१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
७६ ] [ योगचूडामणि उपनिषद्
ऐड़ी से दृढ़तापूर्वक दबाकर योनि स्थान को दृढ़ रूप से संकुचित
करे तथा अपान वायु को ऊपर की तरफ आकर्षित करे तो यह मूलबन्ध
कहलाता है ॥४६॥ इससे अपान और प्राण-वायु एक हो जाते हैं और
मूत्र तथा मल घट जाता है। जो व्यक्ति सदैव इस बन्ध का अभ्यास
करता है वह वृद्ध होने पर भी युवा हो जाता है ॥४७॥ जिस प्रकार
एक महापक्षी विश्रान्ति के लिए उड्डियाण करता है, उसी प्रकार
उड्डियाण अभ्यास मृत्यु रूपी हाथी के लिये सिंह के समान ही है
॥४८॥ उदर से नाभि के नीचे तानना पश्चिमतान कहा जाता है।
उड्डियाण बन्ध भी उदर में होता है ओर इसको वहीं किया जाता है
॥४६॥ जो नीचे की तरफ जाने वाले आकाश और जलतत्व को शिर में
ही स्थिर रखता है, ऐसा जालन्धर बंध दुःख और कष्ट समूह का नाश
करने वाला है ॥५०॥
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठ दुःखौघनाशने ।
न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति ॥५१
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ।
भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥५२
न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा ।
न च मूर्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥५३
पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न स कर्मभिः ।
बध्यते न च केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥५४
चितं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे यतः ।
तेनेयं खेचरी मुद्रा सर्वसिद्धनमस्कृता ॥५५
जालन्धर बन्ध के करने में जो कंठ का संकोचन किया जाता
है, उससे अमृत अग्नि में नहीं पड़ता और वायु भी नहीं दौड़ता
(अर्थात् स्थिर हो जाता है ) ॥५१॥ जिह्वा को लौटकर कपाल
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
कुहर में प्रविष्ट करने और दोनों भौंहों के बीच दृष्टि स्थिर करने
से खेचरी मुद्रा होती है ॥५२॥ इसका साधन करने से न रोग, न मरण
न भूख और न क्षुधा का भय रहता है । जो खेचरी मुद्रा को जानता
है उसे मूर्च्छा भी नहीं होती ॥५३॥ वह रोग से कभी पीड़ित नहीं होता
और न कर्मों में लिप्त होता है । जो खेचरी को जानता है उसे कोई
बाधा नहीं पहुँचा सकता ॥५४॥ जिस खेचरी मुद्रा के साधन से चित्त
आकाश में विचरण करता है और जिह्वा भी आकाश में विचरण करती
है, उसको सिद्ध नमस्कार करते हैं ॥५५॥
बिन्दूमूलशरीराणि सिरा यत्र प्रतिष्ठिताः ।
भावयन्ति शरीराणि आपादतलमस्तकम् ॥५६
खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः ।
न तस्य क्षीयते बिन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च ॥५७
यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः ।
यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति ॥५८
ज्वलितोऽपि यथा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम् ।
व्रजत्यूर्ध्वं गतः शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया ॥५९
स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा ।
पाण्डरं शुक्लमृत्याहुर्लोहिताख्यं महारजः ॥६०
पैर से लेकर शिर तक के समस्त अङ्गों का पोषण करने वाली
शिराओं का आधार बिन्दु है ॥५६॥ जिससे खेचरी मुद्रा द्वारा जिह्वा के
ऊपर विवर (कपाल कुहर) को बन्दकर लिया है, उसका बिन्दु (वीर्य)
फिर किसी तरह नष्ट नहीं हो सकता, रमणी के आलिंगन का भी उस
पर प्रभाव नहीं पड़ता ॥५७। जब तक देह में वीर्य स्थित है तब तक
मृत्यु का क्या भय है ? और जब तक खेचरी मुद्रा बाँधी हुई है तब तक
बिन्दु नहीं जाता ॥५८॥ यदि बिन्दु निकलकर अग्नितत्त्व को प्राप्त हो
७८ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद्
जाए, तो भी योनि मुद्रा द्वारा शक्तिपूर्वक उसे रोक कर ऊर्ध्वगामी
किया जा सकता है ॥५९॥ यह बिन्दु दो प्रकार का होता है, एक
सफेद और दूसरा लाल, सफेद का नाम शुक्ल और लाल का नाम
महाराज कहा जाता है ॥६०॥
सिन्दूरव्रातसंकाशं रविस्थानस्थितं रजः ।
शशिस्थानस्थितं शुक्लं तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ॥६१
बिन्दुब्रह्मा रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः ।
उभयोः सङ्गमादेव प्राप्यते परमं पदम् ॥६२
वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं च यथा रजः ।
याति बिन्दुः सदैकत्वं भवेद्दिव्यवपुस्तदा ॥६३
शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् ।
तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित् ॥६४
शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्ययोः ।
रसानां शोषणं चैव महामुद्राऽभिधीयते ॥६५
रज का स्थान सिन्दूर के समान चमकने वाला रवि-स्थान है
और शुक्र का चन्द्र स्थान है, इन दोनों का संयोग होना बड़ा कठिन
होता है ॥६१॥ बिन्दु ब्रह्मा है और रज शक्ति है, विन्दु चन्द्रमा रूप
है तथा रज सूर्य रूप है इन दोनों के संगम से परम पद की प्राप्ति होती
है ॥६२॥ जब वायु द्वारा चालित रज बिन्दु से मिलकर एक हो जाता
है तब देह दिव्य हो जाती है ॥६३॥ शुक्ल चन्द्र से और रज सूर्य से
संयुक्त है, जो इनकी एकता को, विषय को समझता है वह योग को
जानने वाला है ॥ ६४ ॥ अब महामुद्रा को बतलाते हैं, जिससे नाड़ी
जाल का शोधन, चन्द्र सूर्य का चलाना और रस का सुखाना
होता है ।। ६५ ।।
योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७६
वक्षोन्यस्तहनुः प्रपीड्य सुचिरं योनिं च वामाङ्घ्रिणा
हस्ताभ्यामनुधारयन्प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् ।
आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बद्ध्वा शनै रेचये—
देतद्व्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥६६
चन्द्रांशेन समभ्यस्य सूर्यांशेनाभ्यसेत्पुनः ।
या तुल्या तु भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥६७
नहि पथ्यमपथ्यं वा रसा सर्वेऽपि नीरसाः ।
अतिभुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते ॥३८
क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः ।
तस्य रोगाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत् ॥६९
कथितयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् ।
गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥७०
ठोड़ी को छाती पर रखकर, बाँये पैर से योनि स्थान को देर
तक दबाकर, दांये पैर को सीधा फैला दोनों हाथों से भली प्रकार
पकड़े । तब दोनों कुक्षियों ( बगलों ) में श्वास भरे और फिर धीरे-
धीरे उसका रेचन करे, यह सब प्रकार की व्याधियों को नष्ट करने
वाली महामुद्रा कही जाती है ॥ ६६ ॥ पहले चन्द्र अंश ( बांयी
नासिका ) से अभ्यास करे फिर सूर्य अंश ( दांयी नासिका ) से अभ्यास
करे । जब दोनों की संख्या समान हो जाय तब अभ्यास का बन्द
करदे ॥ ६७ ॥ इस मुद्रा के प्रभाव से पथ्य-अपथ्य ही नहीं, सब
प्रकार का नीरस भोजन भी रसवान बन जाता है, अधिक खाया हुआ
और तीव्र विष भी अमृत के समान पच जाता है ॥ ६८ ॥ क्षय,
कोढ़, गुदावर्त ( भगन्दर ) गुल्म, अजीर्ण और आगे होने वाले
समस्त रोग महामुद्रा के अभ्यास से शमन हो जाते हैं ॥ ६९ ॥
मनुष्यों को महासिद्धि देने वाली जो यह महामुद्रा यहाँ बताई गई है,
८० ] [ योगचूडामणि उपनिषद्
इसको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये, चाहे जिस किसी को न बतलाना
चाहिये ॥ ७० ॥
पद्मासनं समारुह्य समकायशिरोधरः ।
नासाग्रदृष्टिरेकान्ते जपेदोंकारमव्ययम् ॥७१
ॐ नित्यं शुद्धं बुद्धं निर्विकल्पं निरञ्जनं निराख्यातमना-
दिनिधनमेकं तुरीयं यद्भूतं भवद्भविष्यत् परिवर्तमानं सर्वदा-
ऽनवच्छिन्नं परं ब्रह्म । तस्माज्जाता परा शक्तिः स्वयं ज्योति-
रात्मिका । आत्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायो-
रग्निः । अग्नेरापः । अद्भयः पृथिवी । तेषां पञ्चभूतानां पतयः
पञ्च सदाशिवेश्वररुद्रविष्णुब्रह्माणश्चेति । तेषां ब्रह्मविष्णुरुद्रा-
श्चोत्पत्तिस्थितिलयकर्त्तारः । राजसो ब्रह्मा सात्विको विष्णु-
स्तामसो रुद्र इति । एते त्रयो गुणयुक्ताः । ब्रह्मा देवानां प्रथमः
संबभूव । धाता च सृष्टौ विष्णुश्च स्थितौ रुद्रश्च नाशे भोगाय
चेन्द्रः प्रथमजा बभूवुः । एतेषां ब्रह्मणो लोका देवतिर्यङ्नर-
स्थावराश्च जायन्ते । तेषां मनुष्यादीनां पञ्चभूतसमवायः
शरीरम् । ज्ञानकर्मेन्द्रियैर्ज्ञानविषयैः प्राणादिपञ्चवायुमनोबुद्धि-
चित्ताहङ्कारैः स्थूलकल्पितैः सोऽपि स्थूलप्रकृतिरित्युच्यते ।
ज्ञानकर्मेन्द्रियैर्ज्ञानविषयैः प्रणादिपञ्चवायुमनोबुद्धिभिश्च सूक्ष्म-
स्थोऽपि लिङ्गमेवेत्युच्यते । गुणत्रययुक्तं कारणम् । सर्वेषा मेवं
त्रीणि शरीराणि वर्तन्ते । जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयाश्चेत्य
वस्थाश्चतस्रः । तासामवस्थानामधिपतयश्चत्वारः पुरुषा विश्व-
तैजसप्राज्ञात्मानश्चेति ॥
विश्वो हि स्थूलभुङ् नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।
