१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ५ ब्राह्मण ६ मन्त्र १ ३३१
अध्याय ५ ब्राह्मण ६ मन्त्र १ ३३१
तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुष-
स्तावेतावन्योन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स
यदोत्क्रमिष्यन्भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥
वह सत्य ही आदित्य रूप है। इस सूर्य मण्डल में विद्यमान पुरुष और दक्षिण नेत्र में स्थित पुरुष दोनों
आपस में संयुक्त हैं। वे ये दोनों पुरुष एक दूसरे में स्थित हैं। आदित्य-रश्मियों के माध्यम से चाक्षुष पुरुष
में स्थित है और चाक्षुष पुरुष आदित्य में प्राण के रूप में स्थित है। जब चाक्षुष पुरुष निकलने लगता है,
उस समय यह आदित्य मण्डल को ही देखता है। पुनश्च, ये किरणें लौटकर समीप नहीं आती हैं ॥ २ ॥
य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकंः शिर एकमेतदक्षरं भुव इति
बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहरिति हन्ति
पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥
इस आदित्य मण्डल में जो यह (सत्य नाम से युक्त) पुरुष विद्यमान है, 'भूः' उसका शिर है। (उस
पुरुष का) शिर एक है तथा वह अक्षर भी एक ही है। 'भुवः' यह भुजा है, इसकी भुजाएँ दो हैं तथा ये
अक्षर भी दोनों भुजाओं के रूप में (दो) हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अर्थात् चरणों के रूप में हैं; चरण दो हैं और
ये (स्वः=सुवः) अक्षर भी दो हैं। 'अहर्' (हन् धातु से बना है, अर्थ है- हननकर्ता) यह इस (पुरुष) का
उपनिषद् (गूढ़ नाम) है, जो इस तरह से जानता हुआ, उस ब्रह्म की उपासना करता है, वह पापों का हनन
करके उनका परित्याग कर देता है ॥ ३ ॥
योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकंः शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू
द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति
पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥
यह दक्षिण नेत्र में जो पुरुष (विद्यमान) है। भूः उसका शिर है। (उस पुरुष का) शिर एक है तथा
वह अक्षर भी एक ही है। 'भुवः' यह भुजा है, इसकी भुजाएँ दो हैं तथा ये अक्षर भी दोनों भुजाओं के रूप
में (दो) हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अर्थात् चरणों के रूप में हैं और ('स्वः = सुवः') अक्षर भी दो हैं।
'अहम्' (इसका भी अर्थ हननकर्ता है) उस (पुरुष) का उपनिषद् (गूढ़ नाम) है; जो इस तरह से जानता
हुआ ब्रह्म की उपासना करता है, वह पापों का हनन करके उनका परित्याग कर देता है ॥ ४ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष
सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ १॥
यह पुरुष मनोमय एवं सत्य स्वरूप प्रकाश से युक्त है। यह हृदय के अन्तः भाग में व्रीहि (धान)
अथवा यव (जौ) के रूप (जैसे सूक्ष्म आकार) में प्रतिष्ठित है। (यह अनन्त हृदय में योगियों द्वारा
दृष्टिगोचर होता है।) वह इन सभी का स्वामी एवं अधिष्ठाता है और जो भी कुछ (दृश्य जगत्) है, सभी
को अपने शासन में रखता है ॥ १॥
॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥
३३२ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥
विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद्विद्युद्विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥
विद्युत् ही (प्रकाश स्वरूप) ब्रह्म है, इस प्रकार (प्रायः लोग) कहते हैं। पापों का खण्डन अथवा विनाश करने
में सक्षम होने से ब्रह्म ही विद्युत् (प्रकाश) स्वरूप है। जो (व्यक्ति) 'विद्युत् ब्रह्म है' इस प्रकार जानता है, उसके
पापों का (यह विद्युत् ब्रह्म) शमन कर देता है; क्योंकि प्रकाश के रूप में विद्युत् ही ब्रह्म है॥ १ ॥
॥ अष्टमं ब्राह्मणम् ॥
वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः
स्वधाकारस्तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः
स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥
वाणी की, कामधेनु गौ के समान उपासना करे। उस गौ के स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार तथा
स्वधाकार ये चार स्तन हैं। उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्कार से देवताओं की जीविका चलती है,
हन्तकार से मनुष्य जीवन पाते हैं तथा स्वधाकार से पितृगण जीवित रहते हैं। उस वाणी रूपी धेनु के लिए
प्राण ही वृषभ है और मन ही वत्स (बछड़ा) रूप है॥ १ ॥
॥ नवमं ब्राह्मणम् ॥
अयमग्निवैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति
यमेतत्कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषः शृणोति ॥ १ ॥
यह वैश्वानर अग्नि ही है, जो सभी पुरुषों के शरीर में स्थित है। जो अन्न भक्षण किया जाता है, उसका
पाचन शरीर में स्थित यह वैश्वानर अग्नि ही करता है। उसी का ही यह घोष (नाद) होता है, जिसे व्यक्ति
कानों को बन्द करके अनहद नाद की भाँति श्रवण करता है। जिस समय यह प्राण (पुरुष) शरीर से बाहर
निकलने वाला होता है, उस समय इस नाद को नहीं श्रवण कर पाता ॥ १ ॥
॥ दशमं ब्राह्मणम् ॥
यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य
खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं
तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स
ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन्वसति शाश्वतीः समाः ॥ १ ॥
जब यह पुरुष इस (मनुष्य) लोक से उन्मुक्त होकर गमन करता है, तब वह सर्वप्रथम वायु लोक को
प्राप्त करता है। (तदनन्तर) वहाँ पर वह वायु उसके लिए छिद्र युक्त होकर मार्ग प्रदान कर देता है, वह छिद्र
रथ के पहिये की भाँति होता है। उस (छिद्र) के द्वारा वह ऊर्ध्व की ओर आरोहण करता है। इसके पश्चात्
वह सूर्यलोक में प्रतिष्ठित होता है। वहाँ पर सूर्य भी उसके लिए लम्बर नामक वाद्ययन्त्र के छिद्र की भाँति
रास्ता प्रदान करता है। वहाँ से वह ऊर्ध्व की ओर आरोहण करते हुए चन्द्रलोक में पहुँचता है। वहाँ चन्द्रमा
भी उसके लिए दुन्दुभि के छिद्र की तरह का मार्ग देता है। उस मार्ग के द्वारा ही वह ऊपर की ओर बढ़ता
है। इसके बाद वह अशोक (अर्थात् मानसिक पीड़ा से रहित ) और अहिम (अर्थात् शारीरिक दुःख से
रहित) नामक लोक में पहुँचकर वहाँ सदा अनन्त वर्षों तक (अनन्तकाल तक) निवास करता है॥ १ ॥
अध्याय ५ ब्राह्मण १३ मन्त्र १ ३३३
अध्याय ५ ब्राह्मण १३ मन्त्र १ ३३३
॥ एकादशं ब्राह्मणम् ॥
एतद्वै परमं तपो यद्व्याहितस्तप्यते परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेदौतद्वै परमं
तपो यं प्रेतमरण्यंः हरन्ति परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेदौतद्वै परमं तपो यं
प्रेतमग्नावभ्यादधति परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
रोगग्रस्त व्यक्ति को जो ताप-क्लेश होता है- यह निश्चित रूप से परम तप है, जो इस प्रकार श्रेष्ठ
चिन्तन करता है, वह परम सत्य लोक को अपने वश में कर लेता है। मृत अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को जो
लोग जंगल (श्मशान) की ओर ले जाते हैं, यह भी श्रेष्ठ तप है, जो इस प्रकार से जानता है- वह भी परम
सत्य लोक को जीत लेता है। मृत व्यक्ति को जो भी अग्नि में प्रतिष्ठित करते हैं, निश्चित ही यह परम तप
है, जो इस तरह से जान लेता है, वह श्रेष्ठ लोक को अपने वश में कर लेता है॥ १ ॥
॥ द्वादशं ब्राह्मणम् ॥
