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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

६० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद्
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥११८
युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं प्रपूरयेत् ।
युक्तं युक्तं प्रबध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥११९
चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् ।
तत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥१२०
यथा तृतीयकाले तु रविः प्रत्याहरेत्प्रभाम् ।
तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं हरेत् ॥१२१
इत्युपनिषत् ॥
प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं और
प्राणायाम से रहित होने से सब रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ११६ ॥ हिचकी,
खांसी, श्वास, सिर, कान और आंख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के
रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है ॥ ११७ ॥ जिस प्रकार
सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी
प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिये, अन्यथा वह साधक
का नाश कर देता है ॥ ११८ ॥ वायु को युक्तिपूर्वक ही बाहर
निकालना चाहिये और युक्तिपूर्वक ही भीतर लेना चाहिये और युक्ति
से ही रोकना चाहिये, तभी सिद्धि मिलती है ॥ ११९ ॥ चक्षु आदि
इन्द्रियां जो विषयों की तरफ चलती हैं उस को रोकना प्रत्याहार
है ॥ १२० ॥ जिस प्रकार तीसरे प्रहर में सूर्य का प्रकाश कम हो
जाता है, उसी प्रकार योगी तीसरे अङ्ग में स्थिर होकर मन के विकारों
का शमन करे, यह उपनिषद् है ॥ १२१ ॥
॥ योगचूड़ामणि उपनिषद् समाप्त ॥
――――
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
महोपनिषद्
ॐ आप्याय तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो
बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निरा-
कुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे
अस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते
मयि सन्तु। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों, वाणी, घ्राण, चक्षु श्रोत्र, बल और
सब इन्द्रियाँ वृद्धि को प्राप्त हों सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं। मुझसे ब्रह्म
का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे। उसमें रत हुये मुझको
उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
प्रथमोऽध्यायः
अथातो महोपनिषदं व्याख्यास्यामः।
तदाहुः—एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो
नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यो न
चन्द्रमाः। स एकाकी न रमेत।
तस्य ध्यानान्तः स्थस्य यज्ञस्तोममुच्यते।
तस्मिन् पुरुषाश्चतुर्दश जायन्ते एका कन्या दशेन्द्रियाणि
मन एकादशं तेजो द्वादशमहं कारस्त्रयोदश प्राणश्चतुर्दश आत्मा
पञ्चदश बुद्धि भूतानि पञ्च तन्मात्राणि पञ्च महाभूतानि स एकः
पञ्चविंशयन्तिः पुरुषः तत्पुरुषं पुरुषो निवेश्य नास्य प्रधानसंवत्सरा
जायन्ते संवत्सरादधिजायन्ते ॥१-६॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

६२ ] [ प्रथम अध्याय

६२ ] [ प्रथम अध्याय
महोपनिषद् का आरम्भ किया जाता है कि आदि में केवल एक
नारायण ही थे । ब्रह्मा, रुद्र, जल, अग्नि, सो, आकाश, पृथिवी, नक्षत्र,
सूर्य एवं चन्द्रमा आदि कुछ भी नहीं था । नारायण को अकेले रहना
अच्छा नहीं लगा । तब उन्होंने अन्तःस्थ सङ्कल्प रूपी ध्यान किया ।
वह ध्यान ही यज्ञस्तोम कहा गया है । उस ध्यान से ही चौदह पुरुष
और एक कन्या की उत्पत्ति हुई । वे चौदह पुरुष हैं—दस इन्द्रियाँ,
तेजस्वी मन, अहङ्कार, प्राण और आत्मा । इन चौदहों के अतिरिक्त
बुद्धि रूपिणी कन्या हुई । इनसे भिन्न सूक्ष्म भूत वाली पञ्च तन्मात्राएँ
और पञ्च महाभूत हुये । इन पच्चीसों के योग से एक पुरुष बना ।
उस पुरुष में विराट् पुरुष प्रविष्ट हुआ । परन्तु इस पच्चीस तत्व युक्त
विराट् रूप से संवत्सरों की उत्पत्ति नहीं हुई । संवत्सर तो कालरूप
संवत्सर से ही प्रकट हुये हैं ॥ १-६ ॥
अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायता
लतस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषो जायते
बिभ्रच्छ्रियं यशः सत्यं ब्रह्मचर्यं तपो वैराग्यं मन ऐश्वर्यं सप्रणवा
व्याहृतय ऋग्यजुः सामाथर्वाङ्गिरसः सर्वाणि छन्दांसि तान्यंगे
समाश्रितानि तस्मादीशानो महादेवो महादेवः ॥७॥
अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायत ।
तस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमाः प्रतता
आपः । तत्तस्तेजो हिरण्मयमण्डम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखो-
ऽजायत ॥८॥
सोऽध्यायत् । पूर्वाभिमुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिर्गायत्रं
छन्द ऋग्वेदोऽग्निर्देवता । पश्चिमाभिमुखो भूत्वा भुव इति
व्याहृतिस्त्रिष्टुभं छन्दो यजुर्वेदो वायुर्देवता । उत्तराभिमुखो भूत्वा
स्वरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः सूर्योदेवता । दक्षिणाभि-

[Header] महोपनिषद् [ ६३ ]

मुखो भूत्वा मह इति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः सोमो
देवता ॥६॥
सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥१०
विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ।
पतिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रें क विश्वरूपिणम् ॥११॥

