१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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भूमिका
—:❀:—
साधना के सत्परिणाम
उपनिषदों में योग साधना की अनेक विधियों का वर्णन
है और उनका प्रयोग करने पर जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनका
भी यथास्थान संकेत है। साधना से आत्मबल बढ़ता है और
उसकी अभिवृद्धि से शरीर एवं मन के प्रत्येक क्षेत्र का जाज्वल्य-
मान होना स्वाभाविक है। आत्मबल संसार का सबसे बड़ा
आश्चर्य है, वह जहाँ भी रहेगा वहां चमत्कार क्यों दृष्टिगोचर न
होगा ?
उपनिषदों में वर्णित योग साधनाओं का अपना महत्व है
और साथ ही उस महत्व के अनुरूप अनेक प्रकार के लाभों का
भी समन्वय है। साधना-खण्ड के उपनिषदों में साधना द्वारा
लौकिक और पारलौकिक अनेक प्रकार के लाभों की चर्चा
स्थान-स्थान पर मिलती है। उनकी एक झाँकी नीचे प्रस्तुत है:—
“जीभ और चित्त दोनों कपाल के छिद्र रूप आकाश
में फिरते हैं, तब ऊपर गई हुई जीभ वाला यह पुरुष अमर
हो जाता है।‘"
‘बांये पैर के मूल से मूलरंध्र को दबाकर दाहिना पैर
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( २ )
प्रसार कर उसे दोनों हाथों से पकड़ना और फिर दोनों नथुनों
से वायु भरकर कण्ठबन्ध के ऊपर चढ़ाना और उठी हुई
वायु को रोकना, इससे सर्व क्लेशों का नाश हो जाता है, विष भी
अमृत को तरह पच जाता है। क्षय, गुल्म, गुदावर्त और चर्म
के पुराने रोग नष्ट होजाते हैं। प्राण को जीतने का यह उपाय
सर्वमृत्यु का नाश करने वाला है।
“बायें पैर की ऐड़ी को गुदा-स्थान के साथ जोड़कर
दाहिना पैर बांये पैर रखना और वायु भर कर ठोड़ी को
हृदय की तरफ दबाकर गुदा-स्थान को संकोच कर मन के मध्य
यथाशक्ति धारण करके अपने आत्मा का हवन करना, इससे
अपरोक्ष सिद्धि [ सूक्ष्म जगत की जानकारी ] होती है।
“जो पुरुष जीभ से वायु खींचकर निरन्तर पिया करता
है, उसे श्रम का दाह नहीं होता और रोग नाश होते हैं। जो
जीभ से वायु लेकर उसे जीभ के मूल में रोकता है, वह अमृत
पीता है और उसका सब प्रकार कल्याण होता है।
“जो मनुष्य एक मुहुर्त्त समय तक भी मन के साथ वायु को
नांसाग्र पर नित्य धारण करता है, उसके संकड़ों जन्मों के
पास पूर्णतः छूट जाते हैं।
“नेत्र की पुतली में चित्त का संयम करने से सब विषयों
का ज्ञान होता है। नाक के अग्रभाग पर चित्त का संयम करने से
इन्द्रलोक का ज्ञान होता है, उसके नीचे चित्त का संयम करने से
अग्निलोक का ज्ञान होता है। चक्षु में चित्त का संयम करने से
सर्वलोक का ज्ञान होता है, श्रोत्र में चित्त का संयम करने से
यमलोक का ज्ञान होता है। ...... बाईं आंख में संयम करने से
शिवलोक का ज्ञान होता है, मस्तक में संयम करने से
ब्रह्मलोक का ज्ञान होता है। ...... मस्तक में चित्त का संयम
An exact line-by-line transcription of the provided page in Devanagari script:
( ३ )
करने से सत्यलोक का ज्ञान होता है, धर्म तथा अधर्म से संयम
करने से भूत भविष्य का ज्ञान होता है, विभिन्न प्राणियों की
आवाज करने से उनकी बोली का ज्ञान होता है,
संचित कर्म में संयम करने से पूर्वजन्म का ज्ञान होता है, दूसरे
के चित्त में संयम करने से दूसरे के मन का ज्ञान होता
है। .........कण्ठ कूप में संयम करने से भूख प्यास जाती
रहती है। शरीर के आकाश में संयम करने से आकाश में
गति कर सकता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों में संयम
करने से वे ही सिद्धियां प्राप्त होती हैं।"
—शाण्डिल्य उपनिषद्
"महामुद्रा के प्रभाव से पथ्य-अपथ्य ही नहीं, सब
प्रकार का नीरस भोजन भी रसवान बन जाता है, अधिक
खाया हुआ और तीव्र विष भी अमृत के समान पच जाता है।
क्षय, कोढ़, गुदावर्त्त, (भगन्दर) गुल्म, अजीर्ण और आगे
होने वाले समस्त रोग नष्ट होजाते हैं।"
—योगचूड़ामणि उपनिषद्
"भगवान आदिनारायण ने कहा—योग से योग की
वृद्धि होती है। इसलिये योग के द्वारा ही योग जाने। योग में
सदा दत्तचित्त योगी चिरकाल तक सुखोपभोग करता है।"
---सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद्
"नाड़ी शुद्ध होने पर उसके चिन्ह भी दिखाई देने लगते
हैं। शरीर में हलकापन जान पड़ता है, जठराग्नि तीव्र हो जाती
है, शरीर भी निश्चित रूप से कृश हो जाता है।"
योगी के लिये तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं
रहता।......अतिमानुषी चेष्टायें करने लगता है, पर इस
( ४ )
प्रकार की शक्ति और सामर्थ्य किसी को दिखलानी नहीं
चाहिये ।...........अभ्यास बढ़ाने से बड़ी शक्ति प्राप्त हो जाती
है इस प्रकार भूचर सिद्धि प्राप्त होने से समस्त भूचरों पर
विजय प्राप्त होजाती है। व्याघ्र, शरभ, हाथी, सिंह आदि
योगी के हाथ की मार से ही मर जाते हैं ।.............