अन्नं ब्रह्मेत्येकआहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात्प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा
शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः
पितरं किंःस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा
प्रातृद कस्त्वेनयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने
हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि
ह वा अस्मिन्भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥
प्रातृद ऋषि अपने पिता से विचार विमर्श करते हुए कहते हैं- कुछ लोगों का कथन है कि अन्न ब्रह्म है, किन्तु
यह बात मिथ्या लगती है; क्योंकि प्राण के अभाव में अन्न सड़ (नष्ट हो) जाता है। कुछ लोग प्राण को ही ब्रह्म कहते
हैं, किन्तु यह बात भी मिथ्या प्रतीत होती है, क्योंकि अन्न के अभाव में प्राण शुष्क पड़ जाता है। यह दोनों देव तत्त्व
एक साथ मिलकर परमात्म भाव को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार की विशेष अनुभूति प्राप्त करने वाले का मैं क्या शुभ
अथवा क्या अशुभ करूँ ? (क्योंकि कृतार्थ होने के उपरान्त उसका न तो शुभ किया जा सकता है और न तो
अशुभ ।) तत्पश्चात् उसके पिता ने रोकते हुए इस प्रकार कहा-'हे प्रातृद' ! ऐसा मत कहो, इन दोनों तत्त्वों की
समरूपता को प्राप्त करके कौन परमभाव को प्राप्त होता है? अतः उस (प्रातृद के पिता) ने 'वी' इस प्रकार कहा। 'वी'
यही अन्न रूप है। 'वी' रूप अन्न में ही ये समस्त भूत (प्राणी) समाहित हैं। 'रम्' यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राण
में ही ये समस्त भूत (प्राणी समुदाय) रमण करते हैं। जो इस प्रकार से जानता है (वह वीर है), उसमें ये सभी प्राणी
समाहित होते हैं तथा सभी प्राणी रमण करते हैं॥ १ ॥
॥ त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥
उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदंः सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य
सायुज्यंः सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
प्राण ही 'उक्थ' अर्थात् स्तोत्र है, इस कारण 'उक्थ' की प्राण के रूप में उपासना करें; क्योंकि प्राण
३३४ बृहदारण्यकोपनिषद्
ही इन सभी (प्राणियों) को (ऊपर) उठाता है। इस उक्थ के द्वारा ही उक्थवेत्ता पुत्र का प्राकट्य होता है।
इस तरह से जानने वाला ज्ञानी ही 'उक्थ' (प्राण) के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि
भूतानि श्रेष्ठ्याय यजुषः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥
प्राण की उपासना 'यजुः' (योग) के रूप में सम्पन्न करें। प्राण ही यजुः है, इस कारण प्राण में इन
समस्त भूतों (प्राणियों) का योग होता है। समस्त भूत (प्राणी) इस (प्राण) की श्रेष्ठता के कारण ही इस
यजुः रूप प्राण से संयुक्त होते हैं। अतः जो भी इस प्रकार से उपासना करता है, वह यजुः के सायुज्य और
सालोक्य को प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥
साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि
भूतानि श्रेष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥
प्राण ही साम है; क्योंकि समस्त प्राणी साम में ही समाहित होते हैं; इस कारण 'साम' की इसी रूप
में उपासना करे। सभी प्राणी उस साम के साथ ही एक रूप होते हैं एवं उसकी श्रेष्ठता को धारण करने में
समर्थ होते हैं। इस प्रकार से उपासना करने वाला व्यक्ति साम के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त करता है ॥
क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं हि वै क्षत्रं त्रायते हैन प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमन्नमाप्नोति
क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥
प्राण ही क्षत्र (बल) है, इसलिए प्राण की उपासना करें। प्राण ही क्षत्र है अर्थात् इस शरीर की
शस्त्रादि जनित क्षति से रक्षा करता है। अतः क्षत से रक्षा करने के कारण प्राण का क्षत्रत्व प्रसिद्ध है। अन्य
किसी से त्राण (रक्षा) न पाने वाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त करता है। जो भी व्यक्ति इस तरह जानता है,
वह क्षत्र के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥
॥ चतुर्दशं ब्राह्मणम् ॥
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्सं
यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥
इस ब्राह्मण में गायत्री के तत्त्वज्ञान एवं महात्म्य का वर्णन किया गया है-
गायत्री के प्रथम पद (चरण) का महत्त्व समझाते हुए ऋषि कहते हैं- भूमि (भू+मि=दो, इसी
प्रकार), अन्तरिक्ष (चार) तथा द्यौ (दि+वौ =दो) ये कुल मिलाकर आठ अक्षर होते हैं। आठ अक्षरों से
युक्त गायत्री का एक (प्रथम)पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं) है। यह (भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ) ही इस गायत्री का
प्रथम पाद है। जो भी व्यक्ति इस तरह जानता है, वह तीनों लोकों के सम्पूर्ण ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेता है ॥
ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या
एतत्सं यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥
ऋचः (ऋ+चः =दो, इसी प्रकार), यजूंषि (तीन) और सामानि (तीन) ये भी कुल मिलाकर आठ
अक्षर हैं। गायत्री महामन्त्र का द्वितीय पाद भी आठ अक्षरों से युक्त है। यह वेदत्रयी ऋक्, यजुः और साम
ही गायत्री का द्वितीय पाद (भर्गो देवस्य धीमहि) है। इस प्रकार से जानने वाला ज्ञानी त्रयी विद्या की
उपासना का फल प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
अध्याय ५ ब्राह्मण १४ मन्त्र ४ ३३५
अध्याय ५ ब्राह्मण १४ मन्त्र ४ ३३५
प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षर꣪ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स
यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेदाथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं
परोरजा य एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरोयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु
ह्येवैष रज उपर्युपरि तपत्येव꣪ हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३॥
प्राण (प्रा+ण =दो, इसी प्रकार), अपान (तीन) और व्यान (वि+आ+न=तीन), यह भी आठ अक्षर
हैं। आठ अक्षरों से युक्त (धियो यो नः प्रचोदयात्) गायत्री का तृतीय पाद है। गायत्री के इस तीसरे पाद
को जानने वाला (इसकी उपासना करने वाला) व्यक्ति समस्त प्राणि-समुदाय को जीत लेता है। इसके
अतिरिक्त चतुर्थ दर्शत (दिखने वाला) पाद होता है। यह चतुर्थ पाद (परो रजसे सावदोम्) तुरीय कहलाता
है। यह दृष्ट (दर्शनीय) जैसा है, अतः दर्शत पद है, यही 'परो रजा' है। यह सभी रज (लोकों) से परे
(ऊपर) रहकर तपता-चमकता है। गायत्री के चतुर्थ पाद को इस प्रकार से जो जानता है, वह यशस्वी
होता हुआ सुशोभित होता है॥ ३॥
[ गायत्री का चतुर्थ पद 'परो रजसे सावदोम्' भी आठ अक्षरों वाला कहा गया है। विश्वामित्र कल्प तथा
प्राचीन संध्या प्रयोगों में इसका उल्लेख मिलता है। उपनिषद् का कथन है कि गायत्री के तीन पाद ही जपनीय हैं,यह
चौथा पाद 'दर्शत' पद- देखा जाने वाला- अनुभूतिगम्य कहा गया है। इसका पदच्छेद होता है- परो रजसे- असौ-
अदः ॐ अर्थात् रजस् पदार्थ या प्रकाश से परे यह और वह सब ॐ अक्षररूप ब्रह्म ही है। जब साधक के प्राणों
