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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१

शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१
में तथा महः स्वरूप ब्रह्म में अधिष्ठित होता है। (ब्रह्मवेत्ता साधक) अपने राज्य में अधिष्ठित होता है, वह सम्पूर्ण मन
का स्वामी, वाणी, नेत्रों, कर्णों और विज्ञान का स्वामी हो जाता है। पूर्वोक्त साधन का यह फल मिलता है। वह ब्रह्म
आकाश के सदृश विशाल है। वह सत्यरूप आत्म तत्त्व है, वह प्राणों को विश्राम देने वाला, मन को आनन्द देने वाला,
शान्त और अमृत स्वरूप है। वही सर्वथा पुरातन पुरुष उपासना के योग्य है॥ १-२॥
[ इन्द्र शासक-संगठक के प्रतीक हैं। मनुष्य शरीर में स्थित देवता स्वरूप प्राण धाराओं को नियमित करने
की सामर्थ्य सहस्रार एवं ब्रह्मरन्ध्र में सन्निहित होने से उसे इन्द्र योनि कहा गया है।]
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
इस अनुवाक में ऋषि ने पाँच-पाँच तत्त्वों की विभिन्न पंक्तियों-शृंखलाओं का उल्लेख किया है और उन्हें एक
दूसरे का पूरक कहा है-
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप
ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान
उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसः स्नावास्थिमज्जा। एतदधि-
विधाय ऋषिरवोचत्। पाङ्क्तं वा इदं सर्वम्। पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तः स्पृणोतीति॥ १॥
पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ तथा अवान्तर दिशाएँ (दिशाओं के बीच के कोण) यह लोकों की
पंक्ति है। अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा तथा समस्त नक्षत्र (यह ज्योति श्रृंखला में है)। जल, ओषधियाँ,
वनस्पतियाँ, आकाश तथा आत्मा (यह काया से सम्बद्ध है), यह आधिभौतिक वर्णन हुआ। अब आध्यात्मिक
वर्णन करते हैं- प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान (यह प्राण समूह है)। चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी तथा
त्वचा (यह करणों-इन्द्रियों की पंक्ति है)। चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा (यह शरीर के धातु समूह में
है)। यह परिपूर्ण कल्पना करते हुए ऋषि ने कहा है- यह सब पंक्तियों का समूह है। पंक्तियों से ही
पंक्तियों की पूर्ति होती है॥ १॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्या-
श्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओऽशोमिति शस्त्राणि शःसन्ति। ओमित्यध्वर्युः
प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति
ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति। ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥
ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत् की) अनुकृति है। हे आचार्य!
ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके सामगायक सामगान करते हैं।
ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता
है। ॐ कहकर अग्निहोत्र आरम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ब्रह्म को प्राप्त
करने की बात कहता है। ॐ के द्वारा वह ब्रह्म को प्राप्त करता है॥ १॥
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने
च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने

२०२ तैत्तिरीयोपनिषद्
च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च
स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च
स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥ ९ ॥
सत्य आचरण, सत्यवाणी के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। तपश्चर्या,
इन्द्रियों के दमन, मन के निग्रह के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। प्रजा उत्पत्ति,
प्रजनन, प्रजा-वृद्धि के कर्म के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। रथीतर के पुत्र
सत्यवचा ऋषि कहते हैं- सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है। पुरुशिष्ट के पुत्र तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं-तप
ही सर्वोत्तम है। मुद्गल के पुत्र नाक मुनि कहते हैं- शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन ही सर्वश्रेष्ठ
है, क्योंकि वही तप है, वही तप है ॥ ९॥
[ यहाँ ऋषि ने मनुष्य के लिए स्वाध्याय की अनिवार्यता प्रकट की है।]
॥ दशमोऽनुवाकः ॥
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि।
द्रविणः सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्॥ १॥
मैं विश्व वृक्ष का उच्छेदक हूँ। मेरा यश गिरि शिखर के सदृश ऊँचा है। अन्नोत्पादक सूर्य में व्याप्त
अमृत के सदृश मैं भी अतिपवित्र अमृत स्वरूप हूँ। मैं तेजोयुक्त सम्पदावान्, उत्तम मेधावान् और अमृत
से अभिषिक्त हूँ - यह त्रिशङ्कु ऋषि की ज्ञान-अनुभव से युक्त वाणी है॥ १ ॥
॥ एकादशोऽनुवाकः ॥
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न
प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न
प्रमदितव्यम्। देव पितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्॥ १॥ मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो
इतराणि। यान्यस्माकंः सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ॥ २ ॥ नो इतराणि। ये के
चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयाऽऽसने न प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽ
देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते
कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता
आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः।
अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः
स्युः। यथा ते तेषु वर्तेरन्। तथा तेषु वर्तेथाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्।
एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥

शीक्षावल्ली अनुवाक १२ मन्त्र १ २०३

शीक्षावल्ली अनुवाक १२ मन्त्र १ २०३
वेद अध्यापन के बाद आचार्य आश्रम के विद्यार्थियों को शिक्षण देते हैं - सत्य बोलो। धर्म
का आचरण करो। स्वाध्याय में प्रमाद न करो। आचार्य को अभीष्ट धन प्रदान करो। प्रजाओं
(सन्तान) की परम्परा विच्छिन्न न होने दो। सत्य से न डिगो, धर्म से न डिगो, शुभ कर्मों में प्रमाद
न करो, प्रगति के साधन न छोड़ो, शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन में प्रमाद न करो। देव और पितृ
कर्मों का त्याग न करो। माता-पिता को देव रूप मानो, आचार्य को देवता समझो। अतिथि को
देवरूप मानो। जो दोष रहित कर्म वर्णित हैं, उन्हीं का आचरण करो। अन्य का नहीं। हमारे
(शास्त्रादि में वर्णित) जो श्रेष्ठ चरित्र हैं, उसी की उपासना करो, अन्य की नहीं। हमसे (स्वयं से)
श्रेष्ठ जो ब्राह्मण (आचार्य आदि) आएँ, उन्हें उत्तम आसन देकर विश्राम देना चाहिए। दानादि (श्रद्धा
पूर्वक) देने योग्य है। बिना श्रद्धा के दान देने योग्य नहीं। आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देने योग्य
है। लज्जा (सामाजिकता की शर्म) तथा (सिद्धान्त के) भय से भी दान देना उचित है। संविद्-मैत्री
आदि के निर्वाह के लिए देना चाहिए। यदि आपको कर्म और आचरण के विषय में किसी तरह का
सन्देह हो। (ऐसी स्थिति में) विचारशील, परामर्शदाता, आचरणनिष्ठ, निर्मल बुद्धि वाले धर्माभिलाषी
ब्राह्मण से परामर्श करना चाहिए। वे जिस व्यवहार का आदेश करें, वैसा ही व्यवहार वहाँ करना
चाहिए। किसी अपराध से लाञ्छित व्यक्ति के विषय में कोई सन्देह उपस्थित हो, तो विचारशील,
परामर्शकुशल, आचरणनिष्ठ, निर्मल मति वाले, धर्माभिलाषी ब्राह्मण से परामर्श करना चाहिए। वे
जैसे व्यवहार का आदेश करें, वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। यही आपके लिए आदेश और
उपदेश है। यही वेद आज्ञा है। यही ईश्वर का अनुशासन है। इन सिद्धान्तों की ही उपासना करनी
चाहिए। यही उपास्य है ॥ १-४ ॥
[ आचार्य अपनी ओर से अनुशासन समझाते हैं; किन्तु शिष्यों को स्वयं तक सीमित नहीं रखते। शंका होने
पर किसी धर्माचरण युक्त ब्राह्मण से परामर्श लेने का परामर्श देते हैं। ब्राह्मण संज्ञा उस व्यक्ति के लिए है, जो
ज्ञानयुक्त और निस्पृह हैं। जिसने ज्ञान को धर्माचरण के रूप में अपने जीवन में उतार लिया है, वही व्यक्ति मोह और
भय से मुक्त होकर सही परामर्श दे सकता है। आचार्य श्रेष्ठ जीवन-श्रेष्ठ सिद्धान्तों को ही उपास्य मानते हैं।]
॥ द्वादशोऽनुवाकः॥
शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो
विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं
ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्।
आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥
मित्रदेव हमारे लिए कल्याणप्रद हों। वरुण देव कल्याणकारी हों। अर्यमादेव हमारे लिए कल्याणकारी
हों। इन्द्रदेव, बृहस्पतिदेव भी हमारे लिए शान्तिप्रद हों। विशाल डग (पादक्षेप) वाले विष्णु देव हमारे लिए
कल्याणप्रद हों। ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायुदेव ! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आपको
ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा गया है। आप ही ऋत और सत्य नाम से कहे गये हैं। उस ब्रह्म ने हमारी और आचार्य
की रक्षा की है। त्रिविध तापों से सर्वत्र शान्ति हो ॥ १ ॥