ब्रह्मचर्य की धारणा से देह से सुगंध आने लगती है ।......
सदाशिव की धारणा आकाश में करने से आकाश गमन की
शक्ति प्राप्त होती है ।.........पांच प्रकार की धारणाओं से
शरीर दृढ़ होजाता है, मृत्यु का भय जाता रहता है और वह
ब्रह्मप्रलय होने पर भी दुखी नहीं होता ।.......सगुण रूप
साधना से अणिमा आदि सिद्धियां प्राप्त होती है और निर्गुण
ध्यान करने से समाधि की प्राप्ति होती है ।.......जीवात्मा
और परमात्मा की समान अवस्था हो जाती है। अगर अपनी देह
छोड़ने की इच्छा हो तो उसे आसानी से छोड़ा जा सकता है
और फिर जन्म नहीं लेना पड़ता । यदि उसे शरीर प्रिय हो तो
वह शरीर में स्थिर रहकर अणिमादि सिद्धियों से युक्त
सब लोकों में बिहार कर सकता है और चाहे तो कभी भी
स्वर्ग में देवता हो सकता है। वह अपनी इच्छा से मनुष्य
अथवा यक्ष बन सकता है और सिंह व्याघ्र, हाथी आदि कोई
रूप ग्रहण कर सकता है।"
--योगतत्त्व उपनिषद्
"अंगूठा आदि अपने अवयवों में स्फुरण बन्द हो जाने
पर शीघ्र ही अपने जीवन का अन्त होना समझ लेना चाहिए।
इस प्रकार अनिष्टसूचक संकेतों को जानकर योगी को मोक्ष
साधन में ध्यान लगाना चाहिये। जिसके पैर तथा हाथ के
अंगूठों में स्फुरण न जान पड़े उसका जीवन एक वर्ष में समाप्त
( ५ )
हो जाता है। मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (टखना) का
स्फुरण बन्द हो जाने पर छै महीने तक जीवित रहता है।
जब कोहनी में स्फुरण न हो तो जीवन की अवधि तीन मास
रह जाती है। यदि कुक्षि, उपस्थेन्द्रिय में स्फुरण न हो तो
एक महीने में और नेत्रों में स्फुरण न हो तो पन्द्रह दिन में
जीवन का अन्त हो जाता है। जठर द्वार पर स्फुरण न होने से
जीवन की अवधि दस दिन रह जाती है और ज्योति
जुगनू के समान हो जाय तो पांच दिन ही शेष रह जाते हैं।
अगर जिह्वा दिखलाई पड़नी बन्द हो जाय तो तीन दिन का
समय समझना चाहिये। ये सब अनिष्ट आयु के क्षय के कारण
रूप हैं।"
—त्रिशिख ब्राह्मण उपनिषद्
"हृदय स्थान में अष्टदल कमल है। वही ऐसा सोचता
है कि मैं सब कर्मों का कर्त्ता, भोक्ता, सुखी, दुखी, काना, बहिरा,
दुबला, मोटा आदि हूँ। उसमें जीवात्मा ज्योति रूप अणुमात्र में
रहता है। उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है। उस कमल का पूर्व
दल श्वेत वर्ण का है। उसमें निवास करने से भक्ति और
धर्म में मति रहती है। जब आग्नेय दिशा के रक्तवर्ण दल में
निवास होता है तब निद्रा और आलस्य में मति होती है।
दक्षिण वाले कृष्ण दल में निवास होने पर द्वेष और कोप में
मति होती है। नैऋत दिशा के नीलवर्ण दल में निवास करता
है तब पापकर्म और हिंसा में मति रहती है। जब पश्चिम में
स्फटिक वर्ण वाले दल में निवास करता है तब क्रीड़ा, विनोद में
मति होती है। जब वायव्य कोण के माणिक्य रंग वाले दल में
निवास करता है तब चलने और वैराग्य की भावना होती है।
जब उत्तर के पीतवर्ण दल में निवास करता है तब सुख, श्रृङ्गार
( ६ )
में मति होती हैं। जब ईशानकोण में वैडूर्य मणि के वर्ण के दल
में निवास करता है तब दान, दया, एवं करुणा में मति होती
है। संधियों में संधि की मति रहती है, तब वात, पित्त, कफ
सम्बन्धी व्याधियों का प्रकोप होता है। जब मध्य में मति
रहती है तब गाने, नृत्य करने, पढ़ने और आनन्द करने में मति
होती है।"
--ध्यानबिन्दु उपनिषद्
