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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

१६२ छान्दोग्योपनिषद्
स हाशाथ हैनमुपससाद तꣳह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वꣳह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् श्वेतकेतु ने अपने पिता के कहने पर भोजन ग्रहण किया। भोजन करने के उपरान्त वह अपने
पिता के पास उपस्थित हुआ। पिता ने जो भी पूछा, उसे सब कुछ स्मरण हो गया॥ ४॥
तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं
तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥ ५॥
तदनन्तर आरुणि ने कहा- 'हे सोम्य! जब विशाल अग्नि शान्त हो जाए और उसका एक छोटा सा
अंगारा मात्र शेष रह जाए, उस समय बचे हुए अंगारे पर तृण रखकर उसे धीरे-धीरे सुलगाया जाए, तो वह
पहले की तरह ही सबको प्रज्वलित कर सकता है' ॥ ५ ॥
एवꣳ सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता
प्राज्वालीत्तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति
तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥
वैसे ही हे प्रिय सोम्य! तुम्हारी सोलह कलाओं में से एक ही कला शेष रह गयी थी। तत्पश्चात् वह
अन्न द्वारा पुनः प्रज्वलित हो गई। उसी के माध्यम से तुम वेदों को जानने में समर्थ हो सके। हे प्रिय सोम्य!
इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि मन अन्न रूप है, प्राण जल रूप है और वाणी तेज स्वरूप है। इस प्रकार
श्वेतकेतु ने अपने पिता द्वारा कहे हुए उपदेश पूर्णरूपेण आत्मसात् कर लिये ॥ ६ ॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः
स्वपिति नाम सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनꣳ स्वपितीत्याचक्षते
स्वꣳ ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥
अरुण के पुत्र आरुणि जो उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा- हे सोम्य! तुम
हमारे द्वारा बताये गये स्वप्न के स्वरूप को ठीक प्रकार समझ लो। जिस अवस्था में यह पुरुष शयन करता है, ऐसा
कहा जाता है कि उस समय सत् से युक्त हो जाता है, अर्थात् अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसलिए इसको
'स्वपित' कहा जाता है, क्योंकि उस समय यह स्व अर्थात् अपने आप को ही प्राप्त कर लेता ॥ १ ॥
स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा
बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा
प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनꣳ हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥
हे सोम्य! जैसे कोई शकुनि (बाज पक्षी) सूत्र में बँधने के बाद चतुर्दिक उड़ते हुए कहीं आश्रय न
प्राप्त कर अपने ही बन्धन के स्थान पर आ जाता है। ठीक वैसे ही, यह मन भी हर दिशा का भ्रमण करके
कहीं भी अपना विश्रामालय न पाकर प्राण का ही अवलम्बन ग्रहण करता है। इसलिए हे सोम्य! यह मन,
प्राण रूप बन्धन वाला है ॥ २ ॥
अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं
नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमनुत्प-
तितꣳ सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥

अध्याय ६ खण्ड ८ मन्त्र ७ १६३

अध्याय ६ खण्ड ८ मन्त्र ७ १६३
आरुणि ने कहा- 'हे सोम्य! अब तुम क्षुधा और पिपासा के रहस्य को समझो'। जिस समय पुरुष
भोजन ग्रहण करने की इच्छा करता है, उस समय खाये हुए भोजन (अन्न) को जल ही ले जाता है। जैसे
गौ ले जाने वाले को गोनाय, अश्व ले जाने वाला अश्वानाय और पुरुष को ले जाने वाले राजा को पुरुषनाय
कहते हैं। ठीक वैसे ही जल को भोजन (अशन) ले जाने के कारण 'अशनाय' कहकर बुलाते हैं। हे प्रिय
सोम्य! उस जल के द्वारा ही तुम इस शरीर रूपी अङ्कुर को प्रकट हुआ समझो ॥ ३ ॥
तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः
सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः
सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥
अन्न के अतिरिक्त इस शरीर का मूल और क्या है ? हे सोम्य ! तुम तेज को अन्न रूप कर्म का मूल
समझो। तेजरूपी कार्य का मूल सत् तत्त्व को जानो। इस प्रकार से ये समस्त प्राणी सत् रूप मूल वाले ही
हैं अर्थात् सत् ही एक मात्र आश्रय तथा प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥
अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः
पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमभ्युत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं
भविष्यतीति ॥ ५ ॥
जब मनुष्य पिपासित (प्यासा) होकर जल ग्रहण करता है, तब उस (जल) को तेज ही अन्दर ले
जाता है। अतः जैसे 'गोनाय', 'अशनाय', 'पुरुषनाय' कहे गये हैं, ठीक वैसे ही तेज को उस समय जल
को ले जाने वाला कहते हैं। हे सोम्य ! इस कारण से इस शरीर को जलरूपी मूल से प्रकट हुआ समझो,
क्योंकि बिना क्रिया के प्रतिक्रिया नहीं हो सकती ॥ ५ ॥
[ शरीर की चयापचय प्रक्रिया (मैटाबालिज्म) में शरीर के प्रत्येक कोश तक अन्न को जल तथा जल को
काय विद्युत् (बायो इलैक्ट्रीसिटी) द्वारा संचरित किये जाने का तथ्य वर्तमान शरीर विज्ञान स्वीकार कर चुका है।
उसी प्रक्रिया को ऋषि अपने ढंग से समझा रहे हैं।]
तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य
शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु
खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव
भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां
देवतायाम् ॥ ६ ॥
हे प्रिय सोम्य ! जल द्वारा प्रकट हुए शरीर का मूल स्थान कहाँ हो सकता है ? जल का मूल तेज में
और तेज का मूल सत् में होता है। ये सभी प्राणी सत् रूपी मूल वाले, सत् रूपी उद्गम स्थल वाले और
सत् रूपी अत्र वाले हैं। हे सोम्य ! तीनों (अन्न, जल और तेजरूपी) देवता पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर
विभिन्न भागों में बँट जाते हैं। उद्दालक ने कहा- यह मैंने पूर्व में स्पष्ट कर दिया था। इसी कारण से मृत्यु
के समीप पहुँचने वाले पुरुष की वाणी मन में लीन हो जाती है, मन प्राण में विलीन हो जाता है। प्राण तेज
में और तेज परदेवता में मिल जाता है ॥ ६ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