आनन्दभुक्तथा प्राज्ञः सर्वसाक्षीत्यतः परः ॥७२
एकान्त स्थान में पद्मासन लगाकर, सीधा बैठकर, शरीर और
शिर को सीधा रखकर, नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर अव्यय
योगचूडामणि उपनिषद् ] [ ८१
ओंकार का जप करना चाहिये ॥ ७१ ॥ ॐ नित्य, शुद्ध, बुद्ध,
निर्विकल्प, निरञ्जन, नाम रहित, अनादि, मृत्यु स्वरूप, एक तुरीय, भूत,
भविष्य-वर्तमान में अविच्छिन्न रहने वाला जो परब्रह्म है, उसी से स्वयं-
ज्योति रूप पराशक्ति उत्पन्न हुई है। आत्मा से आकाश की उत्पत्ति
हुई, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी की
उत्पत्ति हुई। इन पञ्च महाभूतों के पांच प्रति (स्वामी) सदाशिव,
ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा हैं। इनमें से ब्रह्मा उत्पत्ति, विष्णु स्थिति
और रुद्र प्रलय के करने वाले हैं। ब्रह्मा रजोगुण युक्त, विष्णु सतोगुण
वाले और रुद्र तमोगुण वाले हैं। ब्रह्मा देवताओं से प्रथम उत्पन्न हुए।
ब्रह्मा सृष्टि रचने के लिये, विष्णु सृष्टि का पालन करने के लिये,
रुद्र नाश करने के लिये और चन्द्रमा भोगों के लिये सबसे पहले हुये।
इनमें से ब्रह्मा से लोक, देव, तिर्यंक, नर और स्थावर की उत्पत्ति होती
है। इनमें से मनुष्यों का शरीर पञ्चभूत से मिलकर बनता है। ज्ञाने-
न्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, ज्ञान, विषय प्राण आदि पञ्च वायु, मन, बुद्धि, चित्त,
अहङ्कार—ये सब स्थूल रूप में कल्पे हुये हैं और वह शरीर भी स्थूल
प्रकृति का ही कहा जाता है। ये ही ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, ज्ञान, विषय,
पञ्च वायु, मन, बुद्धि, सूक्ष्म रूप में 'लिंग' कहे जाते हैं। तीन गुणों से
युक्त कारण है। इससे सबके तीन शरीर होते हैं। चार अवस्थाएं
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय हैं, जिनके अधिपति विश्व, तैजस,
प्राज्ञ और आत्मा में चार पुरुष होते हैं। स्थूल का भोक्ता विश्व है,
एकान्त का भोक्ता तैजस है, आनन्द का भोक्ता प्राज्ञ है और 'पर'
सबका साक्षी रूप है ॥ ७२ ॥
प्रणवः सर्वदा तिष्ठेत्सर्वजीवेषु भोगतः ।
अभिरामस्तु सर्वासु ह्यवस्थासु ह्यधोमुखः ॥७३
अकारश्चोकारश्च मकारश्चेति त्रयो वर्णास्त्रयो वेदास्त्रयो
लोकास्त्रयो गुणास्त्रयोऽक्षराणि एवं प्रणवः प्रकाशते ।
अकारो जाग्रति नेत्रे वर्तते सर्वजन्तुषु ।
उकारः कण्ठतः स्वप्ने मकारो हृदि सुप्तितः ॥७४
विराड्विश्वः स्थूलश्चाकार. । हिरण्यगर्भस्तैजसः सूक्ष्मश्च
उकारः । कारणाव्याकृतप्राज्ञश्च मकारः ।
अकारो राजसो रक्तो ब्रह्मा चेतन उच्यते ।
उकारः सात्त्विकः शुक्लो विष्णुरित्यभिधीयते ॥७५
मकारस्तामसः कृष्णो रुद्रश्चेति तथोच्यते ।
प्रणवात्प्रभवो ब्रह्मा प्रणवात्प्रभवो हरिः ॥७६
प्रणवात्प्रभवो रुद्रः प्रणवो हि परो भवेत् ।
अकारे लीयते ब्रह्मा उकारे लीयते हरिः ॥७७
मकारे लीयते रुद्रः प्रणवो हि प्रकाशते ।
ज्ञानिनामूर्ध्वंगो भूयादज्ञानीनामधोमुखः ॥७८
एवं वै प्रणवस्तिष्ठेद्यस्तं वेद स वेदवित् ।
अनाहतस्वरूपेण ज्ञानिनामूर्ध्वगो भवेत् ॥७६
तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् ।
प्रणवस्य ध्वनिस्तद्वत्तदग्रं ब्रह्म चोच्यते ।.८०
वह ( पर-तत्व ) सब जीवों के भोग काल में पृथक रूप से रहता
है और सब अवस्थाओं में अधोमुख रहकर आनन्द रूप है ॥ ७३ ॥
'अ'कार 'उ'कार और 'म'कार ये तीन, तीन वर्ण, तीन वेद, तीन लोक,
तीन गुण, तीन अक्षर, तीन स्वर—ये सब प्रणव द्वारा प्रकाशित होते हैं।
सर्व जीवों में जाग्रत अवस्था में 'अ'कार नेत्रों में रहता है, स्वप्नावस्था
में 'उ'कार कण्ठ में रहता है और सुषुप्ति अवस्था में म'कार हृदय में
रहता है ॥ ७४ ॥ 'अ'कार स्थूल, विराट और विश्व है, 'उ'कार
हिरण्यगर्भ, तैजस और सूक्ष्म है और 'म'कार कारण, अव्याकृत और
योगचूड़ामणि उपनिषत् [ ८३
प्राज्ञ है। 'अ'कार राजस, रक्तवर्ण और ब्रह्मा कहा जाता है। 'उ'कार
सात्विक, शुक्लवर्ण और विष्णु कहा जाता है, तथा 'म'कार को तामस,
कृष्ण वर्ण और रुद्र के नाम से पुकारा जाता है। इस प्रकार प्रणव से
ही ब्रह्मा की उत्पत्ति है, प्रणव में ही विष्णु की उत्पत्ति है और प्रणव से
ही रुद्र उत्पन्न हुआ है। प्रणव ही परातत्त्व है। ब्रह्मा 'अ'कार में लय
हो जाते हैं, 'उ'कार में विष्णु का लय होता है और 'म'कार में रुद्र लय
होते हैं, केवल प्रणव ही प्रकाशित (स्थिर) रहता है। वह ज्ञानी में