मूलाधार में वीणा से उठने वाला अमूर्तनाद जान पड़ता
है। उसी के मध्य में शङ्ख आदि के समान ध्वनि होती है।
कपाल कुहर के मध्य में आकाश रन्ध्र से जाता हुआ नाद मोर
के शब्द तुल्य होता है।"
--ध्यानबिन्दु उपनिषद्
"जिह्वा को लौटकर कपाल कुहर में ले जाय और दोनों
भाहों के मध्य में दृष्टि को जमाकर रखे। इसके अभ्यास से रोग
और मरण का भय नहीं रहता है और निद्रा भूख प्यास भी नहीं
सताती। खेचरी मुद्रा द्वारा जिसने तालु के छेद को बन्दकर
लिया है, उसका वीर्य क्षय नहीं होता है चाहे वह स्त्री का आलि-
ङ्गन ही क्यों न करे और जब तक वीर्य देह में स्थित है तब तक
मृत्यु का भय कैसा ? जब तक खेचरी मुद्रा रहेगी तब तक
वीर्य पतन नहीं हो सकता।"
--ध्यानबिन्दु उपनिषद्
जिसने खेचरी द्वारा जिह्वा के ऊपरी विवर को बन्दकर
लिया है उसका बिन्दु (वीर्य) फिर किसी तरह नष्ट नहीं हो
सकता। रमणी के आलिङ्गन का भी उस पर प्रभाव नहीं पड़ता।
जब तक देह में वीर्य स्थित है तब तक मृत्यु का क्या भय है?"
--योगचूड़ामणि उपनिषद्
( ७ )
"जब वह नाद, अक्षर में लय हो जाता है तब शब्द
रहित परम पद का रूप होता है। अनाहत शब्द से भी परे
जो शब्द है उसके पाने से ही योगी के संशय की निवृत्ति
होती है।"
--ध्यानबिन्दु उपनिषद्
"तालु मूल के ऊर्ध्व भाग में महाज्योति-किरण -मण्डल
होता है, वही योगियों का लक्ष है। उसी से अणिमादि सिद्धियाँ
प्राप्त होती हैं। जब साधक की अन्तर और बाह्य लक्ष्य को
देखने वाली दृष्टि स्थिर हो जाती है तब शाँभवी मुद्रा होती
है। इस मुद्रा से युक्त ज्ञानी के निवास करने की भूमि
पवित्र मानी जाती है और लोग उसके दर्शन से ही पवित्र हो
जाते हैं।"
—अद्वयतारकोपनिषद्
"आरम्भिक अभ्यास में यह नाद कई तरह का होता
है। पहले तीव्र होता है पीछे अभ्यास से वह धीमा होता
जाता है। इस नाद की ध्वनि झींगुर, झरना, भ्रमर, वीणा,
वंशी, घुंघरु आदि की तरह सुनाई देती है।
भ्रमर जिस तरह फूलों का रस ग्रहण करता हुआ गंध
की अपेक्षा नहीं करता, उसी तरह नाद में रुचि लेने वाला
चित विषय वासना की दुर्गन्ध की इच्छा नहीं रखता। जिस
तरह सर्प नाद को सुनकर मस्त होजाता है, उसी तरह चित्त
उस नाद में आसक्त होकर सभी प्रकार की चंचलतायें भूल
जाता है और एकाग्रता आने लगती है। वासनाओं के वन में
घूमने वाला मन रूपी हाथी नाद के अभ्यास रूपी अंकुश से
ही काबू में आ पाता है। जब शब्दों के साथ मिला हुआ नाद
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अक्षर-ब्रह्म में लीन हो जाता है तब शब्द सुनाई नहीं देते।
यही परमपद है।"
—नादबिन्दु उपनिषद्
"नारायण ने कहा—ज्ञान युक्त यमादि को अष्टाङ्ग योग
कहते हैं। शीत, उष्णता, आहार और निद्रा पर विजय सदैव
शान्ति, निश्चलता और इन्द्रियों पर नियंत्रण, ये यम हैं। गुरु-
भक्ति, सत्यमार्ग पर प्रीति, संतोष, अनासक्ति, एकान्तवास,
मन पर अंकुश, फल की इच्छा का अभाव और वैराग्य, ये
नियम हैं। सुख पूर्वक लम्बे समय तक एक ही स्थिति में
रहना और स्वल्प वस्त्र धारण करना आसन कहलाता है।
सोलह मात्रा का पूरक, चौंसठ मात्रा का कुंभक और बत्तीस
मात्रा का रेचक यह प्राणायाम है। इन्द्रियों के विषयों से मन
को पीछे खींचना यह प्रत्याहार है। मन को चैतन्य में स्थिर
करना धारणा है। सब शरीरों में एक मात्र चैतन्य ही है ऐसी
स्थिरता यही ध्यान है और ध्यान को भी भूल जाना यह