॥ अथ ब्रह्मानन्दवल्ली ॥

२०४ तैत्तिरीयोपनिषद्
॥ अथ ब्रह्मानन्दवल्ली ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा
विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
वह परमात्मा हम दोनों (आचार्य और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करे। हम दोनों का साथ-साथ
पोषण करे। हम दोनों साथ-साथ पराक्रम करें। हमारा अध्ययन (ज्ञान) तेजोयुक्त हो। हम परस्पर द्वेष-भाव
से दूर हों। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमोऽनुवाकः ॥
ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्। तदेषाऽभ्युक्ता। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे
व्योमन्। सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति। तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः
संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः।
ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः
पक्षः। अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
श्रुति में यह कहा गया है कि ब्रह्मवेत्ता साधक परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। वह ब्रह्म सत्य, ज्ञान-
स्वरूप और अनन्त है। जो साधक परम आकाश में और प्राणियों की हृदय गुहा में सन्निहित उस ब्रह्म को
जान लेता है, वह विशिष्ट ज्ञान स्वरूप उस ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का उपभोग करता है। निश्चय ही उस
परमात्मा से सर्वप्रथम आकाश तत्त्व प्रकट हुआ। तदनन्तर आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल
और जल से पृथिवी तत्त्व उत्पन्न हुआ। पृथिवी से ओषधियाँ और ओषधियों से अन्न प्राप्त हुआ। अन्न से
पुरुष वृद्धि को प्राप्त हुआ। पुरुष निश्चय ही उस अन्न के रस स्वरूप में है। उसका यह (मनुष्य रूपी पक्षी
का) सिर है। एक बाहु दक्षिण पंख है। अन्य बाहु वाम पंख है। आत्मा मध्य भाग है। ये पैर ही पूँछ और
प्रतिष्ठा हैं। उसी विषय में ये श्लोक उल्लिखित हैं ॥ १॥
॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥
आगे के मन्त्रों में ईश्वर से पंचभूतों की उत्पत्ति तथा मनुष्य की काया में संव्यास पंच कोशों का वर्णन किया गया
है। मनुष्य की काया में समाहित उन सभी कोशों का आकार मनुष्य की स्थूल काया के अनुरूप ही होता है। मनुष्य को
पक्षी मानकर उसके सिर, पंख, मध्यभाग एवं पूँछ की संगति बिठाते हुए पाँचों कोशों का वर्णन किया गया है-
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीं श्रिताः। अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि
यन्त्यन्ततः। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति । येऽन्नं
ब्रह्मोपासते। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वौषधमुच्यते। अन्नाद्भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन
वर्धन्ते। अद्यतेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यत इति। तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात्। अन्योऽन्तर
आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं
पुरुषविधः। तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिणः पक्षः। अपान उत्तरः पक्षः। आकाश आत्मा।
पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥

ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ४ मन्त्र १ २०५

ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ४ मन्त्र १ २०५
वे सभी प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं, जो पृथिवी के आश्रय में स्थित हैं। अन्न से ही वे जीवित रहते
और अन्त में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। अन्न ही सभी तत्त्वों में श्रेष्ठ है। इसीलिए यह सर्वौषधिरूप कहा
गया है। जो अन्नरूपी ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे पुरुष सम्पूर्ण अन्न को प्राप्त करते हैं। अन्न ही सभी तत्त्वों
में श्रेष्ठ है। इसलिए यह सर्वौषधिरूप कहा गया है। अन्न से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। प्राणियों की
वृद्धि अन्न से ही होती है। प्राणियों द्वारा अन्न खाया जाता है और अन्न भी प्राणियों को खाता है, इसीलिए
वह अन्न ( अद्यते वा अत्ति च वा अन्नं ) कहा जाता है। उस अन्न रस युक्त देह से भिन्न इस देह के अन्दर
प्राण रूप आत्मा पूर्ण रूप से व्याप्त है। यह प्राणरूप आत्मा निश्चय ही पुरुष के आकार का है। पुरुष की
आकृति में व्याप्त होने से यह पुरुष के ही आकार का है। उस प्राणगत देह का प्राण ही सिर है। व्यान
दाहिना पंख है। अपान वाम पंख है। आकाश उस देह का मध्य भाग है और पृथिवी उसका पुच्छ एवं आधार
भाग है। यह श्लोक उस प्राणगत देह के विषय में है॥ १॥
॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्याः पशवश्च ये। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मा
त्सर्वायुषमुच्यते। सर्वमेव त आयुर्यन्ति। ये प्राणं ब्रह्मोपासते। प्राणो हि भूतानामायुः ।
तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। तस्माद्वा
एतस्मात्प्राणमयात्। अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध
एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं पुरुषविधः। तस्य यजुरेव शिरः। ऋग् दक्षिणः पक्षः।
सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥
जो देवगण, मनुष्य और पशु आदि प्राणी हैं, वे प्राण के आश्रय से ही चेष्टा करते हैं, क्योंकि प्राण ही
समस्त प्राणियों की आयु है, अतः यह सभी प्राणियों का जीवन है। जो प्राण रूप ब्रह्म की उपासना करते
हैं, वे पुरुष दीर्घ आयु को प्राप्त करते हैं। निश्चय ही प्राण सम्पूर्ण प्राणियों का जीवन है, इसी से यह सभी
प्राणियों की आयु कहा गया है। यही उस पूर्वोक्त अन्नमय शरीर की अन्तरात्मा है। उस प्राणमय देह के
अन्तर्गत उससे भिन्न एक मनोमय आत्मा पूर्णरूप से व्याप्त है। यह निश्चय ही पुरुष के आकार का है।
प्राणमय पुरुष की आकृति में व्याप्त होने से यह मनोमय देह भी पुरुष के ही आकार का है। उस मनोमय
देह का सिर यजुर्वेद है। ऋग्वेद दाहिना पक्ष है। सामवेद बायाँ पक्ष है। आदेश उस देह का मध्य भाग है।
अथर्वा और अङ्गिरा ऋषि द्वारा दृष्ट अथर्व के मन्त्र ही उसका पुच्छ एवं आधार भाग है। यह श्लोक उस
मनोमय देह के विषय में है ॥ १ ॥
॥ चतुर्थोऽनुवाकः ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति
कदाचनेति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात्। अन्योऽन्तर
आत्मा विज्ञानमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं
पुरुषविधः। तस्य श्रद्धैव शिरः। ऋतं दक्षिणः पक्षः। सत्यमुत्तरः पक्षः। योग आत्मा।
महः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥

२०६ तैत्तिरीयोपनिषद्
जिस ब्रह्म के आनन्द की अनुभूति में मन के साथ वाणी भी असमर्थ रहती है, उसका बोध
(आनुभविक ज्ञान) करने वाला विद्वान् कभी भयग्रस्त नहीं होता। यह मनोमय शरीर अपने पूर्ववर्ती
प्राणमय शरीर का आत्मा (आधार) है। उस मनोमय शरीर से भिन्न आत्मा विज्ञानमय है, जो मनोमय शरीर
में पूर्ण व्याप्त है। वह विज्ञानमय देह पुरुष के आकार का है। यह मनोमय देह के अन्तर्गत पुरुष की आकृति
में समाहित है। उस विज्ञानमय देह का सिर श्रद्धा है। ऋत (सनातन सत्य) उसका दाहिना पक्ष है। सत्य
(प्रत्यक्ष सत्य) उसका बायाँ पक्ष है। योग उसका मध्य भाग है। 'महः' को उसका पुच्छ और आधार भाग
कहा गया है। उस विज्ञानमय देह के विषय में यह श्लोक है॥ १॥
॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥
विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते।
विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद। तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वान्कामान्समश्नुत
इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्। अन्योऽन्तर
आत्मानन्दमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं
पुरुषविधः। तस्य प्रियमेव शिरः। मोदो दक्षिणः पक्षः। प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द
आत्मा। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
विज्ञान ही यज्ञों और कर्मों की वृद्धि करता है। सम्पूर्ण देवगण विज्ञान की, श्रेष्ठ ब्रह्म रूप में उपासना
करते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप में जानते हैं, उसी प्रकार के चिंतन में रत रहते हैं, तो वे इसी शरीर
से पापों से मुक्त होकर सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं। उस विज्ञानमय देह के अन्तर्गत वह
आत्मा ही ब्रह्मरूप है। उस विज्ञानमय आत्मा से भिन्न उसके अन्तर्गत आनन्दमय आत्मा पूर्णतः व्याप्त है।
यह भी पुरुष के आकार का ही है। यह उस विज्ञानमय पुरुष देह में व्याप्त होने से पुरुष आकृति का ही
है। प्रेम उस आनन्दमय शरीर का सिर है। मोद दाहिना पक्ष है। प्रमोद बायाँ पक्ष है। आनन्द उस विज्ञानमय
देह का मध्यभाग है। ब्रह्म ही उसका पुच्छ एवं आधार है। उसी आनन्दमय देह के विषय में यह श्लोक है॥
॥ षष्ठोऽनुवाकः॥
असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद। सन्तमेनं ततो
विदुरिति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं
प्रेत्य। कश्चन गच्छती३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य। कश्चित्समश्नुता ३ उ। सोऽ
कामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। इदँ सर्वमसृजत। यदिदं
किंच। तत्सृष्ट्वा। तदेवानुप्राविशत्। तदनुप्रविश्य। सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं
च। निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च। सत्यमभवत्। यदिदं
किंच। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
जो ब्रह्म के अस्तित्व को सत्य नहीं मानता, वह असत्य ही हो जाता है, परन्तु जो ब्रह्म को सत्य
स्वीकार करता है, उसे विद्वज्जन सन्त समझते हैं। जो विज्ञानमय शरीर का आत्मा है, वही आनन्दमय शरीर
का भी है। अब अनु प्रश्न प्रारम्भ होते हैं। अज्ञानी पुरुष मरने के बाद परलोक गमन करता है या नहीं,

ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ८ मन्त्र १ २०७

ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ८ मन्त्र १ २०७

अथवा ज्ञानी पुरुष मरने के बाद परलोक गमन करता है या नहीं ? उस परमात्मा ने अनेक रूपों में प्रकट
होने की कामना की। तब उसने तप किया। तप करके उसने इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की। जगत् की
उत्पत्ति के बाद वह उसी में प्रविष्ट हो गया। प्रविष्ट होने पर वह साकार और निराकार हो गया। वह वर्ण्य
और अवर्ण्य हो गया तथा आश्रयरूप एवं निराश्रयरूप हो गया। वही चैतन्य एवं जड़ रूप हुआ। वही सत्य
स्वरूप परमात्मा ही सत्य एवं मिथ्यारूप हो गया। विद्वज्जन कहते हैं, जो कुछ भी अनुभव में आता है, वह
सत्य ही है। इसी विषय में यह श्लोक है ॥ १ ॥
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानँ स्वयमकुरुत। तस्मात्त-
त्सुकृतमुच्यत इति। यद्वै तत्सुकृतम्। रसो वै सः। रसँ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। को
ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति। यदा
ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो
भवति यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं
विदुषोऽमन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सृष्टि से पूर्व यह सम्पूर्ण जगत् असत् (अव्यक्त) रूप में ही था, उससे ही यह दृश्यमान जगत् उत्पन्न
हुआ है। वह ब्रह्म स्वयं ही जगत् रूप में प्रकट हुआ है; अतः वह सुकृत कहा जाता है। जो सुकृत है, वही
रसरूप है। इस रस को पाकर जीव आनन्दित होता है। वही आकाश की भाँति व्यापक और आनन्द स्वरूप
है। यदि वह न होता, तो कौन जीवित रहता ? कौन चेष्टाएँ करता ? निश्चय ही वही सबको आनन्द प्रदान करने
वाला है। जब कोई जीवात्मा उस अदृश्य, शरीर रहित, अवर्ण्य, निराश्रय परमात्मा में निर्भय होकर स्थित हो
जाता है, तो वह अभयपद को प्राप्त होता है। जब तक वह (जीवात्मा) परमात्मा से विमुक्त रहता है, तब तक
भय से युक्त होता है। वही भय अहंकारी विद्वान् को भी होता है। उस सन्दर्भ में यह (अगला) मन्त्र है ॥ १ ॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
भीषाऽस्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम
इति। सैषाऽऽनन्दस्य मीमाँसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायकः। आशिष्ठो द्रढिष्ठो
बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। ते ये शतं
मानुषा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये
शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः। स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः। स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः। श्रोत्रियस्य
चाकामहतस्य। ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः। स एक आजानजानां
देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। स
एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपि यन्ति। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये

२०८ तैत्तिरीयोपनिषद्
शतमिन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः।
स एकः प्रजापतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः। स एको ब्रह्मण
आनन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। स यश्चायं पुरुषे। यश्चासावादित्ये। स एकः। स य
एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति।
एतंमनोमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतमानन्दमयमा-
त्मानमुपसंक्रामति। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
इस (परब्रह्म) के भय से ही वायु बहता है। इसके भय से ही सूर्य उदित होता है। इसके भय
से ही अग्नि, इन्द्र और पाँचवें मृत्यु के देवता यम-सभी अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त हैं। अब आनन्द
विषयक विवेचन किया जाता है- कोई सदाचारी युवक, जो वेदों के अध्ययन से युक्त हो, सुदृढ़
अंगों वाला, बलिष्ठ, व्यवहार कुशल हो, साथ ही उसे समस्त वैभव से परिपूर्ण पृथिवी प्राप्त हो जाए,
तो यह इस लोक (मनुष्य) का एक आनन्द है। जो मनुष्यलोक के सौ आनन्द हैं। वह मानव गन्धर्व
के एक आनन्द के तुल्य है। वह शुद्ध अन्तःकरण वाले श्रोत्रिय मनुष्य को स्वाभाविक रूप से प्राप्त
है। जो मानव गन्धर्व के सौ आनन्द हैं, वे देवगन्धर्व के एक आनन्द के तुल्य है, वह कामना रहित
श्रोत्रिय मनुष्य को स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। जो देव गन्धर्व के सौ आनन्द हैं, वह पितृलोक को
प्राप्त हुए पितरों के एक आनन्द के तुल्य है, वह कामनाओं से विरक्त श्रोत्रिय मनुष्य को सहज ही
प्राप्त है। जो पितृगण स्थायी रूप से पितृलोक को प्राप्त हुए हैं, उनके सौ आनन्द आजानज संज्ञक
देवों का एक आनन्द है, वह कामनाओं से विरक्त श्रोत्रिय मनुष्य को सहज ही प्राप्त है। जो आजानज
संज्ञक देवों के सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेव संज्ञक देवों के एक आनन्द के तुल्य है। जो मनुष्य अपने
शुभकर्मों द्वारा देवत्व को प्राप्त हुए हैं, जो कामनाओं से विरत हैं, उन्हें वह आनन्द स्वाभाविक रूप
से ही प्राप्त है। जो कर्मदेव संज्ञक देवों के सौ आनन्द हैं, वह देवों के एक आनन्द के तुल्य है, वह
आनन्द कामना रहित श्रोत्रिय मनुष्य को सहज ही प्राप्त है। जो देवों के सौ आनन्द हैं, वह इन्द्र का
एक आनन्द है, वह कामनारहित श्रोत्रिय मनुष्य को सहज प्राप्त है। जो इन्द्रदेव के सौ आनन्द हैं, वह
बृहस्पतिदेव के एक आनन्द के तुल्य है, जो श्रोत्रिय मनुष्य उस आनन्द की कामना से मुक्त है, उसे
वह आनन्द सहज ही प्राप्त है। जो देव प्रजापति के सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मा के एक आनन्द के तुल्य
है, जो श्रोत्रिय मनुष्य उस आनन्द की कामना भी नहीं रखता, उसे वह आनन्द सहज ही प्राप्त है।
जो ब्रह्म इस मनुष्य में है, वही सूर्य में भी है। जो साधक इस रहस्य को जान लेता है, वह इस लोक
से जाते हुए अन्नमय आत्मा को प्राप्त कर लेता है। वह इस प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और
आनन्दमय आत्मा को भी प्राप्त कर लेता है। उसी के विषय में यह श्लोक है ॥ १ ॥
[यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि केवल पृथ्वी एवं सम्पत्ति से आनन्द प्राप्ति सम्भव नहीं है, उसके लिए
समग्र व्यक्तित्व ही श्रेष्ठ होना चाहिए। अगले मंत्रों में श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर आनन्द का उल्लेख है। ऋषि बार-बार कहते हैं
कि वह आनन्द "श्रोत्रियस्य च अकाम हतस्य" है, अर्थात् जो ज्ञान सम्पन्न है तथा कामनाओं से आहत नहीं है, उसी
के लिए यह आनन्द है। अज्ञानी हीनसुखों में ही भटक जाता है, श्रेष्ठ आनन्द तक पहुँचना ही नहीं चाहता। छाले
जैसे रोगों से आहत जीभ जिस प्रकार स्वादिष्ट व्यंजनों का रस नहीं ले सकती, उसी प्रकार कामनाओं से आहत
मन-अन्तःकरण श्रेष्ठ आनन्द की अनुभूति नहीं कर पाता।]

