सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र १ २९५

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र १ २९५
तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतः श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ
नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश
ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा- हे गार्गी ! यह 'अक्षर' स्वयं दृष्टि का विषय नहीं है; किन्तु सभी को देखने वाला है, स्वयं
श्रवण का विषय नहीं है; किन्तु सबकी सुनता है, स्वयं मनन का विषय नहीं है; किन्तु सबका मन्ता है, स्वयं अविज्ञात
है; किन्तु सबका ज्ञाता है। हे गार्गी ! इस 'अक्षर' ब्रह्म में ही वह आकाश तत्त्व ओत-प्रोत है ॥ ११ ॥
सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वं न वै
जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥
इसके पश्चात् वाचक्नवी गार्गी बोली- हे पूजनीय ब्राह्मणो ! इसी (वार्तालाप से प्राप्त हुए ज्ञान) को बहुत
समझो। इन (याज्ञवल्क्य) से नमस्कार करके ही पीछा छूट जाये, तो बहुत है; क्योंकि आपमें से किसी भी
ब्रह्मज्ञानी के लिए इन्हें जीत सकना सम्भव नहीं है। इसके बाद वाचक्नवी गार्गी मौन हो गई ॥ १२ ॥
[ गार्गी ब्रह्मज्ञ विदुषी थी। उसके निर्णायक कथन को सभी ने स्वीकार किया, किन्तु आने वाले क्रम में
शाकल्य विदग्ध अहंकारवश नहीं माने। अगले क्रम में उन्हें उस कुचेष्टा का दण्ड भोगना पड़ा।]
॥ नवमं ब्राह्मणम् ॥
अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा
प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति
होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति
षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा
याज्ञवल्क्येति द्वावित्यौमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च
सहस्रेति ॥ १ ॥
इसके उपरान्त शाकल्य विदग्ध ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! देवगण कितने हैं ?
यह सुनकर याज्ञवल्क्य ने वैश्वदेव मन्त्रों की निविद में वर्णित देवताओं की संख्या प्रतिपादित की- तीन और
तीन सौ, तीन और तीन सहस्र, इसका अभिप्राय हुआ तीन हजार तीन सौ छह। शाकल्य ने कहा- ठीक है।
पुनः शाकल्य ने प्रश्न किया- देवताओं की संख्या कितनी है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- तैंतीस। इसमें सहमति
देकर पुनः शाकल्य ने प्रश्न पूछा- देवता कितने हैं ? तब याज्ञवल्क्य बोले- छः । इसे स्वीकार कर विदग्ध
(शाकल्य) ने फिर पूछा- देवता कितने हैं ? उत्तर दिया गया-तीन । शाकल्य द्वारा 'ठीक है' कहने एवं
पुनः यही पूछने पर कि देवता कितने हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा - दो । 'ठीक है' कहकर शाकल्य ने फिर
पूछा- देवता कितने हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- अध्यर्ध (डेढ़)। इस पर 'ठीक है' कहते हुए शाकल्य ने
पुनः वही प्रश्न दोहराया, तब याज्ञवल्क्य ने कहा- देवता एक है। इसे स्वीकार कर शाकल्य ने कहा- वे
तीन हजार तीन और तीन सौ तीन देवगण कौन से हैं ? ॥ १ ॥

२९६ बृहदारण्यकापानषद
स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिꣳशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिꣳशदित्यष्टौ
वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिꣳशाविति ॥
याज्ञवल्क्य बोले-ये तो (तीन सौ तीन और तीन हजार तीन) देवताओं की विभूतियाँ हैं। देवगण तो
केवल तैंतीस ही हैं। विदग्ध शाकल्य ने पुनः प्रश्न किया-वे तैंतीस देवगण कौन से हैं ? तब याज्ञवल्क्य ने
उत्तर दिया-अष्ट वसु, एकादश रुद्र, बारह आदित्य ये इकतीस देवता हुए। इन्द्र और प्रजापति सहित ये
तैंतीस हो जाते हैं ॥ २ ॥
कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि
चैते वसव एतेषु हीदं सर्वꣳहितमिति तस्माद्वसव इति ॥ ३ ॥
शाकल्य ने प्रश्न किया-अष्ट वसु कौन से हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- अग्नि, पृथ्‍वी, वायु, अन्तरिक्ष,
आदित्य, द्युलोक, चन्द्र और नक्षत्र ये ही अष्टवसु हैं, इन्हीं में सम्पूर्ण जगत् सन्निहित है अथवा जगत् के
सम्पूर्ण पदार्थ इन्हीं में समाये हुए हैं, इसीलिए इन्हें वसुगण कहते हैं ॥ ३ ॥
कतमे रुद्रा इति दशैमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ
रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति ॥ ४ ॥
शाकल्य ने फिर पूछा-ये रुद्र कौन हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा-पुरुष में स्थित ये दस प्राण (दस
इन्द्रियाँ) और ग्यारहवाँ आत्मा (मन) है, यही एकादश रुद्र हैं; क्योंकि जब ये मरणधर्मा शरीर से
मृत्युकाल में उत्क्रमण करते अर्थात् निकलते हैं, उस समय से उसके प्रियजनों-परिजनों को रुलाते हैं, इसी
कारण इन्हें रुद्र कहा गया है ॥ ४ ॥
कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदꣳ सर्वमाददाना
यन्ति ते यदिदꣳ सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥
इसके पश्चात् शाकल्य ने पूछा-बारह आदित्य कौन से हैं ? याज्ञवल्क्य ने बताया-वर्ष में बारह मास
होते हैं, वे ही बारह आदित्य हैं; क्योंकि ये ही सभी को लेते हुए (उनकी आयु का आदान करते हुए)
चलते रहते हैं ॥ ५ ॥
कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः
स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥
शाकल्य ने पुनः प्रश्न किया- इन्द्र और प्रजापति कौन हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- स्तनयित्नु अर्थात्
गरजने वाला मेघ ही इन्द्र है और यज्ञ ही प्रजापति है। शाकल्य ने पूछा- गर्जनशील मेघ क्या है ? उत्तर
मिला विद्युत्। जब शाकल्य ने यह पूछा कि यज्ञ क्या है? तब याज्ञवल्क्य ने कहा- पशु ही यज्ञ है ॥ ६ ॥
कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेते हीदꣳ सर्वं
षडिति ॥ ७ ॥
शाकल्य ने प्रश्न किया- छः देवगण कौन से हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- पृथिवी, अग्नि, वायु, अन्तरिक्ष,
द्यौ और आदित्य, ये ही छः देवगण हैं। ये ही सभी कुछ हैं ॥ ७ ॥