समाधि है। यह सूक्ष्म साधना है। जो इसको जानता है वही
मुक्ति प्राप्त करता है।"
—मण्डलब्राह्मण उपनिषद्
"भौंहों और नासिका की जहां संधि है वहीं स्वर्ग
तथा उससे भी उच्च परमधाम का संधि-स्थान है। वही अवि-
मुक्त (काशी) है। ब्रह्मज्ञानी जन इसी संधि की संध्या रूप
में साधना करते हैं। जो साधक इस प्रकार जानने वाला है कि
अव्यक्त ब्रह्म की साधना का स्थान अविमुक्त क्षेत्र (काशी)
अधिभौतिक स्थान है और भौंहों तथा नासिका का संधि स्थान
आध्यात्मिक काशी है, वही ज्ञानी यथार्थ ज्ञानोपदेश में समर्थ
हो सकता है।
( ६ )
यही आध्यात्मिक अविमुक्त क्षेत्र ( काशी ) सबसे बड़ा
तीर्थ है। यही देवताओं के लिये भी पवित्र है। यही सब देह-
धारियों के लिये परमात्म प्राप्ति का स्थल है। यहाँ जब प्राणी
के प्राण निकलते हैं तब अमृतत्व की प्राप्ति होती है।"
—श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद्
❀ ❀ ❀
लौकिक सुख शान्ति, ऐश्वर्य, आनन्द, समृद्धि सफलता से
लेकर पारलौकिक अन्तः शुद्धि, आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग, मुक्ति,
ब्रह्मप्राप्ति, अमृतत्व आदि सभी संभव सफलताओं का स्रोत
साधना ही है। साधना के बिना केवल दैव के आश्रय बैठे रहने
से किसी को कोई सफलता नहीं मिल सकती, इसलिये उपनिषद-
कारों ने पग-पग पर साधना परायण होने के लिये उपदेश
दिया है। बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष, रोगी-निरोगी, व्यस्त-निवृत्त
सभी कोई अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप साधना कर सकते
हैं और अपने लिये अनुकूल सफलताएँ प्राप्त कर सकते हैं।
यह आवश्यक नहीं कि जो साधनाएँ योगी के लिए उप-
युक्त हैं वे ही सब को करनी चाहिये। प्रत्येक परिस्थिति के
व्यक्ति के लिये उसी लक्ष को प्राप्त कराने वाली साधनाएँ
मौजूद हैं। इन उपनिषदों में भी उस भिन्नता का यत्र-तत्र वर्णन
है। अनुभवी मार्गदर्शकों से तो हर कोई अपनी स्थिति के
अनुरूप साधना पथ जान सकता है और उस मार्ग पर चलते
हुए धीरे-धीरे लौकिक और पारलौकिक सिद्धियाँ उपलब्ध करता
हुआ पूर्णता के लक्ष तक पहुँच सकता है।
अष्ट सिद्धियां
साधना का परिणाम 'सिद्धि' है। जीवनोद्देश्य की
पूर्णता ही सबसे बड़ी सिद्धि मानी जाती है। साधना का लक्ष
( १० )
उसे ही प्राप्त करना है। ८४ प्रकार के योग उसी लक्ष तक
पहुँचने के मार्ग हैं। इस मंजिल तक पहुँचाने में योग साधना ही
एक मात्र अवलम्बन है।
साधना मार्ग पर चलते हुये मील के पत्थरों की तरह
अनेक छोटी-मोटी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती हैं। इनसे
लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख शान्ति का मार्ग प्रशस्त
होता है।
सिद्धियों का वर्णन सभी योग ग्रन्थों में मिलता है।
योगी और सिद्ध पुरुषों में कुछ विलक्षण प्रतिभा, सामर्थ्य एवं
शक्ति देखी भी जाती है। उनमें सामान्य मनुष्य की अपेक्षा
कुछ विशेष आत्मबल होता है, जो विविध रूपों में परिलक्षित
होता है। सिद्ध पुरुष अपनी उपार्जित सिद्धियों का लाभ अपने
निज के लिये नहीं उठाते पर उससे दूसरे सत्पात्रों को लाभान्वित
करते रहते हैं। अपना आत्मबल देकर दूसरों की आत्मा को ऊपर
उठा देने की महान सेवा तो वे निरन्तर करते ही रहते हैं। यदा
कदा किन्हीं सांसारिक अभाव और कष्टों से पीड़ित व्यक्तियों
