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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

४०६ शुकरहस्योपनिषद्
ततो ब्रह्मोपदिष्टं वै सच्चिदानन्दलक्षणम्।
जीवन्मुक्तः सदा ध्यायन्नित्यस्त्वं विहरिष्यसि ॥ ४७ ॥
इसमें सच्चिदानंद स्वरूप ब्रह्म का उपदेश है, जो तप से प्राप्त किया जाता है। तुम उस ब्रह्म का
चिन्तन करते हुए जीवन मुक्त (जन्म मरण के बन्धन चक्र से मुक्त) हो जाओगे ॥४७॥
यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठितः ।
तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ॥ ४८ ॥
जो वेद के आरम्भ में स्वररूप ॐकार उच्चरित होता है तथा जो वेदान्त में प्रतिष्ठित है, जो
प्रकृति में समग्र रूप से लीन होकर भी उससे परे है, वही महेश्वर है ॥ ४८ ॥
उपदिष्टः शिवेनेति जगत्तन्मयतां गतः । उत्थाय प्रणिपत्येशं त्यक्ताशेषपरिग्रहः ॥
भगवान् शिव के इस प्रकार के उपदेश को सुनकर मुनि शुकदेव सम्पूर्ण जगद्रूप परमेश्वर में
तन्मय हो गये। तदनन्तर उठकर भगवान् को हाथ जोड़कर प्रणाम कर सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग
करके (तपोवन) चल दिये ॥ ४९ ॥
परब्रह्मपयोराशौ प्लवन्निव ययौ तदा । प्रव्रजन्तं तमालोक्य कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥
उन्हें प्रव्रज्या में जाते देखकर श्री वेदव्यास जी (कृष्ण द्वैपायन मुनि) को वियोग दुःख हुआ, परन्तु
मुनि शुकदेव परब्रह्म रूप सागर में निर्द्वन्द्व तैरने के समान आनन्दमग्न थे ॥५०॥
अनुव्रजन्नाजुहाव पुत्रविश्लेषकातरः । प्रतिनेदुस्तदा सर्वे जगत्स्थावरजङ्गमाः ॥५१॥
पुत्र के वियोग में कातर हुए श्री वेदव्यास जी उनके पीछे चलते हुए उन्हें पुकारने लगे। उस समय
उनकी पुकार का प्रत्युत्तर सम्पूर्ण जगत् के जड़-चेतन पदार्थों ने दिया ॥ ५१ ॥
तच्छ्रुत्वा सकलाकारं व्यासः सत्यवतीसुतः ।
पुत्रेण सहितः प्रीत्या परानन्दमुपेयिवान् ॥ ५२ ॥
उस उत्तर को सुनकर अपने पुत्र को सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त जानकर सत्यवती पुत्र मुनि वेदव्यास
जी ने पुत्र के सहित व्यापक अनन्तरूप परब्रह्म की प्राप्ति की ॥ ५२ ॥
यो रहस्योपनिषदमधीते गुर्वनुग्रहात् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः साक्षात्कैवल्यमश्रुते साक्षात्कैवल्यमश्रुत इत्युपनिषत् ॥ ५३ ॥
जो साधक गुरु के अनुग्रह से इस रहस्योपनिषद् के तत्त्व दर्शन को जान लेता है, वह समस्त पापों
से मुक्त होकर साक्षात् कैवल्य पद को प्राप्त होता है, यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है ॥ ५३ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐसहनाववतु.........इति। शान्तिः ॥
॥ इति शुकरहस्योपनिषत्समाप्ता ॥

॥ अथ श्वेताश्वतरोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छः अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में
जगत् का मूल कारण जानने की जिज्ञासा की गई है। चर्चा से निर्णय न हो पाने पर ध्यान द्वारा अनुभूति
के आधार पर सृष्टि को क्रमशः एक चक्र, विशिष्ट प्रवाह के रूप में वर्णित किया गया है। मूल तत्त्व,
परमात्मतत्त्व को जानने की आवश्यकता तथा उसका फल समझाते हुए जीव, प्रकृति एवं ईश तथा
परमात्मा, भोक्ता, भोग्य आदि प्रभागों का स्वरूप स्पष्ट किया गया है। अंत में ॐ कार साधना द्वारा तिल
में तैल की तरह हृदय प्रदेश में स्थित परमात्म तत्त्व के साक्षात्कार का निर्देश है। दूसरा अध्याय ध्यान योग
साधना परक है। ध्यान का महत्त्व समझाते हुए उसके विधि-विधान, प्राणायाम, स्थान आदि की मर्यादाएँ
समझाते हुए उन्नति के लक्षण भी दर्शाए गये हैं। योग साधना से पंचभूत सिद्धि एवं आत्म तत्त्व से ब्रह्म
तत्त्व के साक्षात्कार की फलश्रुतियाँ बतलाते हुए परमतत्त्व को नमस्कार किया गया है।
तीसरे और चौथे अध्याय में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति संचालन और विलय में समर्थ परमात्म सत्ता
की सर्वव्यापकता तथा उसे जानने की महत्ता का वर्णन है। उसे नौ द्वार वाली पुरी में, इन्द्रियरहित-
सर्वसमर्थ लघु से लघु और महान् से महान् कहा गया है। जीवात्मा एवं परमात्मा की स्थिति को एक ही
डाल पर बैठे दो पक्षियों की उपमा से समझाया गया है। उस मायापति एवं उसकी माया को जानने की
प्रेरणा के साथ उसे जानने के महान् फल का वर्णन तथा मुक्ति के लिए प्रार्थना है।
अध्याय पाँच और छः में विद्या-अविद्या तथा उनके शासक परमात्मा की विलक्षणता बतलाकर
परमात्मा को ही उपास्य मानने वाले औपनिषदीय ज्ञान का अनुगमन करने की बात कही गई है। जीव के
कर्मानुसार उसकी विभिन्न गतियों, नाना योनियों तथा उनसे मुक्ति के उपाय कहे गये हैं। पुनः जगत् का
कारण जड़ प्रकृति के स्थान पर परमात्म तत्त्व को निरूपित किया गया है। उसके लिए ध्यान, उपासना
एवं ज्ञानयोग का आश्रय लेने की बात कहकर परमात्मा की सर्वव्यापकता तथा सर्वसमर्थता सिद्ध की गई
है। अन्त में यह विद्या सुपात्र को ही दी जाय, यह निर्देश दिया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु.........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अमृतनादोपनिषद्)
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति ।
किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठाः ।
अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥
ब्रह्मवेत्ता ऋषि कहते हैं- इस जगत् का मूल कारण ब्रह्म किस रूप में है ? हम किससे उत्पन्न हुए
हैं ? हम किससे जीवित रहते हैं ? हम कहाँ प्रतिष्ठित हैं ? हे ब्रह्मज्ञ महर्षियो ! हम किसकी प्रेरणा से सुख-
दुःख का अनुभव करते हुए संसार-चक्र व्यवस्था में भ्रमण करते हैं ? ॥ १ ॥
कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम् ।
संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥
काल, स्वभाव, सुनिश्चित कर्मफल व्यवस्था, आकस्मिक घटना, पंचमहाभूत और जीवात्मा-ये इस
जगत् के कारणभूत तत्त्व हैं या नहीं, इन पर सदैव विचार करना चाहिए। इन सब का समुदाय भी इस जगत्
का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि ये आत्मा के अधीन हैं। आत्मा भी कारण नहीं; क्योंकि यह सुख-दुःख
के कारणभूत कर्मफल व्यवस्था के अधीन है ॥ २ ॥