फिर उन नारायण ने अन्य सङ्कल्पयुक्त अन्तःस्थ ध्यान किया ।
उनके उस ध्यान से एक ऐसे पुरुष की उत्पत्ति हुई जो तीन नेत्रों वाला
था तथा वह अपने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये था । यश, सत्य,
तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, नियन्त्रित मन, ऐश्वर्य, प्रणव युक्त व्याहृतियां,
चारों वेद और सम्पूर्ण छन्द उस सिद्ध पुरुष में समाश्रित थे । इसीलिए
उसका नाम ईशान एवम् महादेव हुआ । उन प्रसिद्ध नारायण ने पुनः
अन्तःस्थ ध्यान किया, उस समय उनके ललाट से पसीना टपकते लगा ।
वह पसीना ही जल रूप में फैल गया । उस जल में ही एक अणुकार
हिरण्यमय तेज की उत्पत्ति हुई । उस तेज से ही ब्रह्माजी उत्पन्न
हुये । ब्रह्मा जी पूर्व की ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री छन्द,
ऋग्वेद और अग्नि का ध्यान करने लगे । पश्चिम की ओर मुख करके
भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप छन्द, यजुर्वेद और वायु का ध्यान करने लगे ।
उत्तराभिमुख होकर स्वः व्याहृति, जगती छन्द, सामवेद और सूर्य का
ध्यान करने लगे । फिर उन्होंने दक्षिणाभिमुख होकर महः व्याहृति,
अनुष्टुप्त छन्द, अथर्ववेद और सोम का ध्यान किया । फिर उन ब्रह्मा ने
सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र वाले, सर्व मङ्गलों के कारण, सर्वत्र व्याप्त,
परात्पर और नित्य स्वरूप नारायण का ध्यान किया और उन्होंने उन
जगदीश्वर के क्षीर सागर में शयन करते हुए, दर्शन किये तथा यह
जाना कि यही परममुख विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण संसार का जीवन
इन्हीं पर अवलम्बित है ॥७-११॥

९४ ] [ द्वितीय अध्याय

९४ ] [ द्वितीय अध्याय
पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसंनिभम् ।
हृदयं चाप्यधोमुखं संतस्तै सीत्काराभिश्च ॥१२
तस्ये मध्यं महानर्चिर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखम् ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥१३
तस्याः शिखाया मध्ये पुरुषः परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्मा स ईशानः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
इति महोपनिषत् ॥१४॥
जो भले प्रकार से पद्मकोश के समान लम्बायमान एवं अधोमुख
हृदय है, उससे सीत्कार शब्द निकलता रहता है । उस हृदय के मध्य
में ही एक ज्वाला प्रदीप्त है । वही ज्वाला दीपशिखा के समान दसों
दिशाओं में प्रकाश को बाँटकर विश्व को प्रकाशित करती है । उसी
ज्वाला के मध्य में कुछ ऊपर उठी हुई एक क्षीण वह्निशिखा है । उसी
शिखा में परमात्मा निवास करते हैं । वही परमात्मा ब्रह्मा, ईशान, इन्द्र
हैं तथा वे अविनाशी एवम् परम स्वराट् हैं ॥ १२-१४ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥
द्वितीयोऽध्यायः
शुको नाम महातेजाः स्वरूपानन्दतत्परः ।
जातमात्रेण मुनिराड् यत् सत्यं तदवाप्तवान् ॥१
तेनासौ स्वविवेकेन स्वयमेव महामनाः ।
प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्नुयात् ॥२
अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः ।
चिन्मात्र मेवायमणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ॥३
चिदणोः परमस्यान्तः कोटिब्रह्माण्डरेणवः ।
उत्पत्तिस्थितिमभ्येत्य लीयन्ते शक्तिपर्ययात् ॥४

महोपनिषद् ] [ ६५
आकाशं बाह्यशून्यत्वादनाकाशं तु चित्त्वतः ।
न किंचिद्यदिनर्देश्यं वस्तु सत्तेति किंचन ॥५
आत्मा के परम आनन्द का निरन्तर आस्वादन करने वाले एक
अत्यन्त तेजस्वी मुनीश्वर थे । उनका नाम शुकदेव था । जन्म लेते ही
उन्हें सत्य एवं तत्वज्ञान की प्राप्ति हो गई थी । इसीलिये उन्होंने किसी
की सहायता लिये बिना ही, बहुत काल तक विचार करने के पश्चात्
अपने ही विवेक से आत्मस्वरूप क्या है, इस पर एक निश्चित धारणा
बनाई । आत्मा अनिर्वचनीय है इसलिये अगम्य है और मन रूपी षष्ठ
इन्द्रिय में अवस्थित होने से यह अणु के आकार का है, चिन्मात्र एवं
आकाश तत्व से भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म है । इस परम चिद् रूप अणु में
कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड रेणुकायें शक्ति क्रम के अनुसार उत्पन्न स्थित और
विलय होती रहती हैं । यह आत्मा चिद्रूप होने के कारण आकाश रूप
से भिन्न है, परन्तु बाह्य-शून्यता के कारण आकाश रूप भी है । इसके
रूप का वर्णन नहीं हो सकने से यह वस्तु रूप नहीं है, परन्तु सत्ता
होने से वस्तु रूप है ॥ १-५ ॥
चेतनोऽसौ प्रकाशत्वाद्वैद्याभावाच्छिलोपमः ।
स्वात्मनि व्योमनि स्वच्छे जगदुन्मेषचित्रकृत् ॥६
तद्भामात्रमिदं विश्वमिति न स्यात्ततः पृथक् ।
जवद्भे दोऽपि तद्भानमिति भेदोऽपि तन्मयः ॥७
सर्वगः सर्वसंबन्धो गत्यभावान्न गच्छति ।
नास्त्यसावाश्रयाभावात् सद्भूतत्वादथास्ति च ॥८
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुः परायणम् ।
सर्वसंकल्पसंन्यासश्चेतसा यत्परिग्रहः ॥६
जाग्रतः प्रत्ययाभावं यस्याहुः प्रत्ययं बुधाः ।
यत्सङ्कोचविकासाभ्यां जगत्प्रलयसृष्टयः ॥१०