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र ११ २९७

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र ११ २९७
कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ
देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥
शाकल्य ने फिर पूछा- वे तीन देव कौन से हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा- तीन लोक ही तीनों देवता हैं,
इन्हीं में समस्त देवगण वास करते हैं। फिर शाकल्य ने पूछा- वे दो देवता कौन हैं- ऋषि ने उत्तर दिया-
अन्न और प्राण ही वे दो देवता हैं। शाकल्य ने फिर पूछा- वे डेढ़ देवता कौन हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा- जो
बहता है, अर्थात् यह वायु ही डेढ़ देवता है ॥ ८ ॥
तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदग्ं सर्वमध्याद्धत्तेनाध्यर्ध
इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म तदित्याचक्षते ॥ ९ ॥
शाकल्य ने प्रश्न किया- पवन (वायु) तो एकाकी ही प्रवाहित होता है, फिर इसे 'डेढ़' कैसे कहते
हैं? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा-क्योंकि इसी में सभी ऋद्धि (वृद्धि) को प्राप्त होते हैं, इसलिए इसे
अध्यर्ध (डेढ़) कहते हैं। शाकल्य ने पूछा-एक देव कौन सा है? ऋषि ने कहा 'प्राण' ही एक देवता है,
वही ब्रह्म है और उसी को तत् (वह) कहते हैं ॥ ९ ॥
पृथिव्येव यस्यायतनमग्निलोंको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणग्ं
स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य
एवायग्ं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥
यह पृथिवी ही जिसका शरीर (आयतन) है, अग्नि ही जिसका लोक, मन ही जिसकी ज्योति और जो
समस्त जीवों का आत्मा एवं सहारा है। उस सर्वात्मा एवं सभी के आश्रयरूप पुरुष को जो जानता है, हे
याज्ञवल्क्य! वही ब्रह्मज्ञ है। यह सुनकर याज्ञवल्क्य ने कहा- मैं निःसन्देह उस ब्रह्म को जानता हूँ। जिस
पुरुष को तुम सब जीवों का आत्मा एवं आश्रय बताते हो, वही इस शरीर में संव्याप्त पुरुष है। याज्ञवल्क्य
ने आगे कहा- हे शाकल्य ! अब तुम और प्रश्न करो। शाकल्य ने कहा- उसका देवता कौन है ? ऋषि ने
कहा- उसका देवता अमृत है ॥ १० ॥
काम एव यस्यायतनग्ं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणग्ं स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ं सर्वस्यात्मनः परायणं
यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति
होवाच ॥ ११ ॥
शाकल्य ने कहा- काम ही जिसका शरीर है, हृदय ही जिसका लोक है, मन ही जिसकी
ज्योति है एवं जो समस्त प्राणियों की आत्मा है, उस सर्वान्तरात्मा को जानने वाला ब्रह्मज्ञानी हो जाता
है। याज्ञवल्क्य बोले- मैं निश्चित ही उस पुरुष का ज्ञान रखता हूँ, जिसे तुम सभी भूतों की आत्मा
कहते हो, वह काममय पुरुष है। हे शाकल्य! अब और प्रश्न करो। शाकल्य ने पूछा- उसका देवता
कौन है ? याज्ञवल्क्य ने कहा-'स्त्रियाँ' ॥ ११॥

२९८ बृहदारण्यकोपनिषद्
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणँ
स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य
एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥
शाकल्य ने कहा- रूप ही जिसका देह है, नेत्र ही लोक, मन ही ज्योति है तथा जो सभी का आश्रय
रूप है, उस पुरुष को जानने वाला सर्वज्ञाता होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा-तुम जिस सबके आश्रयभूत पुरुष
की बात कर रहे हो, उसे मैं जानता हूँ। वह पुरुष आदित्य में स्थित है। याज्ञवल्क्य ने कहा हे शाकल्य ! और
प्रश्न करो। शाकल्य ने कहा-उसका देवता कौन है ? ऋषि ने उत्तर दिया-सत्य ही उसका देवता है ॥ १२ ॥
आकाश एव यस्यायतनँ श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणँ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं
यमात्थ य एवायँ श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति
दिश इति होवाच ॥ १३ ॥
शाकल्य ने कहा- आकाश जिसका आयतन (देह) है, श्रोत्र जिसका लोक, मन जिसकी ज्योति है
और जो समस्त भूतों का आश्रय रूप है, उसे जानने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। याज्ञवल्क्य बोले- मैं निश्चित
रूप से उसका ज्ञान रखता हूँ। जिस पुरुष को तुम सब भूतों का आश्रय रूप मानते हो, वही श्रोत्र सम्बन्धी
(अर्थात् श्रोत्र में प्रति श्रवण के समय रहने वाला) 'प्रातिश्रुत्क' पुरुष है। हे शाकल्य ! अब और कुछ पूछो।
शाकल्य ने पूछा- उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने कहा-दिशाएँ ही उसकी देवता हैं ॥ १३ ॥
तम एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणँ स
वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायँछायामयः
पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥
शाकल्य ने कहा- तम ही जिसका आयतन (देह) है, हृदय ही जिसका लोक और मन ही जिसकी
ज्योति है, उस सर्वभूतात्मा को जो जानता है, वह ब्रह्मज्ञानी होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा-मैं उस सर्वभूतात्मा
को निश्चित रूप से जानता हूँ। जिसे तुम 'सर्वभूतात्मा' ऐसा जानते हो, वह छायामय पुरुष ही है। हे शाकल्य !
और पूछो। शाकल्य ने पूछा-उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया-उसका देवता 'मृत्यु' है ॥
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणँ
स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य
एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥ १५ ॥
शाकल्य ने फिर कहा- रूप ही जिसका शरीर, चक्षु ही देखने की शक्ति और मन ही जिसकी ज्योति
है, जो सर्वभूतों में स्थित उनकी आत्मा है, उस पुरुष को जानने वाला सर्वज्ञ होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा-
मैं निश्चित रूप से उस ब्रह्म को जानता हूँ। तुम जिसे सर्वभूतों में स्थित आत्मा कहते हो, वह वही पुरुष
है, जो दर्पण में स्थित है ( अर्थात् दर्पण में दिखाई देता है)। हे शाकल्य ! और प्रश्न करो। शाकल्य ने कहा-
उसका देवता कौन है ? ऋषि ने उत्तर दिया- उसका देवता असु (अर्थात् प्राण) है ॥ १५ ॥

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २० २९९

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २० २९९
आप एव यस्यायतनꣲ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणꣲ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣲ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ
य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥
शाकल्य बोले- जल ही उसका आयतन (देह), हृदय ही लोक और मन ही ज्योति है। उस
सर्वभूतान्तरात्मा को जो जानता है, वह ब्रह्मज्ञानी होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा- मैं निश्चित ही उसका ज्ञान
रखता हूँ, जिसे तुम सर्वभूतान्तरात्मा कहते हो, वह जल स्थित पुरुष ही है। हे शाकल्य! और पूछो,
शाकल्य ने कहा- उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- उसके देवता वरुण हैं ॥ १६ ॥
रेत एव यस्यायतनꣲ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणꣲ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣲ सर्वस्यात्मनः परायणं
यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति
होवाच ॥ १७ ॥
शाकल्य ने कहा- वीर्य ही जिसका शरीर (आयतन) है, हृदय ही जिसका लोक है, मन ही जिसकी
ज्योति है, उस सर्वभूताश्रय पुरुष को जो जानता है, वह सर्वज्ञाता होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा- उस पुरुष
को मैं भली-भाँति जानता हूँ, जिसे आप सर्वभूतों का आश्रय कहते हो, वह पुत्ररूप पुरुष है। हे शाकल्य !
और प्रश्न करो- शाकल्य के पूछने पर कि उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- प्रजापति ॥
शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यस्त्वाꣲ स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमक्रता ३ इति ॥ १८ ॥
याज्ञवल्क्य ने शाकल्य से कहा- हे शाकल्य ! इन ब्राह्मणों ने तुम्हें ही निश्चित रूप से अङ्गारे हटाने
का चिमटा बनाया है ॥ १८ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म
विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यदिशो वेत्थ सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥
शाकल्य ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! जो आप कुरु और पांचाल देश के ब्राह्मणों पर आरोप लगाकर उन्हें तिरस्कृत
करते हैं, क्या स्वयं को ब्रह्मवेत्ता मानकर ऐसा करते हैं ? याज्ञवल्क्य जी बोले-मुझे देवताओं और प्रतिष्ठा के सहित
दिशाओं का ज्ञान है। शाकल्य बोले-यदि आपको देवता और प्रतिष्ठा सहित दिशाओं का ज्ञान है ॥ १९ ॥
किंदेवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति
चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु
रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि
प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥
तो यह बताएँ कि पूर्व दिशा में आप किस देवता से युक्त हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- वहाँ मैं आदित्य
देवता से युक्त हूँ। शाकल्य ने पुनः पूछा- वह आदित्य किसमें स्थित है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- चक्षु में।
शाकल्य ने पूछा- चक्षु किसमें प्रतिष्ठित हैं ? ऋषि ने कहा- रूप में, क्योंकि चक्षुओं के द्वारा ही पुरुष रूपों
को देखता है। शाकल्य ने पूछा- रूप किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- हृदय में, क्योंकि हृदय के
द्वारा ही पुरुष को रूपों का ज्ञान होता है। शाकल्य ने कहा यह सत्य है ॥ २० ॥