४०८ श्वेताश्वतरोपनिषद्
ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।
यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥३ ॥
तब उन्होंने ध्यान योग का अवलम्बन लिया, जिससे उन्हें अपने गुणों से आच्छादित ब्रह्मस्वरूप
आत्मशक्ति का साक्षात्कार हुआ, जो काल, स्वभाव आदि से लेकर आत्मा तक सभी कारणों का एकमात्र
अधिष्ठाता है ॥३॥
[ केवल बौद्धिक विवेचन द्वारा ब्रह्म का बोध सम्भव नहीं है, ध्यान के अन्तर्गत आत्म चेतना द्वारा ही
गुणों के आवरण को भेदकर उस परम तत्त्व का अनुभव किया जा सकता है।]
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
उन्होंने एक ऐसे चक्र को देखा, जो एक नेमि, तीन वृतों, सोलह अन्त (सिरों), पचास अरों, बीस
प्रत्यरों (सहायक अरों), छः अष्टकों, एक ही पाश से युक्त, एक मार्ग के तीन विभेदों, दो निमित्त तथा मोह
रूपी एक नाभि वाला था ॥ ४ ॥
[यहाँ विश्व व्यवस्था को एक चक्र (पहिए) के रूप में वर्णित किया गया है। नेमि चक्र को बाँधे
रखने वाली एक परिधि (प्रकृति) तथा तीन वृत-तीन (सत्त्व, रज, तम) गुण हैं। परिधि के अन्त-सिरे का
जोड़ सोलह कलायें हैं। प्रश्नोपनिषद् के छठे प्रश्न के अन्तर्गत चौथे एवं पाँचवे मन्त्र में इनका वर्णन है। ५०
अरे (विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि आदि पचास प्रत्यय) अन्तःकरण की वृत्तियों के ५० भेद तथा बीस सहायक
अरे (दस इन्द्रियाँ, ५ विषय एवं ५ प्राण) कहे गये हैं। चक्र में अष्टक किसे कहा गया है, यह स्पष्ट नहीं है।
इन छः के आठ-आठ भेद कहे गये हैं- प्रकृति, शरीरगत धातु, सिद्धियाँ, भाव, देवयोनियाँ तथा विशिष्टगुण।
तीन मार्ग धर्म, अधर्म एवं ज्ञानमार्ग तथा दो निमित्त- पाप और पुण्य कर्म हैं। यह सब मोहरूपी नाभिक को
केन्द्र मानकर घूम रहे हैं।]
पञ्चस्रोतोम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्त्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥
हम एक ऐसी नदी को जानते हैं, जो पाँच स्रोतों वाली जल-धाराओं से युक्त है, जिसके पाँच
उद्गम होने के कारण बड़ी उग्र और टेढ़ी-मेढ़ी होकर बहती है, जिसमें पाँच प्राणरूप तरंगें हैं, पाँच प्रकार
के मानसिक स्तर जिनके आदि मूल (कारण) हैं। जो पाँच भँवरों वाली, पाँच दुःखरूप प्रवाहों के वेग
वाली, पाँच पर्वों वाली और पचास भेदों वाली है ॥ ५ ॥
[ऋषि ने यहाँ विश्व प्रवाह को नदी के रूप में वर्णित किया है। पाँच धाराएँ-पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च
उद्गम-पञ्च तत्त्व, पाँच प्राण की तरंगें, पाँच भँवरें-पाँच तन्मात्राएँ, पाँच दुःख-गर्भ, जन्म, रोग, जरा और
मृत्यु हैं। पाँच विभाग-अज्ञान, अहंकार, राग, द्वेष और भय हैं। अन्तःकरण की ५० वृत्तियाँ उसके भेद हैं।
उक्त दोनों उपमाओं की विस्तृत व्याख्या आचार्य शंकर के भाष्य में देखी जा सकती है।]
सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते तस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे।
पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥
सबके पोषण के आधार रूप, सबके आश्रयरूप इस विस्तृत ब्रह्मचक्र (व्यवस्था) में जीव भ्रमण
करता रहता है। इस चक्र से पृथक् होकर जब वह आत्मा को और प्रेरक परमात्मा को सेवा द्वारा संतुष्ट
करता है, तो वह अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

अध्याय १ मन्त्र १३ ४०९

अध्याय १ मन्त्र १३ ४०९
उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च ।
अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥ ७ ॥
वेदों में वर्णित यह परब्रह्म ही पावन प्रतिष्ठा से युक्त और अविनाशी है। इसमें ही तीनों लोक स्थित
हैं। ब्रह्मवेत्ता महापुरुष अपने ही अन्तस् में अधिष्ठित उस ब्रह्म को जानकर उसी में निष्ठापूर्वक लीन होकर
विभिन्न योनियों के जन्म-बंधन से मुक्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः ।
अनीशश्चात्मा बुध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८ ॥
नश्वर जगत् और अनश्वर चेतना के संयोग से निर्मित यह सम्पूर्ण व्यक्त और अव्यक्त विश्व का पोषण
वह परमात्मा करता है। जीवात्मा संसार के विषयों का भोक्ता होने के कारण उसमें फँसता है, परन्तु परब्रह्म
का ज्ञान होने पर सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥
ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा ह्येका भोक्तृभोगार्थयुक्ता ।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ९ ॥
ज्ञानी- अज्ञानी, सर्वसमर्थ- असमर्थ यह दोनों (ईश और जीव) अजन्मा ही हैं। भोक्ता (जीव) के
लिए एक भोग्या (प्रकृति) भी अजन्मा है। विश्वरूपों में संव्यास अनन्त आत्मा-अकर्ता (कर्त्तापन के भाव
से मुक्त) है। इन तीनों (ईश्वर, जीव और प्रकृति) को जब ब्रह्मयुक्त अनुभव करे, वही यथार्थ ज्ञान है ॥ ९ ॥
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः ।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥ १० ॥
प्रकृति नाशवान् है, इसका भोक्ता जीवात्मा अविनाशी है, एक ही परमात्मा इसे अपने नियन्त्रण में
रखता है। उस एक परमात्मा का ध्यान करने से - चिन्तन करने से, उसके तत्त्व की भावना करने से अन्त
में विश्वरूप माया से निवृत्ति होती है और आगे उसी परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है ॥ १० ॥
ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैःक्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः ।
तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥ ११॥
उस परमात्मा को जान लेने पर सम्पूर्ण बन्धनों (विकारों) से मुक्ति मिलती है तथा सम्पूर्ण क्लेश
क्षीण होकर जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। उस परमात्म-तत्त्व का निरन्तर ध्यान करने से
शरीर त्यागने के बाद तृतीय लोक के सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के भोग से पूर्ण कामना की प्राप्ति हो जाती है और फिर
अन्त में कैवल्य पद की प्राप्ति हो जाती है ॥ ११ ॥
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किंचित् ।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२ ॥
अपने भीतर अधिष्ठित इस परमात्म तत्त्व को जानना ही चाहिए, क्योंकि इससे श्रेष्ठ जानने योग्य तत्त्व
दूसरा कुछ भी नहीं है। भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जड़ प्रकृति) और परमात्मा, इन तीनों को जो मनुष्य
जान लेता है, वह सब कुछ जान लेता है। इन तीनों भेदों में वर्णित ये तत्त्व वस्तुतः एक ही ब्रह्म के रूप हैं ॥
वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः ।
स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३ ॥

