१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१६४ ] [ पंचम अध्याय
१६४ ] [ पंचम अध्याय
कुछ ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि नाम धारण किया है। कोई
ताड़, तमाल, कदम्ब, नींबू, आम, तृण औषधि वृक्ष, मूल, पत्र एवं
फल बन गए हैं, तो कोई विभिन्न पर्वतों के आकार में स्थित होकर
मन्दर, मेरु, मलय, महेन्द्र आदि कहे जाते हैं। कोई जल-राशि के रूप
में, कोई समुद्र, दूध, घृत, इक्षु-रस आदि के रूप में स्थित हुये हैं। कुछ
ने महती दिशाओं का रूप धारण किया है तो कोई अत्यन्त वेगवाली
नदी के रूप में प्रवाहित हो रहे हैं। जैसे हाथ से गेंद को बारम्बार
गिराते हुये उछालते हैं उस प्रकार कुछ को मृत्यु बारम्बार ताड़ित करती
है। अनेकों ऐसे हैं कि आकाश में उठते और फिर नीचे गिर जाते हैं।
अनेक मनुष्य ऐसे हैं जो विवेकी होकर भी अच्छे कर्म नहीं करते और
हजारों जन्म भोग लेने पर भी उनका आवागमन नहीं मिटता। आत्म-
तत्व जब दिशा और काल के प्रभाव से तथा अपनी शक्ति के द्वारा देह
धारण करता है तब वही वासना से प्रभावित सङ्कल्पों की ओर जाने
वाले चंचल मन के रूप में हो जाता है। यह सङ्कल्पों से ओत प्रोत मन
शक्ति क्षण भर में ही स्वच्छ आकाश की भावना वाली हो जाती है
उसमें शब्द रूप बीज के अंकुर फूटते हैं। फिर वही मन अधिक घनीभूत
होकर स्पन्दन क्रम के कारण वायु-स्पन्दन के भाव में रमता है। उसमें
स्पर्श रूप वीज के अंकुर लगते हैं। फिर दृढ़ अभ्यास से शब्द-स्पर्श रूप
आकाश की उत्पत्ति होती है और वायु की टक्कर से अग्नि प्रकट होता
है। वह अग्नि रूप तन्मात्रा के सहयोग से त्रिगुणात्मक हो जाता है
और उन तीनों गुणों के साथ मिलकर मन रस-तन्मात्रा की भावना
करता है। उस समय वह जल के शीतल गुण का चिन्तन करता हुआ
जल का अनुभव करने लगता है। फिर वह चार गुणों वाला होकर गंध
तन्मात्रा मय होकर पृथिवी का अनुभव करता है। इस प्रकार पांचों
तन्मात्राओं से युक्त होकर वह अपनी सूक्ष्मता त्याग कर आकाश में
अग्नि की चिङ्गारियों के रूप में स्फुरित होते हुये शरीर को देख पाता
महोपनिषत् [ १६५
है। वह शरीर ही अहङ्कार कलाओं से युक्त और बुद्धिबीज से समन्वित
पुर्यष्टक कहा गया है। वह प्राणियों के हृदय कमल में मँडराने वाले
भौंरे के समान है। जैसे पाक कराने पर विल्वफल स्थूलता को प्राप्त
होता है वैसे ही उस सूक्ष्म शरीर में तीव्र संवेगात्मक तेजस्वी शरीर की
भावना होने पर स्थूल हो जाता है। वह तेज उस स्वच्छ आकाश में
मूषा में लगाये हुये सोने के समान स्फुरित होता और अपने स्वभावा-
नुकूल ही गठित हो जाता है। वह ऊपर सिर के समान, नीचे पांवों के
समान, पार्श्वों में भुजाओं और मध्य में उदर के समान होता जाता
है। इस प्रकार पूर्ण शरीर को प्राप्त हो जाता है। वही शरीर बुद्धि,
बल, वीर्य, उत्साह, विज्ञान एवं वैभव से सम्पन्न हुआ सब लोकों का
पितामह ब्रह्मा बन जाता है ॥ १३४-१५७ ॥
अवलोक्य वपुर्ब्रह्मा कान्तमात्मोयमुत्तमम् ।।१५८
चिन्तामभ्येत्य भगवांस्त्रीकालामलदर्शनः ।
एतस्मिन् परमाकाशे चिन्मात्रैकात्मरूपिणि ।।१५६
अदृष्टापारपर्यन्ते प्रथमं किं भवेदिति ।
इति चिन्तितवान् ब्रह्मा सद्योजातामलात्महक् ।।१६०
अपश्यत् सर्गवृन्द्वानि समतीतान्यनेकंशः ।
स्मरत्यथो स सकलान् सर्गधर्मगुणक्रमात् ।।१६१
लीलया कल्पयामास चित्राः संकल्पतः प्रजाः ।
नानाऽऽचारसमारम्भा गन्धर्वनगरं यथा ।।१६२
तासां स्वर्गापवर्गार्थं धर्मकामार्थसिद्धये ।
अनन्तानि विचित्राणि शास्त्राणि समकल्पयत् ।।१६३
विरिञ्चिरूपान्मनसः कल्पितत्वाज्जगत्स्थितेः ।
तावत्स्थितिरियं प्रोक्ता तन्नाशे नाशमाप्नुयात् ।।१६८
न जायते न म्रियते क्वचित् किंचित कदाचन ।