के स्पन्दन गायत्री के तीन पदों से एकात्मता स्थापित कर लेते हैं, तो चौथे पद का आभास-अनुभव होने लगता है।
इसलिए इसे दर्शत पद कहा है।]
सैषा गायत्र्येतस्मि꣪स्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्धैतत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै
सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावियातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं
ब्रूयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद्धै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत्प्राणे
प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बल꣪ सत्यादोजीय इत्येवं वैषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा
गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणा꣪स्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्माद्गायत्री नाम स यामेवामूं
सावित्रीमन्वाहैषैव स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणा꣪स्त्रायते ॥ ४ ॥
यह गायत्री इस दर्शत पद (दर्शनीय चतुर्थ पद) में स्थित है। वह पद सत्य में स्थित है। नेत्र ही सत्य
है, सुनिश्चित रूप से नेत्र ही सत्य है। इस कारण यदि दो व्यक्ति आपस में 'मैंने देखा है,' 'मैंने सुना है'
इस प्रकार का विवाद करते हुए आएँ और उनमें से जो यह कहे कि 'मैंने देखा है', उसी का हमें विश्वास
होगा। इस प्रकार वह सत्य बल में प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, अतः यह सत्य प्राण में स्थित है। इसी
कारण सत्य की अपेक्षा प्राण अधिक बलवान् है। इस प्रकार यह गायत्री प्राण में स्थित है। इस गायत्री ने
गयों (प्राणों) का त्राण किया। प्राण ही गय हैं, उन प्राणों का इस (गायत्री) ने त्राण किया। इसीलिए इसे
'गायत्री' कहते हैं। आचार्य जिन ब्रह्मचारियों को इसका उपदेश देते हैं, यह (गायत्री) उन सभी के प्राणों
का त्राण करती है ॥ ४ ॥
३३६ बृहदारण्यकोपनिषद्
ताꣳहैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वागनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति न तथा
कुर्याद्गायत्रीमेव सावित्रीमन्ूब्रूयाद्यदिह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रतिगृह्णाति न हैव तद्गायत्र्या
एकंचन पदं प्रति ॥ ५॥
कोई-कोई आचार्य अनुष्टुप् छन्द वाली सावित्री का उपदेश करते हैं। वे कहते हैं कि वाणी ही
अनुष्टुप् है, अतः हम वाक् का ही उपदेश करते हैं। अन्य आचार्यों के मत से ऐसा उचित नहीं है। अतः
गायत्री छन्दवाली सावित्री का ही उपदेश करना चाहिए। इस प्रकार से जानने वाला जो व्यक्ति साधनों का
अधिकाधिक संग्रह करे, तब भी वह गायत्री महामन्त्र के एक पाद के फल के समान भी नहीं है॥५॥
[ गायत्री छन्द वाला- आठ-आठ अक्षरों से युक्त तीन पदों वाला गायत्री मंत्र ही गुरु मंत्र के रूप में उपनिषद्
द्वारा स्वीकार्य है। इससे स्पष्ट होता है कि चतुर्थ चरण युक्त गायत्री मंत्र अथवा अन्य छन्दों वाले गायत्री मंत्र 'गुरु
मंत्र' के रूप में दिया जाना और प्रयुक्त किया जाना उचित नहीं है। किसी विशेष प्रयोजन की पूर्ति के लिए ही
इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।]
स य इमाꣳस्त्रींल्लोकान्पूर्णान्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं
त्रयी विद्या यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि
यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा
य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥६॥
जो व्यक्ति इन तीनों लोकों के सम्पूर्ण वैभव को दान रूप में ग्रहण करता है, उसका वह (दान) इस
गायत्री के प्रथम पाद की उपासना के तुल्य है। यह जो त्रयी (वेद) विद्या है, इसको जो प्रतिग्रह (दान)
रूप में ग्रहण करता है, वह दान गायत्री के द्वितीय पाद की उपासना के फल की समानता करता है तथा
जो समस्त प्राणि-समुदाय को ग्रहण करता है, वह गायत्री के तृतीय पाद का फल प्राप्त करता है। 'दर्शत
परो रजा' यह चतुर्थ पद है, जो कि सभी से ऊपर चमकता है। यह किसी के द्वारा सुलभ (सेवनीय) नहीं
है। इस चतुर्थ पाद की समानता किसी भी प्रतिग्रह (दान) से नहीं हो सकती है ॥ ६ ॥
[यहाँ गायत्री का उपस्थान दिया गया है। उपस्थान का अर्थ है- उप- समीप पहुँचकर की गयी स्तुति।
सामान्य स्थिति में गायत्री महाशक्ति का आवाहन करके उनकी निकटता की अनुभूति के साथ यह भाव स्तुति की
जाती है। उच्च स्थिति में जब साधक के प्राण परिष्कृत होकर गायत्री महाशक्ति का स्पर्श करते हैं, तब उपस्थान
की स्थिति बनती है।]
तस्या उपस्थनं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि नहि पद्यसे नमस्ते
तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्ध्येति
वा न हैवास्मै स कामः समृद्ध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७॥
उस गायत्री का उपस्थान इस प्रकार है- हे गायत्री! तीन लोकरूप प्रथम पाद से आप एक पदी हैं।
त्रयी विद्या (तीनों वेद) रूपी द्वितीय पाद से आप द्विपदा हैं। प्राण, अपान और व्यान रूपी तृतीय पाद से
आप त्रिपदा हैं तथा तुरीय पाद से आप चतुष्पदी हैं। इन सभी से ऊपर निरुपाधिरूप से आप पदरहित अर्थात्
अध्याय ५ ब्राह्मण १५ मन्त्र १ ३३७
अध्याय ५ ब्राह्मण १५ मन्त्र १ ३३७
निर्गुण हैं; क्योंकि आपको किन्हीं साधनों से नहीं जाना जा सकता है। सभी लोकों के ऊपर स्थित आपके
दर्शनीय तुरीय पद को नमन है। यह (संसारगत) पापरूपी शत्रु अपने कार्य में सफलता न प्राप्त करे। इस
तरह से विद्वान् व्यक्ति जिससे द्वेष करता हो, 'उसकी कामना पूरी न हो' इस प्रकार उपस्थान करे अथवा
'मैं' इस वस्तु विशेष को प्राप्त करूँ, इस कामना से उपस्थान करे ॥ ७॥
एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्रीविद्ब्रूथा अथ
कथं हस्तीभूतो वहसीति मुखं ह्यस्याः सम्राण्न विदांचकारेति होवाच तस्या अग्निरेव
मुखं यदिह वा अपि बह्निवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्संदहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्निव
पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धःपूतोऽजरोऽमृतः संभवति ॥ ८॥
विदेहराज जनक ने (अश्वतराश्व के पुत्र) बुडिल आश्वतराश्वि से यह कहा था कि तुमने अपने आपको
गायत्री महाविद्या का ज्ञाता कहा था, फिर हाथी बनकर भार क्यों वहन करते हो? ऐसा सुनकर उसने
कहा- हे सम्राट्! मैं इस (गायत्री महाशक्ति) का मुख नहीं जानता था। (तदनन्तर जनक ने कहा-) इस
(गायत्री महाशक्ति) का मुख 'अग्नि' है। जिस प्रकार अग्नि में जो भी (ईंधन) डाला जाता है, वह सब
भस्म हो जाता है, ठीक उसी प्रकार गायत्री विद्या के निष्णात व्यक्ति को विविध कर्म करने पड़े हों, तब भी
सभी पापों को जलाकर (शुद्ध कर्म भावना से) शुद्ध, पवित्र, जरा रहित-अजर और अमर हो जाता है ॥
॥ पञ्चदशं ब्राह्मणम् ॥
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि । वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् । ॐ ३ क्रतो
स्मर कृतंस्मर क्रतो स्मर कृत ँ स्मर। अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव
वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ १॥
सत्यरूपी ब्रह्म का मुख ज्योतिर्मय स्वर्णपात्र से आच्छादित है। हे विश्व के पोषक सूर्यदेव ! सत्य धर्म
के दर्शन के लिए मैं उसे देख सकूँ, इसलिए आप उस (पर से) आवरण को हटा दें। हे पूषन् (पोषणकर्ता) !