३०० बृहदारण्यकोपनिषद्
किं देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति
यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति
श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायाः ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति
कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा
प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥
शाकल्य ने पूछा- दक्षिण दिशा में आप किस देवता से युक्त हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- यम देवता से। शाकल्य
ने पूछा-वह यम देवता किसमें स्थित है? उत्तर मिला श्रद्धा में। श्रद्धा किसमें स्थित है? ऋषि ने कहा-हृदय में,
क्योंकि हृदय के द्वारा ही पुरुष श्रद्धा को जानता है। शाकल्य ने कहा-हे याज्ञवल्क्य ! यह सत्य है ॥ २१ ॥
किंदेवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन्प्रतिष्ठित
इत्यप्स्विति कस्मिन्नापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति
तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं
भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥
शाकल्य ने आगे कहा-पश्चिम दिशा में आप किस देवता वाले हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा-पश्चिम दिशा
में मैं वरुण देवता से युक्त हूँ। शाकल्य ने पूछा- वरुण किसमें प्रतिष्ठित है ? ऋषि ने उत्तर दिया-जल में।
जल किसमें स्थित है ? उत्तर मिला-वीर्य में। तब शाकल्य ने पूछा- वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य
ने कहा-हृदय में। इसलिए तो पिता के अनुरूप उत्पन्न पुत्र के लिए लोग कहते हैं कि ये मानो पिता के हृदय
से निकला है, पिता के हृदय से ही निर्मित हुआ है। शाकल्य ने कहा-यह भी यथार्थ ही है ॥ २२ ॥
किंदेवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति
दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति
सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि
सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥
शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से पूछा-आप उत्तर दिशा में किस देवता से सम्पन्न हैं। याज्ञवल्क्य ने कहा- सोम देवता
से। शाकल्य ने पूछा- सोम किसमें स्थित है ? ऋषि ने कहा-दीक्षा में। दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य ने
कहा- सत्य में। सत्य किसमें विद्यमान है ? ऋषि ने कहा-हृदय में। क्योंकि व्यक्ति हृदय से ही सत्य को जान पाता
है, अतः सत्य हृदय में ही प्रतिष्ठित है। तब शाकल्य ने कहा-हे याज्ञवल्क्य ! यह भी ठीक है ॥ २३ ॥
किंदेवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति वाचीति
कस्मिन्नु वाक् प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥
शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से पूछा- आप ध्रुव दिशा में किस देवता से युक्त हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा-
अग्निदेव से युक्त हूँ। प्रश्न किया गया- अग्निदेव किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- वाक्
शक्ति में। पुनः प्रश्न हुआ कि वाक् किसमें स्थित है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- वाक् हृदय में प्रतिष्ठित
है। इस पर शाकल्य ने पूछा- फिर हृदय किसमें स्थित है ? ॥ २४ ॥

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २७ ३०१

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २७ ३०१
अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्म-त्स्याच्छ्वानो
वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथीरन्निति ॥ २५ ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा- अरे अहल्लिक (प्रेत) ! जब तुम इस (हृदय) को हमसे पृथक् मानते हो, तब तो
(हृदय विहीन) इस शरीर को कुत्ते नोच कर खा जाते या पक्षीगण चोंच मार-मार कर इसे मथकर
(चीरकर) खा डालते ॥ २५ ॥
कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इत्यपान
इति कस्मिन्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति
कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न
हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ
देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तानुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं
चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तं ह न मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि
हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजहुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥
शाकल्य ने फिर पूछा- आप (शरीर) और हृदय (आत्मा) किसमें प्रतिष्ठित हैं ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर
दिया- प्राण में। शाकल्य ने फिर पूछा- प्राण किसमें स्थित हैं ? उत्तर दिया अपान में । पूछा गया- अपान
किसमें विद्यमान है ? उत्तर दिया गया-व्यान में। फिर प्रश्न किया गया-व्यान किसमें स्थित है ? उत्तर दिया
गया-उदान में। उदान किसमें प्रतिष्ठित है ? समान में। याज्ञवल्क्य ने आगे कहा-यह आत्मा नेति-नेति कहा
जाता है। यह ग्रहण नहीं किया जा सकता और न ही विनष्ट किया जा सकता है। यह सङ्ग रहित
अव्यवस्थित और अहिंसित है। ये आठ शरीर हैं, आठ देवता हैं और आठ पुरुष हैं। वह व्यष्टि रूप होकर
इन पुरुषों को अपने हृदय में एकीकृत करके उपाधिरूप धर्मों का अतिक्रमण किए है। उपनिषद् द्वारा ज्ञातव्य
उस पुरुष के विषय में मैं आपसे पूछता हूँ। यदि आप उसका स्पष्ट विवेचन न कर सकेंगे, तो आपका मस्तक
गिर जायेगा; परन्तु शाकल्य के उस पुरुष को न जानने के कारण उसका मस्तक गिर गया। इतना ही नहीं
उसकी अस्थियों को चोर लोग कुछ और समझकर उठा ले गये ॥ २६ ॥
अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो
वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान्वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥ २७॥
याज्ञवल्क्य बोले - हे तपोधन पूज्य ब्राह्मणगण ! आप विद्वानों में से जो भी चाहे अथवा सभी मिलकर
चाहें तो मुझसे प्रश्न कर लें। यदि आप प्रश्न न करना चाहें, तो आप में से जिसकी इच्छा हो, उससे अथवा
सभी से मैं प्रश्न पूछूँ; किन्तु किसी का भी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करने का साहस न हुआ ॥ २७ ॥
तान् हतैः श्लोकैः पप्रच्छ । यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा। तस्य लोमानि
पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ १ ॥ त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः । तस्मात्तदा
तृण्णात्प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥ २॥ मांसांन्यस्य शकराणि किनाटः स्नाव तत्स्थिरम् ।
अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३ ॥ यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः
पुनः । मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति ॥४॥ रेतस इति मा
वोचतजीवतस्तत्प्रजायते। धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य संभवः ॥ ५॥

