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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५
स्थिति को पा लेना ही समाधि कहा जाता है। उसमें समस्त वृत्तियों
का अन्त हो जाता है। जो योगी इस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त कर
लेता है वह पुनः संसार में नहीं आता ॥ १६०-१६१ ॥ इस प्रकार
योगी तत्व का शोध करता हुआ निस्पृह चित्त से ईंधन रहित
अग्नि के समान स्वयं ही शान्त हो जाता है ॥ १६२ ॥ फिर उसके
लिये कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं रहता, उसका मन और प्राण सच्चे
आत्म-ज्ञान से युक्त हो जाते हैं और उसका जीव शुद्ध परमात्म तत्व में
जल में नमक के समान लय हो जाता है ॥ १६३ ॥ उसे यह मोह
जाल में फँसा हुआ संसार स्वप्न की तरह दिखाई देने लगता है और
वह पूर्ण निश्चल हो स्वभाव से ही सुषुप्ति की-सी अवस्था में रहने
लगता है ॥ १६४ ॥ ऐसा योगी निर्वाण पद को प्राप्त कर कैवल्य
स्थिति में रहता है। यह उपनिषद् है।
॥ त्रिशिखिब्राह्मण उपनिषद् समाप्त ॥
—:०:—

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri

अद्वयतारकोपनिषत्

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
शान्ति पाठ—यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है।
पूर्ण में से पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः
शान्तिः ।
अथातोऽद्वयतारकोपनिषदं व्याख्यास्यामो यतये जितेन्द्रियाय
शमादिषड्गुणपूर्णाय ॥१॥
चित्स्वरूपोऽहमिति सदा भावयन् सम्यङ्निमीलिताक्षः
किंचिदुन्मीलिताक्षो वाऽन्तर्दृष्ट्या भ्रू दहरादुपरि सच्चिदानन्दतेजः
कूटरूपं परं ब्रह्मावलोकयन् तद्रूपो भवति ॥२॥
गर्भजन्मजरामरणसंसारमहद्भयात् संतारमति तस्मा-
त्तारकमिति। जीवेश्वरौ मायिकाविति विज्ञाय सर्वविशेषं नेति
नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म ॥३॥
तत्सिद्ध्यर्थं लक्ष्यत्रयानुसंधानं कर्तव्यम् ॥४॥
देहमध्ये ब्रह्मनाडी सुषुम्ना सूर्यरूपिणी पूर्णचन्द्राभा
वर्तते । सा तु मूलाधारादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रगामिनी भवति ।
तन्मध्ये तटित्कोटिसमानकान्त्या मृणालसूत्रवत् सूक्ष्माङ्गी
कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्ति । तां दृष्ट्वा मनसैव नरः सर्वपापविना-
शद्वारा मुक्तो भवति । फालोर्ध्वगललाटविशेषमण्डले निरन्तरं
तेजस्तारकयोगविस्फुरणेन पश्यति चेत् सिद्धो भवति । तर्जन्य-
ग्रोन्मीलितकर्णरन्ध्रद्वये तत्र फूत्कारशब्दो जायते । तत्र स्थिते
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