॥ नवमः खण्डः ॥

१६४ छान्दोग्योपनिषद्
हे सोम्य! वह अणिमा (सूक्ष्मविद्या) है, वही सब कुछ है। वही आत्मा है एवं तुम भी वही हो।
तत्पश्चात् श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- हे भगवन्! फिर से समझाने की कृपा करें। तब उसके पिता ने
'अच्छा' कहते हुए पुनः समझाने का आश्वासन दिया॥ ७॥
॥ नवमः खण्डः ॥
यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणाँरसान्समवहारमेकताँ
रसं गमयन्ति ॥ १ ॥
उद्दालक ने पुनः श्वेतकेतु से कहा- हे सोम्य! जिस तरह मधुमक्खियाँ शहद प्राप्त करने के लिए
विभिन्न दिशाओं के वृक्षों, पुष्पों से रस लाकर मधु के रूप में एकत्रित कर देती हैं॥ १॥
ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव
खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामह इति ॥ २ ॥
मधु के रूप में एकता को प्राप्त हुए, वे सभी रस जिस प्रकार यह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते कि मैं
अमुक वृक्ष का रस हूँ। ठीक इसी भाँति यह समस्त प्रजा सत् को प्राप्त करने के उपरान्त यह नहीं कहती,
कि हमने सत् तत्त्व प्राप्त कर लिया है॥ २॥
त इह व्याघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा
मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ ३ ॥
इस समस्त लोक में व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, बराह, कीट- पतङ्गे, दंश अथवा मच्छर आदि जो पहले
प्रादुर्भूत होते हैं, वे ही बार-बार उत्पन्न होते हैं॥ ३॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥
वह जो यह अणिमा (सूक्ष्म प्रक्रिया) आदि है, यह सब तदनुरूप ही है। वह ही सत्य है, वही आत्मा
है और हे श्वेतकेतो! वही तुम भी हो। ऐसा अपने पिता के द्वारा कहे जाने पर उसने कहा- हे भगवन्! मुझे
पुनः बताने की कृपा करें। इस प्रकार से उसके पिता उद्दालक ने उसे फिर से समझाने का आश्वासन दिया॥
॥ दशमः खण्डः ॥
इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति
स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीति ॥ १ ॥
उद्दालक ने पुनः समझाते हुए कहा- हे सोम्य! ये पूरब एवं पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित होने वाली
नदियाँ अपने अनुकूल मार्गों से प्रवाहित होती हैं। उनका समुद्र से ही आगमन होता है और अन्त में उसी
समुद्र में ही समाहित हो जाती हैं। जिस तरह वे नदियाँ, सागर में विलीन होकर यह नहीं जानतीं कि मैं
अमुक-अमुक नदी हूँ॥ १॥
एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगत्य न विदुः सत आगच्छामह इति त
इह व्याघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा मशको वा
यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥

अध्याय ६ खण्ड ११ मन्त्र ३ १६५

अध्याय ६ खण्ड ११ मन्त्र ३ १६५
ठीक उसी तरह यह सम्पूर्ण प्रजा भी सत् तत्त्व से प्रकट होकर, यह नहीं समझ पाती कि हम सभी
का सत् तत्त्व से ही आगमन हुआ है। वे सभी यहाँ पर व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, वराह, कीट-पतङ्गे, डाँस
अथवा मच्छर आदि के रूप में प्रकट होते हैं, पुनः अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
आरुणि ने कहा- हे श्वेतकेतु ! यही अणिमा (अणुरूप) आदि से युक्त आत्मा वाला जगत् है तथा तुम
भी वही हो। उसने अपने पिता से पुनः समझाने की प्रार्थना की। पिता उद्दालक ने 'अच्छा' कहते हुए फिर
से समझाने के लिए कहा ॥ ३ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्यो मध्येऽभ्या-
हन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो
मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥
(उन्होंने वृक्ष के दृष्टान्त द्वारा पुनः समझाते हुए कहा-) हे सोम्य! यदि किसी विशाल वृक्ष की जड़
में प्रहार करें, तो वह शुष्क न होकर जीवन धारण करते हुए मात्र रस ही स्रवित करेगा। ठीक वैसे ही यदि
उस (वृक्ष) के मध्य भाग पर आघात किया जाए, तब भी वह जीवित रहते हुए रस टपकाता रहेगा और
यदि इसके ऊर्ध्व भाग में प्रहार किया जाए, तब भी वह जीवित रहते हुए रस-स्राव ही करता रहेगा।
(इससे यह सिद्ध होता है कि) यह वृक्षरूपी जीव-आत्मा से परिपूर्ण जल का पान करता हुआ
आनन्दानुभूति करते हुए स्थिर रहता है ॥ १ ॥
अस्य यदेकाꣳ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां
जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥
हे सोम्य! किसी वृक्ष की एक शाखा को जीव परित्याग कर देता है, तो वह शुष्क हो जाती है। यदि
दूसरी शाखा चेतना शून्य हो जाए, तो वह भी शुष्क हो जाती है। यदि तृतीय शाखा को जीव आघात करने
पर छोड़ दे, तो वह भी सूख जाती है और यदि ऐसे ही सम्पूर्ण वृक्ष का ही जीव उत्क्रमण कर जाता है,
तो वह वृक्ष पूर्णरूपेण शुष्क हो जाएगा ॥ २ ॥
जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ
सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति
तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सोम्य! ठीक ऐसे ही यह वृक्षरूपी शरीर जीवन तत्त्व से रहित होते ही नष्ट हो जाता है, किन्तु जीव
का नाश नहीं होता, ऐसे सूक्ष्म भाव से सम्पन्न आत्म-तत्त्व से परिपूर्ण यह जगत् है। यह सत्य है और हे
सोम्य! इसी तरह तुम भी सत्य तत्त्व से पूर्ण हो। श्वेतकेतु ने निवेदन किया- भगवन्! पुनः समझाएँ। पिता
ने 'अच्छा' कहकर उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥

॥ द्वादशः खण्डः ॥

१६६ छान्दोग्योपनिषद्
॥ द्वादशः खण्डः ॥
न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र
पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र
पश्यसीति न किंचन भगव इति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! इस सामने विद्यमान महान् वट वृक्ष से एक फल तोड़कर ले आओ। ऐसा सुनते ही वह
(श्वेतकेतु) शीघ्रता से फल को ले आया। आरुणि ने पुनः कहा- 'इसे तोड़ दो।' तोड़ते हुए श्वेतकेतु
बोला- 'भगवन् ! तोड़ दिया'। आरुणि ने कहा इसके अन्दर क्या दिखाई दे रहा है? श्वेतकेतु बोला- इसके
भीतर ये अणु के सदृश दाने दिखाई दे रहे हैं। आरुणि ने फिर कहा- इन दानों में से एक को लेकर तोड़
दो। श्वेतकेतु बोला- भगवन् ! तोड़ दिया। आरुणि ने कहा कि 'इसके अन्दर क्या देखते हो?' श्वेतकेतु ने
उत्तर दिया- हे भगवन् ! मुझे इसके अन्दर कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है ॥ १ ॥
तꣳ होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं
महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥
तब उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! इस वट के बीज के अन्दर जिस अति सूक्ष्म अणु रूप को तुम नहीं देख सकते
हो, उसमें इतना विशाल वृक्ष स्थिर है। अतः हे सोम्य ! मेरे द्वारा बताये हुए इस कथन पर श्रद्धापूर्वक विश्वास करो ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! इस वट वृक्ष का जो यह अणु रूप है, तदनुरूप ही यह सब सूक्ष्म जगत् है। वही सत्य है और
हे श्वेतकेतो ! वही तत्त्व तुम स्वयं हो। उद्दालक के ऐसा कहने पर श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- भगवन् !
कृपया मुझे फिर से बताने का अनुग्रह करें। तब उद्दालक ने उसे 'अच्छा' कहते हुए पुनः आश्वस्त किया ॥
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तꣳ होवाच
यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥
उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को फिर से समझाते हुए कहा-'हे सोम्य ! इस पिण्ड रूपी नमक के टुकड़े को
जल-पात्र में डालकर अगले दिन प्रातःकालीन वेला में पुनः उपस्थित होना।' ऐसा सुनकर अपने पिता के
आदेशानुसार वह दूसरे दिन उपस्थित हुआ। तब उद्दालक ने कहा- हे पुत्र ! विगत रात्रि में जिस लवण को तुमने जल
में मिश्रित किया था, 'उसे ले आओ।' परन्तु ढूंढने पर उस नमक को वह नहीं प्राप्त कर सका ॥ १ ॥
यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति
लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैनदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार
तच्छश्वत्संवर्तते तꣳहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥
हे सोम्य ! तुम इस जल में मिले हुए नमक के अंश को नहीं देख सकते हो, फिर भी यदि जिज्ञासा हो तो इस
जल को ऊपर से लेकर आचमन के रूप में ग्रहण करो। आचमन के उपरान्त पिता द्वारा पूछने पर उसने कहा 'नमकीन'
अर्थात् खारा है। पिता ने कहा कि अब जल पात्र के मध्य में से जल लेकर पीते हुए बताओ कैसा है? उसने फिर कहा

अध्याय ६ खण्ड १५ मन्त्र १ १६७

अध्याय ६ खण्ड १५ मन्त्र १ १६७
'नमकीन है।' तत्पश्चात् पिता के कहने पर जल पात्र के नीचे से जल लेकर पान किया। पिता के द्वारा 'कैसा है?' पूछने पर
उसने बताया कि 'नमकीन है।' उद्दालक ने कहा- 'अच्छा तुम इस जल को बाहर फेंक कर हमारे पास आ जाओ।' उसने
पिता के कहने पर वैसा ही किया और कहा उस सम्पूर्ण जल में नमक पूर्ण रूप से मिला हुआ था। तत्पश्चात् आरुणि ने कहा-
हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तुम सत् तत्त्व को देखने में असमर्थ हो, फिर भी वह यहाँ पर पूर्ण रूप से विद्यमान है ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
आरुणि ने कहा- हे सोम्य ! इसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अति सूक्ष्म रूप से सत् तत्त्व आत्मा में
विद्यमान है, यही सत्य है। हे श्वेतकेतो ! ठीक वैसे ही तुम स्वयं भी सत्य स्वरूप हो। तब उसने फिर कहा
भगवन् ! आप पुनः समझाएँ। पिता ने अच्छा कहकर पुनः उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र
प्राङ्वोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥
उद्दालक ने पुनः एक पुरुष के दृष्टान्त द्वारा श्वेतकेतु को समझाते हुए कहा- हे सोम्य ! जिस प्रकार
किसी पुरुष की आँखें बाँधकर गान्धार देश से अन्यत्र किसी निर्जन क्षेत्र में लाकर छोड़ दें, तो वह वहाँ
चतुर्दिक् पूर्व, उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम दिशा की ओर मुँह करके करुण क्रन्दन करता है। वह चिल्लाते हुए
कहता है कि मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाकर छोड़ दिया गया है ॥ १ ॥
तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं
पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव
चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति ॥ २ ॥
यदि कोई दूसरा पुरुष वहाँ आकर उसकी आँखों के बन्धन खोलकर उसे यह बतलाये कि 'गान्धार'
अमुक दिशा में है। अमुक की ओर प्रस्थान कर जाओ। तब वह बुद्धिमान् एवं उपदिष्ट हुआ व्यक्ति एक
गाँव से दूसरे गाँव को पूछते हुए क्रमशः अपने मूल स्थान यानी गान्धार देश को प्राप्त कर लेता है। ठीक
वैसे ही इस लोक में सदाचारवान् व्यक्ति ही सत् को समझ पाता है। उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्ति में उतनी ही
देर लगती है, जितने तक शरीर के बन्धन से मुक्ति नहीं मिल जाती। इसके अनन्तर तो वह पुरुष सत् युक्त
ब्रह्म के अनुरूप हो जाता है अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! यह समस्त जगत् अणु रूप सूक्ष्म सत् तत्त्व से युक्त है। वह ही सत् स्वरूप है। वह ही
आत्म स्वरूप है। हे श्वेतकेतो ! तुम भी उसी सत् तत्त्व से युक्त हो। इस प्रकार सुनते ही उस (श्वेतकेतु) ने
कहा- भगवन् ! पुनः बताने की कृपा करें। तब उद्दालक ने अच्छा कहते हुए उसे पुनः आश्वस्त किया ॥३ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
पुरुषं सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न
वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥

१६८ छान्दोग्योपनिषद्
हे सौम्य ! ज्वरादि से अत्यधिक संतप्त एवं मरणासन्न स्थिति में पहुँचते हुए पुरुष के चारों ओर उसके
बन्धु-बान्धव एवं निकट परिवारीजन बैठकर पूछते हैं- क्या तुम मुझे पहचानते हो ? क्या तुम मुझे जानते
हो ? तो उस व्यक्ति की वाणी जब तक मन में लीन नहीं होती, मन प्राण में, प्राण तेज में तथा तेज परमदेव
तत्त्व में विलीन नहीं हो जाता, तब तक वह सबको जानता रहता है ॥ १ ॥
अथ यदास्य वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ।
तदनन्तर जब उस व्यक्ति की वाणी मन में विलीन हो जाती है, मन प्राण में, प्राण तेज में एवं तेज
उस परमदेव तत्त्व में मिल जाता है, तब वह व्यक्ति किसी को भी पहचान पाने में असमर्थ रहता है ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सौम्य ! वह (अणुरूप) जो अणिमा आदि तत्त्व है, तदनुरूप ही यह सब कुछ है। वही सत्य है और वही
आत्मतत्त्व है। हे सौम्य ! उसी सत् तत्त्व से युक्त स्वयं तुम भी हो। उद्दालक के इस तरह कहने पर श्वेतकेतु ने कहा-
हे भगवन् ! पुनः बताने की कृपा करें। तब उसके पिता ने 'अच्छा' कहते हुए उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि
तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं
तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥
(आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को अपराधी व्यक्ति द्वारा तप्त कुल्हाड़े को ग्रहण करने के उदाहरण द्वारा
समझाते हुए कहते हैं)- हे सौम्य ! जब किसी दोषी व्यक्ति को हाथ बाँधकर (राज्य कर्मचारी) लाते हुए
कहते हैं कि 'इसने चोरी की है', इसके लिए परशु तप्त करो। वह यदि सचमुच उसका (चोरी का) करने
वाला होता है तथा असत्य भाषण कर, अपने किये हुए कृत्य को आवरण में रखता है, तो उस तप्त परशु
को ग्रहण करते ही, वह जलते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येना-
त्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥
यदि वह व्यक्ति चोरी करने वाला नहीं होता, तो उसी परशु से स्वयं को सत्य प्रमाणित करता है। वह अपने
आप को सत्य से ढककर उस परशु को पकड़ लेता है और जब उस परशु से नहीं जलता, तो छोड़ दिया जाता है ॥
[ इस समय अपने भाव से स्वयं को आवृत कर लेने की क्षमता लुप्तप्राय हो गयी है, फिर भी उसके प्रमाण
मिलते हैं। किसी पीड़ित व्यक्ति को सहायता करते समय वास्तविक प्रेम सम्पन्न व्यक्ति को कष्ट नहीं होता; किन्तु
प्रेम का ढोंग करने वाले को कष्ट अनुभव होता है।]
स यथा तत्र नादाह्यैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति
तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ३ ॥
हे सौम्य ! जैसे वह व्यक्ति उस परीक्षा के समय तप्त परशु से नहीं जलता है, वैसे ही सत् तत्त्व को प्राप्त करने
वाले विद्वान् पुनर्जन्म से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यह समस्त विश्व सत् स्वरूप है। वह ही आत्मा है। हे श्वेतकेतो ! उसी
सत् तत्त्व से सम्पन्न तुम स्वयं हो। तब श्वेतकेतु ने कहा भगवन् ! मैं उस सत् तत्त्व को जान गया हूँ-जान गया हूँ ॥

अध्याय ७ खण्ड १ मन्त्र ५ १६९

अध्याय ७ खण्ड १ मन्त्र ५ १६९
॥ अथ सप्तमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तꣳ होवाच यद्वेत्थ तेन मोपसीद
ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति ॥ १ ॥
एक बार ब्रह्मर्षि नारद जी ब्रह्मनिष्ठ योगेश्वर सनत्कुमार जी के समक्ष उपस्थित होकर बोले- हे
भगवन् ! मुझे उपदेश प्रदान करने की कृपा करें। उनसे सनत्कुमार जी ने कहा- सर्वप्रथम जो तुम जानते हो,
उसे बतलाते हुए हमारे पास उपदेश श्रवण करने के लिए आओ, तो उससे आगे का ज्ञान मैं तुम्हें दूँगा ॥१ ॥
स होवाचर्ग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदꣳ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं
वेदानां वेदं पित्र्यꣳ राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां
क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳ सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥
(नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का अध्ययन कर
लिया है। इसके अतिरिक्त इतिहास, पुराण के रूप में पञ्चम वेद, वेदों का वेद (व्याकरण), श्राद्धकल्प,
गणित, उत्पातविद्या, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेद विज्ञान, भूततंत्र, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या,
सर्पविद्या (गारुड़मन्त्र), देवजन विद्या (नृत्य-संगीत) आदि इन सभी विद्याओं का अध्ययन कर चुका हूँ॥
सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतꣳ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति
शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयत्विति तꣳ होवाच
यद्वै किंचैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥
हे भगवन् ! मैं तो केवल मंत्रों में ही पारंगत हूँ अर्थात् शब्दार्थ मात्र ही जानता हूँ। आत्मा के सम्बन्ध
में मेरी जानकारी बिल्कुल नहीं है। मैंने आप जैसे श्रेष्ठ योगियों से सुना है कि आत्मज्ञानी शोक से पार करने
में समर्थ होते हैं। हे भगवन् ! मैं आत्मज्ञान के अभाव में शोक में डूबा रहता हूँ। आप कृपा करके शोक
सागर से पार कीजिए। ऐसा सुनकर सनत्कुमार जी ने नारद जी से कहा- हे महर्षे ! तुम जो कुछ जानते हो,
वह सभी कुछ नाम ही है ॥ ३ ॥
नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां
वेदः पित्र्यो राशिर्देवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या
नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्स्वेति ॥ ४ ॥
ऋग्वेद भी नाम है तथा ऐसे ही यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराणादि, वेदों का वेद
(व्याकरण) श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातविद्या, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेदविज्ञान, भूतविद्या,
धनुर्विद्या, ज्योतिष, सर्पविद्या, संगीत आदि कलाएँ शिल्प विद्या आदि ये सब नाम ही हैं। अतः हे नारद !
तुम नाम की ही उपासना करो ॥ ४ ॥
स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥
जो व्यक्ति नामरूप ब्रह्म की उपासना करता है, उसकी जहाँ तक नाम की गति होती है, वहाँ तक

॥ द्वितीयः खण्डः ॥

१७० छान्दोग्योपनिषद्
इच्छानुसार गति हो जाती है। (नारद ने सनत्कुमार जी से कहा-) हे भगवन् ! क्या नाम के अतिरिक्त
भी कुछ है ? सनत्कुमार ने कहा- हाँ नाम से भी अधिक है ? तब महर्षि नारद जी ने कहा - हे
भगवन् ! तो फिर मुझे वही बताने की कृपा करें ॥ ५ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदग्ं सामवेदमाथर्वणं
चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यग्ं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं
देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याग्ं सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं
च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाग्श्च मनुष्याग्श्च पशूग्श्च वयाग्ंसि च तृणवन -
स्पतीञ्श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च
हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न
साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार ने कहा-) वाणी नाम से अधिक श्रेष्ठ है, वाणी ही ऋग्वेद को प्रकाशित करती है।
यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ अथर्ववेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदों के वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित,
उत्पात विज्ञान, नीतिशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, निरुक्त, वेद विज्ञान, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष ,
सर्पविद्या, संगीत-शिल्प आदि शास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मानव, पशु-पक्षी,
तृण-वनस्पति, हिंस्र जन्तु, कीट-पतंगे, चींटी आदि प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य एवं असत्य, साधु तथा
असाधु, अच्छा एवं बुरा, प्रिय एवं अप्रिय आदि का ज्ञान वाणी द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। वाणी ही इन
सबको ज्ञापित करती है, इसलिए हे नारद ! तुम वाणी की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
हे महर्षि नारद ! वह (साधक) जो वाणी को 'यह ब्रह्म है' ऐसा मानकर उस ब्रह्मरूप की उपासना
करता है, उसकी जहाँ तक वाणी के विषय हैं, वहाँ तक इच्छानुसार गति होती है। (तब नारद ने कहा)
हे योगेश्वर ! वाणी से भी अधिक कुछ है क्या ? (सनत्कुमार जी ने कहा)- हाँ है, वाणी से भी बढ़कर है।
नारद ने कहा- भगवन् ! मुझे वही बताने की कृपा करें ॥२ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं
वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि
कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्राग्श्च पशूग्श्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते
मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥
योगेश्वर सनत्कुमार जी कहते हैं- 'मन' वाणी से अधिक श्रेष्ठ है। जिस तरह से दो आँवले, दो बेर
अथवा दो बहेड़े मुट्ठी के अन्दर आ जाते हैं, उसी तरह वाणी और नाम की अनुभूति मन करता है। जिस
समय मनुष्य मन से विचार करता है कि 'मंत्रों को पढूँ' उसी समय वह पढ़ता है। वह जब सोचता है कि