६६ ] [द्वितीय अध्याय

६६ ] [द्वितीय अध्याय
प्रकाशात्मक होने के कारण यह चेतन स्वरूप है, परन्तु
वेदनात्मक होने से शिला रूप है। अपने अन्तरतम में यह विभिन्न
प्रकार के विश्व का उन्मेष करने वाला है। यह विश्व उसी का अपना
प्रकाश मात्र होने से उससे भिन्न नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में
परिलक्षित होता है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। सबसे सम्बद्ध
होने के कारण उसकी गति सर्वत्र है, परन्तु उसमें गति न होने से
चलता-फिरता नहीं है। निराश्रित होने से वह नास्ति रूप है, परन्तु
तत्स्वरूप होने के कारण उसे अस्ति रूप मात्र हो गया है। वही धन
देने वाले की महान गति है। आनन्द एवं विज्ञान रूप जो ब्रह्म है तथा
जिसका ग्रहण सभी मानसिक सङ्कल्पों का त्याग मात्र ही है, मेधावी
जन जिसकी प्रतीति जाग्रत अवस्था की प्रतीति न होने को ही कहते हैं
तथा जिसके संकोच से प्रलय और विकास से सृष्टि की रचना
होती है ॥ ६-१० ॥
निष्ठा वेदान्तवाक्यानामथ वाचामगोचरः ।
अहं सच्चित्परानन्दब्रह्म वास्मि न चेतरः ॥११
स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्वं विज्ञातवान् शुकः ।
स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ॥१२
इदं वस्त्विति विश्वासं नासावात्मन्युपाययौ ।
केवलं विररामास्य चेतो विषयचापलम् ।
भोगेभ्यो भूरिभङ्गेभ्यो धाराभ्य इव चातकः ॥१३
एकदा सोऽमलप्रज्ञो मेरावेकान्तसंस्थितम् ।
पप्रच्छ पितरं भक्त्या कृष्णद्वैपायनं मुनिम् ॥१४
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने ।
कथं च प्रशमं याति कियत् कस्य कदा वद ॥१५
जो वेदान्त वाक्यों को निष्ठा रूप तथा वाणी के लिए अकथनीय
हैं, मैं उस सत् चित् एवं परमानन्द स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं हूँ।

महोपनिषत् ] [ ६७
अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा श्री शुकदेव जी ने यह सब कुछ जान लिया
और इस स्वयं उपलब्ध परम तत्व में वे निरन्तर लगे रहने वाले मन
से युक्त हुये। उनके हृदय में इस प्रकार विश्वास जम गया कि यही वस्तु
है, इनसे भिन्न कुछ नहीं है। जैसे धारा प्रवाह वर्षा से सन्तुष्ट हुये
चातक की चञ्चलता दूर हो जाती है, वैसे ही शुकदेव जी का चित्त
विभिन्न प्रकार के भोगों से उत्पन्न चञ्चलता से मुक्त होकर कैवल्य
अवस्था को प्राप्त हुआ। उन शुकदेव जी ने एक बार मेरु पर्वत के
निर्जन में स्थित अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन की कुटी में जाकर उनसे
भक्तिपूर्वक निवेदन किया—'महामुने ! इस संसार रूप प्रपञ्च की उत्पत्ति
किस प्रकार हुई और इसका विलय किस प्रकार होता है, यह क्या है,
किसका है, इसकी उत्पत्ति कब हुई, यह सब मुझे कृपापूर्वक
कहिये ॥ ११--१५ ॥
एवं पृष्टेन मुनिना व्यासेनाखिलमात्मजे ।
यथावदखिलं प्रोक्तं वक्तव्यं विदितात्मना ॥१६॥
अज्ञासिषं पूर्वमेवमहमित्यथ तत्पितुः ।
स शुकः स्वकया बुद्ध्वा न वाक्यं बहु मन्यत ॥१७॥
व्यासोऽपि भगवान् बुद्ध् वा पुत्राभिप्रायमीदृशम् ।
प्रत्युवाच पुनः पुत्रं नाहं जानामि तत्त्वतः ॥१८॥
जनको नाम भूपालो विद्यते मिथिलापुरे ।
यथावद्वेत्त्यसौ वेद्यं तस्मात् सर्वमवाप्स्यसि ॥१९॥
पित्रैत्युक्तः शुकः प्रायात् सुमेरोर्वसुधात लम् ।
विदेहनगरीं प्राप जनकेनाभिपालिताम् ॥२०॥
शुकदेव जी इस प्रकार जिज्ञासा देखकर आत्मज्ञानी मुनि ने
सभी बातें यथावत् कहीं। परन्तु शुकदेव जी ने समझा कि यह सब
बातें तो मैं पहले से ही जानता हूं और अपने पिता की बातों पर
विशेष ध्यान न दिया। उनके इस भाव को व्यास जी ने समझ लिया