४१० श्वेताश्वतरोपनिषद्
जिस प्रकार अग्नि का उसके आश्रय स्थान काष्ठ में कोई रूप नहीं दिखता और उसके मूल तत्त्व का
भी नाश नहीं होता, क्योंकि आगे प्रयत्न करने पर ईंधन रूप अपने आश्रय में उसे (अग्नि को) ग्रहण किया
जा सकता है। उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा दोनों ॐकार साधना के द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं॥
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्॥
साधक को अपनी देह को नीचे की अरणि और ॐकार को ऊपर की अरणि बनाकर ध्यान के द्वारा
निरन्तर मन्थन के अभ्यास से (काष्ठ में) गुह्य अग्नि की भाँति परमात्म तत्त्व को देखना चाहिए॥ १४॥
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतस्स्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १५॥
जिस प्रकार तिलों में तैल, दही में घी, स्रोतों में जल और काष्ठों में अग्नि आदि तत्त्व छिपे रहते हैं,
उसी प्रकार परमात्मा अपने अन्तःकरण में ही छिपा हुआ है। जो साधक परमात्मा को सत्य तथा तप के द्वारा
मनन पूर्वक देखता है, परमात्मा उसी साधक के द्वारा ग्रहण किया जाता है॥ १५॥
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम्।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परं तद्ब्रह्मोपनिषत्परमिति ॥ १६॥
साधक दूध में निहित घृत की भाँति आत्मा में स्थित जिस परमात्म तत्त्व को आत्म विद्या और तप
के आधार से प्राप्त करता है, वह उपनिषदों में वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म ही है॥ १६॥
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ॥ १॥
वह सविता (सबका उत्पादक) देवता हमारे मन तथा बुद्धि को परमात्मा में लगाते हुए हमारी
इन्द्रियों को पार्थिव पदार्थों से ऊपर उठा कर उसमें दिव्य अग्नि का प्रकाश स्थापित करे, ताकि हम जगत्
के सार तत्त्व का ही अवलोकन करें॥ १॥
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २॥
हम सविता देवता की उपासना के निमित्त यज्ञादि कर्म मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करें। इस प्रकार
स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करें॥ २॥
युक्तवाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम्।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३॥
स्वर्ग तथा आकाश में गमन करने वाले, बृहद् प्रकाश संचरित करने वाले वे सविता देव हमारे मन
तथा बुद्धि से (मन तथा इन्द्रियों के अधिष्ठाता) देवों को संयुक्त करके उन्हें प्रकाश की ओर प्रेरित करें॥३॥
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ।
विहोत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४॥
जिसमें सभी ब्राह्मण आदि अपने मन तथा चित्त को लगाते हैं, जिनके निमित्त अग्निहोत्र आदि का
विधान किया गया है, जो सभी प्राणियों के विचारों को जानते हैं, उन सवितादेव की हम महती स्तुति करें॥

अध्याय २ मन्त्र ११ ४११

अध्याय २ मन्त्र ११ ४११
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूराः ।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५॥
हे मन और बुद्धि ! तुम्हारे स्वामी और सबके आदिकारण परब्रह्म परमात्मा से मैं नमस्कार के द्वारा
संयुक्त होता हूँ। मेरा श्लोक (स्तुतिकर्म) विद्वान् के यश के समान सर्वत्र फैल जाये। दिव्य लोकों में वास
करने वाले सभी अमृतरूप परमात्मा के अंशधर पुत्रगण मेरी बात सुनें ॥ ५॥
[ मन-बुद्धि विकारों के वशीभूत होकर अकड़े रहते हैं, नमन की प्रक्रिया इष्ट के प्रति समर्पण का अभ्यास
है। शुद्ध होकर साधक के मन-बुद्धि जब इष्ट से संयुक्त होते हैं, तो उनकी गति और सामर्थ्य व्यापक हो जाती है।
मनः शुद्धि की प्रक्रिया आगे स्पष्ट की गई है।]
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राभियुज्यते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥६ ॥
जहाँ अग्नि का मंथन किया जाता है, जहाँ प्राण वायु का विधिवत् निरोध किया जाता है एवं जहाँ
सोमरस का प्रखर आनंद प्रकट होता है, वहाँ मन सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥ ६॥
सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनिं कृणवसे नहि ते पूर्वमक्षिपत् ॥ ७॥
सविता देवता के द्वारा प्रेरित होकर हमें सबके आदि कारण परमात्मा की आराधना करनी चाहिए,
(हे साधक !) तुम उसी परमात्मा का आश्रय ग्रहण करो। इससे तुम्हारे पूर्त कर्म (पुण्य कार्य-स्मार्त कर्म)
भी बन्धन प्रदायक नहीं होंगे ॥ ७॥
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ ८ ॥
विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह सिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन तीनों को सीधा और स्थिर रखे। वह
उसी दृढ़ता के साथ सम्पूर्ण इन्द्रियों को मानसिक पुरुषार्थ कर अन्तःकरण में सन्निविष्ट करे और ॐकार
रूप नौका द्वारा सम्पूर्ण भयावह प्रवाहों से पार हो जाए ॥ ८ ॥
[ इन्द्रियों की सारी सुखाकांक्षाएँ अन्तःकरण से ही उपजती हैं। अन्तःकरण में वे समाविष्ट हो जायें, तो
सारे इन्द्रिय-सुखों का अनुभव अन्दर ही किया जा सकता है।]
प्राणान्प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छसीत ।
दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९॥
विद्वान् पुरुष को चाहिए कि आहार-विहार की सभी क्रियाओं को विधिवत् सम्पन्न करते हुए
प्राणायाम की क्रिया करके जब प्राण क्षीण हो, तो उसे नासिका से बाहर निकाल दे। जिस प्रकार सारथि दुष्ट
अश्वों से युक्त रथ को अत्यन्त सावधानी से लक्ष्य की ओर ले जाता है, उसी प्रकार विद्वान् पुरुष इस मन को
अत्यन्त जागरूक होकर वश में किये रहे ॥ ९॥
समे शुचौ शर्करावह्नवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥ १० ॥
साधक को चाहिए कि वह समतल और पवित्र भूमि, कंकड़, अग्नि तथा बालू से रहित, जल के
आश्रय और शब्द आदि की दृष्टि से मन के अनुकूल, नेत्रों को पीड़ा न देने वाले (तीक्ष्ण आतप से रहित),
गुहा आदि आश्रय स्थल में मन को ध्यान के निमित्त अभ्यास में लगाए ॥ १० ॥
नीहारधूमाकानिलानिलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥ ११ ॥

४१२ श्वेताश्वतरोपनिषद्
योग साधना प्रारम्भ करने पर ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरूप सर्वप्रथम कुहरा, धुआँ, सूर्य, वायु, जुगनू,
विद्युत्, स्फटिकमणि, चन्द्रमा आदि बहुत से रूप साधक के समक्ष प्रकट होते हैं ॥ ११ ॥
पृथ्व्याप्यतेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥ १२ ॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- इन पाँचों महाभूतों का सम्यक् उत्थान होने पर इनसे
सम्बंधित पाँच योग विषयक गुणों की सिद्धि होने पर जिस साधक को योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो जाता है,
उसे न तो रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है और न ही असामयिक मृत्यु प्राप्त होती है ॥ १२ ॥
[ इस मन्त्र में प्रयुक्त 'पृथ्व्याप्यतेजो' शब्द आर्षप्रयोग प्रतीत होता है, अन्यथा इसके स्थान पर 'पृथ्व्यप्तेजो'
अधिक उपयुक्त रहता ।]
लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च ।
गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥ १३ ॥
शरीर की स्थूलता कम होना, नीरोग होना, विषयों में आसक्ति न होना, शरीर में कान्ति-तेजस्विता
होना, स्वर की मधुरता, शुभ गन्ध का होना, मल-मूत्र अल्प होना, ये सब योग की पहली सिद्धि है ॥१३ ॥
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् ।
तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥ १४ ॥
जिस प्रकार मिट्टी से मलिन हुआ रत्न या आभूषण शोधित होकर प्रकाशमय होकर चमकने लगता
है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करके शोकादि से मुक्त होता और अद्वितीय तथा
कृतकृत्य हो जाता है ॥ १४ ॥
यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १५ ॥
जब योग साधना से युक्त साधक दीपक के सदृश आत्मतत्त्व के द्वारा ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार करता
है, तब वह अजन्मा, निश्चल, सम्पूर्ण तत्त्वों से पवित्र उस परमात्मा को जानकर सम्पूर्ण विकार रूप बन्धनों
से मुक्ति पा लेता है ॥ १५ ॥
एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ १६ ॥
वही एक परमात्मा सम्पूर्ण दिशाओं-अवान्तर दिशाओं में संव्याप्त है, वही सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ रूप
में प्रकट हुआ था, वही सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड में अन्तःस्थित है, वही इस जगत् रूप में उत्पन्न हुआ है और
भविष्य में भी उत्पन्न होने वाला है, वही सम्पूर्ण जीवों में स्थित है और सम्पूर्ण पक्षों वाला है ॥ १६ ॥
यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश ।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥ १७ ॥
जो परमात्मा अग्नि में है, जो जल में है, जो समस्त लोकों में संव्याप्त है, जो ओषधियों तथा
वनस्पतियों में है, उस परमात्मा के लिए नमस्कार है ॥ १७ ॥