अध्याय ७ खण्ड ४ मन्त्र ३ १७१

अध्याय ७ खण्ड ४ मन्त्र ३ १७१
'कार्य करूँ', तभी कार्य करता है, जब पुत्र और पशुओं की इच्छा करता है, उसी समय वह उनको प्राप्त
करता है तथा जब वह संकल्प करता है कि इस लोक एवं दूसरे लोक के वैभव को प्राप्त करूँ, तभी वह
उसको, प्राप्त करता है। मन ही आत्मा, मन ही लोक एवं मन ही ब्रह्म है। अतः हे नारद ! तुम इस श्रेष्ठ मन
की उपासना करो ॥ १ ॥
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
जो व्यक्ति मन को 'यह ब्रह्म है' ऐसा मानकर उसकी ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह व्यक्ति जहाँ
तक मन की गति है, वहाँ तक अपनी इच्छा से गतिशील हो जाता है। (नारद ने कहा-) हे भगवन् ! क्या मन से
भी बढ़कर कोई है ? (सनत्कुमार ने कहा-) हाँ मन से भी बढ़कर है। (तब नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! मुझे
उसी का उपदेश प्रदान करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
संकल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु
नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
सनत्कुमार जी ने कहा- 'संकल्प' मन से अधिक श्रेष्ठ है। जब व्यक्ति संकल्प करता है, तभी वह
बोलने की इच्छा करते हुए वाक् शक्ति को प्रेरणा प्रदान करता है। वह उसको नाम के प्रति प्रवृत्त करता है।
नाम के अन्तर्गत ही सभी मंत्र एकाकार हो जाते हैं तथा मन्त्रों में ही सभी कर्म एकरूप हो जाते हैं ॥ १ ॥
तानि ह वा एतानि संकल्पैकायनानि संकल्पात्मकानि संकल्पे प्रतिष्ठितानि
समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्च तेषाᳵ
संक्लृप्त्यै वर्षᳵ संक्लृपते वर्षस्य संक्लृप्त्या अन्नᳵसंक्लृपतेऽन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः
संक्लृपन्ते प्राणानाᳵ संक्लृप्त्यै मन्त्राः संक्लृपन्ते मन्त्राणाᳵ संक्लृप्त्यै कर्माणि संक्लृपन्ते
कर्मणाᳵ संक्लृप्त्यै लोकः संक्लृपते लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्वᳵ संक्लृपते स एष संकल्पः
संकल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
(हे नारद !) सर्वप्रथम जो मन, वाणी आदि का वर्णन किया गया है, वह संकल्परूप, संकल्पमय
और अपने संकल्प में प्रतिष्ठित है। स्वर्ग एवं पृथिवी संकल्प करने वाले प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार वायु
तथा आकाश, जल और तेज भी संकल्प बल से युक्त हैं। इन सभी के संकल्प बल से वृष्टि को सामर्थ्य
प्राप्त होती है। (अथवा उन द्युलोक एवं पृथिवी के संकल्प से वृष्टि होती है।) वृष्टि के संकल्प से अन्न को
समर्थता मिलती है। अन्न के संकल्प से प्राण समर्थ होते हैं। प्राणों के संकल्प से मन्त्र समर्थ होते हैं। मन्त्रों
के संकल्प से कर्मों को सामर्थ्य मिलती है एवं कर्मों के संकल्प से लोक (फल) समर्थ होता है। हे नारद !
तुम ऐसे ही इस श्रेष्ठ संकल्प की उपासना करो ॥ २ ॥
स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते कॢप्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान्
प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिध्यति यावत्संकल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो
भवति यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः संकल्पाद्भूय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति
तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥

१७२ छान्दोग्योपनिषद्
(हे नारद!) जो व्यक्ति यह संकल्प 'यही ब्रह्म है', ऐसा जानकर उसकी उपासना करता है, वह
विधाता द्वारा रचित ध्रुवलोकों को स्वयं ध्रुवरूप होकर, प्रतिष्ठित लोकों को स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा
पीड़ा रहित लोकों को स्वयं पीड़ा रहित होकर पूर्णरूपेण प्राप्त करता है। जिस स्थान तक संकल्प की गति
होती है, वहाँ तक उसकी इच्छानुसार गति हो जाती है। तब नारद जी ने पूछा- हे भगवन्! क्या संकल्प से
भी कुछ श्रेष्ठ है ? सनत्कुमार जी ने कहा- हाँ है, संकल्प से भी श्रेष्ठ है। (नारद ने कहा) हे भगवन्! मुझे
उसी (श्रेष्ठ तत्त्व) का उपदेश करें॥ ३॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो यदा वै चेतयतेऽथ संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति
तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
(हे नारद!) 'चित्त' संकल्प से अधिक श्रेष्ठ है। जब व्यक्ति चिन्तन से युक्त होता है, तभी संकल्प
करता है। तदनन्तर इच्छा करते हुए वाणी एवं नाम को प्रेरित करता है। नाम मन्त्रानुरूप एवं मन्त्र कर्मानुरूप
होकर तदाकार हो जाते हैं॥ १ ॥
तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि
बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वानेत्थमचित्तः स्यादित्यथ
यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तꣳह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं
प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
(हे नारद!) संकल्प, मन, वाणी, मन्त्र, कर्म आदि सभी चित्त में विलीन होने वाले, चित्त द्वारा प्रकट
होने वाले एवं चित्त में ही स्थिर होने वाले होते हैं। यदि कोई व्यक्ति विशेष रूप से विद्वान् होते हुए भी
अचित्त (अर्थात् चिन्तनशीलता से रहित) हो, तो प्रायः लोग यही कहते हैं कि यह कुछ भी नहीं है। यदि
इसने कुछ सुना होता और इसमें विद्वत्ता होती, तो इस तरह से अचित्त नहीं होता। कोई व्यक्ति कम विद्वान्
होकर भी यदि चित्तयुक्त होता है, तो लोग उसकी बात सुनना चाहते हैं। इस प्रकार हे नारद! चित्त ही
संकल्प का (एक मात्र) उत्पत्ति केन्द्र है। तुम चित्त की ही उपासना करो ॥२ ॥
स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितो
ऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति
यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे
भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥
हे नारद! इस तरह से जो व्यक्ति चित्त की ब्रह्म रूप में उपासना करता है, वह चित्त (अर्थात् बुद्धि
युक्त गुणों) से उपचित हुए ध्रुवलोकों को स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकों को स्वयं प्रतिष्ठित होकर और
कष्ट न पाने वाले लोकों को स्वयं पीड़ा (कष्ट) न प्राप्त करते हुए सहजता से प्राप्त कर लेता है। जहाँ तक
चित्त का विषय (गति) है, वहाँ तक उसकी इच्छानुरूप गति हो जाती है। (नारद जी ने पूछा-) हे
भगवन्! क्या चित्त से भी कुछ श्रेष्ठ है ? (सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ है, चित्त से भी श्रेष्ठ है। तब नारद
जी ने कहा- हे भगवन्! मुझे वही बताने का अनुग्रह करें ॥३ ॥