ऊर्ध्वमुख होता है और अज्ञानी में अधोमुख होता है। इस प्रकार प्रणव
ही निश्चय रूप से स्थित है और उसको जानने वाला ही वेदवित् कहा
जाता है। वह अनाहत रूप से ज्ञानियों में ऊर्ध्वगति होता है ॥ ७५—
७६ ॥ प्रणव की यह अनाहत ध्वनि तेल की अवच्छिन्न धार और
घण्टा के दीर्घ निनाद (शब्द) के समान होती है और अग्रभाग ही ब्रह्म
कहा जाता है ॥ ८० ॥
ज्योतिर्मयं तदग्रं स्यादवाच्यं बुद्धिसूक्ष्मतः ।
दहश्ये महात्मानो यस्तं वेद स वेदवित् ॥८१
जाग्रन्नेत्रद्वयोर्मध्ये हंस एव प्रकाशते ।
सकारः खेचरी प्रोक्तस्त्वंपदं चेति निश्चितम् ॥८२
हकारः परमेशः स्यात्तत्पदं चेति निश्चितम् ।
सकारो ध्यायते जन्तुर्ह कारो हि भवेद्ध्रुवम् ॥८३
इन्द्रियैर्बध्यते जीव आत्मा चैव न बध्यते ।
ममत्वेन भवेज्जीवो निर्ममत्वेन केवलः ॥८४
भूर्भुवः स्वरिमे लोकाः सोमसूर्याग्निदेवताः ।
यस्य मात्रासु तिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति ॥८५
वह अग्रभाग (ब्रह्म) ज्योतिर्मय और वाणी से परे है, महा-
पुरुष उसे सूक्ष्म बुद्धि द्वारा देखते हैं, उसको जानने वाला ही वेदवित्
८४ ] [ योगचूडामणि उपनिषद्
है ॥ ८१ ॥ जाग्रत अवस्था में दोनों नेत्रों के मध्य हंस प्रकाशित
होता है। इसमें 'स'कार खेचरी रूप है और वह निश्चित रूप से 'त्वं'
का पद है। 'ह'कार परमेश्वर का पद है और उससे निश्चित रूप से
तत्' प्रकट होता है। जो जीव 'स'कार का ध्यान करता है वह
निश्चित रूप से 'ह'कार ईश्वर ) हो जाता है ॥ ८२-८३ ॥
इन्द्रियाँ जीव को बन्धन में डालती हैं, वे आत्मा को नहीं बाँध सकतीं।
ममता होने में जीव रहता है और ममता के छूट जाने पर कैवल्य स्वरूप
हो जाता है ॥ ८४ ॥ भूलोक, भुवःलोक और स्वर्लोक तथा चन्द्र,
सूर्य और अग्नि देवता परम ज्योति स्वरूप ॐकार की मात्राओं में ही
स्थित रहते हैं ॥ ८५ ॥
इच्छा क्रिया तथा ज्ञानं ब्राह्मी रौद्री च वैष्णवी ।
त्रिधा मात्रा स्थितैर्यत्र तत्परं ज्योतिरोमति ॥८६
वचसा तज्जपेन्नित्यं वपुषा तत्समभ्यसेत् ।
मनसा तज्जपेन्नित्यं तत्परं ज्योतिरोमति ॥८७
शुचिर्वाऽप्यशुचिर्वाऽपि यो जपेत्प्रणवं सदा ।
न स लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥८८
चले वाते चलो बिन्दुर्निश्चले भवेत् ।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥८९
यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवो न मुञ्चति ।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥६०
क्रिया, इच्छा और ज्ञान ये तीन शक्तियां, ब्राह्मी, रौद्री और
वैष्णवी ये तीन मात्रायें परम ज्योति रूप ॐकार में स्थित हैं
॥ ८६ ॥ उसे वाणी से सदैव जपे शरीर से सदैव उसका अभ्यास
( आचरण ) करे, मन से उसका सदैव जप करे, वही परम
ज्योति स्वरूप ॐकार है ॥ ८७ ॥ शुद्ध अथवा अशुद्ध अवस्था में भी
जो सदैव ॐकार का जाप करता करता है, वह पाप में लिप्त नहीं
योगचूड़ामणि उपनिषद् [ ८५
होता और संसार में कमल पत्रवत् रहता है ॥८८॥ वायु के चलित
होने पर बिन्दु भी चलित होता है और वायु के निश्चल रहने पर वह
भी स्थिर रहता है । बिन्दु की स्थिरता से योगी निश्चल होता है इस
लिये वायु का निरोध करना ॥८६॥ जब तक देह में वायु स्थित है
जब तक जीव उसे नहीं छोड़ सकता । वायु का निकल जाना ही मृत्यु
है, इसलिये वायु का का निरोध करे ॥६०॥
यावद्बद्धो मरुत् देहे तावज्जीवो न मुञ्चति ।
यावद्दृष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभय कुतः ॥६१॥
अल्पकालभयाद्ब्रह्मा प्राणायामपरो भवेत् ।
योगिनो मुनयश्चैव ततः प्राणान्निरोधयेत् ॥६२॥
षड्विंशदड्गुलीहंसः प्रायाणं कुरुते बहिः ।
वामदक्षिणमार्गेण धूणायामो विधीयते ॥६३॥
शुद्धिमेति यदा सर्वं नाड़ीचक्रं मलाकुलम् ।
तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणक्षमः ॥६४॥
बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् ।
धारयेद्वा यथाशक्त्या भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥६५॥
जब तक देह में वायु स्थिर है तब तक जीव नहीं छूट सकता ।
जब तक दोनों भौंहों के बीच में दृष्टि स्थिर है तब तक काल का भय
कहां ? ॥६१॥ काल से बचने के लिये ब्रह्मा भी प्राणायाम परायण
होते हैं, इसलिये योगियों और मुनियों को चाहिये कि प्राण के
निरोध का अभ्यास करें ॥६२॥ हंस (श्वास) छब्बीस अंगुल
बाहर जाता है। बायें और दाहिने मार्ग से प्राणायाम किया जाता
है ॥६३॥ जब नाड़ीचक्र सब प्रकार के मलों से शुद्ध हो जाता है,