अध्याय ३ मन्त्र ७ ४१३

अध्याय ३ मन्त्र ७ ४१३
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भवे संभवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥
जो एक मायापति अपनी प्रभुतासम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है,जो अकेला
ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान् जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥
वह एक परमात्मा ही रुद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन
करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर
स्थित है, वह सम्पूर्ण लोकों की रचना करके उनका रक्षक होकर प्रलयकाल में उन्हें समेट लेता है ॥ २ ॥
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
संबाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥
वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को
बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है,वही इस द्यावा-पृथिवी का रचयिता है ॥ ३ ॥
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥
जो रुद्ररूप परमात्मा सम्पूर्ण देवों की भी उत्पत्ति और उनके विकास का कारण है, जो सबका
अधिपति और सर्वज्ञाता है, जिसने सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया, वह परमात्मा हम सबको
कल्याणकारी बुद्धि से संयुक्त करे ॥ ४ ॥
या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शंतमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥
पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता हे रुद्रदेव ! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कान्तिमान्
जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें ॥ ५ ॥
यामिषुं गिरिशंत हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥
हे हिमालय वासी सुखदाता ! जिस बाण को आप प्राणियों की ओर फेंकने के लिए हाथ में धारण
किये रहते हैं, हे हिमालय रक्षक देव ! आप उसे कल्याणकारी बनाएँ, इस जगत् को, जीव समूह को हिंसित
न करें ॥ ६ ॥
ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति ॥ ७ ॥
जो उस जीव-जगत् से परे हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्मा से भी अत्यन्त श्रेष्ठ है, जो अत्यन्त व्यापक है,
किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत् को अपनी सत्ता से
घेरे हुए उस महान् परमात्मा को जानकर विद्वान् पुरुष अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥

४१४ श्वेताश्वतरोपनिषद्

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥८॥
मैं इस अविद्यारूप तमस् से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरूप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही
विद्वान् मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं ॥ ८ ॥
यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष
की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त है ॥ ९॥
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १०॥
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्म) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुःखों से परे है, जो
विद्वान् उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अन्यान्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं ॥ १०॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥
वह कल्याणकारी भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवा वाला है, वह सम्पूर्ण प्राणियों की हृदय
गुहा में निवास करता है। वह सर्वव्यापी और सब जगह पहुँचा हुआ है ॥ ११॥
महान्प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥
यह परम पुरुष परमात्मा महान्, सर्व समर्थ, सबका नियन्ता, प्रकाश स्वरूप और अविनाशी है,
अपनी अत्यन्त निर्मल कांति की प्राप्ति के निमित्त अन्तःकरण को प्रेरित करने वाला है ॥ १२ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।
हृदा मनीषी मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १३॥
अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला अन्तरात्मा सर्वदा मनुष्यों के हृदय में सन्निविष्ट रहता है। जो विद्वान् इस
हृदयगुहा में स्थित मन के स्वामी को विशुद्ध मन से साक्षात्कार करके जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥
[ गीता ने भी हृदय में स्थित अंगुष्ठ मात्र जीवात्मा का उल्लेख किया है। शरीर विज्ञान के अनुसार हृदय
में पेसमेकर से उसकी संगति बैठती है। हृदय की धड़कन के मूल स्पंदन वहीं से उपजते हैं। ]
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥
वह परमात्मा सहस्र सिर वाला, सहस्र नेत्रों वाला और सहस्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत् को
सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर(सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर
हृदयाकाश में स्थित है ॥ १४॥
पुरुष एवेदः सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ १५ ॥
जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यत्काल में होने वाला है और जो अन्नादि पदार्थों से पोषित
हो रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है ॥ १५ ॥
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
वह परम पुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह
कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥

अध्याय ४ मन्त्र २ ४१५

अध्याय ४ मन्त्र २ ४१५
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत्॥
वह परम पुरुष समस्त इन्द्रियों से रहित होने पर भी उनके (इन्द्रियों के) विषयों-गुणों को जानने
वाला है। सबका स्वामी-नियन्ता और सबका बृहद् आश्रय है॥ १७॥
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः ।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ १८॥
वह परम पुरुष प्रकाश के रूप में नवद्वार वाले देहरूपी नगर में अन्तर्यामी होकर स्थित है। वही इस
बाह्य-स्थूल जगत् में लीला कर रहा है॥ १८॥
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ १९॥
वह परम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर
भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीजों को जानता है। उसे जानने
वाला अन्य कोई नहीं है, उसे ज्ञानी जन महान्, श्रेष्ठ आदि कहते हैं॥ १९॥
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम्॥ २०॥
वह परम पुरुष अतिसूक्ष्म अणु से भी सूक्ष्म है और अतिशय महान् से भी महान् है। आत्मारूप वह
पुरुष इस जीव की हृदय गुहा में छिपा हुआ है। उस विषय भोग के संकल्पों से रहित, परमात्मा को जो
विधाता की कृपा से देख लेता है, वह सभी संतापों से मुक्त हो जाता है॥ २०॥
वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्॥ २१॥
उसे हम जानते हैं, जो जरा आदि से मुक्त सदा नित्य है। वह सबसे पुरातन पुरुष सबमें आत्मा रूप
में समाहित है। वह सर्वत्र विद्यमान और अत्यन्त व्यापक है, उसे ब्रह्मवेत्ता जन जन्म-बन्धन से मुक्त तथा
सदा नित्य रहने वाला बताते हैं॥ २१॥
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति ।
वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १॥
जो सृष्टि के आरम्भ में अकेले ही वर्ण (रूप-रंग) से रहित होकर और बिना किसी प्रयोजन के
अपनी विविध शक्तियों के प्रयोग द्वारा अनेक रूप धारण कर लेता है और अन्त में सम्पूर्ण विश्व अपने में ही
विलीन कर लेता है, वह परमात्मा हम सबको शुभ बुद्धि से संयुक्त करे॥ १॥
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥
वही (परमात्मा) अग्नि है, वही सूर्य, वायु तथा चन्द्रमा है। वही शुक्र (तेजस्वी नक्षत्र आदि) है,
वही ब्रह्म, वही आपः और वही प्रजापति है॥ २॥