हे एकर्षे (सर्वद्रष्टा) ! हे यम ! हे सूर्य ! हे प्राजापत्य ! आप अपनी रश्मियों को समेटकर तेज को कम कर लें,
जिससे आपका जो अतिकल्याणकारी रूप है, उस रूप को मैं देख सकूँ। यह जो आदित्यमण्डल में स्थित
पुरुष है, वह अमृतस्वरूप मैं ही हूँ। प्राणवायु इस बाहर की वायु को तथा यह शरीर भस्मावशेष होकर पृथ्वी
को प्राप्त करे। यह अमृत (आत्मा) आपको समर्पित है। हे प्रणवरूप विश्वकर्ता ! स्मरण करें (मेरा ध्यान
रखें)। मैंने जो भी कर्म किया है, उसका स्मरण करें। हे क्रतुरूप (जीवात्मा)! जो भी स्मरण करने योग्य है,
उसी का स्मरण करें। किये हुए कृत्य का स्मरण करें। हे अग्निदेव ! आप हमें कर्मफल की प्राप्ति हेतु सुन्दर
पथ (देवयान मार्ग) से ले चलें। हे देव ! आप हमारे सभी कर्मों को जानने वाले हैं। हमारे कुटिल पापों को
दूर करें (नष्ट करें)। हम आपको बार-बार नमन करते हैं॥ १॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
३३८ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च
ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥
जो ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ को जानने में सक्षम है, वह अपनी जाति में ज्येष्ठ (बड़ा) एवं श्रेष्ठ है। जो भी
व्यक्ति इस तरह से (ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ की) उपासना करता है, वह व्यक्ति अपनों के बीच में तथा जिन लोगों
के बीच चाहता है, उन सभी में श्रेष्ठता और महानता को प्राप्त करता है॥ १ ॥
यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि
च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥
जो वसिष्ठ (श्रेष्ठता) को जानता है, वह स्वजनों के बीच में वसिष्ठ (श्रेष्ठ) होता है। वाणी ही श्रेष्ठ है।
जो (व्यक्ति) इस तरह से वाणी की उपासना करता है, वह अपने आत्मीय जनों में और जिनके प्रति
उसकी विशेष चाह (स्नेह) है, उन सभी में वसिष्ठ (श्रेष्ठ) होता है॥ २ ॥
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे
च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥
जो प्रतिष्ठा को जानने में समर्थ है, वह देश-काल की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता दोनों स्थितियों में प्रतिष्ठित
होता है। नेत्र ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि नेत्र ही समान अथवा असमान देश-काल में प्रतिष्ठित होते हैं। इस प्रकार से जानने
वाला (व्यक्ति) अपनी इच्छा के द्वारा समान अथवा असमान परिस्थितियों में प्रतिष्ठित होता है॥ ३ ॥
यो ह वै सम्पदं वेद सँ हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे
वेदा अभिसम्पन्नाः सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥
जो सम्पद् (दैवी सम्पदा) को जानने में समर्थ है, वह अपनी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करता है।
श्रोत्र ही सम्पद् है, क्योंकि श्रोत्र में ही समस्त वेद भली-भाँति समाये हुए हैं। जो इस प्रकार से जानता
हुआ, जिस भोग की इच्छा करता है, वह उसे पूर्णरूप से प्राप्त करता है॥ ४ ॥
यो ह वा आयतनं वेदायतनँस्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनँ
स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥
जो आयतन (आश्रय) को जानने वाला है, वह स्वयं अपने लोगों के लिए और दूसरों के लिए भी
आयतन (आश्रय) रूप होता है। मन ही आयतन है, जो भी (व्यक्ति) इस प्रकार जानता है, वह स्वजनों
और अन्य दूसरे लोगों को भी आश्रय प्रदान करता है॥ ५ ॥
यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया
पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥
अध्याय ६ ब्राह्मण १ मन्त्र १० ३३१
अध्याय ६ ब्राह्मण १ मन्त्र १० ३३१
जो व्यक्ति प्रजापति (प्रजनन सामर्थ्य) को जानता है, वह प्रजा और पशुओं के रूप में प्रजात अर्थात् वृद्धि को
प्राप्त करता है। रेतस् ही प्रजापति है, जो इस प्रकार से जानता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त होता है ॥६॥
ते हेमे प्राणा अहᳵश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच
यस्मिन्व उत्क्रान्त इदᳵ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७॥
वागादि समस्त प्राण 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ', इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा जी के पास पहुँच कर पूछने
लगे कि हममें से कौन वरिष्ठ (श्रेष्ठ) है ? प्रजापति ने कहा- तुममें से जिसके बाहर निकल जाने पर यह
शरीर अधिक पापी अर्थात् अपवित्र माना जाता है, वही तुममें से श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥
वाग्धोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथाकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाᳵसो
मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह वाक् ॥८॥
सर्वप्रथम वाणी ने शरीर को छोड़ दिया। उस (वागिन्द्रिय) ने एक वर्ष तक बाहर रहने के पश्चात्
वापस आकर पूछा- मेरे अभाव में तुम सब कैसे जीवित रहे ? यह सुनकर उन्होंने कहा- जिस प्रकार मूक
व्यक्ति वाणी से न बोलते हुए भी प्राण से श्वसन क्रिया सम्पन्न करते, चक्षु से देखते, कान से श्रवण करते
हैं, मन से जानते हैं और रेतस् (वीर्य) से प्रजा की वृद्धि करते हैं (जीवित रहते हैं), उसी प्रकार हम भी
जीवित रहे। ऐसा श्रवण कर वागिन्द्रिय ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥८॥
चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाᳵसो
मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥९॥
(वाणी के पश्चात्) चक्षु एक वर्ष के लिए शरीर से बाहर चले गये। एक वर्ष के अनन्तर लौटे और
बोले-'तुम मेरे बिना किस प्रकार जीवित रह सके'? उन्होंने कहा- जैसे अन्धे व्यक्ति नेत्र से न देखते हुए
भी प्राण से प्राणन क्रिया सम्पन्न करते, वागिन्द्रिय से बोलते, श्रोत्र से श्रवण करते, मन से मनन करते और
रेतस् से प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करते हुए जीवित रहते हैं, उसी तरह हम भी जीवित रहे। नेत्रों ने इस
प्रकार सुनते हुए शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ९॥
श्रोत्रᳵ होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथा बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वाᳵसो
मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १०॥
चक्षु के उपरान्त श्रोत्र ने उत्क्रमण किया। उसने भी एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहते हुए, वापस
आकर वागादि अन्य इन्द्रियों से पूछा- तुम सब मेरे बिना कैसे जीवन धारण किये रहे ? तब उन समस्त
इन्द्रियों ने कहा- 'जिस प्रकार बधिर व्यक्ति कानों से श्रवण न करते हुए भी प्राण से श्वास लेते हुए, वाणी
से बोलते हुए, नेत्र से देखते हुए, मन से जानते हुए और रेतस् से सन्तान की उत्पत्ति करते हुए जीवन धारण
किए रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे'। यह सुनकर श्रोत्र ने पुनः शरीर में प्रवेश किया ॥ १० ॥
३४० बृहदारण्यकोपनिषद्
मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथा मुग्धा अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः
श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११॥
इसके बाद मन ने शरीर को छोड़ दिया। एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहने के पश्चात् वापस लौटकर
पूछा कि तुम मेरे बिना कैसे जीवन धारण करने में समर्थ रहे ? तब उन (इन्द्रियों) ने कहा- जैसे पागल
(मुग्ध) पुरुष मन से न जानने के कारण अज्ञानी की भाँति रहते हुए भी प्राणों से श्वास-प्रश्वास की क्रिया
सम्पन्न करते हैं, कानों से श्रवण करते हैं, चक्षु से देखते हैं, वाणी से बोलते हैं और रेतस् (वीर्य) से प्रजा
(सन्तति) उत्पन्न करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे। ऐसा सुनकर मन ने शरीर में
पुनः प्रवेश किया ॥ ११ ॥
रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा
शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२॥
मन के बाद रेतस् ने शरीर से उत्क्रमण किया। उस (रेतस्) ने भी एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहने
के पश्चात् वापस लौटकर पूछा- मेरे बिना तुम कैसे, किस प्रकार जीवित रहे? तब उन इन्द्रियों ने कहा- जैसे
नपुंसक व्यक्ति रेतस् के अभाव में सन्तान न उत्पन्न करते हुए भी प्राण से श्वास लेते हुए, वाणी से बोलते