को अपनी साधना का एक अंश देकर उन्हें कष्टमुक्त कर देते
हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अपना पुण्य-तप कष्ट पीड़ित को दान
रूप में देना पड़ता है और उसके कठिन प्रारब्ध-भोग को भुगतने
को स्वयं तत्पर होना पड़ता है। संसार में हर वस्तु एक नियत
नियम के आधार पर चल रही है। केवल सूखा आशीर्वाद
देने से किसी का कोई भला नहीं हो सकता।। सच्चा आशीर्वाद
जो फलित हो, वही दे सकता है जिसके पास तप की पूँजी
संग्रहीत हो और उसके एक भाग को आशीर्वाद के साथ देते हुये
दूसरे का कठिन प्रारब्ध भोगने के लिये स्वयं तैयार हो। शक्ति-
पात के द्वारा दूसरों की आत्मा को ऊँचा उठाने में भी यही
प्रक्रिया पूर्ण करनी पड़ती है। यह सब सिद्ध पुरुषों के लिये ही
( ११ )
संभव है और सिद्धि साधना के ऊपर टिकी हुई है। कठिन
तपश्चर्या द्वारा ही उसे उपार्जित या उपलब्ध किया जा सकता
है। उपहार के रूप में वह किसी को नहीं मिलती।
साधना मार्ग के पथिकों को समयानुसार जो सिद्धियाँ
मिलती हैं, उनका वर्णन योगशास्त्रों में मिलता है। उनकी
संख्या आठ है, इन्हें अष्ट सिद्धियां भी कहते हैं। इनका वर्णन
इस प्रकार है :—
(१) आत्म सिद्धि—इन्द्रिय संयम, मनोनिग्रह, स्थित-
प्रज्ञता की प्राप्ति, समाधि, आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, तत्व
ज्ञान, भूतजय, मोक्ष, पंच क्लेशों से निवृत्ति, भव बन्धनों से
मुक्ति, संसार की किसी भली-बुरी परिस्थिति का प्रभाव ग्रहण
न करना।
(२) विविधा सिद्धि—पंच तत्वों पर नियन्त्रण, उनके
द्वारा अभीष्ट वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकना,
दूसरों के मन में अपनी भावना तथा मान्यता की स्थापना।
(३) ज्ञान सिद्धि—तीक्ष्ण बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति,
भूतकाल में हुई तथा भविष्य में होने वाली घटनाओं को जान
सकना, दूरस्थ और समीपवर्ती परिस्थितियों का समान रूप से
साक्षात्कार, पूर्वजन्मों का वृत्तान्त जानना, सब प्राणियों के मनो-
गत भावों को जानना, शास्त्रों का सार दर्शन, अन्तःकरण में
वैराग्य और निस्पृह प्रेम।
(४) तप सिद्धि—कठोर तप कर सकने की शक्ति, सर्दी-
गर्मी को बिना कष्ट के सहन, भूख प्यास कर नियन्त्रण, जल थल
और आकाश पर विचरण कर सकना।
(५) क्षेत्र सिद्धि—थोड़े स्थान में बहुत विस्तृत वस्तुओं
का समा सकना, सूक्ष्म शरीर द्वारा देश देशान्तरों और लोक
( १२ )
लोकान्तरों में भ्रमण कर सकना, अपने तेजस को बाहर योजन
प्रदेश तक फैलाकर उस क्षेत्र के दुख तथा अभावों को दूर कर
सकना, शरीरस्थ देवताओं का साक्षात्कार ।
(६) देव सिद्धि—देवताओं, यक्ष, गन्धर्व, प्रेत, पिशाच,
बेताल, ब्रह्म राक्षस छाया पुरुष आदि का अनुग्रह, स्वामित्व
और सहयोग प्राप्त करना । मन्त्र सिद्धि । सिद्ध योगियों का
ब्रह्म रन्ध्र में सम्बन्ध सान्निध्य, षट चक्रों और कुण्डलिनी शक्ति
का जागरण ।
(७) शरीर सिद्धि—दृष्टि या स्पर्श मात्र से दूसरों को
निरोग और कष्ट मुक्त कर देना, अपार शारीरिक बल, अद्भुत
मनोबल, चिन्तन में थकान न होना, निर्वाध भाषण, शाप से
दूसरों को नष्ट कर सकना, स्पर्श से पदार्थों का स्वादिष्ट और
सुगन्धित हो जाना, स्वल्प आहार से बहुतों को तृप्त कर देना,
वाणी से कहे हुये वचनों तथा आशीर्वादों का सफल होना, शरीर
का कायाकल्प, दीर्घ जीवन या अमर होना ।