४१६ श्वेताश्वतरोपनिषद्
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी ।
त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३ ॥
(हे परमेश्वर !) आप ही स्त्री और आप ही पुरुष हैं। आप ही पुत्र अथवा पुत्री हैं, आप ही वृद्ध
होकर लाठी के सहारे चलते हैं तथा (प्रपंच रूप में) जन्म लेकर सर्वत्र विविध रूपों में विद्यमान हैं॥ ३॥
नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः ।
अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥
आप ही नीलवर्ण (आकाश), पतंग (सूर्य), हरितवर्ण (वनस्पति आदि), लाल आँखों वाले
(नक्षत्र या अग्नि), मेघ, ऋतुएँ तथा सप्त समुद्र हैं। आप ही अनादि सत्ता वाले और सर्वत्र विद्यमान हैं,
आपसे ही ये सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥
['नीलः पतंगः' और 'हरितः लोहिताक्षः' के अर्थ कुछ आचार्यों ने नीला भ्रमर तथा हरे रंग का लाल
आँखों वाला पक्षी (शुक) किया है; किन्तु इस मन्त्र में और अगले मन्त्र में भी प्रकृति के व्यापक घटकों का ही
वर्णन है, उनके साथ यह कीट, पक्षी आदि की संगति नहीं बैठती। पतंग का अर्थ सूर्य भी होता है, अतः इनका अर्थ
नीलवर्ण-आकाश सूर्य, हरित (वनस्पति आदि) तथा रक्त नेत्र वाले नक्षत्र या अग्नि मानना अधिक युक्तिसंगत है।]
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः ।
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥
अपने अनुरूप बहुत सी प्रजाओं को उत्पन्न करने वाली लोहित (लाल-रजस्), शुक्ल (श्वेत-
सत्) एवं कृष्ण (काला-तमस्) वर्ण वाली अनादि प्रकृति (अजा) को एक अज (जीव) स्वीकार करता
हुआ भोगता है और दूसरा अज (आत्मा) उपभुक्त प्रकृति का परित्याग कर देता है ॥ ५ ॥
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ ६ ॥
सदा संयुक्त रहकर मैत्री भाव से एक साथ रहने वाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही
वृक्ष (शरीर) का आश्रय लिए हुए रहते हैं। उनमें से एक (जीवात्मा) तो उस वृक्ष के फलों (कर्मफलों)
को स्वाद लेकर खाता है; किन्तु दूसरा (परमात्मा) उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ॥
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७ ॥
उस एक ही वृक्ष पर रहने वाला जीव राग-द्वेष, आसक्ति आदि में डूबकर मोहित हुआ दीनतापूर्वक
शोक करता है। जब वह अनेकों साधकों द्वारा सेवित और अपने से भिन्न ईश्वर और उसकी महिमामयी सत्ता
का साक्षात्कार करता है, तब वह शोक-संताप से मुक्त हो जाता है ॥ ७ ॥
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥
जिसमें सम्पूर्ण देवगण अधिष्ठित हैं, उस अनश्वर परम व्योम (धाम) में समस्त वेद (ज्ञान समुच्चय)
स्थित हैं। जो विद्वान् उसे नहीं जानते, वे केवल ऋचाओं (वेदों) के द्वारा क्या कर लेंगे और जो उसे जानते
हैं, वे सम्यक् रूप से उसी (परमात्मा) में कृतार्थ होकर स्थित हैं ॥ ८ ॥

अध्याय ४ मन्त्र १५ ४१७

अध्याय ४ मन्त्र १५ ४१७
छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति।
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ९ ॥
समस्त वेद, यज्ञ, ज्योतिष्टोम आदि विशिष्ट यज्ञ, व्रत, भूत, भविष्यत् तथा जो भी कुछ वेदों द्वारा
वर्णित है, वह सब मायापति ईश्वर इस अक्षर (अविनाशी प्रकृति तत्त्व) से उत्पन्न करता है और स्वयं
जीवात्मा रूप में उस माया से भिन्न होकर भी उसके साथ भली-भाँति जुड़ा हुआ है॥ ९॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तं महेश्वरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥
प्रकृति को तो माया समझना चाहिए और परब्रह्म परमेश्वर को मायापति। उसी के अङ्गभूत (कार्य-
कारण समूह) से यह सारा जगत् व्याप्त है॥ १०॥
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम्।
तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ११॥
जो स्वयं अकेले ही प्रत्येक शरीर (चौरासी लाख योनि) का अधिष्ठाता है, जिसमें यह सम्पूर्ण जगत्
प्रलयकाल में विलीन हो जाता है और सृजन काल में विविध रूपों में पुनः प्रकट भी हो जाता है। साधक
उस नियामक सत्ता, वर प्रदाता, स्तुत्य परमदेव को जानकर शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है ॥ ११॥
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १२॥
जो रुद्रदेव, अन्यान्य देवों की उत्पत्ति के हेतु और ऐश्वर्यादि से उनका परिपोषण करने वाले हैं, जो
सबके अधिपति और सर्वज्ञाता हैं। जिसने हिरण्यगर्भ को उत्पन्न होते देखा था, वे देव हमें निर्मल बुद्धि से
संयुक्त करें॥ १२॥
यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः ।
य ईशेऽस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥
जो समस्त देवों के अधिपति हैं, जिसमें सम्पूर्ण लोक अधिष्ठित हैं, जो इस जगत् के दो पैर वाले
(मनुष्य) और चार पैर वाले समस्त जीवसमूह के नियन्ता हैं, उन 'क' संज्ञक प्रजापति का हम हविष्यान्न
आदि द्वारा पूजन करें (या उन देवाधिपति परमात्मा को छोड़कर अन्य किस देवता का यजन करें?) ॥
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १४॥
सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, हृदयगुहा के गुह्य स्थान में स्थित, सम्पूर्ण जगत् के रचयिता, अनेक रूप
धारण करने वाले, सम्पूर्ण जगत् को अकेले ही परिव्याप्त करने वाले कल्याणकारी देव को जानकर
(साक्षात्कार करके) साधक शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है ॥ १४॥
स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः ।
यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥ १५॥
वही प्रत्येक काल में समस्त लोकों (ब्रह्माण्ड) का रक्षक, सम्पूर्ण जगत् का स्वामी और सभी
प्राणियों में स्थित है। जिसमें ब्रह्मर्षिगण और देवगण भी ध्यान द्वारा तल्लीन रहते हैं, उस परम पुरुष को
जानकर साधक अपने मृत्यु के बन्धनों को (चक्र को) काट डालता है ॥ १५ ॥

४१८ श्वेताश्वतरोपनिषद्
घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १६ ॥
साधक घृत (मक्खन) के समान ऊपर रहने वाले उसके सार भाग के समान अतिसूक्ष्म और समस्त
प्राणियों में अधिष्ठित कल्याणकारी देव को जानकर तथा उस सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को अपनी सत्ता से
घेरकर रखने वाले विराट् देव को जानकर, सम्पूर्ण विकाररूपी बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ १६ ॥
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।
हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १७ ॥
यह जगत् कर्त्ता, देदीप्यमान परमात्मा सर्वदा मनुष्यों के हृदय में सम्यक् प्रकार से अवस्थित है। जो
साधक अपने हृदय, बुद्धि और मन से ध्यान द्वारा योग युक्त होकर इसे जान लेते हैं, वे अमरत्व पाते हैं ॥१७ ॥
यदाऽतमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासञ्छिव एव केवलः।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥ १८ ॥
जब अज्ञान का तमस् नहीं रहता (अर्थात् ज्ञान का प्रकाश उद्भूत हो जाता है), तब न दिन रहता
है, न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, केवल एक कल्याणकारी देव (शिव) रहता है। वह सर्वदा
अनश्वर है, वह सविता देव का भी उपास्य है तथा उसी से पुरातन प्रकृष्ट ज्ञान (प्रज्ञा) निःसृत हुआ है ॥
नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥
इसे न तो ऊपर से, न इधर-उधर से और न मध्य से ही कोई भली-भाँति पकड़ सकता है। जिसका
नाम 'महद्यशः' (सर्वत्र कीर्तिमान्) है, उसकी कोई उपमा (समानता करने वाला) भी नहीं है ॥ १९ ॥
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्।
हृदा हृदिस्थं मनसा य एनमेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २० ॥
इस परमात्मा का कोई रूप दृष्टि के सामने नहीं ठहर पाता, उसे कोई इन आँखों से नहीं देख सकता।
जो साधक अपने हृदय में अवस्थित परमात्मा को भावपूर्ण हृदय और निर्मल मन से जान लेते हैं, वे अमरत्व
प्राप्त कर लेते हैं ॥२० ॥
अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रतिपद्यते।
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २१ ॥
हे रुद्रदेव (संहारक देव) ! आप जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हैं, ऐसा जानकर कोई भीरु (मृत्यु के
भय से डरने वाला मेरे जैसा) आपके आश्रय में आता है, (और कहता है कि) आप अपने कल्याणकारी
रूप (दक्षिणमुख) से मेरी सर्वदा रक्षा करें (तो निश्चय ही आपको वैसा ही करना चाहिए) ॥ २१ ॥
मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः।
वीरान्मा नो रुद्र भामितोऽवधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ २२ ॥
हे रुद्रदेव ! हम विविध हविष्यान्न लेकर सदैव आपका आवाहन (यजन) करते हैं। आप कुपित
होकर हमारे वीर पुरुषों का नाश न करें। न हमारे पुत्रों में, न पौत्रों में, न हमारी आयु में, न हमारी गौओं
में और न हमारे अश्वों में कोई कमी करें ॥ २२ ॥

अध्याय ५ मन्त्र ६ ४१९

अध्याय ५ मन्त्र ६ ४१९
॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥
द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे।
क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥
(कार्य) ब्रह्म से भी उत्कृष्ट, वह अनन्त सत्ता अविनाशी है, जिसमें विद्या और अविद्या दोनों निहित
हैं और जो प्राणियों की हृदय गुहा में निहित है। क्षरणशील (नश्वर तो) 'अविद्या' है और अविनाशी
(जीवात्मा) 'विद्या' है। जो विद्या और अविद्या दोनों पर शासन करता है, वह इन दोनों से भिन्न सत्ता है ॥
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः।
ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥
जो अद्वितीय परमात्मा प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता है, जो सम्पूर्ण (चौरासी लाख) योनियों को
विभिन्न रूप प्रदान करता है। जिसने सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल मुनि को विशिष्ट ज्ञान-सम्पदा से
सम्पन्न किया तथा उन्हें उत्पन्न होते हुए देखा था (वही विद्या-अविद्या से परे परमतत्त्व है) ॥ २ ॥
एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः।
भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥
यह प्रकाश स्वरूप परमात्मा सृष्टि काल में इस जगत् क्षेत्र में एक-एक जाल (कर्मफल बन्धन) को
अनेक प्रकार से विभक्त कर स्थापित करता हुआ प्रलयकाल में उसका संहार कर देता है। वह परमेश्वर
(कल्पान्तर के आरम्भ में) प्रजापतियों की सृष्टि करके उन सब पर अपना आधिपत्य रखता है ॥ ३ ॥
सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्‌वान्।
एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिखभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥
जिस प्रकार सूर्यदेव अकेले ही ऊपर-नीचे और इधर-उधर की सभी दिशाओं को प्रकाशित करते
हुए देदीप्यमान होते हैं, उसी प्रकार वह परम पुरुष भगवान् प्रकाशस्वरूप और वरणीय होकर अकेले ही
समस्त उत्पत्तिकारक शक्तियों पर अपना आधिपत्य रखता है ॥ ४ ॥
यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः।
सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥
जो परमात्मा सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारणभूत है, जो समस्त तत्त्वों के स्वभाव को परिपक्व
करता है, जो समस्त पकाये गये (अथवा परिवर्तनशील) पदार्थों को विविध रूपों में परिणत करता है, जो
सम्पूर्ण गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) को उनके अनुरूप कार्यों में नियुक्त करता है, जो सम्पूर्ण जगत् का
अधिष्ठाता है (वह परब्रह्म है) ॥ ५ ॥
तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदयते ब्रह्मयोनिम्।
ये पूर्वं देवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥
वह परमात्मा वेदों के गुह्य सारभूत उपनिषदों में निहित है, वेद के उत्पन्नकर्ता उस परमात्मा को
ब्रह्मा जानते थे। जो पुरातन देवगण और ऋषिगण उसे (परमात्मतत्त्व को) जानते थे, वे निश्चित ही उसमें
तन्मय होकर अमृतस्वरूप हो गये थे ॥ ६ ॥

४२० श्वेताश्वतरोपनिषद्
गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव न चोपभोक्ता।
स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७॥
जो गुणों से युक्त, फलप्राप्ति के उद्देश्य से कर्म करने वाला और अपने किये गये कर्म के फल का
उपभोग करने वाला जीवात्मा है, वह विभिन्न रूपों को धारण करता हुआ तीन गुणों (सत्, रज, तम) से
युक्त होकर तीन मार्गों (देवयान, पितृयान तथा लौकिक योनियों या धर्म, अधर्म तथा ज्ञान मार्ग) से गमन
करता है। वह प्राणों का अधिपति जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार विविध योनियों में गमन करता है ॥ ७॥
अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः।
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रोऽप्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥
जो अंगुष्ठ मात्र परिमाणवाला, सूर्य सदृश प्रकाशस्वरूप और सङ्कल्प तथा अहङ्कार से युक्त है, जो
बुद्धि और आत्मा के विशिष्ट गुणों से युक्त है, यह आरे (लकड़ी चीरने का यन्त्र) की नोंक सदृश सूक्ष्म,
परमात्मा से भिन्न अस्तित्व वाला (जीवात्मा) योगियों द्वारा देखा गया है ॥ ८ ॥
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९॥
एक बाल की नोंक के सौवें भाग के पुनः सौ भागों में विभक्त करने पर, जो कल्पित भाग होता है, जीव
का स्वरूप उसी के बराबर (अतिसूक्ष्म) समझना चाहिए, परन्तु वही अनन्त रूपों में विस्तृत भी हो जाता है ॥ ९॥
[ चेतना की सूक्ष्म इकाई की सूक्ष्मता का अनुमान कराने के लिए ऋषि ने यह उदाहरण दिया है।]
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः। यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥ १०॥
यह जीवात्मा न तो स्त्री है, न पुरुष है और न ही नपुंसक है। यह जिस-जिस शरीर को ग्रहण
करता है, उसी-उसी से सम्बद्ध हो जाता है ॥ १० ॥
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासांबुवृष्ट्यात्मविवृद्धिजन्म।
कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसंप्रपद्यते ॥ ११॥
अन्न और जल के सेवन से जिस प्रकार शरीर परिपुष्ट होता है (उसकी वृद्धि होती है), उसी प्रकार
सङ्कल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोह से जीवात्मा का जन्म और विस्तार (अनेक योनियों में) होता है। जीवात्मा
अपने किये हुए कर्मों के फल के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न शारीरिक रूपों को बार-बार
धारण करता है ॥ ११ ॥
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥ १२ ॥
जीवात्मा अपने आन्तरिक गुणों (ममता, अहंता, आकांक्षा आदि) के अनुसार स्थूल और सूक्ष्म
बहुत से रूप धारण करता है। अपने क्रियात्मक गुणों (संस्कारों) तथा चेतनात्मक गुणों (चिन्तन, मनन,
सङ्कल्प आदि) के अनुरूप शरीर धारण कराने वाला हेतु कोई दूसरा (परमपिता परमात्मा) भी देखा
(जाना) गया है ॥ १२ ॥
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥

अध्याय ६ मन्त्र ५

अध्याय ६ मन्त्र ५
४२१

इस घोर संसार (भवसागर) में उस अनादि, अनन्त, विश्व सृजेता, अनेक रूपों वाले, सम्पूर्ण विश्व
को अकेले ही अपनी सत्ता से आवृत करने वाले (परमात्म) देव को जानकर साधक समस्त बन्धनों से मुक्त
हो जाता है ॥ १३ ॥
भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥
श्रद्धा भाव से प्राप्त होने वाले अशरीरी सृष्टि (भाव) एवं प्रलय (अभाव) करने वाले, कल्याणकारी
स्वरूप वाले, कलाओं की रचना करने वाले, उस देव (परमात्मा) को जो साधक जान लेता है, वह शरीर
बन्धन (आवागमन चक्र) को त्यागकर मुक्त हो जाता है ॥ १४ ॥

॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥
स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः ।
देवस्यैष महिमा नु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥
कुछ विद्वान् मनुष्य के स्वभाव को जन्म चक्र का कारण बताते हैं, दूसरे कुछ लोग काल को इसका
कारण बताते हैं, परन्तु ये लोग यथार्थता से बहुत दूर मोहग्रस्त स्थिति में हैं। वास्तव में यह परमात्म देव की
ही महिमा है, जिसके द्वारा इस लोक में यह ब्रह्मरूप (सृष्टि) चक्र घुमाया जाता है ॥ १ ॥
येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः ।
तेनेषितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्याप्यतेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥
जिसके द्वारा यह समस्त जगत् सदैव व्याप्त रहता है, जो ज्ञानस्वरूप, काल का भी काल, सर्वगुणसम्पन्न
और सर्वज्ञ है, उसके ही अनुशासन में यह सम्पूर्ण कर्म चक्र घूम रहा है। पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा
आकाश- इन पञ्च तत्त्वों का चक्र भी उसी के हाथ में है- ऐसा चिन्तन करते रहना चाहिए ॥ २ ॥
तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम्।
एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ॥ ३ ॥
उस परमात्मा ने कर्म चक्र चला कर, उसका अवलोकन कर आगे चेतन तत्त्व से जड़ तत्त्व का
संयोग कराके जगत् की रचना की, अथवा एक (अविद्या), दो (धर्म और अधर्म), तीन (सत्, रज, तम
गुण), आठ (मन, बुद्धि, अहंकार सहित पञ्चतत्त्वों) प्राकृतिक भेदों से तथा काल एवं सूक्ष्म आन्तरिक
गुणों (ममता, अहन्ता, इच्छा, आसक्ति आदि) के संयोग से इस जगत् की रचना की ॥ ३ ॥
आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ।
तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥ ४ ॥
जो साधक तीनों गुणों से व्याप्त कर्मों को आरम्भ करके उन्हें तथा उनके भावों को परमात्मा को
अर्पित कर देता है, (ऐसा करने से) उन कर्मों का अभाव हो जाता है तथा पूर्वकृत कर्मों का भी नाश हो
जाता है। ऐसा होने पर जीवात्मा जड़-जगत् से भिन्न सत्ता (परमात्मा) को प्राप्त हो जाता है ॥ ४ ॥
आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः ।
तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५ ॥

४२२ श्वेताश्वतरोपनिषद्
वह आदि पुरुष परमात्मा, (प्रकृति का जीव से) संयोग कराने वाले निमित्त के रूप में जाना (देखा)
गया है। यह तीनों कालों तथा सोलह कलाओं से परे है। अपने अन्तःकरण में अधिष्ठित उस सर्वरूप और
संसार रूप में प्रकट तथा स्तुत्य पुरातन परमात्म देव की उपासना करनी चाहिए ॥ ५ ॥
स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम्।
धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥
जिससे यह जगत् प्रपञ्च में प्रवृत्त होता है, वह (परमात्मा) जगत् वृक्ष (चक्र), काल तथा आकार
से परे तथा उससे भिन्न है। धर्म के विस्तारक, पाप का नाश करने वाले, उस ऐश्वर्य के स्वामी को जानकर
साधक आत्मा में स्थित उस विश्वाधार विराट् परमात्मा तथा उसके अमृतस्वरूप को प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥
ईश्वरों (प्रभुता-सम्पन्नों) के भी परम महेश्वर, देवताओं के परम देव, पतियों (पालकों) के भी
परमपति, अव्यक्त (प्रकृति आदि) से भी परे, सम्पूर्ण लोक-ब्रह्माण्ड के अधिपति, स्तुति करने योग्य वह
परमात्म देव सबसे परे हैं, (ऐसे) परमात्म देव को हम जानते हैं ॥ ७ ॥
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ८ ॥
उस (निराकार परमेश्वर) के शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बड़ा भी कोई नहीं
है, उसकी पराशक्ति (अदृश्य-दिव्य शक्ति) विविध प्रकार की सुनी जाती है और वह स्वभाव जन्य ज्ञान
क्रिया (सम्पूर्ण विषयों के ज्ञान की प्रवृत्ति) और बल क्रिया (अपने प्रभाव से सबको अभिभूत करने की
शक्ति) वाला है ॥ ८ ॥
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् ।
स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ ९ ॥
इस जगत् में कोई उसका स्वामी नहीं है, उसका कोई शासक नहीं है एवं उसका कोई लिंग (स्त्री,
पुरुष और नपुंसक) भी नहीं है। वह सबका कारण है और इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीवों का अधिपति है।
उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न ही कोई अधिपति है ॥ ९ ॥
यस्तूर्णनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतः।
देव एकः स्वमावृणोति स नो दधातु ब्रह्माव्ययम् ॥ १० ॥
तन्तुओं द्वारा मकड़ी के समान उस एक परमदेव (परमात्मा) ने स्वयं ही अपनी प्रधान शक्ति
(प्रकृति) से (उत्पन्न अनन्त कार्यों से) अपने को आवृत कर लिया है। वह परमात्मा हमें अपने ब्रह्मस्वरूप
से एकत्व प्रदान करे ॥ १० ॥
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण प्राणियों में वह एक देव (परमात्मा) स्थित है। वह सर्वव्यापक, सम्पूर्ण प्राणियों की
अन्तरात्मा, सबके कर्मों का अधीश्वर, सब प्राणियों में बसा हुआ (सबके अन्दर विद्यमान), सबका साक्षी,
पूर्ण चैतन्य, विशुद्धरूप और निर्गुणरूप है ॥ ११ ॥

अध्याय ६ मन्त्र १८ ४२३

अध्याय ६ मन्त्र १८ ४२३
एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥
जो अद्वितीय परमात्मा सबका अधीश्वर है, जो बहुत से निष्क्रिय जीवों के एक बीज को अनेक
रूपों में परिणत कर देता है, उस हृदय गुहा में अवस्थित परमेश्वर को जो धीर पुरुष (अनुभूतिजन्य दृष्टि से)
देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत सुख प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं ॥ १२ ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥
जो परमेश्वर नित्यों में नित्य, चेतनों में चेतन है और एक अकेला ही सम्पूर्ण प्राणियों को उनके कर्मों
का भोग प्रदान करता है, उस सांख्य एवं योग (ज्ञानयोग एवं कर्मयोग) द्वारा अनुभूतिगम्य, सबके
कारणरूप देव- परमात्मा को जो साधक जान लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १४ ॥
वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा अथवा तारों का समूह, न ये बिजलियाँ ही प्रकाशित
होती हैं, तो यह अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकती है। उस (परमात्मा) के प्रकाशित (विद्यमान) होने से ही
(सूर्यादि) सभी प्रकाशित होते हैं। उसके प्रकाश से ही यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्रकाशित है ॥ १४ ॥
एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १५ ॥
इस लोक के मध्य में एक ही हंस (परमात्मा) है, वह जल में सन्निहित अग्नि के समान अगोचर है।
उसे जानकर साधक मृत्युरूप बन्धनों को पार कर जाता है। इससे भिन्न मोक्ष-प्राप्ति का दूसरा मार्ग नहीं है ॥
[जल की उत्पत्ति अग्नि से होती है (अग्नेरापः) और अग्नि जल में समाविष्ट है 'बड़वानल' के रूप
में, यह सिद्धान्त विज्ञान सम्मत है (हाइड्रोजन+ऑक्सीजन+ताप=पानी।)]
स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः ।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥ १६ ॥
जो ज्ञानस्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का रचयिता, सर्वज्ञ, स्वयं ही जगत् की उत्पत्ति का केन्द्र,
काल का भी काल, गुणों का समुच्चय और सर्वविद्यावान् है। वह पुरुष और प्रकृति का प्रमुख अधिपति,
सम्पूर्ण गुणों का नियन्ता, संसार चक्र के बन्धन, स्थिति और मुक्ति का कारण है ॥ १६ ॥
स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता ।
य ईशेऽस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥ १७ ॥
वह तन्मय (विश्वरूप अथवा सर्वप्रकाशक परमात्मा), अमृतस्वरूप ईश्वर (नियामक) रूप में
स्थित, ज्ञानसम्पन्न, सर्वगत (सबमें चैतन्य रूप से स्थित) और इस लोक का रक्षक है, (वही) इस सम्पूर्ण
जगत् का सर्वदा नियामक है; क्योंकि इस जगत् का नियन्त्रण करने में अन्य कोई समर्थ नहीं है ॥ १७ ॥
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तः ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ १८ ॥