६८ ] [ द्वितीय अध्याय

६८ ] [ द्वितीय अध्याय
और वे कहने लगे—'पुत्र मैं इन बातों को तत्वपूर्वक नहीं जानता।
यदि तुम इस विषय में जिज्ञासा रखते हो तो मिथिला नरेश जनक के
पास जाओ। वे इस विषय के पूर्ण ज्ञाता हैं। तुम्हें उनसे इच्छित ज्ञान
की उपलब्धि होगी।' पिता के इस कथन पर शुकदेव जी मेरुपर्वत से
उतरकर, समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक की मिथिला
पुरी में प्रविष्ट हुये ॥ १६-–२० ॥
आवेदितोऽसौ याष्टीकैर्जनकाय महात्मने ।
द्वारि व्याससुतो राजन् शुकोऽत्र स्थितवानिति ॥२१॥
जिज्ञासार्थं शुकस्यासावास्तामेवेत्यवज्ञया ।
उक्त्वा बभूव जनकस्तूष्णीं सप्त दिनान्यथ ॥२२॥
ततः प्रवेशयामास जनकः शुकमंगणे ।
तत्राहानि स सप्तैव तथैवावसदुन्मनाः ॥२३॥
ततः प्रवेशयामास जनकोऽन्तःपुराजिरे ।
राजा न दृश्यते तावदिति सप्त दिनानि तम् ॥२४॥
तत्रोन्मदाभिः कान्ताभिर्भोजनैर्भोगसंचयैः ।
जनको लालयायास शुकं शशिनिभाननम् ॥२५॥
ते भोगास्तानि भोज्यानि व्यासपुत्रस्य तन्मनः ।
नाजुहुर्मन्दपवनो बद्धपीठमिवाचलम् ॥२६॥
केवलं सुसमः स्वच्छो मौनी मुदितमानसः ।
सम्पूर्ण इव शीतांशुस्तिष्ठदमलः शुकः ॥२७॥
शुकदेव जी को आया देखकर द्वारपालों ने महाराज जनक के
पास जाकर निवेदन किया—'श्रीमन् महर्षि व्यासदेव जी के सुपुत्र
श्री शुकदेव जी राज-द्वार पर खड़े हैं।' यह सुनकर राजा जनक ने
अवज्ञापूर्ण कहा कि 'वे वहीं ठहरे रहें और सात दिन तक उनकी
कोई खबर नहीं ली। आठवें दिन उन्हें राज-प्राङ्गण में बुलवा कर
फिर सात दिन तक उनसे बात नहीं की। इसके बाद उन्हें अन्तःपुर

महोपनिषद् [ ६६
के आंगन में बुलवाया, परन्तु फिर भी सात दिन तक राजा उनके समाने
नहीं आये । इसके पश्चात् बाईसवें दिन उनका युवती नारियां, विभिन्न
प्रकार के भोजनों और योग्य वस्तुओं द्वारा महाराज ने सत्कार
किया । परन्तु सौम्यवदन शुकदेव जी के मन में उन भोगों के प्रति कोई
आकर्षण उत्पन्न नहीं हुआ । जैसे मन्द पवन दृढ़ पर्वत को नहीं डिगा
सकता, वैसे ही राजा द्वारा प्रस्तुत कोई भोग साधन शुकदेव जी के मन
को नहीं डिगा सकता । वे विकार रहित भाव से युक्त प्रसन्नचित्त,
समभाव वाले तथा संग-दोष से रहित निर्मल पूर्णचन्द्र के समान शुभ्र
तेज वाले बने रहे ॥२१-२७॥
परिज्ञातस्वभावं तं शुकं स जनको नृपः
आनीय मुदितात्मानमवलोक्य ननाम ह ॥२८॥
निःशेषितजगत्कार्यः प्राप्ताखिलमनोरथः ।
किमीप्सितं तवेत्याह कृतस्वागतमाह तम् ॥२९॥
संसाराडम्बरमिदंकथमभ्युत्थितं गुरो ।
कथं प्रशममायाति यथावत् कथयाशुमे ॥३०॥
यथावदखिलं प्रोक्तं जनकेन महात्मना ।
तदेव यत् पुरा प्रोक्तं तस्य पित्रा महाधिया ॥३१॥
स्वयमेव मया पूर्वमभिज्ञातं विशेषतः ।
एतदेव हि पृष्टेन पित्रा मे समुदाहृतम् ॥३२॥
भवताऽप्येषः एवार्थः कथितो वाग्विदां वर ।
एष एव हि वाक्यार्थः शास्त्रेषु परिदृश्यते ॥३३॥
मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् ।
क्षीयते दग्धसंसारो निःसार इति निश्चितः ॥३४॥
तत् किमेतन्महाबाहो सत्यं ब्रूहि ममाचलम् ।
त्वत्तो विश्रममाप्नोति चेतसा भ्रमता जगत् ॥३५॥

१०० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [द्वितीय अध्याय
महाराज जनक ने इस प्रकार श्री शुकदेव जी की परीक्षा की
और जब उन्हें अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण पाया तब उन्हें अपने समीप
बुलाकर प्रणाम किया और उनका सौम्य सत्कार करते हुये बोले-
आपने अपने सांसारिक विषयों को समाप्त कर दिया है और आप स्वयं
ही पूर्ण मनोरथ हैं, कृपया बतलाइये अब आपकी क्या कामना शेष है ?
इस पर श्री शुकदेव जी ने जिज्ञासु भाव से निवेदन किया- 'हे गुरु श्रेष्ठ
इस सांसारिक प्रपञ्च की उत्पत्ति किस प्रकार होती है और यह कैसे
लय को प्राप्त होती है ? इस सम्बन्ध में मुझे यथार्थ बात शीघ्र ही
बताने की कृपा करें।' इस पर जो बातें महान आत्मा महाराज जनक
ने उन्हें बतलाईं, वे सब बातें उनके पिता परमज्ञानी व्यास जी पहले
ही बता चुके थे । अतः शुकदेव जी ने कहा इन सब बातों को मैंने स्वयं
जाना था, यही बातें मेरे पिता जी ने भी बतलाईं थीं, और आपने भी
यही बातें मुझसे कही हैं और ऐसा ही शास्त्र कहते हैं । मानसिक संकल्प
से प्रपंच की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के नष्ट होने पर प्रपंच
का भी नाश हो जाता है । यह संसार निन्दनीय एवं सार-रहित है, तब
यह क्या वस्तु है ? यही बात मुझे यथार्थ रूप में कहिए । मेरा यह
चित्त संसार के विषय में भ्रमित हो रहा है, उसे आपके सदुपदेश द्वारा
ही शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥२८-३५॥

