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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 572 में से

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पृष्ठ 21

( १३ )

(३) गरिमा—शरीर को बहुत भारी कर लेना ।
(४) लघिमा—शरीर को बहुत हलका कर लेना ।
(५) प्राप्ति—दूरस्थ पदार्थों को स्पर्श अथवा प्राप्त कर
लेना ।
(६) प्राकाम्य—कामनाओं को अभिलषित रूप में पूर्ण
कर लेना ।
(७) ईशत्व—शरीर और मन के भीतरी संस्थानों एवं
चक्रों पर पूर्ण प्रभुता तथा संसार के अन्य पदार्थों को अपनी
इच्छानुसार प्रयोग कर सकने की सामर्थ्य ।
(८) वाशित्व—सब परिस्थितियों अथवा वस्तुओं को
अपने वशवर्ती रख सकना ।
अन्य शास्त्रों में सिद्धियों को अन्य रूपों में भी उपस्थित
किया गया है जिनका उल्लेख कई प्रकार से मिलता है।

शंकराचार्य के मत से सिद्धियाँ
(१) जन्म सिद्धि—जन्म से ही पूर्व संचित संस्कार
तथा वैभव प्राप्त होना ।
(२) शब्द ज्ञान सिद्धि—श्रवण मात्र से सही अनुमान
होना ।
(३) शास्त्र ज्ञान सिद्धि—शास्त्रों के अभ्यास से असाधा-
रण बुद्धि का विकास ।
(४) आधिभौतिक ताप सहन शक्ति ।
(५) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति ।
(६) आधिदैविक सहन शक्ति ।
(७) विज्ञान सिद्धि—अन्तःकरण से तत्वज्ञान का
स्फुरण होना ।