(८) विक्रिया सिद्धि—अपने शरीर को अन्य शरीरों में
परिवर्तित कर लेना, दूसरों के शरीरों को परिवर्तित कर देना,
शरीर को अति भारी, अति हल्का, अति सूक्ष्म, अति विशाल
बना सकना, अन्तर्ध्यान हो जाना, सर्व वशीकरण, सब कामनाओं
की पूर्ति के साधन जुटाना ।
किन्हीं ग्रन्थों में दूसरी आठ सिद्धियाँ गिनाई गई हैं, वे
इस प्रकार हैं :—
(१) अणिमा—शरीर को अणु के समान सूक्ष्म कर
लेना ।
(२) महिमा—शरीर को बहुत बड़े आकार का बना
लेना ।
( १३ )
(३) गरिमा—शरीर को बहुत भारी कर लेना ।
(४) लघिमा—शरीर को बहुत हलका कर लेना ।
(५) प्राप्ति—दूरस्थ पदार्थों को स्पर्श अथवा प्राप्त कर
लेना ।
(६) प्राकाम्य—कामनाओं को अभिलषित रूप में पूर्ण
कर लेना ।
(७) ईशत्व—शरीर और मन के भीतरी संस्थानों एवं
चक्रों पर पूर्ण प्रभुता तथा संसार के अन्य पदार्थों को अपनी
इच्छानुसार प्रयोग कर सकने की सामर्थ्य ।
(८) वाशित्व—सब परिस्थितियों अथवा वस्तुओं को
अपने वशवर्ती रख सकना ।
अन्य शास्त्रों में सिद्धियों को अन्य रूपों में भी उपस्थित
किया गया है जिनका उल्लेख कई प्रकार से मिलता है।
शंकराचार्य के मत से सिद्धियाँ
(१) जन्म सिद्धि—जन्म से ही पूर्व संचित संस्कार
तथा वैभव प्राप्त होना ।
(२) शब्द ज्ञान सिद्धि—श्रवण मात्र से सही अनुमान
होना ।
(३) शास्त्र ज्ञान सिद्धि—शास्त्रों के अभ्यास से असाधा-
रण बुद्धि का विकास ।
(४) आधिभौतिक ताप सहन शक्ति ।
(५) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति ।
(६) आधिदैविक सहन शक्ति ।
(७) विज्ञान सिद्धि—अन्तःकरण से तत्वज्ञान का
स्फुरण होना ।
(८) विद्या सिद्धि—विद्या के द्वारा अविद्या का नाश।
कहीं-कहीं (१) परकाया प्रवेश (२) जल आदि में
असङ्ग (३) उत्क्रान्ति (४) ज्वलन (५) दिव्य श्रवण (६)
आकाश मार्ग गमन (७) प्रकाशावरण क्षण (८) भूतजय
को अष्ट सिद्धि माना गया है।
सच तो यह है कि शारीरिक, मानसिक और आत्मिक
क्षेत्र की सिद्धियां अगणित प्रकार की हैं, उन्हें आठ या किसी
अन्य संख्या में विभाजित नहीं किया जा सकता। आत्मबल को
जिस दिशा में भी लगा दिया जाय उसी में एक चमत्कार पैदा
हो जायेगा और वह एक स्वतन्त्र सिद्धि दिखाई देने लगेगी।
साधना की सफलता के रूप में यह सिद्धियाँ सामने
आती हैं, पर उनकी ओर आकर्षित होना, उन्हें अधिक महत्व
देना, उनका प्रदर्शन करना अथवा लाभ उठाना, गर्व करना और
चमत्कारी बनकर लोगों को अपने पीछे लगाना एक भारी भूल
है। जो साधक इस मार्ग में भटक जाते हैं, उन्हें अपनी थोड़ी
सी संग्रहीत पूँजी से हाथ धोना पड़ता है और आगे की प्रगति
अवरुद्ध ही हो जाती है। इसीलिये उन्हें विघ्न रूप ही माना गया
है और उनकी ओर से मुँह मोड़े रहने का ही आचार्यों ने
आदेश किया है—
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः
—योग दर्शन० विभूति । ३७
ये सिद्धियाँ समाधि में विघ्न रूप हैं। जाग्रत अवस्था में
सिद्धियां हैं।
तद्वैराग्यादपि दोषबीज क्षये कैवल्यम्।
—योग० विभूति । ५०
( १५ )
इन सिद्धियों से भी मन हटा लेने पर दोषों कां बीज नाश
होकर मुक्ति की प्राप्ति होती है ।
यदि तन्नापेक्षास्यात् तदा मोक्षाद् भ्रष्टः ।
कथं कृतकृत्यताभियात्—
—योग सुधाकर
यदि इन सिद्धियों की आकांक्षा रही तो साधक मोक्ष-पथ
से भ्रष्ट हो जायेगा । फिर उसे लक्ष्य प्राप्ति कैसे होगी ?