शृणु तावदिदानीं त्वं कथ्यमानमिदं मया ।
श्रीशुक ज्ञानविस्तारं बुद्धिसारान्तरान्तरम् ॥ ३६ ॥
यद्विज्ञानात् पुमान् सद्यो जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥३७॥
दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् ।
संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृ तिः ॥३८॥
अशेषेण परित्यागो वासनाया य उत्तमः ।
मोक्ष इत्युच्यते सद्भिः स एक विमलक्रमः ॥३९॥

महोपनिषत् [ १०१
ये शुद्धवासना भूयो न जन्मानर्थभागिनः ।
ज्ञातज्ञेयास्त उच्यन्ते जीवन्मुक्ता महाधियः ॥४०॥
पदार्थभावनादार्थं बन्ध इत्यभिधीयते ।
वासनातानवं ब्रह्मन् मोक्ष इत्यभिधीयते ॥४१॥
इस पर राजा जनक बोले—'हे शुकदेव जी ! अब मैं तुम्हारे
प्रति ज्ञान को विस्तृत रूप से कहता हूं। यह ज्ञान सभी ज्ञानों का सार
और सभी रहस्यों का रहस्य है जो पुरुष इसे जान लेता है, वह शीघ्र
ही मुक्ति को प्राप्त होता है ।
महाराज ने कहा—'यह ज्ञान प्राप्त होने पर कि यह दृश्य जगत
भ्रम है, दृश्य-विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। जब यह ज्ञान पूर्ण
हो जाता है, तब निर्वाणमयी शान्ति प्राप्त होती है । त्याग वही परम
श्रेष्ठ है जिसमें वासनाओं की पूर्ण समाप्ति की गई हो । यही श्रेष्ठ
अवस्था विद्वानों द्वारा मोक्ष कही गई है। जो शुद्ध कामना से युक्त और
अनर्थ-शून्य जीवन वाले हैं तथा जो जानने योग्य तत्त्व के ज्ञाता हैं, वही
पुरुष जीवन्मुक्त कहे जाते हैं, हे शुकदेव जी ! पदार्थ-भावना में दृढ़ता
ही बन्धन है और वासनाओं के क्षय को ही मोक्ष कहा गया है ।३६-४१।
तपःप्रभृतिना यस्मै हेतुनैव विना पुनः ।
भोगा इव न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४२॥
आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतः ।
न हृष्यति ग्लायति यः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४३॥
हर्षामर्षभयक्रोधकामकार्पण्यदृष्टिभिः ।
न परामृश्यते योऽन्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४४॥
अहंकारमयीं त्यक्त्वा वासनां लीलयैव यः ।
तिष्ठति ध्येयसं त्यागी स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४५॥
ईप्सितानीप्सिते न स्तो यस्यान्तर्वर्तिदृष्टिषु ।
सुषुप्तिवच्चरत्यन्तस्स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४६॥

१०२ ] [ द्वितीब भाग
अध्यात्मरतिरासीनः पूर्णः पावनमानसः ।
प्राप्तानुत्तमविश्रान्तिर्न किंचिदिह वाञ्छति ।
यो जीवति गतस्नेहः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४७॥
संवेद्येन हृदाकाशे मनागपि न लिप्यते ।
यस्यासावजडा संवित् स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४८॥
रागद्वेषौ सुखं दुःखं धर्माधमौ फलाफले ।
यः करोत्यनपेक्ष्यैव स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४९॥
मौनवान् निरहंभावो निर्मानो मुक्तमत्सरः ।
यः करोति गतोद्वेगः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५०॥
सर्वत्र विगत स्नेहो यः साक्षिबदवस्थितः ।
निरीच्छो वर्तते कार्ये जीवन्मुक्त उच्यते ॥५१॥
येन धर्ममधमं च मनोमननमूहितम् ।
सर्वमन्तः परित्यक्तं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५२॥
यावती दृश्यकलना सकलेयं विलोक्यते ।
स येन सुष्ठु संत्यक्ता स जीवन्मुता उच्यते ॥५३॥
कट्वम्ललवणं तिक्तममृष्टं मृष्टमेव च ।
सममेव च यो भुङ्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५४॥
जरा मरणमापच्च राज्यं दारिद्य्रमेव वा ।
रम्यमित्येव यो भुङ्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५५॥
धर्माधमौ सुखं दुःख तथा मरणजन्मनी ।
धिया येन सुसंत्यक्तं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५६॥
उद्वेगानन्दरहितः समया स्वच्छया धिया ।
न शोचते न चोदेति स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५७॥
सर्वेच्छाः सकलाः शंकाः सर्वेहाः सर्वनिश्चयाः ।
धिया येन परित्यक्ताः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५८॥
जन्मस्थितिविनाशेषु सोदयास्तमयेषु च ।