हुए, नेत्र से देखते हुए, कानों से श्रवण करते हुए और मन से मनन करते हुए (जीवन धारण किए रहता
है), उसी प्रकार हम भी जीवित रहे। इस प्रकार सुनकर रेतस् (वीर्य) ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ १२ ॥
अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन्यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशंकून्संवृहेदेवं हैवेमान्प्रा-
णान्संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं
कुरुतेति तथेति ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् प्राण शरीर से उत्क्रमण करने को तत्पर हुए। जैसे सिंधु देश का श्रेष्ठ अश्व पैर बाँधने के खूँटे
को उखाड़ डालता है, वैसे ही प्राण ने सभी वागादि इन्द्रियों को अपने स्थान से विचलित कर दिया। उन
समस्त वाक् आदि इन्द्रियों ने कहा- भगवन् ! आप शरीर से बाहर न निकलें, आपके अभाव में हम जीवित
नहीं रह सकते। तदनन्तर (उस) प्राण ने कहा- अच्छा, तुम सभी मुझे बलि (भेंट) प्रदान किया करो।
इन्द्रियों ने तथास्तु कहते हुए उसे आश्वस्त किया ॥ १३ ॥
सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं
तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुर्यद्वा अह सम्पदस्मि त्वं तत्संपदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि
त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतस्तस्यो मे किमन्नं
किं वास इति यदिदं किंचाश्वभ्य आकृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नमापो वास इति न
ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया
अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्त्येतमेव तदनमग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ॥ १४॥
अध्याय ६ ब्राह्मण २ मन्त्र २ ३४१
अध्याय ६ ब्राह्मण २ मन्त्र २ ३४१
उस वागिन्द्रिय ने कहा- मुझमें जो श्रेष्ठता है, अब तुम ही उस वसिष्ठ गुण से सम्पन्न हो। ऐसे ही नेत्र
ने भी कहा- मैं जो प्रतिष्ठा रूप हूँ, अब तुम ही उस प्रतिष्ठा के गुण से सम्पन्न हो। श्रोत्र ने भी कहा- मैं जो
सम्पदा रूप हूँ, अब तुम ही उस सम्पदा के गुण से युक्त हो। (तत्पश्चात्) मन ने कहा- मैं जो आश्रय रूप
हूँ, अब तुम ही उस आश्रय के गुणों से सम्पन्न हो। (तदनन्तर) रेतस् ने कहा- मैं जो सन्तानोत्पत्ति कर्त्ता
हूँ, अब तुम ही उस प्रजा की उत्पत्ति के गुणों से सम्पन्न हो। (इसके बाद) प्राण ने प्रश्न किया कि मेरा अन्न
और वस्त्र क्या होगा ? तब उन वाक् आदि इन्द्रियों ने कहा- कीट-पतंगादि से लेकर जितने देहधारी हैं, वे
सब तुम्हारे अन्न होंगे और जल ही तुम्हारा उपवीत होगा। प्राण के इस अन्न को इस तरह से जानने वाले का
भक्षित अन्न अभक्ष्य नहीं होता। जल को वस्त्र रूप में जानने वाले मनीषिगण जल का आचमन करके ही
भोजन ग्रहण करते हैं। प्राण को वस्त्र से रहित नहीं होने देते ॥ १४॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम स आजगाम जैविलं प्रवाहणं
परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमार३ इति स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टोऽन्वसि
पित्रत्योमिति होवाच ॥ १ ॥
आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु पांचालों की सभा में पहुँचकर सेवकों द्वारा परिचर्या कराते हुए जीवल के
पुत्र प्रवाहण के समीप आया। श्वेतकेतु को देखकर प्रवाहण ने 'ओ कुमार!' कहते हुए बुलाया। वह बोला-
'भो !' (क्या हैं?)। प्रवाहण ने प्रश्न किया-क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें शिक्षा दी है ? श्वेतकेतु ने कहा- 'हाँ' ॥
वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयत्यो विप्रतिपद्यन्ता ३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं
पुनरापद्यन्ता३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यथासौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न
संपूर्यता३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यतिथ्यामाहुत्याः हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा
समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य
वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि ऋषेर्वचः श्रुतम् द्वे सृती
अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं
मातरं चेति नाहमत एकंचन वेदेति होवाच ॥ २ ॥
(प्रवाहण ने पूछा-) प्रजा (जीवात्मा) शरीर को त्यागने के पश्चात् भिन्न-भिन्न मार्गों से गमन करती
है, क्या तुम यह जानते हो? श्वेतकेतु ने उत्तर दिया- 'नहीं' । (राजा ने पुनः प्रश्न किया-) वह पुनः इस
लोक में आती है, तो क्या यह तुम्हें ज्ञात है ? श्वेतकेतु ने फिर कहा 'नहीं'। (राजा ने फिर प्रश्न किया-)
इस तरह असंख्यों मरकर गये हुए प्राणियों के गमन करने से वह लोक भरता क्यों नहीं ? उसने उत्तर दिया
'नहीं जानता।' (राजा ने फिर पूछा-) कौन सी आहुति प्रदान करने से आपः तत्त्व ही प्राणी रूप में होकर
उठने एवं बोलने में समर्थ हो जाता है ? उसने उत्तर दिया- नहीं जानता। (प्रश्न पूछा गया-) देवयान मार्ग
का कर्मरूपी साधन अथवा पितृयान का कर्मरूपी साधन कैसे प्राप्त होता है ? क्या तुमने ऋषियों की यह
वाणी सुनी है कि पितरों एवं देवताओं के इस प्रकार के दो मार्ग हैं। ये दोनों मार्ग मनुष्य से सम्बन्ध रखने
३४२ बृहदारण्यकापानषद
वाले हैं। इन दोनों मार्गों से गमन करने वाला जगत् ठीक प्रकार से गमन करता है, साथ ही ये मार्ग पिता
और माता अर्थात् (द्युलोक और पृथ्वी लोक) के मध्य में हैं। ऐसा सुनने के पश्चात् श्वेतकेतु ने कहा- मैं
इनमें से एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं जानता हूँ॥ २॥
अथैनं वसत्योपमन्त्रयांचक्रेऽनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव स आजगाम पितरं
तꣳहोवाचेति वाव किल नो भवान्पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान्
राजन्यबन्धुरप्राक्षीत्ततो नैकंचन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतिकान्युदाजहार ॥ ३॥
इसके पश्चात् राजा ने श्वेतकेतु से रुकने के लिए निवेदन किया, लेकिन वह कुमार राजा के द्वारा की
गई प्रार्थना की उपेक्षा करके चला गया। वह कुमार अपने पिता के समक्ष आकर बोला- आपने यह कहा
था कि तुझे सभी विषयों की शिक्षा दे दी गयी है? (ऐसा सुनकर श्वेतकेतु के पिता ने कहा-) हे श्रेष्ठ बुद्धि
वाले! क्या हुआ? कुमार ने कहा- उस (राजा) ने मुझसे पाँच प्रकार के प्रश्न पूछे थे; किन्तु मैं उनमें से
एक का भी उत्तर नहीं दे सका। पिता ने पूछा- वे कौन से प्रश्न थे? पुत्र ने 'ये थे' इस प्रकार कहते हुए
उन सभी प्रश्नों के प्रारूप बता दिये॥ ३॥
स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किंचन वेद सर्वमहं तत्तुभ्यमवोचं
प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति स आजगाम गौतमो यत्र
प्रवाहणस्य जैवलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहारयांचकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार
तꣳ होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४॥
श्वेतकेतु से उसके पिता ने कहा कि हे तात ! हम जो कुछ भी जानते थे, वह सभी तुमको बता दिया
था। अब हम दोनों ही उस क्षत्रिय बन्धु के पास चलकर ब्रह्मचर्य के व्रत को धारण करते हुए उसके समक्ष
निवास करेंगे। पुत्र ने कहा- 'आप ही उनके पास जाएँ।' ऐसा सुनकर वह गौतम (श्वेतकेतु के पिता) जहाँ
जैवलि प्रवाहण का कक्ष था, वहाँ पहुँचे। उसके लिए आसन प्रदान करते हुए राजा ने (सेवकों से) जल
मँगाकर अर्घ्य समर्पित किया। तत्पश्चात् बोले मैं पूज्य गौतम को वर प्रदान करता हूँ अर्थात् आपका प्रयोजन
पूर्ण करने के लिए तत्पर हूँ॥ ४॥
स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥
उस (श्वेतकेतु के पिता) ने कहा- हे राजन्! आपने वर प्रदान करने के लिए प्रतिज्ञा की हैं। उसके अनुसार
मैं कहता हूँ कि कुमार (श्वेतकेतु) से जो पश्न किये थे, वही प्रश्न आप मुझसे पूछने की कृपा करें॥ ५॥
स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ ६॥
राजा प्रवाहण ने कहा- हे गौतम! वह वर तो देवताओं के श्रेष्ठ वरों में से है। इसलिए आप मनुष्यों
से सम्बन्धित वरों में से कोई भी वर माँग लो॥ ६॥
स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिधानस्य
मा नो भवान्बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्योऽभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं
भवन्तमिति वाचा ह स्मैव पूर्वं उपयन्ति स होपायनकीर्त्योवास ॥ ७॥
गौतम ने कहा- आप को मालूम है कि मेरे पास तो वह सभी कुछ है; जैसे- स्वर्ण, गौ, अश्व,
अध्याय ६ ब्राह्मण २ मन्त्र ११ ३४३
अध्याय ६ ब्राह्मण २ मन्त्र ११ ३४३
परिचारिकाएँ, परिवार एवं वस्त्राभूषण आदि। इसलिए आप श्रेष्ठ एवं अनन्त फलों से युक्त तथा कभी भी
नष्ट न होने वाला वर प्रदान करें। (राजा ने कहा-) हे गौतम! तुम शास्त्र द्वारा कही हुई रीति से उसे प्राप्त
करने की इच्छा करो। (गौतम ने कहा-) 'अच्छा' ठीक है। मैं आपके समीप में शिष्य भाव से शिक्षा प्राप्ति
के लिए उपस्थित हुआ हूँ। पूर्वकाल में ब्राह्मण वाणी से ही क्षत्रिय आदि के पास उपस्थित होते थे। इस
प्रकार गौतम भी कथन मात्र करके उस गुरु के समीप शिष्यभाव से रहने लगे॥ ७॥
स होवाच यथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न
कस्मिश्चन ब्राह्मण उवास तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वैवं ब्रुवन्तमर्हति
प्रत्याख्यातुमिति॥ ८॥
राजा ने कहा- हे गौतम! जैसे तुम्हारे पूर्वजों ने (पितामह आदि ने) हमारे महान् पूर्वजों के अपराध
को स्वीकार नहीं किया था, उसी प्रकार तुम भी मेरी अवज्ञा न करना। यह विद्या इससे पहले और किसी
भी ब्राह्मण के पास नहीं रही। इस श्रेष्ठ विद्या को मैं तुम्हारे लिए कहता हूँ; क्योंकि तुम्हारी नम्रता युक्त इस
प्रकार की प्रार्थना का निषेध करने में कोई भी समर्थ नहीं हो सकता॥ ८॥
असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गारा
अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो
राजा संभवति॥ ९॥
हे गौतम! यह द्युलोक ही अग्नि है। आदित्य ही उस (अग्नि) की समिधा (ईंधन) है। रश्मियाँ ही
धूम्र (धुआँ) हैं, दिन ही ज्वालाएँ हैं, दिशाएँ ही अङ्गार हैं तथा अवान्तर दिशाएँ ही चिनगारियाँ हैं, ऐसे
महान् गुणों से युक्त द्युलोक रूपी इस अग्नि में देवताओं के समूह श्रद्धारूप आहुतियाँ प्रदान करते हैं, उन
आहुतियों से ही राजा सोम का प्रादुर्भाव होता है॥ ९॥
पर्जन्यो वाग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा
ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः
संभवति॥ १०॥
हे गौतम! पर्जन्य (अर्थात् मेघ) ही अग्नि है। संवत्सर ही उसकी समिधा है, अभ्र (बादल) ही धुआँ
है, विद्युत् ही ज्वाला के रूप में है, अशनि (अर्थात् इन्द्र का वज्र) ही अङ्गारे हैं और मेघ की गर्जना ही
विस्फुलिङ्ग (चिनगारी) हैं। इस प्रकार इस अग्नि में समस्त देवता, सोम राजा (वाष्प) की आहुति देते हैं,
इस आहुति से ही वर्षा होती है॥ १०॥
अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निर्धूमो रात्रिरर्चिश्चन्द्रमाङ्गारा नक्षत्राणि
विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं संभवति॥ ११॥
हे गौतम! यह लोक ही अग्नि है। इस (अग्नि) की समिधा पृथ्वी है, अग्नि धूम्र है, रात्रि ज्वाला है,
चन्द्रमा अङ्गार एवं नक्षत्र ही चिनगारियाँ हैं। इस दिव्य अग्नि में देवगण वर्षा की आहुतियाँ प्रदान करते हैं।
उन आहुतियों से ही श्रेष्ठ अन्न का प्रादुर्भाव होता है॥ ११॥
३४४ बृहदारण्यकोपनिषद्
पुरुषो वाऽग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित्प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं
विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥ १२ ॥
हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुँह ही समिधाएँ हैं। प्राण ही धुआँ है, वाणी ही
ज्वाला है, चक्षु ही अङ्गारे हैं और श्रोत्र ही विस्फुलिङ्ग (चिनगारी) हैं। इस (श्रेष्ठ दिव्य) अग्नि में ही
समस्त देवता अन्न का होम करते हैं। उस (अन्न) की आहुति से ही रेतस् (वीर्य) प्रकट होता है॥ १२॥
योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति
तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः
संभवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १३ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ (उत्पादक अंग) ही समिधा है, लोम समूह ही धुआँ है,
योनि ही ज्वाला है, सहवास ही अङ्गारे और आनन्द ही चिनगारी है। इस अग्नि में सभी देव समूह रेतस्
(वीर्य) की आहुति करते हैं। उस यजन कृत्य से पुरुष की उत्पत्ति होती है। वह जीवन धारण किये रहता
है, जब तक कर्म शेष रहते हैं, तब तक ही जीवित रहता है और जब मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १३॥
अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित्समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरङ्गारा अङ्गारा
विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो
भास्वरवर्णः संभवति ॥ १४॥
तब इसे अग्नि के समक्ष ले जाते हैं। उस (आहुतिभूत पुरुष) का अग्नि ही अग्निरूप होता है, समिधाएँ
ही समिधा रूप होती हैं। धूम्र ही धुआँ रूप होता है, ज्वाला ही ज्वाला होती है, अङ्गार ही अङ्गारे होते हैं
और चिनगारियाँ ही विस्फुलिङ्ग होते हैं। इस अग्नि में देवता लोग पुरुष की ही आहुति देते हैं। उस आहुति
द्वारा ही मनुष्य तेजोमय रूप वाला होता है ॥ १४ ॥
ते य एवमेतद्विदुर्यै चामी अरण्ये श्रद्धाꣳ सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह
आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं
देवलोकादादित्यमादित्याद्वैद्युतं तान्वैद्युतान्पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ते
तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १५ ॥
इस प्रकार जो (गृहस्थ और वानप्रस्थी) इस (पञ्चाग्नि विज्ञान) को जानते हैं और अरण्य
(वन) में श्रद्धासिक्त हृदय से सत्य (ब्रह्म) की उपासना करते हैं, वे आर्चिषी अवस्था अथवा ज्योति
के अभिमानी देव को प्राप्त करते हैं, इससे (आर्चिषी से) वे आह्निक को अर्थात् दिन के अभिमानी
देवता को प्राप्त करते हैं, आह्निक से शुक्लपक्ष को, शुक्लपक्ष से उत्तरायण वाले छः महीनों को,
षण्मासों से देवलोक को, देवलोक से आदित्य को, आदित्य से वैद्युत (विद्युत् सम्बन्धी देवता)
को, वैद्युत से एक मानस पुरुष इन्हें ब्रह्मलोक में ले जाता है। वे उस ब्रह्मलोक में दीर्घकाल तक
निवास करते हैं। उनका पुनरावर्तन (अर्थात् पुनर्जन्म) नहीं होता ॥ १५ ॥
अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३४५
अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३४५
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिं रात्रेरप-
क्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद्यान्षण्मासान्दक्षिणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं
पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमꣳ राजानमाप्यायस्वापक्षी-
यस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त
आकाशाद्वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते
ततो योषाग्नौ जायन्ते लोकान्प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्तेऽथ य एतौ पन्थानौ न
विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार जो यज्ञ, दान और तपश्चर्या द्वारा लोकों पर विजय प्राप्त करते हैं, वे धूम (धूम के अधिष्ठाता
देवता) को प्राप्त होते हैं। धूम से रात्रि देवता को, रात्रि से कृष्ण पक्ष (कृष्णपक्ष के अधिष्ठाता देवता) को,
कृष्णपक्ष से दक्षिणायन सूर्य वाले छः महीनों को, छः मासों से पितृलोक को एवं पितृलोक से चन्द्र लोक
को प्राप्त होते हैं। वहाँ (चन्द्रलोक में) उस अन्न को देवतागण उसी प्रकार ग्रहण (भक्षण) करते हैं, जिस
प्रकार ऋत्विकगण सोम का पान करते हैं, जब उनके (जीवों के) पुण्यफल (कर्मफल) क्षीण हो जाते हैं,
तब वे आकाश को प्राप्त करते हैं। आकाश से वायु को, वायु से वृष्टि को, वृष्टि से पृथ्वी को अन्नरूप में प्राप्त
होते हैं। तत्पश्चात् पुरुष रूपी अग्नि में (उन अन्नों की) आहुति दी जाती हैं, जिसके द्वारा वे लोकों के
उत्थानकर्त्ता होकर स्त्री रूपी अग्नि में प्रकट होते हैं। इस प्रकार (विभिन्न लोकों को बार-बार प्राप्त करते
हुए) ये जीव घूमते ही रहते हैं; किन्तु जो इन दोनों (उत्तर-दक्षिण) मार्गों को नहीं जानते, वे कीट, पतङ्ग
और दन्दशूक (मच्छर) आदि होते हैं ॥ १६ ॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाह-
मुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कꣳसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमुह्य
परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यꣳ संस्कृत्य पुꣳसा नक्षत्रेण मन्थꣳ संनीय