३०२ बृहदारण्यकापानषद

यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत्। मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति ॥ ६ ॥
जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः । विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य
तद्विद इति ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥
याज्ञवल्क्य ने उन ब्राह्मणों से इन श्लोकों द्वारा प्रश्न किए- मनुष्य, वनस्पति- वृक्ष के तुल्य है, अर्थात्
जो गुण धर्म वनस्पति के हैं, वही मनुष्य के भी हैं। वृक्ष में पत्ते होते हैं और मनुष्य के शरीर में रोम होते
हैं, मनुष्य के शरीर में स्थित त्वचा ही वृक्ष पर लिपटी छाल होती है ॥ १ ॥ रक्त रस है। जिस प्रकार पुरुष
की त्वचा से रक्त निकलता है, उसी प्रकार वृक्ष की छाल से रस (गोंद) निकलता है। आघात लगने पर वृक्ष
से भी रस निकलता है और चोट लगने पर मनुष्य के शरीर से भी रक्त बहता है ॥ २ ॥ पुरुष शरीर का मांस,
वृक्ष की भीतरी त्वचा (शकर) के समान है, मनुष्य शरीर के स्नायु तंत्र, वृक्ष के दृढ़ रेशे (किनाट) के
समान है। किनाट स्नायु के समान ही स्थिर होता है। मनुष्य में स्नायु तन्त्र के अन्दर स्थित अस्थियों के
समान ही वृक्ष में किनाट के अन्दर काष्ठ होता है और मनुष्य शरीर में स्थित मज्जा वृक्ष स्थित गूदे के समान
है ॥ ३ ॥ इतने पर भी (अर्थात् दोनों में से समानता होने पर भी ) वृक्ष जब ऊपर से काट दिया जाता है,
तो वह अपने मूल (जड़) से पुनः नए अंकुर फोड़ कर नवीन हो जाता है और यदि इसी प्रकार मृत्यु द्वारा
मनुष्य को काट दिया जाए, तो वह किस मूल द्वारा उत्पन्न होगा ॥ ४ ॥ वह (पुरुष) वीर्य से उद्भूत होता
है, ऐसा भी न कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुष में ही उत्पन्न होता है, मृत पुरुष में नहीं। वृक्ष जब कट
जाता है, तो वह बीज से भी नये सिरे से उत्पन्न हो जाता है और कट जाने पर भी पुनः अंकुरित हो जाता
है ॥ ५ ॥ वृक्ष यदि मूल से उखड़ जाये, तो पुनः उसका उग सकना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार मृत्यु द्वारा
यदि मनुष्य को काट दिया जाए, तो किस मूल (जड़) द्वारा उसका पुनः उगना (उत्पन्न होना) सम्भव
है ॥ ६ ॥ पुरुष तो उत्पन्न हुआ ही है, अतः वह दोबारा उत्पन्न नहीं होता। ऐसी स्थिति में मृत्यु के उपरान्त
उसे कौन उत्पन्न करेगा ? (इस प्रश्न का उन ब्राह्मणों ने कोई उत्तर नहीं दिया, अस्तु, श्रुति इसके विषय में
कहती है) ब्रह्म विज्ञानमय व आनन्द रूप है। दानदाता की परमगति भी वही है। ब्रह्मनिष्ठ और ब्रह्म को
जानने वाले पुरुष का परम आश्रय भी वह ब्रह्म ही है ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र २ ३०३

अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र २ ३०३
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
जनको ह वैदेह आसांचक्रेऽथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज तꣳ होवाच याज्ञवल्क्य
किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानित्युभयमेव सम्राडिति होवाच ॥ १ ॥
विदेहराज जनक सिंहासन पर आरूढ़ थे। उसी समय उनके पास महर्षि याज्ञवल्क्य जी आये। राजा
जनक ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य जी ! आपका आगमन किस निमित्त हुआ है ? आप पशुओं की इच्छा से पधारे
हैं या सूक्ष्म प्रश्नों की इच्छा से ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- राजन् ! मैं दोनों प्रयोजनों से यहाँ आया हूँ॥ १॥
यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्रवीद्वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किꣳ
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य
वागेव सम्राडिति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदः
सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि
व्याख्यानानीष्टꣳ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव
सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभꣳ सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २ ॥
याज्ञवल्क्य जी ने कहा- हे राजन् ! आप से किसी विद्वान् ने ब्रह्म के विषय में जो कुछ कहा हो, वह
सब हम श्रवण करने के लिए आये हैं। विदेहराज जनक ने कहा- शैलिनि (शिलिन के पुत्र) जित्वा ने
वाक् को ही ब्रह्म कहा है। याज्ञवल्क्य बोले- जिस प्रकार कोई, माता-पिता और गुरु के द्वारा शिक्षित
होकर कहता है, उसी प्रकार उस जित्वा ने वाक् ही ब्रह्म है- ऐसा कहा है; क्योंकि जो वाक् रहित है
(गूँगा है), क्या उसे ब्रह्म का कोई लाभ प्राप्त हो सकता है ? क्या उस जित्वा ने आपको वाक् का आश्रय
स्थल और उसकी प्रतिष्ठा भी बताई है, जनक ने कहा- नहीं, मुझे तो इस विषय में नहीं बताया।
याज्ञवल्क्य जी बोले- यह उपदेश एक पादीय अथवा अपूर्ण है। जनक ने कहा- तो उसके विषय में सम्यक्
रूप से आप ही हमें बताएँ। याज्ञवल्क्य जी ने कहा- वाक् (वाणी) ही उस ब्रह्म का आयतन अर्थात् शरीर
है और आकाश ही उसकी प्रतिष्ठा है। प्रज्ञा समझ कर उसकी ही उपासना करनी चाहिए। जनक जी ने
पूछा- प्रज्ञता (प्रज्ञा) क्या है ? ऋषि बोले वाक् ही प्रज्ञता (प्रज्ञा) है। हे राजन् ! वाक् शक्ति के द्वारा ही
बन्धु- बान्धवों का ज्ञान होता है तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान होता है। उसी वाक्
के माध्यम से इतिहास, पुराण, उपनिषद्, विद्या, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, यज्ञकर्म, हुत, अशित
(भूखे व्यक्ति को भोजन कराने के धर्म), पायित (प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाने के धर्म), इहलोक,

३०४ बृहदारण्यकोपनिषद्
परलोक और समस्त भूतों का ज्ञान होता है। हे सम्राट् ! वस्तुतः वाक् ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानते हैं, उन
विद्वानों का यह वाक् परित्याग नहीं करती। ऐसे विद्वान् पुरुष को सभी प्राणी उपहार प्रदान करते हैं। वह
स्वयं देवता बनकर देवों के बीच निवास करता है। यह सुनकर विदेहराज जनक ने कहा- इस ज्ञान के
निमित्त (दक्षिणा स्वरूप) मैं आपको ऐसी सहस्त्र गौएँ प्रदान करता हूँ, जिनसे हाथी के समान विशाल बैल
उत्पन्न हों। ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे पिता ऐसा मानते थे कि शिष्य (अथवा जिज्ञासु) को पूर्ण शिक्षण
(ज्ञान) दिये बिना दक्षिणा के रूप में उसका धन ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥ २ ॥
[ शिष्य जब वाञ्छित विद्या प्राप्त करके तुष्ट हो जाता था, तब वह स्वयं गुरु से गुरु-दक्षिणा लेने का आग्रह
करता था। गुरु भी अपना दायित्व पूर्ण हुए बिना दान स्वीकार नहीं करते थे।]
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्म उदङ्कः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत्प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किँ
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्युपासीत का प्रियता
याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं
याजयत्यप्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशङ्कं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट्
कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ३॥
याज्ञवल्क्य ने कहा- आपसे किसी भी विद्वान् ने ब्रह्म के विषय में जो भी कुछ कहा हो, वह हमसे
कहिए। विदेहराज जनक ने कहा- शुल्बपुत्र उदङ्क ने मुझसे ब्रह्म के विषय में यह कहा है कि प्राण ही ब्रह्म
है। (याज्ञवल्क्य ने कहा-) जिस प्रकार कोई माता-पिता और गुरु के द्वारा शिक्षित होकर कहता है, उसी
प्रकार उदङ्क ने प्राण ही ब्रह्म है- ऐसा कहा है; क्योंकि प्राण के बिना कुछ भी कर सकना सम्भव नहीं है।
याज्ञवल्क्य ने कहा- क्या उन्होंने (शौल्बायन ने) प्राण के आयतन और आश्रय स्थल के विषय में भी
बताया है ? राजा जनक ने कहा- इस सन्दर्भ में उन्होंने कुछ नहीं बताया, तब याज्ञवल्क्य बोले- यह तो एक
पैर वाला अथवा अपूर्ण शिक्षण हुआ। राजा जनक ने कहा- तो फिर आप ही उस ज्ञान को सम्यक् रूप से
कहें। याज्ञवल्क्य बोले- प्राण का शरीर प्राण ही है, आकाश उसकी प्रतिष्ठा है। प्राण को प्रिय मानकर ही
उसकी उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- यह प्रियता किसे कहते हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा- प्राण की
कामना (प्रियता) से ही यजन न करने योग्य से यज्ञ कराया जाता है। दान न लेने योग्य से भी दान प्राप्त
किया जाता है तथा इसी की प्रियता के कारण जिस दिशा में भी गमन करते हैं, उसी में मृत्यु का भय या
उसकी आशंका प्रतीत होती है। हे राजन् ! ये सब प्राण के निमित्त ही होता है। अतः हे सम्राट् ! प्राण ही ब्रह्म
है, ऐसा जानकर कार्य करने वाले का प्राण कभी परित्याग नहीं करता। समस्त भूत उसे उपहार प्रदान
करते हैं। वह व्यक्ति देवता होकर उन्हीं के मध्य विराजता है। विदेहराज जनक ने कहा- ऋषिवर !
हाथी के आकार वाले बैलों को प्रदान करने वाली सहस्र गौएँ मैं आपको दक्षिणा रूप में प्रदान करता
हूँ। ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे पिताश्री की यह धारणा थी कि बिना पूर्ण ज्ञान दिये शिष्य से दक्षिणा
ग्रहण नहीं करनी चाहिए ॥ ३ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र ५ ३०५

अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र ५ ३०५
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्कुर्वाष्ण॑श्चक्षुर्वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किं
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य
चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति
तत्सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४॥
याज्ञवल्क्य ने पुनः राजा जनक से कहा- आप किसी आचार्य द्वारा प्राप्त किये गये ज्ञान से हमें भी
अवगत कराएँ। जनक ने कहा- मुझसे बर्कु वार्ष्णि (कृष्ण पुत्र) ने कहा कि चक्षु ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य
बोले- माता-पिता और आचार्य से शिक्षित हुए के समान ही उन वार्ष्णि ने चक्षु को ब्रह्म कहा है, क्योंकि
चक्षु के बिना कुछ देख सकना असम्भव है; किन्तु क्या उन्होंने आपको चक्षु के आयतन और आश्रय
(प्रतिष्ठा) के विषय में भी कुछ बताया है? जनक ने कहा कि इसके विषय में तो उन्होंने कुछ नहीं बताया।
यह तो एक पाद वाला अथवा अपूर्ण शिक्षण हुआ। राजा जनक ने कहा-तो आप ही इस संदर्भ में हमें बताएँ।
याज्ञवल्क्य ने कहा- चक्षु का आयतन (शरीर) चक्षु ही है तथा आकाश ही उसकी प्रतिष्ठा है। चक्षु को सत्य
मानकर उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- सत्यता किसे कहते हैं? ऋषि ने कहा- हे राजन् ! चक्षु ही
स्वयं सत्यता है; क्योंकि चक्षु से (दर्शन करने वाले से) जब पूछा जाता है कि क्या आपने (अमुक दृश्य)
देखा है ? तब वह उत्तर देता है- हाँ मैंने देखा है, तो वह सत्य ही होता है। हे सम्राट् ! चक्षु ही परब्रह्म है, जो
ऐसा जानता है, चक्षु (स्थूल-सूक्ष्म दृष्टि) उसका कभी परित्याग नहीं करते और समस्त प्राणी भी उसके
अनुगत रहते हैं। वह देव बनकर देवलोक में निवास करता है। तब विदेहराज जनक ने कहा- मैं आपको
हाथी के तुल्य हृष्ट-पुष्ट बैल प्रदान करने वाली एक हजार गौएँ प्रदान करता हूँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे
पिताश्री की मान्यता थी कि पूर्ण ज्ञान दिये बिना शिष्य से दक्षिणा ग्रहण नहीं करनी चाहिए ॥ ४ ॥
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति
यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि
किं स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै
नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता
याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद्वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या
अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्रः श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनः श्रोत्रं
जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते
हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत
नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥

३०६ बृहदारण्यकोपनिषद्
ऋषि याज्ञवल्क्य, महाराज जनक से बोले- किसी भी आचार्य ने (ब्रह्म के विषय में) आपसे जो कुछ
भी कहा हो वह आप हमें बताने का कष्ट करें। जनक बोले- भारद्वाज गोत्रीय गर्दभी (विपीत) ने मुझे
बताया था कि श्रोत्र ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य ने कहा- जिस प्रकार कोई माता-पिता और गुरु द्वारा प्रशिक्षित
होकर कहता है, उसी प्रकार गर्दभी विपीत ने भी श्रोत्र ही ब्रह्म है, ऐसा कह दिया है, क्योंकि श्रोत्र के बिना
सुन सकना संभव नहीं है। क्या उन (गर्दभी विपीत) ने उस श्रोत्र के शरीर और प्रतिष्ठा (आश्रय) के
विषय में भी कुछ बताया है ? जनक ने कहा- नहीं। याज्ञवल्क्य बोले- यह ज्ञान एक पद वाला अर्थात्
अधूरा है। राजा ने कहा- तो फिर आप ही उसके विषय में मुझे बताएँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- श्रोत्र ही, श्रोत्र
की देह है और आकाश ही उसकी प्रतिष्ठा अर्थात् आश्रय है। इस श्रोत्र की उपासना इसे अनन्तरूप मानकर
करनी चाहिए। जनक ने पूछा- अनन्तता क्या है। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि दिशाएँ ही अनन्त हैं, क्योंकि
किसी भी दिशा में गमन करने पर उसका अन्त नहीं मिलता। हे सम्राट् ! दिशाओं को ही श्रोत्र मानना
चाहिए और श्रोत्र ही ब्रह्म है। जो ज्ञानी इस प्रकार जानता हुआ व्यवहार करता है, श्रोत्र उसका कभी
परित्याग नहीं करते। सभी प्राणी उसका अनुसरण करते हैं और वह (ज्ञानी) देवता बनकर देवलोक में
वास करता है। जनक बोले- हे ऋषिवर! मैं हाथी जैसे हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करने वाली सहस्र गौएँ आपको
प्रदान करता हूँ। याज्ञवल्क्य जी ने कहा- मेरे पिताजी ऐसा मानते थे कि शिष्य को पूर्ण ज्ञान दिये बिना
दक्षिणा का धन ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥ ५ ॥
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति
यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किँ
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता
याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः
पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति
देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभ सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ६ ॥
याज्ञवल्क्य पुनः बोले- हे जनक ! आपको किसी आचार्य ने ब्रह्म सम्बन्धी जो भी ज्ञान दिया हो, वह
आप मुझसे कहें। विदेहराज जनक बोले- सत्यकाम जाबाल ने मुझसे कहा था कि मन ही ब्रह्म है।
याज्ञवल्क्य बोले कि यह तो उन्होंने माता-पिता और गुरु द्वारा प्रशिक्षित की तरह कह दिया, क्योंकि मन
के बिना कुछ भी करना असम्भव है। क्या उन्होंने मन के आश्रय और प्रतिष्ठा के विषय में भी वर्णन किया
है ? जनक बोले- नहीं। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे राजन् ! उन्होंने यह तो अपूर्ण ज्ञान ही दिया है। जनक ने
कहा- तो फिर आप ही उसके विषय में पूर्णरूपेण बताएँ। याज्ञवल्क्य बोले- मन का शरीर मन ही है और
आकाश उसका आश्रय है। मन को आनन्द मानकर उसकी उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- कि
यह आनन्दत्व क्या है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- राजन् ! मन ही आनन्द है। मन से ही स्त्री की कामना की

अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र ७ ३०७

अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र ७ ३०७
जाती है और उससे अपने अनुरूप पुत्र की प्राप्ति होती है, वह पुत्र ही आनन्द है। हे सम्राट् ! मन ही ब्रह्म
है। जो ज्ञानी मन को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता है, मन उसका कभी परित्याग नहीं करता।
समस्त प्राणी उसके अनुकूल हो जाते हैं। वह देवस्वरूप होकर देवताओं के मध्य निवास करता है।
विदेहराज जनक ने कहा कि आपके निमित्त मैं हाथी के आकार वाले बैलों को उत्पन्न करने वाली एक
हजार गौएँ प्रदान करता हूँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे पिता जी का ऐसा मत था कि बिना पूर्ण शिक्षा दिये
दक्षिणा की राशि ग्रहण नहीं करनी चाहिए ॥ ६ ॥
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छाकल्योऽब्रवीद्धृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य हि किः
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता
याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनः हृदयं वै
सम्राट् सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति
हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्मं नैनः हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवा भूत्वा
देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स
होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ७ ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा- आपको किसी भी आचार्य ने जो ( ब्रह्म विषयक ) ज्ञान दिया हो, वह हमें
भी बताएँ। विदेहराज जनक ने कहा- विदग्ध शाकल्य ने हृदय को ही ब्रह्म बताया है। याज्ञवल्क्य
बोले कि माता-पिता और गुरु द्वारा प्रशिक्षित हुए के समान ही उन्होंने हृदय को ब्रह्म कहा है,
क्योंकि हृदय हीन व्यक्ति कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं है। क्या उन्होंने हृदय का शरीर और
आश्रय स्थल भी बताया है ? जनक ने कहा- इसके विषय में उन्होंने नहीं बताया। तब याज्ञवल्क्य
ने कहा- यह तो अपूर्ण शिक्षा हुई। जनक बोले- तब आप ही पूर्ण ज्ञान प्रदान कीजिए। याज्ञवल्क्य
ने कहा- हृदय का शरीर हृदय ही है और आकाश उसकी प्रतिष्ठा अर्थात् आश्रय स्थल है। स्थिति
मानकर हृदय की उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- स्थितता क्या है ? याज्ञवल्क्य ने कहा-
हृदय ही स्थितता है। हृदय ही समस्त प्राणियों की प्रतिष्ठा (आश्रय) है, समस्त प्राणी हृदय में ही
प्रतिष्ठित होते हैं। जो ज्ञानी हृदय को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता है, हृदय कभी उसका
परित्याग नहीं करता। समस्त जीव उसके अनुगत रहते हैं और वह देवता बनकर देवताओं के मध्य
निवास करता है। महाराज जनक ने कहा- हाथी के समान आकार और बल वाले बैलों को पैदा
करने वाली एक सहस्र गौएँ मैं आपको प्रदान करता हूँ। याज्ञवल्क्य बोले- शिष्य को ज्ञान से
पूर्णरूपेण कृतार्थ किये बिना ही दक्षिणा का धन स्वीकार नहीं करना चाहिए, ऐसा मेरे पिताजी का
विचार था ॥ ७ ॥

॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥

३०८ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स
होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवंमेवैताभिरुपनिषद्भिः
समाहितात्मास्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व
गमिष्यसीति नाहं तद्भगवन्वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति
ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् महाराजा जनक अपने कूर्च (अपने विशिष्ट आसन) से उठकर खड़े हो गये और बोले-
हे याज्ञवल्क्य ! आपको नमन है। आप मुझे उपदेश प्रदान करें। याज्ञवल्क्य बोले - हे राजन् ! जिस प्रकार
दूर की यात्रा करने के लिए नौका अथवा रथ का आश्रय लिया जाता है, उसी प्रकार (उपनिषदों का सहारा
लेकर) आप समाहित आत्मा हो गये हैं। आपने पूज्य श्रीमन्त होकर वेदों का अध्ययन किया है, उपनिषदों
का भी श्रवण किया है। यहाँ से गमन करके अब आप कहाँ पहुँचेंगे ? जनक ने कहा- यह मुझे ज्ञात नहीं।
याज्ञवल्क्य ने कहा- आप जहाँ पहुँचेंगे, वह गन्तव्य मैं निश्चित रूप से आपको बताऊँगा। जनक ने कहा,
ठीक है- बताने का अनुग्रह करें ॥ १ ॥
इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तं वा एतमिन्धꣳ सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते
परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥
(याज्ञवल्क्य ने कहा- सुनिये) दक्षिण नेत्र में जो पुरुष स्थित है, उसका नाम 'इन्ध' है। इसी 'इन्ध'
को परोक्ष रूप से 'इन्द्र' कहते हैं। देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं, वे प्रत्यक्ष के प्रति द्वेष भाव रखते हैं ॥ २ ॥
[ देव शक्तियाँ सूक्ष्म प्राण-प्रवाह रूप हैं, उन्हें परोक्ष रूप से ही अनुभव किया जा सकता है। आँख या कान
प्रत्यक्ष रूप में देखने-सुनने वाले दिखते हैं; किन्तु देखने-सुनने की क्षमता रूप देव शक्तियाँ परोक्ष ही हैं। इसीलिए
देवों को परोक्ष प्रिय कहा गया है।]
अथैतद्वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सꣳस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय
आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डोऽथैनयोरेतत्प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये
जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः संचरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा
भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतदास्रवदास्रवति
तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥
बायें नेत्र में स्थित पुरुष वस्तुतः इन्द्र की पत्नी विराट् है। इन दोनों का मिलने का केन्द्र यही हृदयाकाश
है। हृदयान्तर्गत स्थित लाल पिण्ड ही इन दोनों का अन्न है। हृदयान्तर्गत स्थित जल ही इन दोनों का आवरण
वस्त्र है। हृदय के ऊपर जाने वाली नाड़ी ही इनके संचरण करने का मार्ग है। बाल के हजारवें हिस्से
जितनी सूक्ष्म-हिता नाम की नाड़ियाँ हैं, जो हृदय के अन्दर स्थित हैं। इन्हीं नाड़ियों के द्वारा प्रवाहित हुआ
अन्न सम्पूर्ण शरीर में पहुँचता है। इसी कारण यह सूक्ष्म देह, सूक्ष्म आहार ग्रहण करने वाला होता है ॥ ३ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २ ३०९

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २ ३०९
[ दायें और बायें नेत्रों के पति-पत्नी जैसा ऋषि का यह कथन रहस्यात्मक है। वर्तमान विज्ञान इस सन्दर्भ में अभी
सीमित ज्ञान ही प्राप्त कर सका है। दोनों आँखों में सन्निहित शक्तियों को पुरुष ही कहा गया है, लेकिन वे पति-पत्नी की
तरह परस्पर पूरक हैं। एक को अर्धाङ्ग ही कहा जा सकता है। नेत्र विज्ञान के डॉक्टर यह बताते हैं कि दोनों आँखों के बीच
एक कोमल संवेदनात्मक रिश्ता है। यदि किसी कारण एक आँख की नर्वस् में खराबी आ जाये, तो उसके प्रति संवेदना
के नाते दूसरी ओर भी कमजोरी आने लगती है। डॉक्टर इसे आफ्थैल्मिक सिम्पैथी कहते हैं।]
तस्य प्राची दिक् प्राञ्चःप्राणा दक्षिणा दिग्दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः
प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः सर्वा
दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि
सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स
होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे
नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४॥
उस विद्वान् पुरुष के लिए पूर्व दिशा-पूर्व प्राण, दक्षिण दिशा-दक्षिण प्राण, पश्चिम दिशा-पश्चिम
प्राण, उत्तर दिशा- उत्तर प्राण, ऊर्ध्व दिशा - ऊपरी प्राण, नीचे की दिशा- निचला प्राण है एवं समस्त
दिशाएँ - सम्पूर्ण प्राण हैं। वह आत्मा नेति-नेति रूप से वर्णित है, वह ग्रहण न किए जाने के कारण
'अग्राह्य' है, वह नष्ट न होने के कारण अशीर्य है, वह असङ्ग भी है तथा बन्धन रहित भी। वह कभी
व्यथित नहीं होता। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे जनक! आप निश्चित ही अभय हो गये हैं। जनक ने कहा- हे
याज्ञवल्क्य! आपने मुझे अभय ब्रह्म का ज्ञान कराया है, अतः आप भी अभय हों, आपको नमस्कार है, यह
विदेहदेश और मैं (जनक) आपके अनुगामी हैं। ॥ ४॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
जनकः ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो
याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तꣳ
हास्मै ददौ तꣳ सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १॥
महर्षि याज्ञवल्क्य विदेहराज जनक के पास गये। उन्होंने विचार किया कि वहाँ मैं कुछ न बोलूँगा; परन्तु पूर्व
में एक बार जनक और याज्ञवल्क्य का अग्निहोत्र के विषय में वार्तालाप हुआ था, तब याज्ञवल्क्य ने जनक को
इच्छानुसार प्रश्न करने का वरदान दिया था। अतः इस बार राजा जनक ने ही उनसे प्रश्न प्रारम्भ किया ॥ १॥
याज्ञवल्क्य किंज्योतिरयं पुरुष इति आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं
ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २॥
विदेहराज जनक ने प्रश्न किया हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योति से युक्त है।
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- हे राजन्! यह पुरुष आदित्य रूप ज्योति से सम्पन्न है। यह पुरुष आदित्य
ज्योति से ही प्रतिष्ठित होता है, उसी से चतुर्दिक् जाता है, कर्म सम्पादित करता है और उसी से
वापस लौट आता है। जनक ने कहा- हाँ, यह उचित है ॥ २॥

