१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
प्रथम अध्याय [ २४६ ]
प्रथम अध्याय [ २४६ ]
शक्तिचालन है ॥ ७ ॥ कुण्डलिनी को चलाने के दो मुख्य साधन हैं,
सरस्वती का चालन और प्राण निरोध, अभ्यास द्वारा लिपटी हुई
कुण्डलिनी सीधी हो जाती है ॥ ८ ॥ पहले तुझको सरस्वती के चालन
के विषय में समझाता हूं, प्राचीनता वाले सरस्वती को अरुन्धती कहते
हैं। इस सरस्वती नाड़ी का चालन करने से कुण्डलिनी अपने आप चलने
लगती है। इसके लिए जब श्वांस इड़ा [ बाँयी ] नाड़ी से बहती हो
तो पद्मासन लगाकर बैठे ॥९-१०॥
द्वादशांगुलदैर्ध्यं च अम्बरं चतुरङ्गुलम् ।
बिस्तीर्य तेन तन्नाडीं वेष्टयित्वा ततः सुधीः ॥११
अंगुष्ठतर्जनीभ्यां तु हस्ताभ्यां धारयेहढ़म् ।
स्वशक्त्या चालयेद्वामे दक्षिणेन पुनः पुनः ॥१२
मुहूर्तद्वयपर्यन्तं निर्भयाच्चालयेत्सुधीः ।
ऊर्ध्वमाकर्षयेत्किञ्चित्सुषुम्नां कुण्डलीगता ॥१३
तेन कुण्डलिनी तस्याः सुषुम्नाया मुखं व्रजेत् ।
जहाति तस्मात्प्राणोऽयं सुषुम्नां व्रजति स्वतः ॥१४
तुन्दे तु ताणं कुर्याच्च कण्ठसंकोचने कृते ।
सरस्वत्याश्चालनेन वक्षः स्यादूर्ध्वंगो मरुत् ॥१५
तब बारह अंगुल लम्बे ओर चार अंगुल चौड़े आकाश के
टुकड़े से ( कल्पित करके ) कुण्डलिनी को लपेटे ॥ ११ ॥ तब बांयी
और दाहिनीं नासिका को अँगूठे और तर्जनी से दृढ़तापूर्वक पकड़े और
पहले दाहिनीं से और फिर बांयी नासिका से बार बार रेचक और
पूरक करे । साथ ही उसको मानसिक भावना द्वारा दांयी और
बांयी ओर बार-बार चालन करता रहे ॥ १२ ॥ इस प्रकार दो मुहूर्त
तक सरस्वती का चालन करता रहे । इसके पश्चात् सुषुम्ना नाड़ी को
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जो कुण्डलिनी के समीप ही रहती है किंचित ऊपर की तरफ खींचे
॥ १३ ॥ इस विधि से अभ्यास करने पर कुण्डलिनी सुषुम्ना के मुख में
चढ़ने लगती है और प्राण भी स्वयं ही उस स्थान को छोड़कर सुषुम्ना
में चलने लगता है ॥ १४ ॥ पेट को ऊपर की तरफ खींच कर तथा
कण्ठ को संकोचन कर सरस्वती को चलाने से वायु वक्षस्थल से ऊपर
चला जाता है ॥ १५ ॥
सूर्येण रेचयेद्वायुं सरस्वत्यास्तु चालने ।
कण्ठसंकोचनं कृत्वा वक्षः स्यादूर्ध्वगो मरुत् ॥१६
तस्मात्संचालयेन्नित्यं शब्दगर्भां सरस्वतीम् ।
यस्याः संचालनैनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते ॥१७
गुल्मं जलोदरप्लीहो ये चान्ये तुन्दमध्यगाः ।
सर्वे ते शक्तिचालेन रोगा नश्यन्ति निश्चयम् ॥१८
प्राणरोधमथेदानीं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
प्राणश्च देहगो वायुरायामः कुम्भकः स्मृतः ॥१९
स एव द्विविधः प्रोक्तः सहितः केवलस्तथा ।
यावत्केवलसिद्धिः स्यात्तावत्सहितमभ्यसेत् ॥२०
जब सरस्वती का चालन किया जाय तो सूर्य नाड़ी ( दाहिनी )
से वायु का रेचक करे, कण्ठ से संकोचन कर ले तो वायु वक्षस्थल
से ऊपर चला जाता है ॥ १६ ॥ इस प्रकार शब्दगर्भा सरस्वती का
लगातार चालन करते रहना चाहिये । इसके चालन से योगी सब
प्रकार के रोगों से छूट जाता है ॥ १७ ॥ गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा
पेट सम्बन्धी अन्य रोग शक्तिचालन से निश्चयपूर्वक नष्ट हो जाते हैं
॥१८॥ आगे प्राण निरोध ( प्राणायाम ) को बतलाते हैं । देह में
चलने वाले वायु को प्राण कहते हैं और जब वह स्थिर हो जाता है