महोपनिषत् ] [ १०३
सममेव मनो यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५९॥
न किंचन द्वेष्टि तथा न किंचिदपि काङ्क्षति ।
भुङ्क्तेयः प्रकृतान् भोगान् स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६०॥
शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः ।
यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६१॥
यः समस्तार्थ जालेषु व्यवहार्यपि निस्पृहः ।
परार्थेष्विव पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६२॥
जीवन्मुक्त वही है जो तप आदि साधनों के बिना, स्वभाव से ही
सांसारिक भोगों से विरक्त है । समय-समय पर मिलने वाले सुख
अथवा दुःख में जो आसक्त नहीं होता तथा जो सुख से हर्षित अथवा
दुःख से दुःखित नहीं होता, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है । ऐसा पुरुष
काम, क्रोध, हर्ष, उद्वेग, शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है और
अहंकारयुक्त वासना को स्वभाव से ही त्याग देता है । चित्त के
अवलम्बन में जो सदा त्याग-भाव रखता है, वही जीवन्मुक्त है । जो
सदा अन्तर्मुखी दृष्टि वाला, पदार्थ-आकांक्षा से रहित, किसी वस्तु की
कामना या उपेक्षा से शून्य सुषुप्ति के समान अवस्था में स्थित रहने
वाला है, वह जीवन्मुक्त है । जो पूर्ण पवित्र मन वाला, सदा आत्मा में
लीन रहने वाला, अत्यन्त शांत अवस्था में रहने वाला, कामना और
आसक्ति से रहित सदा उदासीन रहता, वह जीवन्मुक्त है । जिसका
हृदय किसी पदार्थ में लिप्त नहीं रहता और चेतन संवित् स्वरूप वाला
है, वह जीवन्मुक्त है । जो किसी कार्य में फलाफल की अपेक्षा नहीं करता
तथा जो राग-द्वेष से रहित, सुख-दुःख से निरपेक्ष, और धर्माधर्म में
निर्लिप्त है वह जीवन्मुक्त है । जिसने अहंकार के भाव का परित्याग कर
दिया है, जो मान-मत्सर के विकार से मुक्त हो गया है, जो उद्वेग-रहित
होकर कर्म में रत हैं, उसे ही ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं। जो मोह
रहित रहकर साक्षी के समान जीवन व्यतीत करता है और बिना किसी
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१०४ ] [ द्वितीय अध्याय

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय
फल की कामना किये कर्म में लगा रहता है. वह पुरुष जीवन्मुक्त ही
है। जिसने धर्माधर्म और सभी कामनाओं तथा सांसारिक विषयों के
चिन्तन का त्याग कर दिया है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं । जिसने इस
दिखाई पड़ने वाले विश्वरूप प्रपंच का भले प्रकार त्याग कर दिया है, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो पुरुष, खट्टे, चरपरे, कडुवे, मीठे, नमकीन
आदि पदार्थों को स्वाद की चिन्ता किये बिना अर्थात् स्वादिष्ट और
स्वाद रहित तथा खराब स्वाद वाले पदार्थों को एक समान मानकर
भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त है । जो वृद्धावस्था, मृत्यु विपत्ति,
ऐश्वर्य-भोग एवं दारिद्रय में समभाव रखता हुआ सब स्थितियों में संतुष्ट
रहता है, वह जीवन्मुक्त है। धर्माधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म मरण में हर्ष
विषाद न करने वाला पुरुष जीवन्मुक्त है। जो उद्वेग और आनन्द से
रहित, शोक अथवा हर्षोत्साह से ममत्व एवं स्वच्छ बुद्धि वाला है,
वह जीवन्मुक्त है। सभी इच्छाओं, शंकाओं, कामनाओं और निश्चयों को
जिसने पूर्णतः त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त है । उत्पत्ति, स्थिति और
विलीनावस्था में तथा उन्नति-अवनति में जो समान मन वाला है. वह
जीवन्मुक्त है। जो केवल प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला आकां-
क्षाओं में रहित तथा किसी के प्रति द्वेष-ईर्ष्या नहीं करता. वह जीवन्मुक्त
है। जो कलायुक्त होते हुये भी कला-रहित रहता है, चित्त के रहते हुये
भी जो चित्त रहित बना हुआ है तथा जिसने सांसारिक विषयों का
चिन्तन छोड़ दिया है, वह जीवन्मुक्त है । विश्व के सभी अर्थ-जालों के
मध्य स्थिर होकर भी उसने पराये धन से निस्पृह रहने वाले धर्मात्मा
के समान जो पुरुष निस्पृह रहता है, वह आत्मा में ही पूर्णता का अनु-
भव करने वाला महात्मा जीवन्मुक्त हैं ॥४२-६२॥
जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।
विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥६३॥
विदेहमुक्तो नोदेति नास्तमेति न शाम्यति ।