जुहोति-यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान्। तेभ्योऽहं भागधेयं
जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा। या तिरश्ची निपद्यतेऽहं विधरणी इति। तां
त्वा घृतस्य धारया यजे सꣳराधनीमहꣳ स्वाहा ॥ १ ॥
जो महत्ता प्राप्त करना चाहता हो, वह आदित्य के उत्तरायण होने पर शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में बारह
दिन के अन्दर किसी शुभ तिथि में उपसद्व्रती (पयोव्रती) होकर गूलर काष्ठ से निर्मित कटोरे या चमस
में सर्वौषधि और फल आदि को एकत्र करके, यज्ञ वेदी का परिसमूहन (सफाई) और उपलेपन (लिपाई)
सम्पन्न करे। तदुपरान्त अग्नि स्थापन करे और वेदी के चारों ओर कुश-आसन बिछाकर गृह्यसूत्र में वर्णित
पद्धति से घृत को संस्कारित करके, जिसका नाम पुरुष वाची हो, उस नक्षत्र (हस्त, पुष्य आदि नक्षत्र) में
मन्थ (औषधियों का मिश्रित रूप) को (स्रुवा) के बीच में रखकर आहुति प्रदान करे। आहुति के साथ
इस मन्त्र के माध्यम से प्रार्थना करे- हे जातवेदा (अग्ने)! मनुष्यों की कामनाओं में बाधा डालने वाले
३४६ बृहदारण्यकोपनिषद्
तुममें प्रतिष्ठित जितने तिर्यग् (कुटिल) देवगण हैं, उन सभी देवों को मैं आहुति प्रदान करता हूँ। वे सभी
तृप्त होकर मेरी कामनाओं को पूर्ण करें। इन देवताओं के अतिरिक्त जो तिरश्ची (कुटिल) देवियाँ हैं, उनको
भी मैं घृताहुति प्रदान करता हूँ। वे भी मेरी कामनाओं को पूर्ण करें॥ १ ॥
ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा
वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा
मन्थे संस्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा संपदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति
श्रोत्राय स्वाहाऽयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ
हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥
(साधक या याजक) 'ज्येष्ठाय स्वाहा', 'श्रेष्ठाय स्वाहा' इन मन्त्रों से यज्ञ में आहुति प्रदान करता हुआ
स्रुवा के अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है, 'प्राणाय स्वाहा', 'वसिष्ठायै स्वाहा' इन मन्त्रों से आहुति
प्रदान करता हुआ संस्रव (स्रुवा में बचे घृत) को मन्थ में डाल देता है, 'वाचे स्वाहा', 'प्रतिष्ठायै स्वाहा'
इन मन्त्रों से अग्नि में हवन करते हुए संस्रव को मन्थ में डाल देता है, 'चक्षुषे स्वाहा', 'सम्पदे स्वाहा' मन्त्र
बोलते हुए आहुति करके अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है, 'श्रोत्राय स्वाहा', 'आयतनाय स्वाहा'
उच्चारण करते हुए आहुति प्रदान करके बचे हुए घृत को मन्थ में डाल देता है, 'मनसे स्वाहा', 'प्रजात्यै
स्वाहा' मन्त्रों से आहुति करके संस्रव को मन्थ में डाल देता है, 'रेतसे स्वाहा' मन्त्र के साथ आहुति देकर
अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है ॥ २ ॥
अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे
संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा
मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः
स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति
क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे
संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ
हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये
स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥
'अग्नये स्वाहा' मन्त्र से अग्नि में आहुति प्रदान करता हुआ अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है।
सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा, स्वः स्वाहा, भूर्भुवः स्वः स्वाहा, ब्रह्मणे स्वाहा, क्षत्राय स्वाहा,
भूताय स्वाहा, भविष्यते स्वाहा, विश्वाय स्वाहा, सर्वाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण
करते हुए संस्रव (अवशिष्ट घृत) को मन्थ में डाल देता है ॥ ३ ॥
अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिंकृतमसि
हिंक्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्दे संदीप्तमसि
विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥
अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र ६ ३४७
अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र ६ ३४७
इसके पश्चात् जो मन्थ (मिश्रित द्रव्य) और संस्रव (टपकाया हुआ घृत) पात्र में रखा है, उसे स्पर्श
करते हुए 'भ्रमदसि' 'ज्वलदसि' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ कहता है कि आप (प्राणस्वरूप होने के कारण
सर्वत्र) भ्रमणशील हैं, (अग्निरूप होने से) जाज्वल्यमान हैं, (ब्रह्मरूप होने से) पूर्ण हैं, (आकाश रूप
होने से) स्तब्ध हैं, (सबके मित्र होने के कारण) जगद्रूप एक सभा तुल्य हैं। आप ही हिङ्कृत और
हिङ्क्रियमाण हैं। आप ही उदगीथ और उद्गीयमान हैं। आप ही श्रावित और प्रत्याश्रावित हैं अर्थात्
आपको ही अध्वर्यु और आग्नीध्र अभिषुत करते हैं, आप ही मेघ में सम्यक् प्रकार से (विद्युत् रूप में)
प्रदीप्त हैं। आप ही विभु (विभिन्न रूपों वाले) और प्रभु (समर्थ) हैं। आप ही अन्न, ज्योति और मृत्यु हैं।
आप ही सबके संहारक होने से स्वयं प्रलय स्वरूप हैं॥४॥
अथैनमुद्यच्छत्यामँस्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स माँ राजेशानो-
ऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५॥
इसके पश्चात् मन्थ को पात्र सहित हाथ से उठाता हुआ- 'आमंसि आमंहि' आदि मन्त्रों का उच्चारण
करे। कहे- आप सर्वज्ञ हैं, हम आपकी महिमा को भली-भाँति जानते हैं, आप (प्राण) ही राजा, ईशान
और अधिपति हैं, हमें भी आप राजा, ईशान और अधिपति बनाएँ॥५॥
अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः
सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवँरजः मधु
द्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा धियो यो नः प्रयोदयान्मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ ३ अस्तु
सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमान्वाह सर्वांश्च मधुमतीरहमेवेदँ
सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः
संविशति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं
भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वँशं जपति ॥ ६ ॥
इसके बाद उस मन्थ को चार ग्रासों में मन्त्रों के साथ भक्षण करे। पहले 'तत्सवितुर्वरेण्यं' आदि प्रथम
मन्त्र का उच्चारण करे, जिसका अर्थ है-सविता के उस वरेण्य (वरण करने योग्य) पद का मैं ध्यान करता
हूँ। 'मधुवाता ऋतायते'- वायु मधुर होकर बह रही है। 'मधुक्षरन्ति सिन्धवः' - नदियाँ मधु रस प्रवाहित
कर रही हैं। 'माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः'- ओषधियाँ हमारे लिए मधुर हों। इसके पश्चात् 'भूःस्वाहा' कहकर
मन्थ का प्रथम ग्रास ग्रहण करे। इसके उपरान्त- 'भर्गो देवस्य धीमहि' - हम सविता के पापनाशक दिव्य
तेज को धारण करते हैं। 'मधुनक्तमुतोषसो'-रात्रि और दिवस मधुर हों। 'मधुमत्पार्थिवँरजः'-पृथिवी के
रजकण मधुर हों। 'मधु द्यौरस्तु नः पिता,'-पिता द्युलोक हमारे लिए मधुर हों। इतना बोलकर 'भुवः
स्वाहा' मन्त्र के साथ मन्थ का द्वितीय ग्रास ग्रहण करे। तब- 'धियो यो नः प्रचोदयात्'- वे सविता देवता
हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें। 'मधु मान्नो वनस्पतिः' वनस्पति हमारे निमित्त (सोम मय) हो।
'मधुमाँर अस्तु सूर्यः'- सूर्य हमारे लिए मधुर हो। 'माध्वीर्गावो भवन्तु नः'- गौएँ मधुर दुग्ध प्रदात्री हों।
'स्वः स्वाहा'- उच्चारण करके मन्थ का तृतीय ग्रास भक्षण करे। इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री मन्त्र का
३४८ बृहदारण्यकोपनिषद्
उच्चारण करके फिर - 'अहमेवेदः सर्वं भूयासम्' - 'मैं ही सब कुछ हो जाऊँ' कह कर 'भूर्भुवः स्वः
स्वाहा' मन्त्र के साथ (समस्त मन्थ का अवशिष्ट) चौथा ग्रास ग्रहण करे। इसके पश्चात् हस्तप्रक्षालन करके
वेदी के पृष्ठ (पश्चिम) भाग में पूर्वाभिमुख होकर शयन करे। फिर प्रातःकाल सूर्योपस्थान करते हुए कहे-
आप समस्त दिशाओं रूपी पंखुड़ियों के आश्रय रूप कमल हैं, मैं भी मनुष्यों में कमल तुल्य होऊँ। इसके
पश्चात् उसी मार्ग से वापिस लौटकर अग्नि (वेदी) के पश्चिम ओर बैठकर (अगले मन्त्र) वंश को जपे ॥ ६ ॥
तः हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य
एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७॥
इस मन्थ प्रक्रिया (विशिष्ट हवन पद्धति) का उपदेश अरुण पुत्र उद्दालक ने वाजसनेय याज्ञवल्क्य
को करते समय कहा था कि इस मन्थ को यदि कोई सिंचन के लिए (पूरी तरह) सूखे वृक्ष पर डाल देगा,
तो उसमें से कोपलें फूटकर शाखाएँ निकल आएँगी ॥ ७ ॥
एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैङ्ग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य
एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥
इस मन्थ का उपदेश वाजसनेय याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्य को करते हुए कहा था- यदि कोई
सिंचन के निमित्त सूखे वृक्ष पर भी इस मन्थ को डालेगा, तो उसमें नये पत्ते व शाखाएँ प्रस्फुटित हो जाएँगी ॥ ८ ॥
एतमु हैव मधुकः पैङ्ग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनः शुष्के
स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ९ ॥
मधुक पैङ्ग्य ने अपने शिष्य भागवित्ति चूल के प्रति इस मन्थ का उपदेश करते हुए कहा था कि यदि
कोई सींचने के लिए ठूँठ वृक्ष पर भी इस मन्थ को डालेगा, तो उसमें से पत्ते फूट पड़ेंगे और शाखाएँ
प्रस्फुटित हो जाएँगी ॥ ९ ॥
एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकय आयस्थूणायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनः
शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥
भागवित्ति चूल ने अपने शिष्य जानकि आयस्थूण के प्रति उपदेश करते हुए, इस मन्थ के विषय में
कहा था- यदि कोई सिंचन के लिए बिल्कुल शुष्क वृक्ष पर इसे (मन्थ को) डालेगा, तो उसमें से पत्ते व
शाखाएँ प्रस्फुटित हो जाएँगे ॥ १० ॥
एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य
एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥
जानकि आयस्थूण ने सत्यकाम जाबाल के प्रति इस मन्थ का उपदेश करते समय कहा था- यदि कोई
सींचने हेतु सूखे वृक्ष पर इस मन्थ को डालेगा, तो उसमें कोपलें और शाखाएँ निकल आएँगी ॥ ११ ॥
एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ
निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतन्नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥
इस मन्थ का उपदेश सत्यकाम जाबाल ने अपने अन्तेवासी (आश्रमवासी) शिष्यों के प्रति किया था
अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ ३४९
अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ ३४९
और कहा था कि यदि कोई सींचने के लिए शुष्क वृक्ष पर भी इसको डाल देगा, तो वह कोपल और
शाखाओं से युक्त हो जायेगा। यह मन्थविधि अपुत्र और अशिष्य को नहीं बतलानी चाहिए ॥ १२ ॥
चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थिन्यौ
दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च
खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान्दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥
यह मन्थकर्म चार औदुम्बर काष्ठ के बने पात्रों द्वारा सम्पन्न होता है। ये चार पात्र-स्रुवा, चमस,
समिधा उपमन्थनी और इध्म अर्थात् समिधा हैं। इसमें दस प्रकार के ग्रामीण धान्य प्रयुक्त होते हैं। ये धान्य-
व्रीहि (धान), यव (जौ), तिल, माष (उड़द), अणु (साँवा), प्रियङ्गु (काँगनी), गोधूम (गेहूँ), मसूर,
खल्व (एक प्रकार का धान) और खलकुल (कुलथी) हैं। इन सभी को पीसकर मधु और घृत डालकर
आहुति दी जाती है ॥ १३ ॥
॥ चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥
इस ब्राह्मण में प्राणि-जगत् की आधारभूता प्रजनन प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है। यह सृष्टि यज्ञमय है,
इसलिए सृष्टिचक्र की गतिशील रखने वाली प्रजनन-प्रक्रिया भी ऋषि की दृष्टि से यज्ञीय कर्मानुशासन का अंग
है। इसे इसी भाव से समझा और अपनाया जाना चाहिए-
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां
फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥
इन पंचभूतों का रस पृथिवी है, पृथिवी का रस आपः (जल) है, जल का रस ओषधियाँ हैं,
ओषधियों का रस पुष्प हैं, पुष्पों का रस (सार) फल हैं, फलों का रस पुरुष है और पुरुष का सार तत्त्व
रेतस् (वीर्य) है ॥ १ ॥
स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियः ससृजे ताःसृष्ट्वाऽध
उपास्त तस्मात्स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव
समुदपारयत्तैनामभ्यसृजत् ॥ २ ॥
प्रजापति ने इच्छा की कि इस (पुरुष अथवा) रेतस् के लिए आश्रय तैयार करूँ। उसने स्त्री
(नारीत्व) का सृजन किया तथा आधार रूप में उसकी उपासना की। इसीलिए आज भी स्त्री आधार रूप
में उपासित है। उस (प्रजापति) ने अपनी ग्रावा (शिलाखण्ड) जैसी सुदृढ़ सामर्थ्य से उस (स्त्री जाति)
को परिपूर्ण किया। उस स्थापना से स्त्री के स्त्रीत्व की संसार में प्रतिष्ठा हुई ॥ २ ॥
तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ
स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य
एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासाः स्त्रीणाः सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं
चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥ ३ ॥
३५० बृहदारण्यकोपनिषद्
ऋषि देवमानव उत्पन्न करने वाले प्रजनन यज्ञ के उपादानों का वर्णन करते हुए कहते हैं-
नारी की जननेन्द्रिय ही यज्ञवेदी है, वहाँ स्थित लोम ही बर्हि (कुश का आसन) है, मध्यभाग का चर्म
अधिषवण फलक है, मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है और मुष्क (पार्श्व में स्थित दो मांस पिण्ड) समिधा है।
इस प्रकार इस (प्रजनन) यज्ञ का फल वाजपेय यज्ञ के समान होता है। इस प्रकार का ज्ञान रखकर प्रजनन
यज्ञ सम्पन्न करने वाला यजमान (पुरुष) स्त्री के पुण्यों को प्राप्त कर लेता है; किन्तु इस प्रकार का ज्ञान
न रखकर (भोग बुद्धि से) प्रजनन करने वाले के पुण्यों को स्त्रियाँ प्राप्त कर लेती हैं॥ ३॥
[जो व्यक्ति प्रजनन यज्ञ का महत्त्व समझकर प्रजनन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए निर्धारित मर्यादाओं
के अनुसार रतिकर्म में प्रवृत्त होता है, उसे उस यज्ञीय प्रक्रिया की पूर्ति का पुण्य प्राप्त होना स्वाभाविक है; किन्तु
यदि कोई व्यक्ति अपने असंयत कामावेग के कारण रतिक्रिया में प्रवृत्त होता है, तो उसके द्वारा मर्यादा भंग होने
के कारण उसका पुण्य क्षीण होता है।]
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहेत्तद्ध
स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लो-
कात्प्रयन्ति य इदमविद्वांःसोऽथोपहासं चरन्तीति बहु वा इदंः सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः
स्कन्दति ॥ ४॥
इस (यज्ञ) विषय के ज्ञाता आरुणि उद्दालक तथा मौद्गल्य और कुमार हारित कहते हैं कि बहुत से
ऐसे मरणधर्मा और बुद्धिहीन ब्राह्मण हैं, जो इस प्रजनन यज्ञ को इस (पवित्र) रूप में नहीं जानते। वे
निरिन्द्रिय और सुकृतहीन होकर, इस रतिकर्म में आसक्त होकर परलोक (श्रेष्ठलोक) से पतित हो जाते हैं।
पत्नी का ऋतुकाल प्राप्त होने से पूर्व ही यदि कोई प्राणतत्त्वोपासक दिन अथवा रात्रि में न्यूनाधिक रूप में
स्वतः स्खलित हो जाते हैं, तो उन्हें (अगले मंत्र में उल्लिखित) प्रायश्चित्त करना चाहिए॥ ४॥
तदभिमृशेदद्नु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं
तद्रेत आददे पुनर्मामैत्विन्द्रियं पुनस्तेजःपुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं
कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५॥
उस गिरे हुए (अपने रेतस्) को अभिमन्त्रित करते हुए उसे हाथ से स्पर्श करे और कहे कि आज यह
मेरा वीर्य जो पृथिवी पर गिरा है और पूर्व में भी कभी ओषधि तथा जल में गिरा है (अर्थात् पृथिवी, ओषधि
और जल को दूषित किया है), उस वीर्य को मैं फिर से धारण करना चाहता हूँ। इस प्रकार कहने के बाद
अनामिका और अङ्गुष्ठ से उसे उठाकर वक्षस्थल अथवा दोनों भौंहों के बीच में लेप करे और कहे- जो यह
मेरी (वीर्यरूप) इन्द्रिय शक्ति बाहर चली गई थी, वह पुनः मेरे पास आ जाए। मुझे पुनः अपना तेजस् और
सौभाग्य प्राप्त हो। अग्नि देव एवं अन्य देवगण पुनः मेरे शरीर में उचित स्थान पर इसे प्रतिष्ठित कर दें॥ ५॥
अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविणंः सुकृतमिति
श्रीर्ह वा एषां स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ॥
इसके बाद वह प्रायश्चित्त कर्त्ता जल में अपने प्रतिबिम्ब को देखता हुआ उस (जल) को अभिमन्त्रित