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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 572 में से

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पृष्ठ 172

१६४ ] [ पंचम अध्याय
कुछ ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि नाम धारण किया है। कोई
ताड़, तमाल, कदम्ब, नींबू, आम, तृण औषधि वृक्ष, मूल, पत्र एवं
फल बन गए हैं, तो कोई विभिन्न पर्वतों के आकार में स्थित होकर
मन्दर, मेरु, मलय, महेन्द्र आदि कहे जाते हैं। कोई जल-राशि के रूप
में, कोई समुद्र, दूध, घृत, इक्षु-रस आदि के रूप में स्थित हुये हैं। कुछ
ने महती दिशाओं का रूप धारण किया है तो कोई अत्यन्त वेगवाली
नदी के रूप में प्रवाहित हो रहे हैं। जैसे हाथ से गेंद को बारम्बार
गिराते हुये उछालते हैं उस प्रकार कुछ को मृत्यु बारम्बार ताड़ित करती
है। अनेकों ऐसे हैं कि आकाश में उठते और फिर नीचे गिर जाते हैं।
अनेक मनुष्य ऐसे हैं जो विवेकी होकर भी अच्छे कर्म नहीं करते और
हजारों जन्म भोग लेने पर भी उनका आवागमन नहीं मिटता। आत्म-
तत्व जब दिशा और काल के प्रभाव से तथा अपनी शक्ति के द्वारा देह
धारण करता है तब वही वासना से प्रभावित सङ्कल्पों की ओर जाने
वाले चंचल मन के रूप में हो जाता है। यह सङ्कल्पों से ओत प्रोत मन
शक्ति क्षण भर में ही स्वच्छ आकाश की भावना वाली हो जाती है
उसमें शब्द रूप बीज के अंकुर फूटते हैं। फिर वही मन अधिक घनीभूत
होकर स्पन्दन क्रम के कारण वायु-स्पन्दन के भाव में रमता है। उसमें
स्पर्श रूप वीज के अंकुर लगते हैं। फिर दृढ़ अभ्यास से शब्द-स्पर्श रूप
आकाश की उत्पत्ति होती है और वायु की टक्कर से अग्नि प्रकट होता
है। वह अग्नि रूप तन्मात्रा के सहयोग से त्रिगुणात्मक हो जाता है
और उन तीनों गुणों के साथ मिलकर मन रस-तन्मात्रा की भावना
करता है। उस समय वह जल के शीतल गुण का चिन्तन करता हुआ
जल का अनुभव करने लगता है। फिर वह चार गुणों वाला होकर गंध
तन्मात्रा मय होकर पृथिवी का अनुभव करता है। इस प्रकार पांचों
तन्मात्राओं से युक्त होकर वह अपनी सूक्ष्मता त्याग कर आकाश में
अग्नि की चिङ्गारियों के रूप में स्फुरित होते हुये शरीर को देख पाता