भृगुवल्ली अनुवाक २ मन्त्र १ २०९

भृगुवल्ली अनुवाक २ मन्त्र १ २०९
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति
कुतश्चनेति । एतःह वाव न तपति किमहः साधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति ।
स य एवं विद्वानेते आत्मानः स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानः स्पृणुते य एवं वेद ।
इत्युपनिषत् ॥ १ ॥
जिस ब्रह्मानन्द की अनुभूति में मन के साथ वाणी असमर्थ रहती है, उसका बोध करने वाला विद्वान्
कभी भयग्रस्त नहीं होता। विद्वज्जनों को इस बात की चिन्ता संतप्त नहीं करती कि उन्होंने श्रेष्ठ कर्म क्यों
नहीं किया ? उन्होंने पाप कर्मों को क्यों किया ? जो विद्वान् पाप-पुण्य दोनों ही कर्मों को जानता है, वह
पापों से अपनी रक्षा करता है। जो विद्वान् पाप-पुण्य दोनों ही कर्मों के बन्धन को जानता है, वह दोनों ही
कर्मों में आसक्त न होकर अपनी रक्षा करता है। यह उपनिषद् वाणी है ॥ १ ॥
॥ अथ भृगुवल्ली ॥
॥ प्रथमोऽनुवाकः ॥
भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच ।
अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तः होवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन
जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
भृगु वारुणि अपने पिता देव वरुण के पास गये और बोले - हे भगवन् ! मुझे ब्रह्म का उपदेश करें।
देव वरुण ने उनसे कहा - अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाणीं ये सब उस ब्रह्म की प्राप्ति के साधन हैं।
ये समस्त प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, जिसके आश्रय से जीवन जीते हैं और अन्त में इस लोक से प्रयाण
कर जिसमें लय होते हैं, उस ब्रह्म को तत्त्वतः जानने की जिज्ञासा करो। वही ब्रह्म है। इस प्रकार जानकर
भृगु ऋषि तप करने लगे। तप करने के अनन्तर ॥ १ ॥
॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि
जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि
भगवो ब्रह्मेति । तः होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स
तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्हें बोध हुआ कि अन्न ही ब्रह्म है। निश्चय ही सभी प्राणी अन्न से ही उत्पन्न
होते हैं, उत्पन्न प्राणी अन्न से ही जीवित रहते हैं और अन्त में मृत्यु आने पर इस लोक से प्रयाण
कर अन्न में ही प्रविष्ट होते हैं। ऐसा जानकर वे पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (उनके द्वारा
पूर्ण समर्थन न मिलने पर) पुनः भृगु ऋषि बोले- भगवन् ! तो ब्रह्म क्या है ? ब्रह्म का बोध कराएँ।

२१० तैत्तिरीयोपनिषद्
उन्होंने कहा- तप से ब्रह्म को तत्त्वतः जानने की जिज्ञासा करो। तप ही ब्रह्म है। अतः भृगु ऋषि पुनः
तप करने लगे। तप करने के अनन्तर ॥ १ ॥
॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि
जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स
तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्हें बोध हुआ कि प्राण ही ब्रह्म है। यथार्थ में सभी प्राणी प्राण से ही उत्पन्न होते
हैं, उत्पत्ति के बाद प्राण से ही जीवित रहते हैं और अन्त में इस लोक से प्रयाण कर प्राण में ही प्रविष्ट होते
हैं। इस प्रकार जानकर वे पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (उनके द्वारा पूर्ण समर्थन न मिलने पर)
पुनः भृगु ऋषि बोले- भगवन्! ब्रह्म तत्त्वतः क्या है, उसका बोध कराएँ। उन्होंने कहा-तप से ब्रह्म को
तत्त्वतः जानो। तप ही ब्रह्म है, ऐसा जानकर भृगु ऋषि तप करने लगे। तप करने के अनन्तर ॥ १ ॥
॥ चतुर्थोऽनुवाकः ॥
मनो ब्रह्मेति व्यजानात्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि
जीवन्ति। मनःप्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि
भगवो ब्रह्मेति। तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्होंने जाना कि वास्तव में मन से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर
मन से ही जीवन जीते हैं और अन्त में इस लोक से प्रयाण कर मन में ही प्रविष्ट होते हैं। ऐसा जानकर भृगु
ऋषि पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (अपने ज्ञान बोध का पूर्ण समर्थन न मिलने पर पुनः
कहा-) भगवन्! यथार्थ में ब्रह्म क्या है, उसका बोध कराएँ। देववरुण ने कहा-तप से उस ब्रह्म के यथार्थ
स्वरूप को जानो। तप ही ब्रह्म है। भृगु ऋषि पुनः तप करने लगे। तप करने के अनन्तर..... ॥ १ ॥
॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन
जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स
तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्होंने जाना कि वास्तव में विज्ञान से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पत्ति के
बाद विज्ञान से ही जीवन जीते हैं। अन्त में प्रयाण करते हुए विज्ञान में ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार
जानकर वे पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (अपने बोध का पूर्ण समर्थन न मिलने पर उन्होंने पुनः
कहा)- भगवन्! यथार्थ में ब्रह्म क्या है, उसका बोध कराएँ। देव वरुण ने कहा- तप से उस ब्रह्म को
तत्त्वतः जानो। तप ही ब्रह्म है। भृगु ऋषि पुनः तप करने लगे। तप करने के अनन्तर...... ॥ १ ॥

भृगुवल्ली अनुवाक ८ मन्त्र १ २११
॥ षष्ठोऽनुवाकः ॥
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन
जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या। परमे
व्योमन् प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति
प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्होंने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है। वास्तव में आनन्द से हो समस्त प्राणी उत्पन्न
होते हैं। उत्पत्ति के बाद आनन्द से ही जीवन जीते हैं और अन्त में आनन्द में ही प्रविष्ट होते हैं। इस प्रकार
भृगु ऋषि ब्रह्मज्ञान से पूर्ण हुए। भृगु ऋषि द्वारा अनुभूत तथा देव वरुण द्वारा वर्णित यह ब्रह्म विद्या
परम व्योम (व्यापक आकाश) में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार जो साधक ब्रह्म के आनन्द स्वरूप को जानता
है। वह प्रचुर अन्न, पाचन शक्ति, प्रजा-पशु, ब्रह्मवर्चस तथा महान् कीर्ति से सम्पन्न होकर महान् हो जाता है॥
[ऋषि स्पष्ट करते हैं कि श्रेष्ठतम ब्रह्मविद्या किसी व्यक्ति विशेष के आश्रित नहीं है, वह परम व्योम
में स्थित है। भृगु की तरह कोई भी साधक अपनी अनुभूति-सामर्थ्य को तप द्वारा प्रखर-परिष्कृत
बनाकर उसका बोध प्राप्त कर सकता है।]
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे
प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्न की निन्दा न करे। वह व्रत है। प्राण ही अन्न है। शरीर उस अन्न का भक्षण करने वाला है। शरीर
प्राण के आश्रय में स्थित है और प्राण शरीर के आश्रय में अधिष्ठित है। इस प्रकार अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित
है। जो साधक इस रहस्य को जानता है, वह उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है। वह (साधक) अन्न-पाचन
शक्ति, प्रजा, पशु, ब्रह्मवर्चस तथा महान् कीर्ति से सम्पन्न होकर महान् हो जाता है॥ १ ॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः
प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने
प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्न का कभी तिरस्कार न करे। वह व्रत है। जल ही अन्न है। तेजस् अन्न का भोग करने वाला है।
जल में तेजस् स्थित है और तेजस् में जल अधिष्ठित है। इस प्रकार अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित है। जो साधक
अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है, इस रहस्य को जानता है, वह अन्नरूपी ब्रह्म में अधिष्ठित होता है। वह अन्नादि
साधन, पाचन शक्ति, सन्तान, पशु, ब्रह्मवर्चस और कीर्ति से समृद्ध होकर महान् हो जाता है॥ १ ॥
[ जल में तेजस् की अनुभूति सहज की जा सकती है। मोती या किसी चमकदार वस्तु की चमक (तेजस्विता)
घटती है, तो कहा जाता है, उसका पानी उतर गया या 'आब' कम हो गई। 'आब' अरबी में पानी को ही कहते
हैं, जो सम्भवतः संस्कृत के 'अप्' का ही परिवर्तित रूप है।]