३१० बृहदारण्यकोपनिषद्

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य
ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येव-
मेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥
इसके उपरान्त जनक ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! सूर्यास्त हो जाने पर यह पुरुष किस ज्योति से
युक्त होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि उस समय यह पुरुष चन्द्रमा की ज्योति से सम्पन्न होता है। वह
चन्द्रमा की ज्योति से स्थित होता, आता-जाता, कर्म करता और उसी से वापस लौट आता है। जनक ने
कहा- हाँ, यह भी यथार्थ है ॥ ३ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य
ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥
जनक ने पुनः प्रश्न पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य और चन्द्र दोनों अस्त हो जाते हैं, तब यह पुरुष
किस ज्योति से सम्पन्न होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- उस समय यह अग्नि की ज्योति से सम्पन्न होता
है। यह उसी (अग्नि) की ज्योति से बैठता, गमन करता, कर्म करता और वापस भी लौट आता है। जनक
इसे स्वीकारते हुए बोले- हे याज्ञवल्क्य ! वस्तुतः यही सत्य है ॥ ४ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किंज्योतिरेवायं पुरुष
इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति
तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतैऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र
न्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥
जनक ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य और चन्द्र अस्त हो जाते हैं तथा अग्नि भी शान्त हो
जाती है, तब यह पुरुष किस ज्योति से सम्पन्न होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- तब यह वाक् रूपी
ज्योति से सम्पन्न होता है। उसी से बैठता, गमन करता, कर्म सम्पादन करता और उसी से वापस लौट आता
है। हे राजन् ! जहाँ अँधेरे में हाथ भी दृष्टिगोचर नहीं होता, वहाँ वाणी का उच्चारण सुनते ही यह पहुँच
सकता है। जनक ने कहा- हे महात्मन् ! यह तथ्य भी उचित है ॥ ५ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि
किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म
कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥
जनक ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य, चन्द्र अस्त हो जाते हैं, अग्नि और वाक् भी शान्त हो जाती
है, तब इस पुरुष की कौन सी ज्योति होती है। याज्ञवल्क्य ने कहा- तब यह पुरुष आत्मज्योति से सम्पन्न
होता है। यह उसी के द्वारा बैठता, आता-जाता, कर्म सम्पन्न करता और फिर वापस भी लौट आता है ॥ ६ ॥
कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः
सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोक-
मतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र १२ ३११

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र १२ ३११
जनक ने प्रश्न किया- यह आत्मा कौन है ? उन्होंने उत्तर दिया- प्राणों में चित्तवृत्तियों के भीतर स्थित,
विज्ञानमय ज्योति पुरुष है, वही समान रूप से दोनों लोकों (इहलोक और परलोक) में संचरित होता है।
वह मानो चिन्तन और चेष्टा करता हो। वह पुरुष (आत्मा) स्वप्न के रूप में इहलोक (देह और इन्द्रियों के
समुच्चय) का अतिक्रमण करता है और मृत्यु के रूपों का भी उल्लंघन करता है ॥ ७ ॥
स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसंपद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन्
म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥
यह पुरुष जब जन्म लेता है, तब देह के साथ आत्मभाव को प्राप्त होकर पापों से युक्त हो जाता है;
किन्तु जब मृत्यु के उपरान्त ऊर्ध्वगमन करता है, तब पापों को परित्यक्त कर देता है ॥ ८ ॥
तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं
स्वप्नस्थानं तस्मिन्सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं च। अथ
यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दांश्च पश्यति
स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन
भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥
इस पुरुष के इहलोक और परलोक ये दो ही स्थान हैं। स्वप्न लोक इन दोनों के बीच का लोक है।
इस मध्यवर्ती स्थान में रहकर पुरुष इहलोक और परलोक का दर्शन करता रहता है। परलोक में निवास
करते समय वह पाप और आनन्द दोनों का दर्शन करता है। जब वह शयन करता है, तब अपनी सांसारिक
भावनाओं के बनते-बिगड़ते रहने से अपने ही तेजः स्वरूप और ज्योतिः स्वरूप के कारण स्वप्न देखता है॥
न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान्रथयोगान्पथः सृजते न तत्रानन्दा
मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो
भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥
उस अवस्था (स्वप्नावस्था) में न रथ होता है, न उनमें जोते जानेवाले अश्व होते हैं और न ही पथ
होता है, परन्तु वह (पुरुष) स्वयं ही इन सबको निर्मित कर लेता है। इसी प्रकार उस स्थिति में आनन्द,
मोद और प्रमोद भी नहीं होते, किन्तु वह उन्हें भी उत्पन्न कर लेता है। वहाँ कुण्ड, सरोवर और नदियाँ भी
नहीं होतीं, किन्तु वह उनका भी निर्माण कर लेता है। वस्तुतः वही उन सबका कर्ता है ॥ १० ॥
तदेते श्लोका भवन्ति। स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्याऽसुप्तः सुप्तानभिचाकशीति।
शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥
ये श्लोक इस सन्दर्भ में है- स्वप्न की स्थिति में शरीर को निश्चेष्ट करके यह आत्मा स्वयं शयन नहीं
करता, वरन् समस्त प्रसुप्त पदार्थों को जाग्रत् करता है अर्थात् उन्हें देखता है। वह हिरण्मय पुरुष एकाकी
ही अपने तेज के साथ पुनः जाग्रत् स्थिति को प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा। स ईयतेऽमृतो यत्र कामं
हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥

३१२ बृहदारण्यकोपनिषद्
वह अनश्वर और हिरण्मय पुरुष अपने शरीररूपी घोंसले की रक्षा करता हुआ, इस शरीर को परित्यक्त
करके बहिर्गमन करता है। वह अमृत पुरुष जहाँ कामना (वासना) होती है, वहीं चला जाता है ॥ १२ ॥
स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो
जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥
वह दिव्य गुण सम्पन्न पुरुष स्वप्न की अवस्था में उच्च-नीच विभिन्न भावों को प्राप्त होकर अनेक रूपों
का निर्माण कर लेता है। वह कभी नारियों के साथ मोद मनाता, कभी मित्रों के साथ आनन्दित होता और
कभी भय उत्पन्न करने वाले दृश्य देखता है ॥ १३ ॥
आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति तं नायतं बोधयेदित्याहुः ।
दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि
ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं
ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४॥
सभी इस पुरुष के विश्राम स्थल (शरीर) को ही देखते हैं। उसके (वास्तविक स्वरूप) को कोई नहीं
देखता। उस प्रसुप्त पुरुष को अचानक नहीं जगाना चाहिए, ऐसा (वैद्य लोगों का) मत है, क्योंकि एकदम जगाने से
विभिन्न इन्द्रियों में उसकी चेतना न पहुँचने से फिर चिकित्सा करना कठिन हो जाता है। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि
यह स्वप्नावस्था जाग्रत् स्थिति ही है, क्योंकि जो पुरुष (आत्मा) स्वप्नावस्था में देखता है, वही जाग्रत् अवस्था में भी
देखता है, इस स्थिति में यह पुरुष स्वयं प्रकाशपुञ्ज होता है। (यह सुनकर) जनक बोले- मैं आपके निमित्त एक
हजार मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। हे भगवन्! अब मोक्ष सम्बन्धी उपदेश प्रदान करें ॥ १४ ॥
स वा एष एतस्मिन्संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष
इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥
(याज्ञवल्क्य बोले-) यह जीव सुषुप्तावस्था में (प्रगाढ़ निद्रा की स्थिति में) अनेक प्रकार से विचरण
करते हुए पाप और पुण्यों का दर्शन करता है। (अर्थात् भले- बुरे दृश्य देखता है)। इसके उपरान्त वह
जिस योनि से गया था, उसी योनि अर्थात् स्वप्नावस्था में ही लौट आता है। फिर भी वह पुरुष सबसे
अनासक्त ही रहता है क्योंकि वह पुरुष स्वतः असङ्ग है। जनक ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! यह तथ्य यथार्थ
है। मैं आपको सहस्र मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। आप मेरे लिए मोक्ष विषयक उपदेश करें ॥ १५ ॥
स वा एष एतस्मिन्स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष
इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥
यह पुरुष जब स्वप्न की स्थिति में होता है, तब वहाँ विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं में विचरण करता
हुआ, अनेक प्रकार के पाप-पुण्यों के दृश्य देखता हुआ लौट जाता है, जहाँ से वह आया था अर्थात् फिर
से जाग्रत् स्थिति में आ जाता है; किन्तु वह उस सबसे अलिप्त ही रहता है, जो कुछ उसने वहाँ देखा था।

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २१ ३१३

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २१ ३१३
फिर भी वह पुरुष अनासक्त ही रहता है, इसका कारण यह है कि पुरुष वस्तुतः असङ्ग ही होता है। (यह
सुनकर) जनक बोले- हाँ भगवन्! यह यथार्थ है। मैं आपको सहस्र मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। आप (आगे
भी) मोक्ष सम्बन्धी उपदेश ही कीजिए ॥ १६ ॥
स वा एष एतस्मिन्बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥
यह आत्मा जाग्रत् स्थिति में विचरण करते हुए, विभिन्न पाप-पुण्यों का दर्शन करते हुए, पुनः वहीं
स्वप्नावस्था में पहुँच जाता है ॥ १७ ॥
तद्यथा महामत्स्य उभे कूलेऽनुसंचरति पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्ता-
वनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥
जिस प्रकार कोई महामत्स्य (बड़ा मगरमच्छ) नदी के पूर्वापर (इस और उस) किनारों पर आता जाता
रहता है, ठीक उसी प्रकार यह पुरुष भी स्वप्न और जाग्रतावस्था में क्रमशः आवागमन करता रहता है॥ १८ ॥
तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः संहृत्य पक्षौ संलयायैव
ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न
कंचन स्वप्नं पश्यति ॥ १९ ॥
जिस प्रकार आकाश में श्येन (बाज) अथवा सुपर्ण पक्षी चतुर्दिक उड़ता हुआ थक जाता है
और पंखों को सिकोड़कर अपने घोंसलों की ओर गमन करता है, उसी प्रकार यह पुरुष इस स्थान
(सुषुप्ति) की ओर दौड़ता है जहाँ शयन करने पर, न तो उसे किसी भोग की कामना रहती है और
न ही स्वप्न दिखाई पड़ता है ॥ १९ ॥
ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति
शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव
हस्तीव विच्छादयति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र
देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥
उस पुरुष की हिता नामक नाड़ियाँ इतनी सूक्ष्म होती हैं, जितना एक बाल का हजारवाँ भाग। ये
(नाड़ियाँ) श्वेत, पीली, नीली, हरी और लाल रंग वाली होती हैं। वह पुरुष स्वप्नावस्था में जब जाग्रतावस्था
के समान ही भयानक दृश्य देखता है कि मुझे कोई मार रहा है, अपने वश में कर रहा है, हाथी खदेड़ रहा
है अथवा मैं गड्ढे में गिर रहा हूँ, तो वह अज्ञान के कारण इन्हें यथार्थ मान लेता है और दुःखी होता है;
किन्तु जब वह यह मानता है कि मैं ही देवता हूँ, राजा हूँ अथवा सब कुछ मैं ही हूँ, तब उस समय वह
अपने को आनन्द लोक में अनुभव करता है, (अथवा वही उसका आनन्द होता है) ॥ २० ॥
तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो
न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद
नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥

३१४ बृहदारण्यकापानषद
सुषुप्तावस्था में अवस्थित उस पुरुष का रूप कामरहित, पापरहित और भयरहित होता है। जिस प्रकार
अपनी निज की पत्नी का आलिङ्गन करने वाला पुरुष (पूर्णतया आत्मविभोर होने के कारण) बाहर और
भीतर की सभी प्रकार की जानकारियों से अनभिज्ञ रहता है, उसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञ आत्मा से एकीकृत
होकर बाह्य और आभ्यान्तर विषयों से अनभिज्ञ रहता है अर्थात् उसे कोई चिन्ता नहीं सताती। उस पुरुष का
यह स्वरूप निश्चित ही आप्तकाम, आत्मकाम, निष्काम तथा शोक रहित होता है ॥ २१ ॥
अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदा अत्र
स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः
श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा
सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥
सुषुप्तावस्था में पिता अपिता, माता अमाता, लोक अलोक, देव अदेव, वेद अवेद, चोर अचोर,
भ्रूणघाती अभ्रूणघाती, चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस (क्षत्रिय स्त्री और शूद्र पुरुष से उत्पन्न पुरुष)
अपौल्कस, संन्यासी (श्रमण) असंन्यासी, तपस्वी अतपस्वी हो जाते हैं। तब वह पुरुष समस्त पुण्यों और
पापों से अनासक्त रहता है, क्योंकि उस समय वह हृदय के सम्पूर्ण शोकों को पार कर चुका होता है ॥ २२ ॥
यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न
तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत् पश्येत् ॥ २३ ॥
उस स्थिति में वह देखते हुए भी नहीं देखता। अमरत्व प्राप्त होने के कारण उसकी दृष्टि कभी विलुप्त
नहीं होती। उस अवस्था में उस (पुरुष) के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता, जिसे वह देख सके ॥ २३ ॥
यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविना-
शित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥
उस समय सूँघने की शक्ति होते हुए भी वह नहीं सूँघता। उसकी घ्राण शक्ति कभी समाप्त नहीं होती,
क्योंकि वह अनश्वर होता है। उस अवस्था में वह क्या सूँघे ? क्योंकि उससे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है ॥
यद्वै तन्न रसयते रसयन्वै तन्न रसयते नहि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥
वह रस ग्रहण करने में समर्थ होने पर भी रस ग्रहण नहीं करता। उसकी रस ग्रहण करने की सामर्थ्य
का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अमर्त्य है। उस स्थिति में उससे भिन्न अन्य कोई पदार्थ भी तो नहीं
है, जिसका वह रसपान करे ॥ २५ ॥
यद्वै तन्न वदति वदन्वै तन्न वदति न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न
तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥
वाक्शक्ति सम्पन्न होते हुए भी वह बोलता नहीं। उसकी वाक्शक्ति का कभी विनाश नहीं होता,
क्योंकि वह शाश्वत है। उससे अन्य कुछ और भी तो नहीं है, जिसके संदर्भ में वह बोले ॥ २६ ॥
यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन्वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७॥
वह श्रवण शक्ति से युक्त होने पर भी नहीं सुनता। अमर्त्य होने के कारण उसकी श्रवण शक्ति का
कभी विनाश नहीं होता। उससे भिन्न जब कुछ भी नहीं है, तो वह क्या सुने ? ॥ २७ ॥