महोपनिषत् ] [ १०५
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न सन्नासन्न दूरस्थो न चाहं न च नेतरः ॥६४॥
ततः रितमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ।
अनाख्यमनभिव्यक्तं सत् किंचिदवशिष्यते ॥६५॥
न शून्यं नापि चाकारि न दृश्यं नापि दर्शनम् ।
न च भूतपदार्थौघसदनन्ततया स्थितम् ॥६६॥
किमप्यव्यप देशात्मा पूर्णात् पूर्णतराकृतिः ।
न सन्नासन्न सदसन्न भावो भावनं न च ॥६७॥
चिन्मात्रं चैत्यरहितमनन्तमजरं शिवम् ।
अनादिमध्यपर्यन्तं यदनाधि निरामयम् ॥६८
द्रष्टृ दर्शनदृश्यानां मध्ये यद्दर्शनं स्मृतम् ।
नातः परतरं किंचिन्निश्श्वयोऽस्त्यपरो मुने ॥६६
स्वयमेव त्वया ज्ञातं गुरुतश्च पुनः श्रुतम् ।
स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निसंकल्पाद्विमुच्यते ॥७०-
तेन स्वयं त्वया ज्ञातं ज्ञेयं यस्य महात्मनः ।
भोगेभ्यो ह्यरतिर्जाता दृश्याद्वा सकलादिह ॥७१
प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं भवता पूर्णचेतसा ।
स्वरूपे तपसि ब्रह्मन् मुक्तास्त्वं भ्रान्तिमुत्सृज ॥७२
अतिबाह्यं तथा बाह्यमन्तराभ्यन्तरं धियः ।
शुक पश्यन्न पश्येस्त्वं साक्षी संपूर्णकेवलः ॥७३
वह पुरुष काल के द्वारा शरीर के कलवित कर लिये जाने
पर जीवन्मुक्ता अवस्था को त्यागकर उसी प्रकार विदेह मुक्तावस्था को
प्राप्त होता है जिस प्रकार गतिहीन पवन हो जाता है । विदेहमुक्त
अवस्था में उन्नति, अवनति से दूर रहता है, उस समय उसका लय भी
नहीं होता । उसकी वह अवस्था सत्, असत् से परे होती है और वह
दूरस्थ भी नहीं होती । उसमें अहम्भाव अथवा परभाव भी नहीं होता ।
विदेहमुक्त अवस्था में गंभीरता और स्तब्धता होती है तथा उसमें तेज
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१०६ ] [ द्वितीय अध्याय

१०६ ] [ द्वितीय अध्याय
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एवं अन्धकार का भी अस्तित्व नहीं होता। उसमें अभिव्यक्त न होने
वाला तथा अनिर्वचनीय सत् शेष रहता है। उसका न कोई आकार
है और न शून्य ही है, वह न अदृश्य है और न दिखाई ही देता है।
वह भूत आदि के समूहों से रहित तथा सत् रूप अनन्त में स्थित होता
है। उस विचित्र तत्व के स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता।
उसकी आकृति पूर्ण से भी अत्यन्त पूर्ण है। वह सत्, दोनों में से
कुछ भी नहीं होता और सत् असत् दोनों के योग से भी परे है। उसमें
भावना का भी अभाव होता है। वह चित्त रहित और अनन्त होता है।
तथा चेतनामात्र है। वह शिवस्वरूप, जरारहित और कल्याणकारी
है। आदि, मध्य और अन्त से भी परे है। वह दोषों से मुक्त तथा
अनादि है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन में उसे केवल दर्शन रूप कहा गया
है। हे शुकदेव जी ! इस सम्बन्ध में इतना ही कहा जाता है। तुम इस
तत्त्व के स्वयं जानने वाले हुए हो और तुमने अपने पिता से भी सुना है
कि संकल्प से ही जीव बंधन में पड़ता और संकल्पों का त्याग करने पर
मुक्ति को प्राप्त होता है। जिस तत्व का बोध होने पर सज्जनों को
सांसारिक दृश्य प्रपंचों में विरक्ति हो जाती है, उस तत्त्व को तुमने स्वयं
ही जान लिया है। तुम पूर्ण चेतना को उपलब्ध कर पाने योग्य वस्तु
को प्राप्त कर चुके हो। तुम अपने भ्रम का त्याग करो, तुम तप स्वरूप में
स्वयं स्थित हो इसीलिये मुक्त भी हो। हे शुकदेव जी ! तुम बाह्य तथा
आन्तरिक और अत्यन्त आंतरिक दृश्य को देखते हुए भी उसे नहीं
देखते, क्योंकि तुम कैवल्य स्थिति में साक्षिमात्र रूप से ही अवस्थित
हो ॥ ६३—७३ ॥
विशश्राम शुकस्तूष्णीं स्वस्थे परमवस्तुनि ।
वीतशोकभयायासो निरीहश्छिन्नसंशयः ॥७४
जगाम शिखरं मेरोः समाध्यर्थमखण्डितम् ॥७५
तत्र वर्षसहस्राणि निर्विकल्पसमाधिना ।
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महोपनिषत् । [१०७
देशे स्थित्वा शशामासावात्मन्यस्नेहदीपवत् ॥७६
व्यपगतकलनाकलंकशुद्धः स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ ।
सलिलकण इवाम्बुधौ महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥
इति महोपनिषत् ॥७७
यह सुनकर शुकदेव जी शोक, भय, संशय और श्रमादि से रहित
होकर कामना-हीन होगये और परतत्व रूप आत्मा में स्थित होकर मेरु
पर्वत पर चले । वहाँ वे आत्म-देश में हजारों वर्षों तक स्थित रहे और
उस निर्विकल्प समाधि के द्वारा उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई । जैसे समुद्र
में जल-कण विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं, जैसे ही शुकदेव जी
संकल्प रूप दोषों से मुक्त शुद्ध स्वरूप होकर वासना विहीन होते हुए
पवित्र और निर्मल आत्मपद में एकीभाव को प्राप्त होगए ॥७४-७७॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥
तृतीयोऽध्यायः
निदाघो नाम मुनिराट् प्राप्तविद्यश्च बालकः ।
विहृतस्तीर्थ यात्रार्थं पित्राऽनुज्ञातवान् स्वयम् ॥१
सार्धत्रिकोटितीर्थे स्नात्वा गृसमुपागतः ।
स्वोदन्तं कथयामास ऋभुं नत्वा महायशाः ॥२
सार्धत्रकोटीतीर्थेषु स्नानपुण्यप्रभावतः ।
प्रादुर्भूतो मनसि मे विचारः सोऽयमीदृशः ॥३
जायते मृतये लोको म्रियते जननाय च ।
अस्थिराः सर्वं एवेमे सचराचरचेष्टिताः ॥४
सर्वापदां पदं पोपा भावा विभवभूमयः ।
अयः शलाकासदृशाः परस्परमसङ्गिनः ।
श्लिष्यन्ते केवला भावा मनः कल्पनयाऽनया ॥५
भावेष्वरतिरायाता पथिकस्य मरुष्विव ।