२१२ तात्तरायापानषद
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः
प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने
प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्न को बढ़ाएँ। वह एक व्रत है। पृथ्‍वी ही अन्न है। आकाश पार्थिव अन्न का आधार रूप होने से
उसका भोक्ता है। पृथ्वी में आकाश स्थित है और आकाश में पृथ्वी अधिष्ठित है। इस प्रकार अन्न में अन्न
स्थित है। जो विद्वान् इस रहस्य को जानता है, वह उसी अन्नरूप ब्रह्म में प्रतिष्ठित होता है। वह अन्नादि
पदार्थ, पाचनशक्ति, संतान, पशु, ब्रह्मवर्चस और कीर्ति से समृद्ध होकर महान् हो जाता है॥ १॥
[ आकाश में पृथ्वी तो प्रत्यक्ष दीखती है, पृथ्वी में आकाश समझने के लिए परमाणु संरचना (एटामिक
स्ट्रक्चर ) समझना होगा। परमाणु का केन्द्र नाभिक ( न्यूक्लियस) होता है और आस-पास इलेक्ट्रॉन घूमते हैं।
न्यूक्लियस तथा घूमने वाले इलेक्ट्रानों के बीच इतना स्थान खाली होता है, जितना सूर्य और पृथ्वी के बीच। यह
स्थान ही आकाश है। इस प्रकार हर ठोस पदार्थ में पर्याप्त आकाश होता है।]
॥ दशमोऽनुवाकः ॥
न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् ।
आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नँराद्धम्। मुखतोऽस्मा अन्नँ राध्यते । एतद्वै
मध्यतोऽन्नँराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नँराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नँराद्धम्। अन्ततोऽस्मा
अन्नँराध्यते ॥ १ ॥ य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति
हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः ।
तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति ॥ २ ॥ यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु ।
प्रजापतिरमृतमानन्द इत्युपस्थे।सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति ।
तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति ॥ ३ ॥ तन्नम
इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर
इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे ।
यश्चासावादित्ये । स एकः ॥ ४ ॥ स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमा-
त्मानमुपसंक्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं
विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतमानंदमयमात्मानमुपसंक्रम्य । इमाँल्लोकान्कामान्नी
कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥
घर में आये हुए अतिथि को तिरस्कृत न करें। यह एक व्रत है। जिस प्रकार बने, बहुत सा अन्न प्राप्त
करें, जिससे सर्वदा अतिथि सेवा में तत्पर रहें। यदि उसे अधिक आदर और प्रेम से भोजन कराएँ, तो स्वयं
को अधिक आदर सहित अन्न मिलता है। यदि मध्यम श्रेणी के आदर और प्रेम से भोजन कराएँ, तो मध्यम
श्रेणी के आदर सहित स्वयं को अन्न प्राप्त होता है। यदि निम्न श्रेणी के आदर और प्रेम से भोजन कराएँ, तो
स्वयं को निम्न श्रेणी के आदर सहित अन्न प्राप्त होता है। जो इस तथ्य का ज्ञाता है, वह अतिथि का उत्तम

भृगुवल्ली अनुवाक १० मन्त्र ६ २१३

भृगुवल्ली अनुवाक १० मन्त्र ६ २१३
आदर करता है। वह परमात्मा वाणी में रक्षक शक्ति के रूप में है, प्राण और अपान में प्रदाता और रक्षक
दोनों सामर्थ्य वाला है। वह हाथों में कर्म करने की शक्ति, पैरों में गति सामर्थ्य, गुदा में विसर्जन शक्ति के
रूप में स्थित है। यह उस ब्रह्म की मानुषी सत्ता का वर्णन है, अब उसकी दैवी सत्ता का वर्णन करते हैं।
वह वृष्टि में तृप्ति है, बिजली में शक्ति है। पशुओं में यश, ग्रहों-नक्षत्रों में ज्योति, उपस्थ में प्रजनन-सामर्थ्य,
वीर्य और आनन्द रूप में सन्निहित है। वह आकाश में व्यापक विश्व (प्रत्यक्ष जगत्) रूप में स्थित है। वह
परमात्मा सबका आधाररूप है, ऐसा मानकर-उपासना करने वाला सबको आधार देने वाला बन जाता है।
वह सबसे महान् है, ऐसा मानकर उपासना करने वाला महान् बन जाता है। वह मन है, ऐसा मानकर
उपासना करने वाला मननशील होता है। वह नमन योग्य है, ऐसा मानने वाले उपासक के लिए सम्पूर्ण
कामनाएँ नत होती हैं। वह ब्रह्म है, ऐसा मानकर उपासना करने वाला ब्रह्ममय हो जाता है। वह परिमर
(जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य और अग्नि -ये पाँच देवता मृत्यु (अस्त) को प्राप्त होते हैं।) -
आकाश-मृत्युनियामक देव है, ऐसा मानकर उपासना करने वाले के विद्वेषी शत्रु समाप्त हो जाते हैं, उसका
अप्रिय चाहने वाले बन्धु भी नष्ट हो जाते हैं, जो इस मनुष्य में है, वह सूर्य में भी है, जो साधक इस प्रकार
दोनो में एकत्व को जानता है, वह इस लोक से प्रयाण कर अन्नमय आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः प्राणमय
आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः मनोमय आत्मा, फिर विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः वह
आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होता है। आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होकर वह इच्छित भोग और रूप को प्राप्त
करता है। फिर साम गायन करता हुआ सब लोकों में विचरण करता है॥ १-५ ॥
अहमन्नमह-मन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो ३ ऽहमन्नादो ३ ऽहमन्नादः।
अह१श्लोककृदह१श्लोककृद-ह१श्लोककृत्। अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं
देवेभ्योऽमृतस्य ना ३ भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३ वाः । अहमन्नमन्नमदन्तमा ३
द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णज्योतीः । य एवं वे। इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥
आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !!! मैं (आत्मतत्त्व) ही अन्न हूँ। आश्चर्य है कि मैं (आत्मा ) ही
अन्न का उपभोग करने वाला हूँ । आश्चर्य है कि मैं (आत्मा) ही इनका संयोजक हूँ। मैं ही श्लोककृत्
(मन्त्रद्रष्टा) हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ। मैं इस प्रत्यक्ष सत्यरूप जगत् के प्रथम उत्पत्तिकर्त्ता हिरण्यगर्भ
आदि अमर देवों के भी पूर्व स्थित अमरत्व का केन्द्र हूँ। जो मुझे देता है, वह देकर मेरी रक्षा करता
है। मैं अन्नरूप होकर अन्न-भक्षक का भी भक्षण कर लेता हूँ। मैं सम्पूर्ण भुवनों को नगण्यरूप
अनुभव करता हूँ। मेरा तेज सूर्य के समान है। इस प्रकार का बोध करने वाला विद्वान् वैसी ही
सामर्थ्य वाला होता है। (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु । ........ इति शान्तिः ॥
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ॥ ............ इति शान्तिः ॥
॥ इति तैत्तिरीयोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ नादाबन्दूपानषद् ॥
यह उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध है। इस उपनिषद् के प्रारम्भ में 'ॐकार' को हंस मानकर उसके विभिन्न
अंगोपांगों का वर्णन किया गया है। फिर ॐ की १२ मात्राओं तथा उनके साथ प्राणों के विनियोग का फल कहा
गया है। योगयुक्त साधक की स्थिति तथा ज्ञानी के प्रारब्ध कर्मों के क्षय का वर्णन करते हुए नाद के अनेक प्रकार
तथा नादानुसंधान साधना का स्वरूप समझाया गया है। अंत में मन के प्रभावित होने, मन के लय होने तथा
मनोलय की स्थिति का वर्णन किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ वाङ्मे मनसि........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- ऐतरेयोपनिषद्)
ॐ अकारो दक्षिणः पक्ष उकारस्तूत्तरः स्मृतः ।
मकारं पुच्छमित्याहुरर्धमात्रा तु मस्तकम् ॥ १ ॥
ॐ कार रूप हंस का 'अकार' दक्षिण पक्ष (दाहिना पंख) तथा 'उकार' उत्तर पक्ष (बायाँ पंख)
कहा गया है। उसकी पूँछ ही 'मकार' है और अर्धमात्रा ही उसका शीर्ष भाग है ॥ १ ॥
पादादिकं गुणास्तस्य शरीरं तत्त्वमुच्यते ।
धर्मोऽस्य दक्षिणं चक्षुरधर्मोऽथो परः स्मृतः ॥ २ ॥
उस (ॐ कार रूप हंस) के दोनों पैर रजोगुण एवं तमोगुण हैं और (उसका) शरीर सतोगुण कहा
गया है। धर्म (उसका) दक्षिण चक्षु है और अधर्म बायाँ चक्षु (नेत्र) कहा गया है ॥ २ ॥
भूर्लोकः पादयोस्तस्य भुवर्लोकस्तु जानुनि ।
सुवर्लोकः कटीदेशे नाभिदेशे महर्जगत् ॥ ३ ॥
उस (हंस) के दोनों पैरों में भूः (पृथ्वी) लोक स्थित है। उसकी जंघाओं में भुवः (अन्तरिक्ष) लोक
केन्द्रित है। स्वः (स्वर्ग-ऊर्ध्व) लोक उसके कटिप्रदेश तथा महः लोक उसके नाभि प्रदेश में स्थित है ॥ ३ ॥
जनोलोकस्तु हृद्देशे कण्ठे लोकस्तपस्ततः ।
भ्रुवोर्ललाटमध्ये तु सत्यलोको व्यवस्थितः ॥ ४ ॥
उसके हृदय स्थल में जनः लोक और कण्ठ प्रदेश में तपोलोक विद्यमान है। ललाट और भौंहों के
मध्य में सत्य लोक स्थित है ॥ ४ ॥
सहस्रार्णमतीवात्र मन्त्र एष प्रदर्शितः ।
एवमेतां समारूढो हंसयोगविचक्षणः ॥ ५ ॥
न भिद्यते कर्मचारैः पापकोटिशतैरपि ।
आग्नेयी प्रथमा मात्रा वायव्येषा तथापरा ॥ ६ ॥
इस प्रकार से वर्णित सहस्रावयव युक्त प्रणवरूप हंस पर आसीन होकर कर्मानुष्ठान-ध्यान आदि में
रत हंस योगी- विचक्षण पुरुष ओंकार की श्रेष्ठ विधि से मनन व चिन्तन करता हुआ सहस्रों-करोड़ों पापों
से निवृत्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है। (ॐकार के देवता अग्नि हैं। उसका स्वरूप भी अग्नि
मण्डल जैसा है। 'अकार' नामक (प्रणव की) प्रथम मात्रा 'आग्नेयी' कही गयी है और ('उकार' नामक)