तब योगी प्राणों के निरोध में समर्थ होता है ॥ ६४ ॥ योगी
को बद्ध पद्मासन लगाकर चन्द्र (बायीं नासिका) से वायु को खींचना
८६ ] [ योगचूडामणि उपनिषद्
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और उसे यथाशक्ति भीतर रोककर सूर्य (दाहिनी नासिका) से बाहर
निकालना ॥६५॥
अमृतोदधिसंकाशं गोक्षीरधवलोपमम् ।
ध्यात्वा चन्द्रमसं बिम्बं प्राणायामे सुखी भवेत् ॥६६॥
स्फुरत्प्रज्वलसज्जवालापूज्यमादित्यमण्डलम् ।
ध्यात्वा हृदि स्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत् ॥६७॥
प्राणं चेदिडया पिबेन्नियमितं भूयोऽन्यथा रेचयेत् ।
पीत्वा पिङ्गया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद्वामया ।
सूर्यचन्दमसोरनेन विधिना बिन्दुद्वयं ध्यायतः
शुद्धा न डिगणा भवन्ति यमिनो मासद्वयादूर्ध्वतः ॥६८॥
यथेष्ट धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् ।
नादाभिव्यक्तिररोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥६९॥
प्राणो देहस्थितो यावदपानं तु निरुन्धयेत् ।
एकाश्वसमयी मात्रा ऊर्ध्वाधो गगने स्थितिः ॥१००॥
अमृत के समुद्र के समान, गो के दूध के सदृश धवल चन्द्रमा
के विम्ब का ध्यान करता हुआ प्राणायाम करे ॥ ६६ ॥ फिर
प्रज्ज्वलित ज्वाला के समान हृदय में स्थित सूर्य भगवान का ध्यान
करते हुये प्राणायाम करे ॥ ६७ ॥ पहले इड़ा (बांयीं) नाड़ी
से श्वास लेकर पिङ्गला दाहिनी से रेचक करे, फिर पिङ्गला से
श्वास लेकर इड़ा से बाहर निकाल दे। इस प्रकार सूर्य और चन्द्र
दोनों बिन्दुओं का ध्यान (अभ्यास) करने से दो मास में नाड़ी शुद्ध
हो जाती है ॥ ६८ ॥ वायु का यथेष्ठ धारण करना, जठराग्नि
का प्रदीप्त होना, नाद का सुनाई पड़ना, आरोग्य—ये सब नाड़ी शोधन
से प्राप्त होते हैं ॥६९॥ जब तक देह में प्राणवायु स्थित है तब तक
अपान को रोके। एक श्वास वाली मात्रा हृदयाकाश में ऊपर और
नीचे गतिमान होती है ॥१००॥
योगचूडामणि उपनिषत् [ ८७
रेचक, पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः ।
प्राणायामो भवेदेवं मात्राद्वादशसंयुक्तः ॥१०१॥
मात्राद्वादशसंयुक्तौ निशाकरदिवाकरौ ।
दोषाजालमबध्नन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभि सदा ॥१०२॥
पूरकं द्वादशं कुर्यात्कुम्भकं षोडषं भवेत् ।
रेचकं दश चोंकारः प्राणायामः स उच्यते ॥१०३॥
प्रधमे द्वादशा मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता ।
उत्त मे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णयः ॥१०४॥
अधमे स्वेदजननं कम्पो भवति मध्यमे ।
उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥१०५॥
रेचक, पूरक और कुम्भक ये प्रणव स्वरूप हैं, इस प्रकार का
प्राणायाम द्वादश मात्रा में करना ॥ १०१ ॥ यह द्वादश मात्रा संयुक्त
सूर्य और चन्द्र का प्राणायाम समस्त दोषों का नाश करने
वाला है ॥ १०२ ॥ बारह मात्रा का पूरक करके सोलह मात्रा का
कुम्भक करना चाहिए तब फिर दस मात्रा रेचक करना—यह ओंकार
प्राणायाम कहा जाता है ॥ १०३ ॥ द्वादश मात्रा का प्राणायाम
हलका है, इससे दुगुनी मात्रा वाला मध्यम है और तिगुनी
मात्रा वाला उत्तम कहा जाता है ॥ १०४ ॥ हलके प्राणायाम से
पसीना आता है, मध्यम से कम्पन उत्पन्न होता है, उत्तम में
आसन से उठता जान पड़ता है, इस प्रकार वायु का निरोध करना
चाहिये ॥ १०५ ॥
बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम्,
नासाग्रदृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्यसेत् ॥१०६॥
द्वाराणां नव संनिरुध्य मरुतं बद्ध्वा दृढां धारणां
नीत्वा कालमपानवह्निहतं शक्त्या समं चालितम् ।
८८ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषत्
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
आत्मध्यानयुतस्त्वनेन विधिना विन्यस्य मूर्ध्नि स्थिरं ।
यावत्तिष्ठति तावदेव महतां संगो न संस्तूयते ॥१०७॥
प्राणायामो भवेदेवं पातकेन्धनपावकः ।
भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभि सदा ॥१०८॥
आसनेन रुजं हन्ति प्राणायामेन पातकम् ।
विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुञ्चति ॥१०६॥
धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम् ।
समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम् ॥११०॥
बद्ध पद्मासन पर बैठकर शिवरूपी गुरु को नमस्कार करना
चाहिये फिर नासाग्र पर दृष्टि रखकर एकाकी प्राणायाम का अभ्यास
करना चाहिये ॥ १०६ ॥ नवों द्वारों को रोक वायु को बाँध कर