१०८ ] [ तृतीय अध्याय

१०८ ] [ तृतीय अध्याय
शाम्यतीदं कथं दुःखमिति तप्तोऽस्मि चेतसा ॥६
चिन्तानिचयचक्राणि नानन्दाय धनानि मे ।
सप्रसूतकलत्राणि गृहाण्युग्रापदामिव ॥७
इयमस्मिन् स्थितोदारा संसारे परिपेलवा ।
श्रीर्मुने परिमोहाय साऽपि नूनं न शर्मदा ॥८
आयुः पल्लवकाणाग्रलम्बाम्बुकणभंगुरम् ।
उन्मत्त इव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरकम् ॥६
विषयाशीविषासंगपरिजर्जरचेतसाम् ।
अप्रौढात्मविवेकानामायुरायासकारणम् ॥१०
बाल्यावस्था से ही तपकांक्षी निदाघ अपने पिता से आज्ञा लेकर
तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चल पड़े। अपनी इस यात्रा में उन्होंने साढ़े तीन
करोड़ तीर्थों में स्नान किया। फिर घर लौटकर अपने पिता महर्षि ऋभु
को अपनी बात सुनाते हुए कहा—'पिता जी, मैंने जिन साढ़े तीन करोड़
तीर्थों में स्नान किया है, उनके पुण्य स्वरूप मेरे मन में यह विचार उत्पन्न
हुए हैं कि यह विश्व उत्पन्न होता और नष्ट हो जाता है और फिर उत्पन्न
होने के लिये ही नष्ट होता है। तभी चराचर जीवों की चेष्टा वाला यह
प्रपंच अस्थिर है, इसका जीवन क्षण-मात्र है। यह ऐश्वर्ययुक्त सम्पूर्ण
पदार्थ विपत्तियों के कारण हैं। यह सभी लोहे की कील के समान
परस्पर पृथक रहते हुए मानसिक कल्पना रूप चुम्बक के द्वारा ही एकत्र
किये जाते हैं। जैसे मार्ग चलने वाला व्यक्ति मरुभूमि में चलते-चलते
विरक्त हो जाता है, वैसे ही मैं इन सब सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो
रहा हूँ। क्योंकि यह मुझे दुःखदायी जान पड़ते हैं। इस दुःख से मुक्ति
किस प्रकार मिलेगी, यह विचार मेरे हृदय को सन्तप्त कर रहा है।
जिन धन रूप ऐश्वर्यों के कारण चिन्ताएँ चक्कर काटती रहती हैं, वे
धन मेरे लिये सुख देने वाले नहीं हैं। स्त्री, पुत्र आदि सब घोर विपत्तियों
के घर हैं। विश्व में उदारता की मूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी वह लक्ष्मी जी

महोपनिषत् [ १०६
भी अत्यन्त मोह उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही उनके द्वारा जीव
को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। जैसे प०त्ते के अग्रभाग में जो जल की बूँद
लटकती हैं वह क्षणभंगुर है, वैसे ही मनुष्य की आयु भी क्षणभंगुर है।
इसलिये असमय ही इस देह को त्याग कर मुझे उन्मत्त के समान प्रस्थान
करना पड़ेगा। जिनका मन विषयरूपी सर्प के सङ्ग से जीर्ण होगया है
और जिनको आत्म विवेक की प्राप्ति नहीं हुई, उनका जीवन कष्ट का
ही कारण बना है ॥९—१०॥
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्यः च खण्डनम्।
ग्रथनं च तरंगाणामास्था नायुषि युज्यते ॥११
प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते।
पराया निर्वृतेः स्थानं यत्तज्जीवितमुच्यते ॥१२
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः।
स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥१३
जातास्त एव जगति जन्तवः साधुजीविताः।
ये पुनर्नैह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ॥१४
भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिणः।
अशान्तस्य मनो भारं भारोऽनात्मविदो वपुः ॥१५
अहंकारवशादापदहंकाराद्दुराधयः।
अहंकारवशादीहा नाहंकारात् परो रिपुः ॥१६
अहङ्कारवशाद्यच्चन्मया भुक्तं चराचरम्।
तत्तत् सर्वंभवस्त्वेव वस्त्वहंकाररिक्तता ॥१७
इतश्चेतश्च सुव्यग्रं व्यर्थमेवाभिधावति।
मनो दूरतरं याति ग्रामे कौलेयको यथा ॥१८
क्रूरेण जनतां याता (तः) तृष्णाभार्याऽनुगामिना।
वशां कौलेयकेनैव ब्रह्मन् भुक्तोऽस्मि चेतसा ॥१९
अध्यंष्ठिपमात्म्हतः सुमेरूमूलनादपि