१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 572 में से
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बतलाया गया है--सहित और केवल । जब तक केवल कुम्भक
सिद्ध न हो तब तक सहित-कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये
॥ २० ॥
सूर्योज्जायी शीतली च भस्त्री चैव चतुर्थिका ।
भेदैरेव समं कुम्भो यः स्यात्सहितकुम्भकः ॥२१
पवित्रे निर्जने देशे शर्करादिविवर्जिते ।
धनुःप्रमाणपर्यन्ते शीताग्निजलवर्जिते ॥२२
पवित्रे नात्युच्चनीचे ह्यासने सुखदे सुखे ।
बद्धपद्मासन कृत्वा सरस्वत्यास्तु चालनम् ॥२३
दक्षनाड्या समाकृष्य बहिष्ठं पवनं शनैः ।
यथेष्टं पूरयेद्वायुं रेचयेदिडया ततः ॥२४
कपालशोधने वाऽपि रेचयेत्पवनं शनैः ।
चतुष्कं वातदोषं तु कृमिदोषं निहन्ति च ॥२५
सूर्यभेदी, शीतली और भस्त्रिका इन चार प्रकार के प्राणायामों
के साथ सहित कुम्भक किया जाता है ॥ २१ ॥ एकान्त और
पवित्र स्थान में जहां कंकड़-पत्थर आदि न हों और पास में ही घास,
अग्नि, जल आदि न हों, वहां न अधिक ऊँचा न अधिक नीचा ऐसे
पवित्र सुखदायक आसन पर बद्ध-पद्मासन लगाकर बैठे और सरस्वती
का चालन करे ॥ २२--२३ ॥ दाहिनी नासिका से बाहर की वायु
को धीरे-धीरे खींचे और पर्याप्त परिमाण में वायु के भीतर जाने
पर बांयी नासिका से रेचन करे ॥ २४ ॥ कपाल शोधन की क्रिया
में भी वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाले । इससे चारों प्रकार के वातदोष
और कृमिदोष नष्ट हो जाते हैं ॥२५॥
पुनः पुनरिदं कार्यं सूर्यभेदमुदाहृतम् ।
मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनैः ॥२६
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi