१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहोपनिषद् ] [ ६५
आकाशं बाह्यशून्यत्वादनाकाशं तु चित्त्वतः ।
न किंचिद्यदिनर्देश्यं वस्तु सत्तेति किंचन ॥५
आत्मा के परम आनन्द का निरन्तर आस्वादन करने वाले एक
अत्यन्त तेजस्वी मुनीश्वर थे । उनका नाम शुकदेव था । जन्म लेते ही
उन्हें सत्य एवं तत्वज्ञान की प्राप्ति हो गई थी । इसीलिये उन्होंने किसी
की सहायता लिये बिना ही, बहुत काल तक विचार करने के पश्चात्
अपने ही विवेक से आत्मस्वरूप क्या है, इस पर एक निश्चित धारणा
बनाई । आत्मा अनिर्वचनीय है इसलिये अगम्य है और मन रूपी षष्ठ
इन्द्रिय में अवस्थित होने से यह अणु के आकार का है, चिन्मात्र एवं
आकाश तत्व से भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म है । इस परम चिद् रूप अणु में
कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड रेणुकायें शक्ति क्रम के अनुसार उत्पन्न स्थित और
विलय होती रहती हैं । यह आत्मा चिद्रूप होने के कारण आकाश रूप
से भिन्न है, परन्तु बाह्य-शून्यता के कारण आकाश रूप भी है । इसके
रूप का वर्णन नहीं हो सकने से यह वस्तु रूप नहीं है, परन्तु सत्ता
होने से वस्तु रूप है ॥ १-५ ॥
चेतनोऽसौ प्रकाशत्वाद्वैद्याभावाच्छिलोपमः ।
स्वात्मनि व्योमनि स्वच्छे जगदुन्मेषचित्रकृत् ॥६
तद्भामात्रमिदं विश्वमिति न स्यात्ततः पृथक् ।
जवद्भे दोऽपि तद्भानमिति भेदोऽपि तन्मयः ॥७
सर्वगः सर्वसंबन्धो गत्यभावान्न गच्छति ।
नास्त्यसावाश्रयाभावात् सद्भूतत्वादथास्ति च ॥८
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुः परायणम् ।
सर्वसंकल्पसंन्यासश्चेतसा यत्परिग्रहः ॥६
जाग्रतः प्रत्ययाभावं यस्याहुः प्रत्ययं बुधाः ।
यत्सङ्कोचविकासाभ्यां जगत्प्रलयसृष्टयः ॥१०