१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंनात्मक भावों की संभावना नहीं है । जो आत्मतत्व में है, वही सब
कुछ है। इसलिए कहीं भी, किसी भी वस्तु की कामना न करते हुए जो
सहज में ही प्राप्त हो जाय, उसको निर्लिप्त भाव से भोगता रहे । न
किसी का त्याग और न ग्रहण, इस प्रकार विकार रहित रहो । हे पुत्र !
जिस पुरुष का यह जन्म अन्तिम अर्थात् जिसका आगे जन्म नहीं
होना है उस पुरुष में श्रेष्ठ जाति के मुक्ता के समान स्वच्छ विद्या प्रविष्ट
होती है । जिनके चित्त में वैराग्य का समावेश है उनके द्वारा भले
प्रकार अपने अनुभव द्वारा यह मत व्यक्त किया जाता है कि दृष्टा को
दृश्य के द्वारा जिस सुख की अनुभूति होती है, वह आत्मतत्व से उत्पन्न
हुआ स्पन्दन ही है और हम उसी का भले प्रकार से उपासना करते हैं ।
अस्ति और नास्ति के मध्यस्थ, प्रकाशों के भी प्रकाशक आत्मा के हम
उपासक हैं । वह आत्मा हमारे हृदय में महेश्वर रूप में स्थित है। जो
व्यक्ति उस शाश्वत आत्मा को छोड़कर अन्य वस्तुओं की उपलब्धि के लिए
प्रयत्नशील हैं, वे अपनी हस्तगता कौस्तुभ मणि का परित्याग कर अन्य
रत्न की कामना करते हैं । यह इन्द्रिय रूपी शत्रु सबल हों या बलहीन,
विवेक रूपी दण्ड से बारम्बार ताडन करने योग्य हैं । जैसे इन्द्र अपने
वज्र के प्रहार द्वारा बड़े-बड़े पर्वतों को भी गिरा देते हैं, वैसे ही विवेक
बुद्धि के द्वारा इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को उठने न देना चाहिए ॥११-२१॥
संसाररात्रिदुःस्वप्ने शून्ये देहमये भ्रमे ।
सर्वतवापवित्रं तद्दृष्टं संसृतिविभ्रमम् ॥२२॥
अज्ञानोपहतो बाल्ये यौवने वनिताहतः ।
शेषे कलत्रचिन्तार्त्तः किं करोति नराधमः ॥२३॥
सतोऽसत्ता स्थिता मूर्ध्नि रम्याणां मूर्च्छयंरम्यता ।
सुखानां मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं संश्रयाम्यहम् ॥२४॥
येषां निमेषणोन्मेषौ जगतः प्रलयोदयौ ।