मन को भटकने न दिया जाय
साधना द्वारा आत्म-कल्याण की आकांक्षा करने वाले
श्रेय-पथिकों के लिये यह आवश्यक है कि वे वासना और तृष्णा
के प्रति दिन-दिन उदासीन होना सीखें और आत्मिक सम्पदाओं
का महत्व समझते हुए उनको ओर अपना प्रेम बढ़ावें । जिसके
मन में लोभ, मोह की जितनी प्रबलता रहेगी, वासना और
तृष्णा में जो जितना ही डूबा रहेगा, उसका मन भगवान में
उतना ही कम लगेगा । इसलिये उपनिषद् स्थान-स्थान पर यह
कहते हैं कि मन को सांसारिक प्रलोभनों और आकर्षणों से
रोका जाय, उन्हें व्यर्थ और सारहीन वस्तु समझा जाय ।
शरीर आत्मा का वाहनमात्र है । उसे निरोग और प्रसन्न
रखने के लिये जितनी अनिवार्य आवश्यकतायें हैं, उतने में ही
सन्तुष्ट रहा जाय । भौतिक सम्पदायें बढ़ाने की अपेक्षा आत्मिक
सद्गुणों की सम्पदायें बढ़ाना अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है ।
यदि भौतिक प्रलोभनों में मन को बहुत आकर्षण रहा तो सारा
मनोबल, शरीरबल और समय उसी दिशा में लगा रहेगा
और आत्मिक प्रगति के तीनों ही साधन बहुत स्वल्पमात्रा में
बचेंगे । फलस्वरूप सफलता भी थोड़ी सी ही मिलेगी ।
शरीर रक्षा और पारिवारिक व्यवस्था के लिये उचित
मनोयोग लगाना, सुव्यवस्थित प्रयत्न करना, श्रम संलग्न होना
आवश्यक है। इन कर्तव्यों की उपेक्षा करने के लिये कोई
नहीं कहता। लौकिक कर्तव्यों का उचित सीमा में पालन करना
आत्म साधना का ही एक भाग है। शरीर और परिवार भी
हमारे आत्म कुटुम्ब के सदस्य ही हैं, उनकी उपेक्षा क्यों की
जाय ? ऐसी उपेक्षा से जीवन का स्वाभाविक और सामान्य
क्रम अस्त व्यस्त होता है, तब आत्मिक प्रगति का मार्ग भी
अवरुद्ध ही हो जाता है। इसलिये अतिवादियों की तरह जीवन
के उचित उत्तरदायित्वों को वहन करने से इन्कार करना किसी
भी विचारशील व्यक्ति के लिये उचित नहीं कहा जा सकता।
हमें अपने शारीरिक, पारिवारिक एवं सामाजिक सभी कर्तव्य
उचित रीति से पूर्ण करने चाहिए। पर उनमें इतना अधिक लोभ
और मोह न हो कि आत्मिक कर्तव्यों की ओर उपेक्षा की जाने
लगे और अनिच्छा उत्पन्न हो जाय।
जीवन का वास्तविक उद्देश्य और सच्चा लाभ आत्मिक
प्रगति में ही है। उसकी ओर शारीरिक एवं सांसारिक कर्तव्यों
की अपेक्षा कम नहीं वरन अधिक ही ध्यान रहना चाहिये
क्योंकि शरीर की अपेक्षा आत्मा का महत्व निश्चित रूप से
अधिक है। लौकिक जीवन सुखपूर्ण हो ऐसी इच्छा होना
स्वाभाविक है पर आत्मिक शान्ति का महत्व नगण्य समझा जाय
यह उचित नहीं, क्योंकि लौकिक जीवन क्षणिक और आत्मिक
जीवन अनन्त है। क्षणिक सुखों के लिये, निस्सार वासनाओं
और कभी तृप्त न हो सकने वाली मृगतृष्णाओं के पीछे भटकते
हुए इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को नष्ट कर देना और
आत्मिक प्रगति की ओर से विमुख रहना कोई दूरदर्शिता का
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कार्य नहीं है। यह तथ्य जब हम भली-भाँति समझलें तभी
भौतिक और आत्मिक लाभों की तुलना करना और उनकी ओर
उचित ध्यान दे सकना संभव हो सकेगा।
उपनिषदकार इस बात पर बहुत बल देते हैं कि मन को
सांसारिक कर्तव्यों के उचित मात्रा में पालन करने तक ही
सीमित रहने दिया जाय। धन और वासना की जितनी उचित
उपयोगिता है, उतनी सीमा तक ही उनमें मनको डूबने दिया
जाय। अति आकर्षण, अति मोह, अति लोभ में आजकल
जन-मानस डूबा पड़ा है। इस स्थिति से ऊपर उठे बिना न तो
आत्म कल्याण का महत्व समझ में आवेगा और न उसमें मन
ही लगेगा। फिर चिन्ह-पूजा के रूप में कुछ साधना की भी तो
उसका प्रतिफल भी वैसा ही नगण्य होगा।
आकर्षण की प्रधान धारा एक ही रह सकती है।
यदि लौकिक तृष्णायें अधिक होंगी तो आत्म-उद्धार के लिये
तत्परता कहाँ से होगी? और यदि आत्मिक लक्ष्य है तो तृष्णा
और वासना में निरन्तर निमग्न रहना कैसे निभेगा? दोनों में से
एक को प्रमुखता देनी पड़ेगी। उपनिषदों में आत्मलक्ष को
प्रमुखता देने और मन को लौकिक आकर्षणों से बचाने का
स्थान-स्थान पर प्रतिपादन हुआ है। इसी को सदाचार, तप,
संयम, मनोनिग्रह, कर्मयोग आदि नामों से पुकारा जाता है।
साधना-मार्ग में यह महत्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा करके
आगे बढ़ सकना किसी के लिये भी संभव नहीं होता। मन को
पवित्र रखने, इन्द्रियों में आसक्त न होने, अपवित्रता और पाप
वृत्तियों में न डूबने का पवित्र कर्तव्य उपनिषदों में जगह-जगह
प्रतिपादित हुआ है और आस्तिकता, तपश्चर्या, कर्तव्यनिष्ठा