अध्याय ७ खण्ड ७ मन्त्र १ १७३

अध्याय ७ खण्ड ७ मन्त्र १ १७३
॥ षष्ठः खण्डः ॥
ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव
द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महत्तां
प्राप्नुवन्ति ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ
ये प्रभवो ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद!) चित्त से उत्कृष्टतम स्थिति ध्यान की है। (ऐसा प्रतीत होता है कि) मानो पृथिवी ध्यान
करती है, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक भी मानो ध्यान में रत हैं, जल और पर्वत भी मानो ध्यान में तल्लीन हैं, देवता
और मानव भी मानो ध्यान करते हैं। इसलिए जो भी यहाँ पुरुषों में महानता को प्राप्त किये हुए हैं, वे भी
शायद ध्यान के द्वारा अर्जित किये हुए लाभ का अंश प्राप्त करते हैं; किन्तु जो संकीर्ण विचार के होते हैं,
वे कलह करने वाले, चुगलखोर और दूसरों के समक्ष ही उनकी निन्दा करने वाले होते हैं। साथ ही जो
सामर्थ्य से युक्त हैं, वे लोग भी ध्यान के ही लाभ का अंश अर्जित करने वाले हैं। अतः (हे नारद!) तुम
ध्यान की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति ध्यान को 'यह ब्रह्म ही है', इस प्रकार से समझकर उसकी उपासना करता
है, उसकी स्वेच्छानुसार गति ध्यान की गति के समान ही हो जाती है। (ऐसा सुनकर नारद जी ने पूछा)
हे भगवन्! क्या ध्यान मे भी श्रेष्ठ कुछ है? (तब सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ, ध्यान से भी श्रेष्ठ है। (नारद
जी ने कहा-) हे भगवन्! कृपया उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ सप्तमः खण्डः ॥
विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदꣳसामवेदमाथर्वणं
चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां
ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳ सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं
चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाꣳश्च मनुष्याꣳश्च पशूꣳश्च वयाꣳसि च तृणवनस्पती-
ञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं
चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥
(हे नारद!) ध्यान से भी अधिक श्रेष्ठ 'विज्ञान' है। विज्ञान द्वारा ही मनुष्य ऋग्वेद को जानता
है। यजुर्वेद, सामवेद और चतुर्थ अथर्ववेद, पञ्चम वेद इतिहास-पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प,
गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविद्या,
धनुर्वेद, ज्योतिष, सर्पविद्या, शिल्पविद्या, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य,
पशु-पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद, कीट-पतंग, पिपीलिका पर्यन्त समस्त जीव, धर्म, अधर्म, सत्य,
असत्य, साधु, असाधु, मनोज्ञ, अमनोज्ञ, अन्न, रस तथा इहलोक एवं परलोक आदि को विज्ञान द्वारा
ही जाना जाता है। (इसलिए हे नारद!) तुम विज्ञान की ही उपासना करो ॥ १ ॥

१७४ छान्दोग्योपनिषद्
स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाञ्ज्ञानवतोऽभिसिद्ध्यति
यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो
विज्ञानाद्भूय इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद!) जो (व्यक्ति) विज्ञान की ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह व्यक्ति श्रेष्ठ विज्ञान और
ज्ञान वाले लोकों को प्राप्त कर लेता है। जहाँ तक विज्ञान का सम्बन्ध है, वहाँ तक उसकी यथेच्छगति होती
है। नारद जी ने कहा- हे भगवन् ! क्या विज्ञान से भी श्रेष्ठ कुछ है? सनत्कुमार ने कहा- हाँ है। नारद जी
ने कहा- भगवन् ! मुझे उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते। स यदा
बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन्परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन्द्रष्टा
भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति। बलेन वै
पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च
वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गऽपिपीलकं बलेन लोकस्तिष्ठति
बलमुपास्स्वेति ॥ १॥
(हे नारद!) बल विज्ञान से भी अधिक श्रेष्ठ है। सौ विज्ञानवेत्ताओं को एक बलवान् व्यक्ति कँपा देता
है। जिस समय यह मनुष्य बल-सम्पन्न होता है, तभी उठने वाला भी होता है और जब उठता है, तो वह
सेवा-शुश्रूषा करने वाला होता है, जब सेवा-शुश्रूषा वाला होता है, तो समीप जाने वाला होता है, समीप
पहुँचने से दर्शन, श्रवण, मनन, जानने, अनुष्ठान एवं अनुभव करने वाला होता है। बल से ही पृथिवी स्थित
है, बल से ही अन्तरिक्ष, बल से ही द्युलोक, बल से ही पर्वत, देवता और मनुष्य, बल से ही पशु-पक्षी,
तृण वनस्पति, श्वापद और कीट- पतंग एवं पिपीलिका पर्यन्त समस्त प्राणि-समुदाय स्थित हैं तथा बल से
ही लोक स्थित है। इसलिए हे नारद ! तुम बल की उपासना करो ॥ १ ॥
सं यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
(हे नारद!) जो (व्यक्ति) बल को ब्रह्म के रूप में जानकर उसकी उपासना करता है, तो जहाँ तक
बल की गति है, वहाँ तक उस (व्यक्ति) की स्वेच्छा गति हो जाती है। (तब नारद जी ने पूछा-) क्या बल
से अधिक भी कुछ है ? (सनत्कुमार ने कहा-) बल से भी श्रेष्ठ है। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! कृपा
करके मेरे प्रति उसी श्रेष्ठ तत्त्व का वर्णन करें ॥ २ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्रीर्नाश्रीयाद्यद्युह जीवेदथवाद्रष्टाऽश्रोता -
मन्ताबोद्धाकर्ताविज्ञाता भवत्यथान्नस्यायै द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा
भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद!) अन्न बल से अधिक श्रेष्ठ है। यदि कोई व्यक्ति दस दिन तक भोजन न ग्रहण करे और