मन्त्र १३ २१५
द्वितीया मात्रा 'वायव्या' कही गयी है। (इस वायव्या के देवता वायु हैं और यह वायुमण्डल की
भाँति रंग-रूप वाली है) ॥ ५-६॥
भानुमण्डलसंकाशा भवेन्मात्रा तथोत्तरा।
परमा सार्धमात्रा या वारुणीं तां विदुर्बुधाः ॥ ७॥
तत्पश्चात् 'मकार' नामक यह तृतीय 'मात्रा' सूर्य मण्डल के समतुल्य है। (इस मात्रा के देवता सूर्य
हैं तथा) चतुर्थ मात्रा 'अर्धमात्रा' के रूप में 'वारुणी' कही गयी है। (इस वारुणी के देवता वरुण हैं) ॥ ७॥
कालत्रयेऽपि यस्येमा मात्रा नूनं प्रतिष्ठिताः।
एष ओंकार आख्यातो धारणाभिर्निबोधत ॥ ८ ॥
इन उपर्युक्त चारों मात्राओं में से हर एक मात्रा तीन-तीन काल अथवा कला रूप है। इस प्रकार 'ॐकार'
को द्वादश कलाओं से युक्त कहा गया है। धारणा, ध्यान एवं समाधि के द्वारा इसे जानने का प्रयास करना चाहिए॥
[ ॐकार साधना मात्र उच्चारण से पूरी नहीं होती, दिव्य प्राण प्रवाह रूप ॐकार की अनुभूति धारणा
ध्यानादि द्वारा की जाती है।]
घोषिणी प्रथमा मात्रा विद्युन्मात्रा तथापरा।
पतङ्गिनी तृतीया स्याच्चतुर्थी वायुवेगिनी ॥ ९॥
(इस प्रकार बारह कलाओं की मात्राओं में) प्रथम मात्रा 'घोषिणी' कही गई है। द्वितीय मात्रा का
नाम 'विद्युन्मात्रा' है, तृतीय मात्रा 'पातङ्गी' और चतुर्थ मात्रा 'वायुवेगिनी' के नाम से जानी जाती है ॥ ९ ॥
पञ्चमी नामधेया तु षष्ठी चैन्द्रयभिधीयते।
सप्तमी वैष्णवी नाम अष्टमी शांकरीति च ॥ १०॥
पाँचवीं मात्रा का नाम 'नामधेया' है और छठवीं मात्रा 'ऐन्द्री' के नाम से जानी जाती है। सातवीं
मात्रा का नाम 'वैष्णवी' और आठवीं मात्रा 'शाङ्करी' के नाम से प्रसिद्ध है ॥ १० ॥
नवमी महती नाम धृतिस्तु दशमी मता।
एकादशी भवेन्नारी ब्राह्मी तु द्वादशी परा ॥ ११ ॥
नौवीं मात्रा 'महती' तथा दसवीं मात्रा को 'धृति' (ध्रुवा) कहा गया है। ग्यारहवीं मात्रा 'नारी'
(मौनी) और बारहवीं मात्रा 'ब्राह्मी' के नाम से जानी जाती है ॥ ११ ॥
प्रथमायां तु मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते।
भरते वर्षराजासौ सार्वभौमः प्रजायते ॥ १२ ॥
( ॐकार की इन द्वादश कलाओं की) प्रथम मात्रा में यदि साधक अपने प्राणों का परित्याग कर
देता है, तो वह भारतवर्ष में सार्वभौमिक चक्रवर्ती सम्राट् के रूप में प्रादुर्भूत होता है ॥ १२ ॥
द्वितीयायां समुत्क्रान्तो भवेद्यक्षो महात्मवान्।
विद्याधरस्तृतीयायां गान्धर्वस्तु चतुर्थिका ॥ १३ ॥
( ॐकार की) द्वितीय मात्रा में जब साधक के प्राणों का उत्क्रमण होता है, तब वह महान्
महिमाशाली यक्ष के रूप में उत्पन्न होता है। ( ॐकार की) तृतीय मात्रा में प्राण त्याग करने पर (वह)
विद्याधर के रूप में और चतुर्थ मात्रा में प्राण के परित्याग करने से (वह) गन्धर्व के रूप में जन्म लेता है ॥