४२४ श्वेताश्वतरोपनिषद्
जो परमात्मा सर्वप्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान करता है। मैं मोक्ष
प्राप्ति की अभिलाषा से बुद्धि को प्रकाशित करने वाले उन देव की शरण ग्रहण करता हूँ॥ १८॥
निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम्॥ १९॥
जो कलाओं तथा क्रियाओं से रहित, सदा शान्त, निर्दोष, निर्मल, अमृतत्व का श्रेष्ठ सेतुरूप,
(धूम्ररहित) प्रदीप्त अग्नि के समान देदीप्यमान है (हम उसकी शरण ग्रहण करते हैं)॥ १९॥
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति॥ २०॥
जब मनुष्यगण आकाश को चमड़े की भाँति लपेट सकेंगे (जब कि यह असम्भव है); तब उस देव
(परमात्मा) को जाने बिना भी दुःखों का अन्त हो सकेगा (यह भी असम्भव है)॥ २०॥
[वस्तुतः दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति परमतत्त्व को जानकर ही ही सकती है।]
तपः प्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान्।
अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्॥ २१॥
श्वेताश्वतर ऋषि ने तप के प्रभाव से और परमात्मा की कृपा से ब्रह्म को जाना तथा ऋषियों द्वारा
सेवित उस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्व का उन्होंने आश्रम के सुपात्रों को उपदेश दिया॥ २१॥
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः॥ २२॥
उपनिषदों (वेदान्त) में इस परम गुह्य ब्रह्मविद्या का पूर्वकल्प में उपदेश किया गया था। जिसका
अन्तःकरण रागादि से शान्त न हुआ हो, उस साधक को तथा जो अपना पुत्र या शिष्य न हो (अर्थात्
आचार्य के प्रति श्रद्धाभाव न रखता हो), उसे यह गुह्य ज्ञान नहीं देना चाहिए॥ २२॥
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता
ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः प्रकाशन्ते महात्मन इति॥ २३॥
जिस साधक की परमात्मा में अत्यन्त भक्ति है तथा जैसी परमात्मा में है, वैसी ही गुरु में भी है, उस
महान् आत्मा के हृदय में ही ये बताये गये गूढ़ ज्ञान प्रकाशित होते हैं, ऐसे महात्मा में ही (यह उपनिषद्)
ज्ञान प्रकाशित होते हैं॥ २३॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु.......इति। शान्तिः॥
॥ इति श्वेताश्वतरोपनिषत्समाप्ता ॥

परिशिष्ट-१
परिभाषा कोश-१०८ उपनिषद् (ज्ञानखण्ड)
१. अक्षर ब्रह्म - वेदान्त दर्शन में 'ब्रह्म' की अवधारणा उस परमसत्ता के रूप में है, जो सर्वातिशायी, सर्वसमर्थ,
सर्वत्र विद्यमान रहने वाली सर्वोच्च शक्ति है। उस 'परब्रह्म' को अनेक नामों से अभिहित किया गया है- परमात्मा,
परमेश्वर, ब्रह्म, भूमा, परमचैतन्य, अक्षरब्रह्म (ओंकार) इत्यादि। परब्रह्म का अक्षरात्मक स्वरूप 'ओंकार' 'प्रणव'
के रूप में उपनिषदादिक आर्ष ग्रन्थों में सर्वत्र प्राप्त होता है। तात्त्विक दृष्टि से देखा जाय, तो 'ब्रह्म' अक्षर ही है,
'न क्षरति इति अक्षरः' जिसका क्षरण-विनाश नहीं होता है, वह 'अक्षर' है। इस दृष्टि से 'अक्षर' शब्द ब्रह्म की
विशिष्टता का बोधक हुआ। वैसे अक्षरात्मक-वर्णात्मक ब्रह्म के रूप में 'ॐ' प्रणव को स्वीकार किया जाता है,
जैसे- अक्षरं परमं पदम् (महाना० ११.१), अक्षरं परमं ब्रह्म निर्विशेषं निरंजनम् (१ यो०शि० ३.१६), अक्षरं
ब्रह्मपरमं (गी० ८.३), अक्षरोऽहमोङ्कारोऽमरोऽभयोऽमृतो ब्रह्माभयं हि वै (गो० उ० ४०)। इन उद्धरणों को
देखने से प्रतीत होता है कि अक्षर ब्रह्म-ओंकार-प्रणव-आत्मा आदि सभी एक ही तत्त्व के प्रतिपादक हैं। अक्षर
ब्रह्म का विशद विवेचन माण्डूक्य उपनिषद् तथा गौड़पादकृत माण्डूक्य कारिका में उपलब्ध है।
२. अग्नि- वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में देवतारूप में अग्नि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह तीनों लोकों
में प्रमुखतः तीन रूपों में है- आकाश में सूर्य, अन्तरिक्ष में विद्युत् और पृथ्वी पर साधारण अग्नि। ऋग्वेद में सबसे
अधिक सूक्त अग्नि देवता की स्तुति में ही संगृहीत हैं। अग्नि की गृहपति कहा गया है और परिवार के सभी सदस्यों
से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध है (ऋ० २.१.९)। अग्नि को दिव्य पुरोहित भी कहा गया है- अग्निमीळे पुरोहितम् (ऋ०
१.१.१)। अग्नि सर्वदर्शी है, वह मनुष्य के सब कर्मों को देखता है- (ऋ० १०.७९.५)। अग्नि को प्रमुख रूप से
तीन रूपों में अभिहित किया गया है- १. गार्हपत्य २. दक्षिणाग्नि ३. आहवनीय। मीमांसा सूत्र में जैमिनि ने अग्नि
के छः रूप वर्णित किये हैं- गार्हपत्य २. आहवनीय, ३. दक्षिणाग्नि ४. सभ्य ५. आवसथ्य और ६. औपासन। अग्नि
और आदित्य दोनों को भर्ग भी कहा गया है-अग्निर्वै भर्गः। आदित्यो वै भर्गः (जैमि० ४.२८.२)।
३. अङ्गिरस् - द्र० - अथर्वा ।
४. अङ्गुष्ठमात्र - मनुष्य को हृदय गुहा में वह परमात्मा आत्मा रूप में अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला या अँगूठे जैसा
समाविष्ट है। यही तथ्य उपनिषद् से भी प्रमाणित होता है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये
संन्निविष्टः (कठ० २.३.१७), अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति (कठ० २.१.१२)। यह परमात्मा हृदय में
अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाली धूमरहित ज्योति के रूप में है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः (कठ० २.१.१३)।
यह ज्योति सूर्य के समान प्रकाशमय और सङ्कल्प तथा अहंकार से युक्त है-अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः
सङ्कल्पाहंकारसमन्वितो यः (श्वेता० ५.८)।
५. अज - अज का शब्दार्थ है - जिसका जन्म न हो, जन्म के बन्धन से रहित। अजन्मा, स्वयंभू, ब्रह्मा, विष्णु,
महेश, ईश्वर और कामदेव को भी अज कहकर निरूपित किया जाता है। मानस में ब्रह्म को अज कहा गया है- ब्रह्म
जो व्यापक विरज, अज, अकल, अनीह, अभेद (रा०मा० १.५०)। जीव तथा माया को भी 'अज' रूप में माना गया
है। महाभारत में अज के विषय में कहा गया है-नहि जातो न जायेयं न जनिष्ये कदाचन। क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां
तस्मादहमजः स्मृतः ॥ (महा० शान्ति० ३४२. ७४) अर्थात् मैं न उत्पन्न हुआ हूँ, न होता हूँ और न होऊँगा। सब
प्राणियों का मैं क्षेत्रज्ञ हूँ, इसीलिए लोग मुझे अज कहते हैं। अनादि प्रकृति को भी अज कहा गया है। उपनिषद् के
अनुसार बहुत से प्राणियों को त्रिगुणात्मक रचने वाली लाल, कृष्ण, सफेद रंग को एक अजन्मा प्रकृति को एक
अज (अज्ञानी जीव) आसक्त होकर भोगता है और दूसरा अज (ज्ञानी पुरुष) भुक्त प्रकृति को त्याग देता है-
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः।
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ (श्वेता० ४.५)।