१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 572 में से
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ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्ता—
द्व्रह्मानन्दं परमं चैव पश्चात् ।
ब्रह्मानन्दं परमं दक्षिणे च
ब्रह्मानन्दं परमं चोत्तरं च ॥३०
एक मात्र वह परमात्मा ही सदा से वर्तमान है और अन्य सब
भेद, आदि तथा भेदाभेद उसमें ही व्याप्त हैं ॥ २६ ॥ वस्तु या
अवस्तु जो कुछ है वह सब साक्षात् ब्रह्म ही है । ऐसी अवस्था में
ब्रह्मज्ञान रखने वाला किसी का ग्रहण या त्याग कैसे कर सकता
है ? ॥ २७ ॥ जो ब्रह्म उपमारहित, वाणी और मन से अगोचर,
दृष्टि से दिखाई न देने वाला, ग्रहण न कर सकने योग्य, अगोत्र,
रूप रहित है, जो नेत्र, कान, हाथ, पैर आदि से रहित, नित्य, विभु,
सर्वगत, सूक्ष्म, अव्यय, मृत्युरहित है वही सब का अधिष्ठान या
आधार स्वरूप है । उसके आगे और पीछे श्रेष्ठ ब्रह्मानन्द ही है, दांये,
बांये भी वह परम ब्रह्मानन्द है ॥३०॥
स्वात्मन्येव स्वयं सर्वं सदा पश्यति निर्भयः ।
तदा मुक्तो न मुक्तश्च बद्धस्यैव विमुक्तता ॥३१
एवंरूपा परा विद्या सत्येन तपसाऽपि च ।
ब्रह्मचर्यादिभिर्धर्मैर्लभ्या वेदान्तवर्त्मना ॥३२
स्वशरीरे स्वयंज्योतिःस्वरूपं परमार्थिकम् ।
क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥३३
एवं स्वरूपविज्ञानं यस्य कस्यास्ति योगिनः ।
कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य संपूर्ण रूपिणः ॥३४
आकाशमेकं संपूर्णं कुत्रचिन्न हि गच्छति ।
तद्वद्ब्रह्मात्मविच्छ्रेष्ठः कुत्रचिन्नैव गच्छति ॥३५