दृढ़तापूर्वक शक्तिचालन करके अपान और अग्नि सहित कुण्डलिनी को
ऊपर ले जाय ओर आत्म ध्यानपूर्वक उसे मस्तक में स्थिर करे, जब
तक यह स्थिर रहे तब तक श्रेष्ठ है ॥ १०७ ॥ ऐसा प्राणायाम पाप
रूपी ईंधन के लिये अग्नि स्वरूप है और संसार सागर से पार होने के
लिए सेतु के समान है ॥ १०८ ॥ आसन से रोगों का नाश होता है और
प्राणायाम से पापों का । योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हों
जाते हैं ॥ १०६ ॥ धारणा से मन में धैर्य आता है, समाधि द्वारा
अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है और इस प्रकार शुभाशुभ कर्मों का
नाश होकर मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ११० ॥
प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ।
प्रत्याहारद्विषट्केन जायते धारणा शुभा ॥१११॥
धारणा द्वादश प्रोक्तं ध्यानं योगविशारदैः ।
ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥११२॥
समाधौ परमं ज्योतिरनन्त विश्वतोमुखम् ।
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योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ८१
तस्मिन्दृष्टे क्रियाकर्म यातातो न विद्यते ॥११३
संबद्धाऽऽसनमेढ्रमङ् घ्रियुगलं कर्णाक्षिनासापुट-
द्वारानङ् गुलिभिर्नियम्य पवनं वक्रे ण वा पूरितम् ।
बद्ध वा वक्षसि बह्नपानसहितं मूर्ध्नि स्थितं धारये-
देवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरस्तन्मनाः ॥११४
गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान् ।
घण्टाऽऽदीनां प्रवाद्याना नादसिद्धिरुदीरिता ॥११५
प्राणायाम के द्वादश बार के अभ्यास से प्रत्याहार होता है
और बारह प्रत्याहार का अभ्यास करने से शुभ धारणा उत्पन्न होती
है। बारह धारणा को ध्यान कहा गया है और बारह ध्यान से
समाधि कहलाती है ॥ ११२ ॥ समाधि होने पर जो परम ज्योति
अनन्त और विश्वतोमुख का भाव होता है उससे क्रिया, कर्म और
आवागमन से छूट जाता है ॥ ११३ ॥ आसन पर बैठकर दोनों
चरणों को मेढ़ स्थान में लगाकर, कान, आंख और नाक के द्वारों को
अंगुलियों से बन्द करके, वायु को मुख द्वारा खींचकर भीतर ले जाय ।
उसे अपान के साथ मिलाकर छाती में रोके फिर मस्तक में स्थिर करे,
इस प्रकार उसमें मन को संलग्न करके योगीजन समभाव के विशेष
तत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ११४ ॥ आकाश मण्डल में पवन के जाने से
महान ध्वनि ( नाद ) सुनाई देने लगती है, घण्टा आदि का शब्द सुनने
में आता है और नाद-सिद्धि होती है ॥ ११५ ॥
प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् ।
प्राणायामवियुक्तेभ्यः सर्वरोगसमुद्भवः ॥११६
हिक्का कासस्तथा श्वासः शिरः कर्णाक्षिवेदना ।
भवन्ति विविधा रोगाः पवनव्यत्ययक्रमात् ॥११७
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः ।
६० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद्
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तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥११८
युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं प्रपूरयेत् ।
युक्तं युक्तं प्रबध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥११९
चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् ।
तत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥१२०
यथा तृतीयकाले तु रविः प्रत्याहरेत्प्रभाम् ।
तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं हरेत् ॥१२१
इत्युपनिषत् ॥
प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं और
प्राणायाम से रहित होने से सब रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ११६ ॥ हिचकी,
खांसी, श्वास, सिर, कान और आंख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के
रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है ॥ ११७ ॥ जिस प्रकार
सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी
प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिये, अन्यथा वह साधक
का नाश कर देता है ॥ ११८ ॥ वायु को युक्तिपूर्वक ही बाहर
निकालना चाहिये और युक्तिपूर्वक ही भीतर लेना चाहिये और युक्ति
से ही रोकना चाहिये, तभी सिद्धि मिलती है ॥ ११९ ॥ चक्षु आदि
इन्द्रियां जो विषयों की तरफ चलती हैं उस को रोकना प्रत्याहार
है ॥ १२० ॥ जिस प्रकार तीसरे प्रहर में सूर्य का प्रकाश कम हो
जाता है, उसी प्रकार योगी तीसरे अङ्ग में स्थिर होकर मन के विकारों