२१६ नादाबन्दूपानषद
[ अपने प्राणों के स्पन्दन का ॐकार रूप महाप्राण की जिस कोटि के साथ तादात्म्य होता है, उसी के
अनुरूप देहान्तर की प्राप्ति होती है।]
पञ्चम्यामथ मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते ।
उषितः सह देवत्वं सोमलोके महीयते ॥ १४॥
यदि पाँचवीं मात्रा में उस (साधक) के प्राणों का उत्क्रमण होता है, तो वह 'तुषित' नामक देवों के
साथ निवास करता हुआ चन्द्रलोक में सम्मानित होता है ॥ १४॥
षष्ठ्यामिन्द्रस्य सायुज्यं सप्तम्यां वैष्णवं पदम् ।
अष्टम्यां व्रजते रुद्रं पशूनां च पतिं तथा ॥ १५ ॥
छठवीं मात्रा में (शरीर से प्राणों का उत्क्रमण होने पर) साधक देवराज इन्द्र के सायुज्य पद को प्राप्त
करता है। सातवीं मात्रा में भगवान् विष्णु के पद-वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है तथा आठवीं मात्रा में
पशुपति भगवान् शिव के रुद्रलोक में जाकर उनकी समीपता का लाभ प्राप्त करता है ॥ १५॥
नवम्यां तु महर्लोकं दशम्यां तु जनं व्रजेत्।
एकादश्यां तपोलोकं द्वादश्यां ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १६ ॥
नवीं मात्रा में महः लोक को, दसवीं मात्रा में जनः लोक (ध्रुवलोक) को प्राप्त होता है। ग्यारहवीं
मात्रा में तपोलोक को और बारहवीं मात्रा में साधक शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है ॥ १६ ॥
ततः परतरं शुद्धं व्यापकं निर्मलं शिवम्।
सदोदितं परं ब्रह्म ज्योतिषामुदयो यतः ॥ १७॥
इससे भी परतर (परे), श्रेष्ठ, व्यापक, शुद्ध, निर्मल, कल्याणकारी, सदैव उदीयमान (वह) परमब्रह्म-
तत्त्व है। उसी से सभी तरह की ज्योतियाँ (अग्नि, सूर्य एवं चन्द्र आदि) प्रादुर्भूत हुई हैं ॥ १७ ॥
अतीन्द्रियं गुणातीतं मनो लीनं यदा भवेत्।
अनूपमं शिवं शान्तं योगयुक्तं सदाविशेत् ॥ १८ ॥
जब श्रेष्ठ साधक का मन समस्त इन्द्रियों एवं सत्, रज और तम आदि तीनों गुणों से परे होकर
परमतत्त्व में विलीन हो जाता है, तब वह उपमारहित, कल्याणकारी, शान्तस्वरूप हो जाता है; ऐसी उच्च
स्थिति में पहुँचे हुए साधकों को योग युक्त कहा जाना चाहिए ॥ १८ ॥
तद्युक्तस्तन्मयो जन्तुः शनैर्मुञ्चेत्कलेवरम्।
संस्थितो योगचारेण सर्वसङ्गविवर्जितः ॥ १९ ॥
उस योगयुक्त और तन्मय हुए साधक को अविद्या आदि दोषों से मुक्त और योग पद्धति से
स्वस्थ (आत्मा में स्थित) होकर सभी प्रकार के आसक्ति आदि दोषों से रहित हो जाना चाहिए ॥ १९ ॥
ततो विलीनपाशोऽसौ विमलः कमलाप्रभुः ।
तेनैव ब्रह्मभावेन परमानन्दमश्नुते ॥ २०॥
इस प्रकार उस (साधक) के समस्त सांसारिक बन्धनों का शमन (क्षय) हो जाता है। वह
निर्मल, कैवल्यपद को प्राप्त कर स्वयं ही परमात्म स्वरूप हो जाता है। वह ब्रह्मभाव से परमानन्द को
प्राप्त करके असीम आनन्द की अनुभूति करता है ॥ २० ॥

मन्त्र २७ २१७
आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते।
प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि ॥ २१ ॥
.हे ज्ञानवान् पुरुष ! तुम सतत प्रयत्न करते हुए आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करो। उसी
के सच्चिन्तन में अपने समय को लगाओ। प्रारब्ध कर्मानुसार जो भी कष्ट-कठिनाइयाँ सामने आयें, उनको
भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न (खिन्न-दुःखी) नहीं होना चाहिए ॥ २१ ॥
उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति ।
तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते ॥ २२॥
देहादीनामसत्त्वात्तु यथा स्वप्ने विबोधतः ।
कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति कीर्तितम् ॥ २३ ॥
आत्मज्ञान के प्रादुर्भूत होने पर भी प्रारब्ध (संस्कार) स्वयं त्याग नहीं करता, किन्तु जैसे ही
तत्त्वज्ञान का प्राकट्य होता है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म का क्षय हो जाता है। जैसा कि स्वप्नलोक के देहादिक
असत् होने के कारण जाग्रत् होने पर विलुप्त हो जाते हैं, विगत जन्मों में जो किये हुए कर्म हैं, उन्हीं कर्मों
को प्रारब्ध कर्म की संज्ञा प्रदान की गई है ॥ २२-२३ ॥
यत्तु जन्मान्तराभावात्पुंसो नैवास्ति कर्हिचित् ।
स्वप्नदेहो यथाध्यस्तस्तथैवायं हि देहकः ॥ २४॥
ज्ञानी के लिए तो जन्म-जन्मान्तर भी नहीं है। इसलिए प्रारब्ध कर्म ज्ञानी के लिए कभी भी बाधक
नहीं होता। जैसे स्वप्नकालीन देह, देह नहीं होती, केवल अध्यास मात्र (रस्सी में साँप की तरह) ही होती
है, वैसे ही यह जाग्रत् अवस्था का शरीर भी अध्यास मात्र ही है ॥ २४॥
अध्यस्तस्य कुतो जन्म जन्माभावे कुतः स्थितिः ।
उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भाण्डस्येव पश्यति ॥ २५॥
अध्यस्त (अयथार्थ) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? और उत्पत्ति के अभाव में उस वस्तु की
स्थिति कैसे होगी ? (जिस प्रकार रज्जु-रस्सी में सर्प का अध्यास होने पर रज्जु में सर्प नहीं उत्पन्न होता और
न ही उस स्थान में सर्प की स्थिति ही होती है।) इसलिए इस प्रपञ्च का मुख्य उपादान कारण आत्मा ही
है। जैसे कि मिट्टी के द्वारा निर्मित पात्रों का उपादान कारण मिट्टी होती है ॥ २५॥
अज्ञानं चेति वेदान्तैस्तस्मिन्नष्टे क्व विश्वता ।
यथा रज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात् ॥ २६ ॥
तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्पश्यति मूढधीः ।
रज्जुखण्डे परिज्ञाते सर्परूपं न तिष्ठति ॥ २७॥
वेदान्तानुसार ये सभी सांसारिक प्रपञ्च अज्ञानान्धकार के कारण आत्मा में ही प्रतिभासित होते हैं।
अज्ञानरूपी अन्धकार के विनष्ट होने पर संसार की स्थिति नहीं रह जाती। जिस तरह भ्रम बुद्धि से ग्रस्त मनुष्य
रज्जु बुद्धि का परित्याग कर उसे सर्प बुद्धि से ग्रहण करता है, अर्थात् रस्सी को सर्प समझने लगता है, इसी
तरह अज्ञानी (मूढ़) मनुष्य सत्य (आत्मा) का ज्ञान (बोध) न होने के कारण इस भ्रम-बुद्धिवश सांसारिक
प्रपञ्च का अवलोकन करता है। जब मनुष्य ठीक तरह से उस रस्सी को पहचान लेता है, तो पूर्व में
दृष्टिगोचर होने वाले सर्प की भावना नहीं रह जाती ॥ २६-२७॥

२१८ नादबिन्दूपनिषद्
अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपञ्चे शून्यतां गते ।
देहस्यापि प्रपञ्चत्वात्प्रारब्धावस्थितिः कुतः ॥ २८ ॥
जिस तरह अधिष्ठान (आधार) स्वरूप आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर प्रपञ्च (संसार) शून्यता को
प्राप्त हो जाता है, ऐसी स्थिति में देह (शरीर) भी प्रपञ्चरूप (अयथार्थ) होने के कारण प्रारब्ध की स्थिति
किस प्रकार रह सकती है? ॥ २८ ॥
अज्ञानजनबोधार्थं प्रारब्धमिति चोच्यते ।
ततः कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते ॥ २९ ॥
अज्ञान से ग्रसित लोगों को बोध कराने के लिए प्रारब्ध कर्म की बात कही जाती है। तदनन्तर
कालवश ही सांसारिक प्रारब्ध कर्मों का विनाश हो जाता है ॥ २९ ॥
ब्रह्मप्रणवसंधानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः ।
स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् (प्रारब्ध कर्मों के समाप्त होने पर) 'ॐकार' स्वरूप ब्रह्म की आत्मा के साथ एकता के
चिन्तन से नादरूप में स्वयं प्रकाशमान शिव के कल्याणकारी स्वरूप (परब्रह्म) का प्रादुर्भाव उसी प्रकार
हो जाता है, जिस प्रकार बादलों के हट जाने पर भगवान् भास्कर प्रकाशित हो जाते हैं ॥ ३० ॥
सिद्धासने स्थितो योगी मुद्रां संधाय वैष्णवीम् ।
शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं सदा ॥ ३१ ॥
योगी (साधक) को सिद्धासन से बैठने के पश्चात् वैष्णवी मुद्रा धारण करनी चाहिए। तदनन्तर
दाहिने कान के अन्दर उठते हुए नाद (अनाहत ध्वनि) का सतत श्रवण करना चाहिए ॥ ३१ ॥
[ बायें पैर की एड़ी से गुदा स्थान को तथा दाहिने पैर से जननेन्द्रिय मूल को दबाकर, शरीर को सीधा
रखकर त्रिबन्ध (मूल, जालन्धर, उड्डीयान) लगाने को सिद्धासन कहा जाता है तथा अपलक नेत्रों से बाह्य दृष्टि
को अन्तर्लक्ष्य करके (भ्रुकुटि-मध्य में) देखना वैष्णवी मुद्रा कहलाती है।]
अभ्यस्यमानो नादोऽयं बाह्यमावृणुते ध्वनिः ।
पक्षाद्विपक्षमखिलं जित्वा तुर्यपदं व्रजेत् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार नाद का किया गया अभ्यास बाह्य ध्वनियों को आवृत कर लेता है, इस तरह (योगी
साधक) दोनों पक्षों 'अकार' और 'मकार' को जीतकर क्रमशः सम्पूर्ण 'ओंकार' को शनैः-शनैः
आत्मसात् कर तुर्यावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ॥
श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो महान् ।
वर्धमाने तथाभ्यासे श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मतः ॥ ३३ ॥
अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में यह महान् नाद (अनाहत ध्वनि) विभिन्न तरह से सुनायी देता है। इसके
अनन्तर जब अभ्यास अधिक बढ़ जाता है, तब उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप (भेद) सुनायी पड़ने लगते हैं ॥ ३३ ॥
आदौ जलधिजीमूतभेरीनिर्झरसंभवः ।
मध्ये मर्दलशब्दाभो घण्टाकाहलजस्तथा ॥ ३४ ॥
अन्ते तु किंकिणीवंशवीणाभ्रमरनिःस्वनः ।
इति नानाविधा नादाः श्रूयन्ते सूक्ष्मसूक्ष्मतः ॥ ३५ ॥