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एवं परमार्थ परायणता की ओर मन को बलपूर्वक प्रेरित करते
रहने के लिये बहुत जोर दिया गया है।
ऐसी प्रेरणाओं के कुछ निर्देश इस प्रकार हैं—
"जब हृदय में रहने वाली कामनायें नष्ट हो जाती हैं तब
यह मरणधर्मा मनुष्य ही अमृत हो जाता है और उसे इसी
शरीर में ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।"
—बृहदारण्यक, अध्याय ४, ब्राह्मण ४—
"मन ही संसार है, प्रयत्नपूर्वक इस मन को ही शुद्ध
करना चाहिये। जिसका जैसा मन होता है, वह वैसा ही बन
जाता है। शान्त मन वाला व्यक्ति ही आत्मा को तथा अक्षय
आनन्द को प्राप्त करता है, यही सनातन रहस्य है।"
—मैत्रेयी उपनिषद्
"इन्द्रियों के विषयों में आसक्त रहने के कारण अनेक
दोषों का प्रादुर्भाव होता है । यदि वे ही इन्द्रियां भली प्रकार
वशीभूत हो जायें तो वह सिद्धिदायिनी होती हैं। भोगों का
उपयोग करने से विषयों की कामनाएं कभी शान्त नहीं होतीं।
भोग तो घृत द्वारा अग्नि के अधिक प्रदीप्त होने के समान उनकी
वृद्धि ही करते हैं॥"
—नारदपरिव्राजकोपनिषद्
"जिनके मन-वाणी में पवित्रता है, जो सदा दोष रहित
हैं, वे ही मनुष्य वेदान्त को सुनकर उसका पूरा फल पा
सकते हैं।"
—नारदपरिव्राजकोपनिषद्
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' तप, सन्तोष, आस्तिक्य, दान, ईश्वर-पूजन, सिद्धान्त-
श्रवण, ह्रीं, मति, जप और व्रत ये दस नियम हैं ।'
—शाण्डिल्य उपनिषद्
"जो चित् शक्ति, इच्छा और अनिच्छा वाले प्राणियों में
विद्यमान है वह मलों से घिरी है और पाशबद्ध चिड़िया की
तरह उड़ने में असमर्थ होती है । इच्छा और द्वेष से उत्पन्न
द्वन्दभाव के कारण ये प्राणी मोह-वश पृथिवी रूपी गढ़े में गिरे
हुये कीट पतंगों के तुल्य ही हैं ।"
—सन्यास उपनिषद्
"मन ही मनुष्यों के बन्धन तथा मोक्ष का कारण है । जो
मन विषयों में आसक्त होगा, वह बन्धन का तथा जो विषयों से
पराङ्मुख होगा, वह मोक्ष का कारण होगा ।"
—शाट्यायनीयोपनिषद्
"मन के मैल को त्याग करना ही स्नान है । मन और
इन्द्रियों को वश में करना ही पवित्रता है । शारीरिक मलों की
शुद्धि मिट्टी जल आदि से होती है । यह तो लौकिक शुद्धि है ।
वास्तविक पवित्रता तो मोह और अहङ्कार का त्याग करने से
ही होती है । ज्ञान रूप मिट्टी तथा वैराग्य रूप जल में धोने पर
जो पवित्रता होती है, वही वास्तविक पवित्रता है ।"
—मैत्रेयी उपनिषद्
"तप द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान से मन वश में
आता है । मन वश में होने से आत्मा की प्राप्ति होती है और
तब संसार से छुटकारा मिल जाता है ।..................मनुष्य का
चित्त जितना बाहरी विषयों में आसक्त रहता है, उतना ही
अगर ब्रह्म में आसक्त हो जाय तो बन्धनों से मुक्ति सहज ही
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
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है। मुनि का बताया हुआ यह तथ्य हम सबके लिये विचारणीय
और मननीय है।”
—मैत्रेयी उपनिषद्
“यह पराविद्या सत्य, तप और ब्रह्मचर्य से वेदान्त-मार्ग
द्वारा प्राप्त होती है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, जिनके दोष
क्षीण होगये हैं, वे ही अपने भीतर स्वयं प्रकाशमान परमात्मा
को देख सकते हैं। माया में फँसे हुये उनको नहीं देख सकते।”
—पाशुपतब्रह्मोपनिषद्
मन को कम महत्व की निस्सार बातों में भटकने से रोक
कर उसे परम कल्याणकारक आत्म-पथ पर अग्रसर करने के
लिए उपनिषदों का विशेष आग्रह है। साधना का यही महत्वपूर्ण
अङ्ग भी है।
—:०:—
जैसा अन्न वैसा मन
आत्म-कल्याण के पथ पर चलने का प्रधान आधार
‘अन्न-शुद्धि’ को माना गया है, क्योंकि उसी पर मन की शुद्धि
निर्भर है। मन को शरीर का ही एक भाग माना गया है, उसे
ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहते हैं। शरीर की उन्नति अवनति बहुत
से आहार पर निर्भर रहती है। आहार के शरीर-पोषक स्थूल
भावों को हम सभी जानते हैं। किसी वस्तु के खाने से शरीर पर
क्या प्रभाव पड़ता है विज्ञान द्वारा इसकी बहुत कुछ खोज हो
चुकी है, पर अभी यह खोज होनी शेष है कि किस-किस आहार
में कौन कौन सूक्ष्म गुण विद्यमान हैं और उसका मनोभूमि के
उत्थान-पतन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
अध्यात्म-विद्या के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म