अद्वयतारकोपनिषत् [ २१७
मनसि चक्षुर्मध्यगतनीलज्योतिस्थलं विलोक्य अन्तर्दृष्ट्या निर-
तिशयसुखं प्राप्नोति । एवं हृदये पश्यति । एवमन्तर्लक्ष्यलक्षणं
मुमुक्षुभिरुपास्यम् ॥५॥
ॐ। अब अद्वयतारक उपनिषद का कथन करते हैं जो संन्यासी,
जितेन्द्रिय तथा शम-दम आदि षट गुणों से युक्त साधकों के लिये है
॥ १ ॥ आंखें बन्द अथवा अधखुली रख कर अन्तर दृष्टि से
भ्रुकुटियों के ऊपर के स्थान में "मैं चित् स्वरूप हूँ" इस प्रकार का
भाव निरन्तर रखते हुये सच्चिदानन्द, तेज समूह रूप परब्रह्म की
झांकी करने से परब्रह्म रूप हो जाता है ॥ २ ॥ जो गर्भ, जन्म,
जरा, मरण, संसार आदि महान पापों से तारता है, उसे तारकब्रह्म
कहा जाता है। जीव और ईश्वर को मायिक जानते हुए अन्य सबको
'नीति-नेति' कहते हुए जो कुछ शेष बचता है, वही अद्वय ब्रह्म है
॥ ३ ॥ उसकी सिद्धि के लिये तीन लक्ष्यों का अनुसंधान करना उचित
है ॥ ४ ॥ देह के मध्य में सुषुम्ना नाम की ब्रह्मनाड़ी पूर्ण चन्द्रमा के
समान प्रकाश वाली उपस्थित है, वह मूलाधार से आरम्भ होकर
ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। इस नाड़ी के मध्य में करोड़ों बिजलियों के
समान तेजवाली, मृणाल के सूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति
प्रसिद्ध है। इसका मन के द्वारा दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से
छूट कर मुक्त हो जाता है। ललाट के ऊपर विशेष मण्डल में
स्फुरित होने वाले तेज को तारक ब्रह्म के योग से सदैव देखता रहता
है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छेदों को तर्जनी अँगुलियों के
अग्रभाग से बन्द कर लेने पर फुत्कार का शब्द सुनाई देता है। उसमें
मन को स्थित करके चक्षुओं के मध्य नीली ज्योति के स्थल को
अन्तःदृष्टि से देखने पर अत्यन्त सुख की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार
का दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्षणों का
मोक्षाभिलाषी पुरुष को अभ्यास करना चाहिये ॥५॥

२१८ ] [ अद्वयतारकोपनिषत्
अथ बहिर्लक्ष्यलक्षणम्। नासिकाग्रे चतुर्भिः षड्भिरष्टभिः
दशभिः द्वादशभिः क्रमात् अंगुलान्ते नीलद्युतिश्यामत्वसहस्ररक्तभ-
ङ्गीस्फुरत्पीतवर्णद्वयोपेतं व्योम यदि पश्यति स तु योगी भवति ।
चलदृष्ट्या व्योमभागवीक्षितुः पुरुषस्य दृष्ट्यग्रे ज्योतिर्मयूखा
वर्तन्ते । तद्दर्शनेन योगी भवति । तप्तकाञ्चनसंकाशज्योतिर्मयूखा
अपाङ्गान्‍ते भूमौ वा पश्यति तद्दृष्टिः स्थिरा भवति । शीर्षोपरि
द्वादशांगुलसमीक्षितुः अमृतत्वं भवति । यत्र कुव स्थितस्य
शिरसि व्योमज्योतिर्दृष्टं चेत स तु योगी भवति ॥६॥
अथ मध्यलक्ष्यलक्षणं प्रातश्चित्रादिवर्णखण्डसूर्यचक्रवत्
वह्निज्वालावलीवत् । तद्विहीनान्तरिक्षवत् पश्यति । तदाकारा-
कारितया अवतिष्ठति । तद्भूयोदर्शनेन गुणरहिताकाशं भवति ।
विस्फुरत्तारकाकारदीप्यमानगाढतमोपमं परमाकाशं भवति ।
कालानलसमद्योतमानं महाकाशं भवति । सर्वोत्कृष्टपरमद्युति-
प्रद्योतमानं तत्त्वाकाशं भवति । कोटि सूर्यप्रकाशवैभवसंकाश
सूर्याकाशं भवति । एवं बाह्याभ्यान्तरस्थव्योमपञ्चकं तारक-
लक्ष्यम् । तद्दर्शी विमुक्तफलस्तोऽहग्व्योमसमानो भवति । तस्मात्
तारक एव लक्ष्यं अमनस्कफलप्रदं भवति ॥७॥
तत्तारकं द्विविधं पूर्वार्धं तारकं उत्तरार्धं अमनस्कं चेति ।
तदेष श्लोको भवति—
तद्योगं च द्विधा विद्धि पूर्वोत्तरविधानतः ।
पूर्वं तु तारकं विद्यात् अमनस्कं तदुत्तरमिति ॥८
अब बाह्य लक्ष्य के लक्षणों पर विचार करते—नासिकाग्र
से क्रमशः चार, छः, आठ, दस या बारह अंगुल की दूरी पर नील
और श्याम रङ्ग का सा रक्त भृङ्ग के वर्ण का प्रकाश, जो पीत शुक्ल
वर्ण से भी युक्त होता है, उसे जो आकाश में देखता है, वह योगी

अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २१६
होता है । चलती हुई दृष्टि से आकाश में देखने से ज्योति किरणें
दिखलाई देती हैं, उनको देखने वाला योगी होता है। जब नेत्रों के
कोने में तृप्त सुवर्ण के समान ज्योति मयूख का दर्शन होता है तो दृष्टि
स्थिर हो जाती है। मस्तक के ऊपर बाहर अंगुल की दूरी पर ज्योति
को देखने वाला अमृतत्व को प्राप्त होता है । चाहे जिस स्थान पर
स्थित शिर के ऊपर जो व्योम ज्योति को देखता है, वह योगी
होता है ॥ ६ ॥ इससे आगे मध्य लक्ष के लक्षण कहते हैं-प्रातः
समय चित्रादि वर्ण युक्त अखण्ड सूर्य चक्रवत्, अग्नि की ज्वाला के
सदृश्य और उनसे रहित अन्तरिक्ष के तुल्य देखता है, उनके आकार
का होकर स्थिर रहता है, उसके दर्शन से फिर निर्गुण 'आकाश'
हो जाता है। चमकने वाले तारे से प्रकाशित और प्रातःकाल के
अँधेरे के समान 'परमाकाश' होता है । 'महाकाश' कालानल के
समान प्रकाशयुक्त होता है । 'तत्त्वाकाश' सबसे उत्कृष्ट प्रकाश और
प्रखर ज्योति वाला होता है। 'सूर्याकाश' करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के
समान होता है। इस प्रकार बाहर और भीतर स्थित ये पांच आकाश
तारक का लक्ष्य है। इस विधि से आकाश को देखने वाला उसी के
समान बन्धनमुक्त हो जाता है । तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल
प्रदान करने वाला होता है ॥ ७ ॥ इस प्रकार यह तारक-योग दो
प्रकार का होता है-पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध । इस विषय में यह श्लोक
कहा है-"यह योग दो प्रकार का है-पूर्व और उत्तर । पूर्व को तारक
कहा जाता है और उत्तर को अमनस्क ।" ॥८॥
अक्ष्यन्तस्तरयोः चन्द्रसूर्य प्रतिफलनं भवति । तारकाभ्यां
सूर्यचन्द्र मण्डलदर्शनं ब्रह्माण्डमिव पिण्डाण्डशिरोमध्यस्थाकाशे
रवीन्दुमण्डलद्वितयमस्तीति निश्चित्य तारकाभ्यां तद्दर्शनम् ।
अत्राप्युभयैक्यदृष्ट्या मनोयुक्तं ध्यायेत् तद्योगाभावे इन्द्रियप्रवृत्ते-
रनवकाशात् । तस्मात् अन्तर्दृष्ट्या तारक एवाऽनुसंधेयः ॥६॥