का शमन करे, यह उपनिषद् है ॥ १२१ ॥
॥ योगचूड़ामणि उपनिषद् समाप्त ॥
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महोपनिषद्
ॐ आप्याय तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो
बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निरा-
कुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे
अस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते
मयि सन्तु। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों, वाणी, घ्राण, चक्षु श्रोत्र, बल और
सब इन्द्रियाँ वृद्धि को प्राप्त हों सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं। मुझसे ब्रह्म
का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे। उसमें रत हुये मुझको
उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
प्रथमोऽध्यायः
अथातो महोपनिषदं व्याख्यास्यामः।
तदाहुः—एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो
नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यो न
चन्द्रमाः। स एकाकी न रमेत।
तस्य ध्यानान्तः स्थस्य यज्ञस्तोममुच्यते।
तस्मिन् पुरुषाश्चतुर्दश जायन्ते एका कन्या दशेन्द्रियाणि
मन एकादशं तेजो द्वादशमहं कारस्त्रयोदश प्राणश्चतुर्दश आत्मा
पञ्चदश बुद्धि भूतानि पञ्च तन्मात्राणि पञ्च महाभूतानि स एकः
पञ्चविंशयन्तिः पुरुषः तत्पुरुषं पुरुषो निवेश्य नास्य प्रधानसंवत्सरा
जायन्ते संवत्सरादधिजायन्ते ॥१-६॥
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६२ ] [ प्रथम अध्याय
६२ ] [ प्रथम अध्याय
महोपनिषद् का आरम्भ किया जाता है कि आदि में केवल एक
नारायण ही थे । ब्रह्मा, रुद्र, जल, अग्नि, सो, आकाश, पृथिवी, नक्षत्र,
सूर्य एवं चन्द्रमा आदि कुछ भी नहीं था । नारायण को अकेले रहना
अच्छा नहीं लगा । तब उन्होंने अन्तःस्थ सङ्कल्प रूपी ध्यान किया ।
वह ध्यान ही यज्ञस्तोम कहा गया है । उस ध्यान से ही चौदह पुरुष
और एक कन्या की उत्पत्ति हुई । वे चौदह पुरुष हैं—दस इन्द्रियाँ,
तेजस्वी मन, अहङ्कार, प्राण और आत्मा । इन चौदहों के अतिरिक्त
बुद्धि रूपिणी कन्या हुई । इनसे भिन्न सूक्ष्म भूत वाली पञ्च तन्मात्राएँ
और पञ्च महाभूत हुये । इन पच्चीसों के योग से एक पुरुष बना ।
उस पुरुष में विराट् पुरुष प्रविष्ट हुआ । परन्तु इस पच्चीस तत्व युक्त
विराट् रूप से संवत्सरों की उत्पत्ति नहीं हुई । संवत्सर तो कालरूप
संवत्सर से ही प्रकट हुये हैं ॥ १-६ ॥
अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायता
लतस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषो जायते
बिभ्रच्छ्रियं यशः सत्यं ब्रह्मचर्यं तपो वैराग्यं मन ऐश्वर्यं सप्रणवा
व्याहृतय ऋग्यजुः सामाथर्वाङ्गिरसः सर्वाणि छन्दांसि तान्यंगे
समाश्रितानि तस्मादीशानो महादेवो महादेवः ॥७॥
अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायत ।
तस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमाः प्रतता
आपः । तत्तस्तेजो हिरण्मयमण्डम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखो-
ऽजायत ॥८॥
सोऽध्यायत् । पूर्वाभिमुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिर्गायत्रं
छन्द ऋग्वेदोऽग्निर्देवता । पश्चिमाभिमुखो भूत्वा भुव इति
व्याहृतिस्त्रिष्टुभं छन्दो यजुर्वेदो वायुर्देवता । उत्तराभिमुखो भूत्वा
स्वरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः सूर्योदेवता । दक्षिणाभि-
[Header] महोपनिषद् [ ६३ ]
मुखो भूत्वा मह इति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः सोमो
देवता ॥६॥
सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥१०
विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ।
पतिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रें क विश्वरूपिणम् ॥११॥
फिर उन नारायण ने अन्य सङ्कल्पयुक्त अन्तःस्थ ध्यान किया ।
उनके उस ध्यान से एक ऐसे पुरुष की उत्पत्ति हुई जो तीन नेत्रों वाला
था तथा वह अपने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये था । यश, सत्य,
तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, नियन्त्रित मन, ऐश्वर्य, प्रणव युक्त व्याहृतियां,
चारों वेद और सम्पूर्ण छन्द उस सिद्ध पुरुष में समाश्रित थे । इसीलिए
उसका नाम ईशान एवम् महादेव हुआ । उन प्रसिद्ध नारायण ने पुनः
अन्तःस्थ ध्यान किया, उस समय उनके ललाट से पसीना टपकते लगा ।