मन्त्र ४१ २१९
इस नाद की ध्वनि प्रारम्भिक काल में समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनि के समान सुनायी
देती है। इसके बाद बीच की अवस्था (मध्यमावस्था) में मृदङ्ग, घंटे और नगाड़े की भाँति यह ध्वनि सुनाई
पड़ती है। अन्त में अर्थात् उत्तरावस्था में किङ्किणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की ध्वनि के समान मधुर नाद-
ध्वनि सुनायी पड़ती है। इस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते हुए नाना प्रकार के नाद सुनायी पड़ते हैं ॥३४-३५॥
महति श्रूयमाणे तु महाभेर्यादिकध्वनौ।
तत्र सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ॥ ३६ ॥
निरन्तर नाद का अभ्यास करते हुए जब भेरी आदि की ध्वनि (आवाज) तेजी से सुनायी पड़ने लगे,
तब उसमें भी सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर नाद के सुनने का विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥
घनमत्सृज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममुत्सृज्य वा घने।
रममाणमपि क्षिप्तं मनो नान्यत्र चालयेत् ॥ ३७ ॥
(नाद में रुचि रखने वाले साधक को चाहिए कि) वह घन नाद को छोड़कर सूक्ष्मनाद (मन्द
ध्वनि) या फिर सूक्ष्म नाद का परित्याग करके घन नाद में मन को केन्द्रित करे। अन्यत्र और कहीं भी
इधर-उधर मन को भ्रमित न होने दे ॥ ३७ ॥
यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः।
तत्र तत्र स्थिरीभूत्वा तेन सार्धं विलीयते ॥ ३८ ॥
साधक का मन सर्वप्रथम जहाँ-कहीं किसी भी सूक्ष्म (अतिमन्द) अथवा घननाद (अभेद्यध्वनि)
में लगता है। उसको (मन को) वहीं केन्द्रित करना चाहिए। ऐसा करने से वह (चित्त) स्वयमेव तन्मय
(विलीन) होने लगता है ॥ ३८ ॥
विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादे दुग्धाम्बुवन्मनः।
एकीभूयाथ सहसा चिदाकाशे विलीयते ॥ ३९ ॥
साधक का मन सभी सांसारिक बाह्य-प्रपंचों से विस्मृत होकर दूध में मिश्रित जल की भाँति नाद
(ध्वनि) में एकीभूत हो जाता है। इस प्रकार वह (मन) नाद के साथ अकस्मात् ही चिदाकाश में स्वयं को
विलय कर लेता है ॥ ३९ ॥
उदासीनस्ततो भूत्वा सदाभ्यासेन संयमी ।
उन्मनीकारकं सद्यो नादमेवावधारयेत् ॥ ४० ॥
संयमी पुरुष को चाहिए कि नाद-श्रवण से भिन्न विषयों-वासनाओं को उपेक्षित करके सतत अभ्यास
द्वारा मन को तत्क्षण ही उस नाद में नियोजित करे और सदैव चिन्तन के द्वारा उसी में रमण करता रहे ॥ ४० ॥
सर्वचिन्तां समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जितः ।
नादमेवानुसंदध्यान्नादे चित्तं विलीयते ॥ ४१ ॥
योगी साधक को चाहिए कि सतत चिन्तन करते हुए समस्त चिन्ताओं का परित्याग कर सभी तरह
की चेष्टाओं से मन को हटाकर (उस) नाद का ही अनुसन्धान (श्रवण-मनन-चिन्तन) करे; क्योंकि
(चिन्तन द्वारा सहज ही) चित्त का नाद में लय हो जाता है ॥ ४१ ॥

२२० नादबिन्दूपनिषद्
मकरन्दं पिबन्भृङ्गो गन्धान्नापेक्षते यथा।
नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि काङ्क्षति॥ ४२॥
जिस प्रकार भ्रमर फूलों का रस ग्रहण करता हुआ पुष्पों के गन्ध की अपेक्षा नहीं रखता है, ठीक
वैसे ही सतत नाद में तल्लीन रहने वाला चित्त विषय-वासना आदि की आकांक्षा नहीं करता है॥ ४२॥
बद्धः सुनादगन्धेन सद्यः संत्यक्तचापलः।
नादग्रहणतश्चित्तमन्तरङ्गभुजङ्गमः॥ ४३॥
यह चित्त रूपी अन्तरङ्ग भुजङ्ग (सर्प) नाद को सुनने के पश्चात् उस सुन्दर नाद की गन्ध से आबद्ध
हो जाता है और तत्क्षण ही सभी तरह की चपलताओं का परित्याग कर देता है॥ ४३॥
विस्मृत्य विश्वमेकाग्रः कुत्रचिन्न हि धावति।
मनोमत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः॥ ४४॥
नियामनसमर्थोऽयं निनादो निशिताङ्कुशः।
नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते॥ ४५॥
अन्तरङ्गसमुद्रस्य रोधे वेलायतेऽपि वा।
ब्रह्मप्रणवसंलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः॥ ४६॥
तदनन्तर (वह मन) विश्व (सांसारिकता) को विस्मृत करके तथा एकाग्रता को धारण करके
(विषयों में) इधर-उधर कहीं भी नहीं दौड़ता है। विषय-वासना रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मन
रूपी उन्मत्त गजेन्द्र को वश में करने में यह नादरूपी अति तीक्ष्ण अङ्कुश ही समर्थ होता है। यह नाद
मनरूपी हिरण को बाँधने में जाल का कार्य करता है और मन रूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता
है। ब्रह्मरूप प्रणव में संयुक्त हुआ यह नाद स्वयं ही प्रकाश स्वरूप होता है॥ ४४-४६॥
मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्।
तावदाकाशसंकल्पो यावच्छब्दः प्रवर्तते॥ ४७॥
मन वहाँ ही (उस प्रकाश तत्त्व में) विलय को प्राप्त हो जाता है। वहीं परम श्रेष्ठ भगवान् विष्णु का परम पद
है। मन में आकाश तत्त्व का संकल्प तभी तक रहता है, जब तक कि शब्दों का उच्चारण और श्रवण होता है॥ ४७॥
निःशब्दं तत्परं ब्रह्म परमात्मा समीयते ।
नादो यावन्मनस्तावन्नादान्तेऽपि मनोन्मनी॥ ४८॥
निःशब्द (शब्दरहित) होने पर तो वह (मन) परमब्रह्म के परमात्म-तत्त्व का अनुभव करने लगता
है। नाद (ध्वनि) के रहने तक ही मन का अस्तित्व बना रहता है। नाद के समापन होने पर मन भी 'अमन'
(शून्यवत्) हो जाता है॥ ४८॥
सशब्दश्चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम्।
सदा नादानुसंधानात्संक्षीणा वासना तु या॥ ४९॥
निरञ्जने विलीयेते मनोवायू न संशयः।
नादकोटिसहस्राणि बिन्दुकोटिशतानि च॥ ५०॥