२२० ] [ अद्वयतारकोपनिषत्
यत्तारकं द्विविधः मूर्तितारकं अमूर्तितारकं चेति । यत्
इन्द्रियान्तं तत् मूर्तिमत् । यत् भ्रूयुगातीतं तत् अमूर्तिमत् ।
सर्वत्र अन्तःपदार्थविवेचने मनोयुक्ताभ्यास इष्यते । तारकाभ्यां
तदूर्ध्वस्थसत्त्वदर्शनात् मनोयुक्तेन अन्तरीक्षणेन सच्चिदानन्द-
स्वरूपं ब्रह्म॑व । तस्मात् शुक्लतेजोमयं ब्रह्मेति सिद्धम् । तद्ब्रह्म
मनःसस्कारिचक्षुषा अन्तर्दृष्ट्या वेद्यं भवति । एवं अमूर्तितारक-
मपि । मनोयुक्तेन चक्षुषैव दहरादिकं वेद्यं भवति, रूपग्रहण
प्रयोजनस्य मनश्चक्षुरधीनत्वात् बाह्यवदान्तरेऽपि आत्तमरश्चक्षुः
संयोगेनैव रूपग्रहणकार्योदयात् । तस्मात् मनोयुक्ता अन्तर्दृष्टिः
तारकप्रकाशाय भवति ॥१०॥
हम आंख के तारक (पुतलियों) से सूर्य और चन्द्र को देखते
हैं। जिस प्रकार हम नेत्र के तारकों से बाह्य ब्रह्माण्ड के सूर्य और
चन्द्र के दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने सिर रूप ब्रह्माण्ड के मध्य में
स्थित सूर्य और चन्द्र का निश्चय करके उनका दर्शन करना चाहिए
और दोनों को एक ही समझकर मन से उनका ध्यान करना चाहिए
क्योंकि मन को इस भाव में युक्त न किया जायगा तो इन्द्रियाँ
विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी । इसलिये साधक को अन्तर दृष्टि से
तारक का ही अनुसंधान करना चाहिए ॥ ६ ॥ तारक दो प्रकार
का होता है—मूर्त और अमूर्त । जो इन्द्रियों के अन्त में है, वह
मूर्ति तारक है और जो दोनों भ्रुकुटियों से बाहर है, वह अमूर्ति है।
अन्तः पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन द्वारा अभ्यास करना
चाहिए । सत्व-दर्शन युक्त मन से अन्तर में निरीक्षण करने से दोनों
तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का दर्शन होता है।
इससे विदित होता है कि ब्रह्म शुक्ल तेजोमय है। उस ब्रह्म को
मन सहित चक्षुओं की अन्तःदृष्टि से देखकर जानना । अमूर्ति तारक भी
इसी विधि से मन संयुक्त नेत्रों से विदित होता है । रूप

दर्शन के विषय में मन चक्षुओं के अधीन रहता है और बाहर के
समान भीतर भी रूप ग्रहण का कार्य इन दोनों के द्वारा ही
होता है । इसलिए मन सहित चक्षुओं से ही तारक का प्रकाश जाना
जाता है ॥ १० ॥
भ्रूयुगमध्यबिले दृष्टिं तद्द्वारा ऊर्ध्वस्थिततेज आविर्भूतं
तारकयोगो भवति । तेन सह मनोयुक्तं तारकं सुसंयोज्य प्रयत्नेन
भ्रूयुग्मं सावधानतया किंचिदूर्ध्वमुत्क्षेपयेत् । इति पूर्वंतारकयोगः ।
उत्तरं तु अमूर्तिमत् अमनस्कमित्युच्यते । तालुमूलोर्ध्वभागे
महान् ज्योतिर्मयूखो वर्तते । तत् योगिभिर्ध्येयम् । तस्मात्
अणिमादिसिद्धिर्भवति ॥ ११ ॥
अन्तर्बाह्यलक्ष्ये दृष्टौ निमेषोन्मेषवर्जितायां सत्यां शांभवी
मुद्रा भवति । तन्मुद्रारूढज्ञानिनिवासात् भूमिः पवित्रा भवति ।
तद्दृष्ट्या सर्वे लोकाः पवित्रा भवन्ति । तादृशपरमयोगिपूजा यस्य
लभ्यते सोऽपि मुक्तो भवति ॥ १२ ॥
अन्तर्लक्ष्यज्ज्वलज्ज्योतिःस्वरूपं भवति । परमगुरूपदेशेन
सहस्रारज्वलज्ज्योतिर्वा बुद्धिगुहानिहितचिज्ज्योतिर्वा षोडशान्त-
स्थतुरीयचैतन्यं वा अन्तर्लक्ष्यं भवति । तद्दर्शनं सदाचार्यमूलम्॥१३॥
तारक योग का लक्ष्य दोनों भ्रुकुटियों के मध्य स्थान के ऊर्ध्व
भाग में स्थित तेज का दर्शन करना है । उसके सहित मन से तारक की
सुयोजना करके प्रयत्नपूर्वक दोनों भौहों को किंचित उच्च रखे । यह
तारक-योग का पूर्व भाग है । दूसरे उत्तर भाग—अमूर्त्तिमान को
अमनस्क कहते हैं । तालूमूल के ऊर्ध्वभाग में महाज्योति किरणमण्डल
होता है । वही योगियों का लक्ष्य है । उसी से अणिमादिक सिद्धियाँ
प्राप्त होती हैं ॥ ११ ॥ जब साधक की अन्तर और बाह्य लक्ष्य को