वह पसीना ही जल रूप में फैल गया । उस जल में ही एक अणुकार
हिरण्यमय तेज की उत्पत्ति हुई । उस तेज से ही ब्रह्माजी उत्पन्न
हुये । ब्रह्मा जी पूर्व की ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री छन्द,
ऋग्वेद और अग्नि का ध्यान करने लगे । पश्चिम की ओर मुख करके
भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप छन्द, यजुर्वेद और वायु का ध्यान करने लगे ।
उत्तराभिमुख होकर स्वः व्याहृति, जगती छन्द, सामवेद और सूर्य का
ध्यान करने लगे । फिर उन्होंने दक्षिणाभिमुख होकर महः व्याहृति,
अनुष्टुप्त छन्द, अथर्ववेद और सोम का ध्यान किया । फिर उन ब्रह्मा ने
सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र वाले, सर्व मङ्गलों के कारण, सर्वत्र व्याप्त,
परात्पर और नित्य स्वरूप नारायण का ध्यान किया और उन्होंने उन
जगदीश्वर के क्षीर सागर में शयन करते हुए, दर्शन किये तथा यह
जाना कि यही परममुख विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण संसार का जीवन
इन्हीं पर अवलम्बित है ॥७-११॥
९४ ] [ द्वितीय अध्याय
९४ ] [ द्वितीय अध्याय
पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसंनिभम् ।
हृदयं चाप्यधोमुखं संतस्तै सीत्काराभिश्च ॥१२
तस्ये मध्यं महानर्चिर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखम् ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥१३
तस्याः शिखाया मध्ये पुरुषः परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्मा स ईशानः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
इति महोपनिषत् ॥१४॥
जो भले प्रकार से पद्मकोश के समान लम्बायमान एवं अधोमुख
हृदय है, उससे सीत्कार शब्द निकलता रहता है । उस हृदय के मध्य
में ही एक ज्वाला प्रदीप्त है । वही ज्वाला दीपशिखा के समान दसों
दिशाओं में प्रकाश को बाँटकर विश्व को प्रकाशित करती है । उसी
ज्वाला के मध्य में कुछ ऊपर उठी हुई एक क्षीण वह्निशिखा है । उसी
शिखा में परमात्मा निवास करते हैं । वही परमात्मा ब्रह्मा, ईशान, इन्द्र
हैं तथा वे अविनाशी एवम् परम स्वराट् हैं ॥ १२-१४ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥
द्वितीयोऽध्यायः
शुको नाम महातेजाः स्वरूपानन्दतत्परः ।
जातमात्रेण मुनिराड् यत् सत्यं तदवाप्तवान् ॥१
तेनासौ स्वविवेकेन स्वयमेव महामनाः ।
प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्नुयात् ॥२
अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः ।
चिन्मात्र मेवायमणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ॥३
चिदणोः परमस्यान्तः कोटिब्रह्माण्डरेणवः ।
उत्पत्तिस्थितिमभ्येत्य लीयन्ते शक्तिपर्ययात् ॥४
महोपनिषद् ] [ ६५
आकाशं बाह्यशून्यत्वादनाकाशं तु चित्त्वतः ।
न किंचिद्यदिनर्देश्यं वस्तु सत्तेति किंचन ॥५
आत्मा के परम आनन्द का निरन्तर आस्वादन करने वाले एक
अत्यन्त तेजस्वी मुनीश्वर थे । उनका नाम शुकदेव था । जन्म लेते ही
उन्हें सत्य एवं तत्वज्ञान की प्राप्ति हो गई थी । इसीलिये उन्होंने किसी
की सहायता लिये बिना ही, बहुत काल तक विचार करने के पश्चात्
अपने ही विवेक से आत्मस्वरूप क्या है, इस पर एक निश्चित धारणा
बनाई । आत्मा अनिर्वचनीय है इसलिये अगम्य है और मन रूपी षष्ठ
इन्द्रिय में अवस्थित होने से यह अणु के आकार का है, चिन्मात्र एवं
आकाश तत्व से भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म है । इस परम चिद् रूप अणु में
कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड रेणुकायें शक्ति क्रम के अनुसार उत्पन्न स्थित और
विलय होती रहती हैं । यह आत्मा चिद्रूप होने के कारण आकाश रूप
से भिन्न है, परन्तु बाह्य-शून्यता के कारण आकाश रूप भी है । इसके
रूप का वर्णन नहीं हो सकने से यह वस्तु रूप नहीं है, परन्तु सत्ता
होने से वस्तु रूप है ॥ १-५ ॥
चेतनोऽसौ प्रकाशत्वाद्वैद्याभावाच्छिलोपमः ।
स्वात्मनि व्योमनि स्वच्छे जगदुन्मेषचित्रकृत् ॥६
तद्भामात्रमिदं विश्वमिति न स्यात्ततः पृथक् ।
जवद्भे दोऽपि तद्भानमिति भेदोऽपि तन्मयः ॥७
सर्वगः सर्वसंबन्धो गत्यभावान्न गच्छति ।
नास्त्यसावाश्रयाभावात् सद्भूतत्वादथास्ति च ॥८
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुः परायणम् ।
सर्वसंकल्पसंन्यासश्चेतसा यत्परिग्रहः ॥६
जाग्रतः प्रत्ययाभावं यस्याहुः प्रत्ययं बुधाः ।
यत्सङ्कोचविकासाभ्यां जगत्प्रलयसृष्टयः ॥१०