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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 572 में से

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पृष्ठ 230

२२२ ] [ अद्वयतारकोपनिषत्
देखने वाली दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब शांभवी मुद्रा होती है । इस
मुद्रा से युक्त ज्ञानी के निवास करने की भूमि पवित्र मानी जाती है और
सब लोग उसके दर्शन से पवित्र हो जाते हैं। जो कोई ऐसे परमयोगी
की पूजा करता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है ॥ १२ ॥
अन्त:लक्ष्य तरल ज्योति के रूप में हो जाता है। परम गुरु का उपदेश
प्राप्त होने से सहस्रदल-कमल में तरल जल-ज्योति अथवा बुद्धि गुहा में
रहने वाली ज्योति अथवा सोलह कला के अन्त में स्थित तुरीय चैतन्य
अन्तर्लक्ष्य होता है। यह सदाचार मूलक दर्शन है ॥ १३ ॥
आचार्यों वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः ।
योगज्ञो योगनिष्ठश्च सदा योगात्मकः शुचिः ॥१४
गुरुभक्तिसमायुक्तः पुरुषज्ञो विशेषतः ।
एवंलक्षणसंपन्नो गुरुरित्यभिधीयते ॥१५
गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः ।
अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥१६
गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः ।
गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परायणम् ॥१७
गुरुरेव परा काष्ठा गुरुरेव परं धनम् ।
यस्मात्तदुपदेष्टाऽसौ तस्माद्गुरुतरो गुरुरिति ॥१८
यः सकृदुच्चारयति तस्य संसारमोचनं भवति । सर्वजन्म-
कृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति । सर्वान् कामानवाप्नोति । सर्व-
पुरुषार्थसिद्धिर्भवति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥ १६ ॥
वह सम्पन्न आचार्य, विष्णु भक्त, मत्सरता रहित, योगज्ञाता,
योगनिष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष
रूप से लीन, इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है। 'गु' शब्द का