२२२ ] [ अद्वयतारकोपनिषत्
देखने वाली दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब शांभवी मुद्रा होती है । इस
मुद्रा से युक्त ज्ञानी के निवास करने की भूमि पवित्र मानी जाती है और
सब लोग उसके दर्शन से पवित्र हो जाते हैं। जो कोई ऐसे परमयोगी
की पूजा करता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है ॥ १२ ॥
अन्त:लक्ष्य तरल ज्योति के रूप में हो जाता है। परम गुरु का उपदेश
प्राप्त होने से सहस्रदल-कमल में तरल जल-ज्योति अथवा बुद्धि गुहा में
रहने वाली ज्योति अथवा सोलह कला के अन्त में स्थित तुरीय चैतन्य
अन्तर्लक्ष्य होता है। यह सदाचार मूलक दर्शन है ॥ १३ ॥
आचार्यों वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः ।
योगज्ञो योगनिष्ठश्च सदा योगात्मकः शुचिः ॥१४
गुरुभक्तिसमायुक्तः पुरुषज्ञो विशेषतः ।
एवंलक्षणसंपन्नो गुरुरित्यभिधीयते ॥१५
गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः ।
अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥१६
गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः ।
गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परायणम् ॥१७
गुरुरेव परा काष्ठा गुरुरेव परं धनम् ।
यस्मात्तदुपदेष्टाऽसौ तस्माद्गुरुतरो गुरुरिति ॥१८
यः सकृदुच्चारयति तस्य संसारमोचनं भवति । सर्वजन्म-
कृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति । सर्वान् कामानवाप्नोति । सर्व-
पुरुषार्थसिद्धिर्भवति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥ १६ ॥
वह सम्पन्न आचार्य, विष्णु भक्त, मत्सरता रहित, योगज्ञाता,
योगनिष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष
रूप से लीन, इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है। 'गु' शब्द का

अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २२३
अर्थ है अन्धकार और ‘रु’ का अर्थ है इसको रोकने वाला । अन्ध-
कार को दूर करने से गुरु होता है। गुरु ही परमब्रह्म है, गुरु ही परम-
गति है, गुरु ही पराविद्या है, गुरु ही परायण योग्य है, गुरु ही
पराकाष्टा है, गुरु ही परम धन है ॥ १४-१८ ॥ वह गुरु उपदेश
करने वाला होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है। इसका उच्चारण
करने से संसार से छुटकारा हो जाता है, सब जन्मों के पाप तुरन्त
नष्ट हो जाते हैं, सब कामनायें पूरी हो जाती हैं, सब पुरुषार्थ सिद्ध हो
जाते हैं। जो इस प्रकार जानता है, वही उपनिषद् का ज्ञाता है ॥१६॥
॥ अद्वयतारक उपनिषद् समाप्त ॥

पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो
अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः शान्तिः
शान्तिः ॥
हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण
को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें
और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें ।
महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले
पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे
गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें !
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
पूर्वकाण्डः
अथ ह वै स्वयंभूर्ब्रह्मा प्रजाः सृजानोति कामकामो जायते
कामेश्वरो वैश्रवणः ॥ १ ॥ वैश्रवणो ब्रह्मपुत्रो वालखिल्यः
स्वयंभुवं परिपृच्छति—जगतां का विद्या का देवता जाग्रत्तूरीय
योरस्य को देवो यानि कस्य वशानि कालाः कियत्प्रमाणाः
कस्याज्ञया रविचन्द्रग्रहादयो भासन्ते कस्य महिमा गगनस्वरूप
एतदहं श्रोतुमिच्छामि नान्यो जानाति त्वंब्रूहि ब्रह्मन् ॥ २ ॥
स्वयंभूरुवाच—कृत्स्नजगतां मातृका विद्या ॥ ३ ॥ द्विक्लि-
वर्णसहिता द्विवर्णमाता त्रिवर्णसहिता चतुर्मात्रात्मकोङ्कारो