तब वह कुम्भक कहा जाता है ॥ १९ ॥ यह कुम्भक दो प्रकार का
प्रथम अध्याय ] [ Public Domain. Digitization by eGangotri ] २५१
बतलाया गया है--सहित और केवल । जब तक केवल कुम्भक
सिद्ध न हो तब तक सहित-कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये
॥ २० ॥
सूर्योज्जायी शीतली च भस्त्री चैव चतुर्थिका ।
भेदैरेव समं कुम्भो यः स्यात्सहितकुम्भकः ॥२१
पवित्रे निर्जने देशे शर्करादिविवर्जिते ।
धनुःप्रमाणपर्यन्ते शीताग्निजलवर्जिते ॥२२
पवित्रे नात्युच्चनीचे ह्यासने सुखदे सुखे ।
बद्धपद्मासन कृत्वा सरस्वत्यास्तु चालनम् ॥२३
दक्षनाड्या समाकृष्य बहिष्ठं पवनं शनैः ।
यथेष्टं पूरयेद्वायुं रेचयेदिडया ततः ॥२४
कपालशोधने वाऽपि रेचयेत्पवनं शनैः ।
चतुष्कं वातदोषं तु कृमिदोषं निहन्ति च ॥२५
सूर्यभेदी, शीतली और भस्त्रिका इन चार प्रकार के प्राणायामों
के साथ सहित कुम्भक किया जाता है ॥ २१ ॥ एकान्त और
पवित्र स्थान में जहां कंकड़-पत्थर आदि न हों और पास में ही घास,
अग्नि, जल आदि न हों, वहां न अधिक ऊँचा न अधिक नीचा ऐसे
पवित्र सुखदायक आसन पर बद्ध-पद्मासन लगाकर बैठे और सरस्वती
का चालन करे ॥ २२--२३ ॥ दाहिनी नासिका से बाहर की वायु
को धीरे-धीरे खींचे और पर्याप्त परिमाण में वायु के भीतर जाने
पर बांयी नासिका से रेचन करे ॥ २४ ॥ कपाल शोधन की क्रिया
में भी वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाले । इससे चारों प्रकार के वातदोष
और कृमिदोष नष्ट हो जाते हैं ॥२५॥
पुनः पुनरिदं कार्यं सूर्यभेदमुदाहृतम् ।
मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनैः ॥२६
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत्
यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ।
पूर्ववत्कुम्भयेत्प्राणं रेचयेदिडया ततः ॥२७
शीर्षोदिता नलहरं गलश्लेष्महरं परम् ।
सर्वरोगहरं पुण्यं देहानलविवर्धनम् ॥२८
नाडीजलोदरं धातुगतदोषविनाशनम् ।
गच्छतस्तिष्ठतः कार्यमुज्जय्याख्यं तु कुम्भकम् ॥२६
जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत्कुम्भकादनु ।
शनैस्तु घ्राणरन्ध्राभ्यां रेचयेदनिलं सुधीः ॥३०
गुल्मप्लीहादिका दोषाः क्षयं पित्तं ज्वरं तृषाम् ।
विषाणि शीतली नाम कुम्भकोऽयं निहन्ति च ॥३१
इस क्रिया को सूर्य भेदन कहते हैं, इसका अभ्यास बार-बार
करते रहना चाहिये । अब उज्जायी को बतलाते हैं कि मुख बन्द करके
दोनों नासिकाओं से वायु को धीरे से खींचे जिससे वह शब्द करती हुई
कण्ठ से लेकर हृदय तक भर जाय । तब पूर्ववत् कुम्भक करके
बाँयी नासिका से रेचक करे, इससे मस्तक की उष्णता, गले का कफ
और अन्य अनेक रोग दूर हो जाते हैं और देह की अग्नि की वृद्धि
होती है । इससे नाड़ी सम्बन्धी जलोदर और धातु सम्बन्धी रोग भी
दूर हो जाते हैं । इस उज्जायी कुम्भक को चलते-फिरते, स्थिर रहते
सदैव करते रहना चाहिये ॥ ३६--२६ ॥ शीतली नामक प्राणायाम
करते समय वायु को जिह्वा द्वारा खींचकर पूर्ववत् कुम्भक किया
जाता है फिर नासिका के छिद्रों से वायु को शनैः निकाल दिया
जाता है । इससे गुल्म, प्लीहा, पित्त ज्वर, तृषा आदि दूर होते हैं
॥ ३०--३१ ॥
ततः पद्मासनं बद्ध्वा समग्रीवोदरः सुधीः ।
मुखं संयम्य यत्नेन प्राणं घ्राणेन रेचयेत् ॥३२.