अध्याय ७ खण्ड ११ मन्त्र १ १७५

अध्याय ७ खण्ड ११ मन्त्र १ १७५
जीवित रह जाए, तब भी वह दर्शन, श्रवण, मनन, बोध, अनुष्ठान और अनुभव आदि करने में प्रायः असमर्थ
ही हो जाता है। पुनश्च यदि उसे अन्न की प्राप्ति होने लगे, तो वह दर्शन, श्रवण, मनन, बोध, अनुष्ठान एवं
अनुभूति करने में समर्थ हो जाता है। अतः (हे नारद!) तुम इस श्रेष्ठ अन्न की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्वानवतोऽभिसिद्ध्यति यावदन्नस्य गतं
तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भूय इत्यन्नाद्वाव
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
(हे नारद!) जो भी (व्यक्ति) अन्न को ही ब्रह्म के रूप में मानकर उपासना करता है, वह अन्न एवं
जल से परिपूर्ण लोकों को प्राप्त करता है। जहाँ तक अन्न की गति है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा से पहुँच
सकता है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन्! अन्न से भी उत्कृष्ट कुछ है क्या? (सनत्कुमार जी ने कहा)
हाँ है। नारद जी ने कहा- हे भगवन्! मुझे तो उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
आपो वावान्नाद्भूयस्यस्तस्माद्यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो
भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा
मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वयांसि च
तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद!) अन्न की अपेक्षा जल अधिक श्रेष्ठ है। यही कारण है कि जब अधिक वृष्टि नहीं होती,
तो प्राण इसलिए व्यथित होते हैं कि अन्न कम होगा तथा जब कभी वर्षा प्रचुर परिमाण में होती है, तो प्राण
यह विचार कर प्रसन्न होते हैं कि अन्न बहुत अधिक होगा। यह जो पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, पर्वत, देव-
मनुष्य एवं पशु-पक्षी तथा तृण-वनस्पति, श्वापद एवं कीड़े-पतंगे, पिपीलिका (चींटी) आदि स्तर के प्राणी
हैं, ये सभी मूर्तिमान् जल रूप ही हैं। इसलिए हे नारद! तुम इस श्रेष्ठ जल की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामांस्तृप्तिमान्भवति यावदपां गतं तत्रास्य
यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽद्भ्यो भूय इत्यद्भ्यो वाव
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति जल को ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करता है, वह सभी मूर्तियुक्त विषयों
को प्राप्त करके तृप्त होता है। जहाँ तक जल की गति है, वहाँ तक वह व्यक्ति अपनी इच्छा से पहुँच सकता
है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन्! क्या जल से भी अधिक श्रेष्ठ कुछ है? (सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ,
जल से भी श्रेष्ठ है। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! तब उसी श्रेष्ठ तत्त्व को मुझे बताने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाहुर्निशोचति नितपति
वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च
विद्युद्भिराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं
दर्शयित्वाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥

१७६ छान्दोग्योपनिषद्
हे नारद ! जल की अपेक्षा तेज अधिक श्रेष्ठ है। जिस समय यह वायु तत्त्व को निश्चल करके आकाश
को चारों ओर से तप्त करता है, तब सभी कहते हैं कि गर्मी बहुत अधिक हो रही है, ताप बहुत बढ़ रहा
है, अब वर्षा होगी। वह तेज ही सर्वप्रथम प्रकट होता है, तत्पश्चात् जल की रचना करता है। तेज ऊर्ध्व एवं
तिर्यक् दिशा की ओर गमन करते हुए विद्युत् के साथ गर्जना करता है। इस तेज से ही विद्युत् प्रकट होती
है, गर्जना होती है तथा प्रायः लोग कहते हैं कि वृष्टि होगी। चूँकि तेज सर्वप्रथम स्वयं प्रकट होकर जल
की रचना करता है, इस कारण हे नारद ! तुम तेज की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कान-
भिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति
भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद !) जो (व्यक्ति) तेज को ब्रह्म के रूप में समझकर उसकी उपासना करता है। वह तेजवान्,
प्रकाश और अन्धकार से रहित लोकों को प्राप्त करता है। जहाँ तक तेज की गति है, वहाँ तक उसकी
स्वेच्छानुसार गति होती है। नारद जी ने पूछा- भगवन् ! तेज की अपेक्षा कुछ अन्य श्रेष्ठ है क्या ? सनत्कुमार
ने कहा- हाँ है, इससे भी श्रेष्ठ है। तब हे भगवन् ! कृपा करके मुझे उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्नि-
राकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे
जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद !) तेज से भी अधिक उत्कृष्ट आकाश है। आकाश में ही सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत्, नक्षत्र एवं
अग्नि स्थित हैं। आकाश द्वारा ही हम आपस में एक दूसरे को बुलाते हैं, आकाश द्वारा ही श्रवण करते हैं।
आकाश के माध्यम से ही प्रतिश्रवण करते हैं। आकाश में ही सभी क्रीड़ा करते और नहीं भी करते हैं।
(सभी पदार्थों) की उत्पत्ति आकाश में ही होती है तथा आकाश में ही (जीव एवं अङ्कुर) अभिवर्द्धित होते
हैं। अतः हे नारद ! तुम आकाश तत्त्व की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसं-
बाधानुरुगायवतोऽभिसिद्ध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य
आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे
भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति आकाश को 'यही ब्रह्म है' ऐसा मानकर उसकी उपासना करता है। वह
प्रकाशवान्, आकाशवान्, कष्टरहित तथा अति विस्तृत लोकों को प्राप्त करता है। जिस क्षेत्र तक आकाश
की सीमा है, वहाँ तक उसकी स्वेच्छा से गति (पहुँच) हो जाती है। (ऐसा सुनकर नारद जी ने प्रश्न
किया-) हे भगवन् ! क्या आकाश से भी श्रेष्ठ है? सनत्कुमार ने कहा- हाँ है, आकाश से भी श्रेष्ठ है।
(नारद जी ने कहा-) तो भगवन् ! कृपा करके मुझे आप उसी तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥

अध्याय ७ खण्ड १४ मन्त्र २ १७७

अध्याय ७ खण्ड १४ मन्त्र २ १७७
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कंचन शृणुयुर्न
मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै
पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून् स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
हे नारद ! स्मरण आकाश से अधिक श्रेष्ठ है। इसी से जहाँ बहुत से व्यक्ति (किसी स्थान विशेष पर)
बैठे हुए हों; किन्तु फिर भी स्मरण न करने पर वे सभी न कुछ सुन सकने में, न मनन कर सकने में और
न ही कुछ विशेष जान सकने में समर्थ हो सकते हैं, जब वे सभी स्मरण करते हैं, तभी वे सुन सकने में
समर्थ हो सकते हैं, तभी मनन और विशेष जानकारी प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। स्मरण मात्र से ही
मनुष्य अपने बच्चों और पशुओं को पहचानता है। (इसलिए हे नारद!) तुम स्मरण की उपासना करो ॥१ ॥
स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः
स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे
भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
(हे नारद!) जो (व्यक्ति) स्मरण (स्मर) की 'यही ब्रह्म है' अर्थात् ब्रह्म रूप में उपासना सम्पन्न
करता है। जहाँ तक (स्मर) स्मरण का विषय (सीमा) है, वहाँ तक उस (व्यक्ति) की गति (पहुँच) हो
जाती है। (इस प्रकार सुनने के पश्चात् नारद जी ने प्रश्न किया-) हे भगवन् ! क्या स्मरण से भी श्रेष्ठ कुछ
है ? (तब सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ है, इससे भी श्रेष्ठ है। नारद बोले- हे भगवन् ! कृपा करके उसी
श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
आशा वाव स्मराद्भूयस्याशद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्राँश्च
पशूँश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥
हे नारद ! स्मरण की अपेक्षा आशा कहीं अधिक श्रेष्ठ है। आशा द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हुआ स्मृतिभूत
वह (व्यक्ति) स्मरण करता हुआ ही मन्त्रों के पाठ में संलग्न होता है। अपने कर्मों में रत हुआ पुत्र एवं
पशुओं की तथा लोक एवं परलोक की भी इच्छा करता रहता है। (अतः हे नारद!) तुम इस श्रेष्ठतर वस्तु
आशा की उपासना करो ॥ १ ॥
स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशायास्य सर्वे कामाः समृद्ध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो
भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव
आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति आशा को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता है, उसके सभी उद्देश्य आशा
के माध्यम से पूर्ण होते हैं। प्रायः उसकी प्रार्थना सफल होती है। जहाँ तक आशा की गति (सीमा) है,
वहाँ तक उस व्यक्ति की इच्छानुकूल पहुँच हो जाती है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन् ! आशा से भी क्या
अधिक श्रेष्ठ कुछ होता है ? (सनत्कुमार ने कहा-) हाँ है, आशा से भी अधिक श्रेष्ठ है। तब भगवन् ! मुझे
उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥

॥ पञ्चदशः खण्डः ॥

१७८ छान्दोग्योपनिषद्
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं:
समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो
माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥
(हे नारद !) प्राण आशा से अधिक श्रेष्ठ है। जिस तरह रथ के पहिये के केन्द्र में ‘अरे’ प्रतिष्ठित रहते
हैं, ठीक उसी तरह प्राण तत्त्व में सम्पूर्ण विश्व समाहित है। प्राण अपनी ही शक्ति द्वारा प्रस्थान करता है,
समाहित प्राण ही प्राण को प्रदान करता है तथा प्राण के लिए ही प्रदान करता है। प्राण ही पिता, प्राण ही
माता, प्राण ही भाई, प्राण ही बहिन, प्राण ही आचार्य तथा प्राण ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है ॥ १ ॥
स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किंचिद्
भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै
त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥
यदि कोई (व्यक्ति) अपने पिता, माता, भाई, बहिन, आचार्य अथवा ब्राह्मण के प्रति अशिष्टतापूर्ण
व्यवहार करता है, तो उसको देखने एवं सुनने वाले उसे अपमानित करते हुए कहते हैं कि तुझे धिक्कार है।
सचमुच ही तू अपने माता व पिता को मारने वाला है, भ्रातृघाती है, बहिन की हत्या करने वाला है, आचार्य
का हनन करने वाला है और तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है ॥ २ ॥
अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न
मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्थहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥
परन्तु जिन लोगों के प्राण निकल गये हैं, उन माता, पिता आदि समस्त परिवारिजनों को यदि वह
व्यक्ति शूल से संहृत कर एवं छिन्न-भिन्न करके जला देता है (कपाल क्रिया आदि करता है), तो भी उसे
कोई यह नहीं कहता है कि तू पिता का हत्यारा, माता का हत्यारा, भाई का हत्यारा, बहिन का हत्यारा एवं
आचार्य का घात करने वाला है अथवा ब्रह्म का घाती है ॥ ३ ॥
प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी
भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४॥
(हे नारद !) इस प्रकार माता-पिता आदि के रूप में प्राण ही होते हैं। इसलिए जो (व्यक्ति) प्राणों को
इस तरह से अनुभव करता है, चिन्तनयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी होता है, वही ‘अतिवादी’ कहा जाता है।
यद्यपि कोई भी उसे ‘अतिवादी’ कहे, तो फिर उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वास्तव में मैं अतिवादी
हूँ। इस तथ्य को उसे छुपाना नहीं चाहिए ॥ ४ ॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं
त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
(हे नारद !) जो व्यक्ति सत्य के कारण अतिवाद करता है, वह अवश्य ही अतिवाद करने
वाला है। (तब नारद जी ने कहा)- हे भगवन् ! मैं तो सत्य के कारण ही अतिवाद करता हूँ।

अध्याय ७ खण्ड २० मन्त्र १ १७९

अध्याय ७ खण्ड २० मन्त्र १ १७९
(सनत्कुमार जी ने कहा-) सत्य को विशेष रूप से जानना चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे
भगवन्! मैं विशेष प्रकार से सत्य को ही आत्मसात् करता हूँ॥ १ ॥
॥ सप्तदशः खण्डः ॥
यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन् सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति
विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद !) जब व्यक्ति सत्य को विशेष रूप से जानने में समर्थ हो जाता है,
तब वह सत्य भाषण करता है। बिना जाने वह सत्य नहीं बोलता, वरन् विशेष रूप से जानने वाले सत्य का
ही प्रतिपादन करता है। इसलिए हे नारद ! विज्ञान की ही विशेष रूप से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
(नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं विशेष प्रकार से सत्य को ही आत्मसात् करता हूँ॥ १ ॥
॥ अष्टादशः खण्डः ॥
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव
विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार जी ने नारद जी को समझाते हुए कहा- हे नारद !) जब मनुष्य मनन करता है, तब
कुछ विशेष जानकारियाँ प्राप्त करने में सक्षम होता है। बिना मनन किये कोई भी व्यक्ति कुछ भी नहीं
जान पाता, वरन् मनन करने के पश्चात् ही जान पाता है। इसलिए हे नारद ! विशेष रूप से मति की ही
जिज्ञासा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! मैं मति के सम्बन्ध में विशेष जानकारी
प्राप्त करने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥
॥ एकोनविंशः खण्डः ॥
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञा-
सितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद !) (जब मनुष्य को किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान विशेष के प्रति)
श्रद्धा उत्पन्न होती है, तब वह मनन करता है, श्रद्धा के अभाव में वह मननशील नहीं हो सकता। श्रद्धालु
(व्यक्ति) ही मननशील हो सकता है। इसलिए हे नारद ! श्रद्धा को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी
चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं श्रद्धा के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥
॥ विंशः खण्डः ॥
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा
त्वेव विजिज्ञासितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद जी से कहा-) हे नारद! जब मनुष्य की (किसी व्यक्ति विशेष के
प्रति) निष्ठा (जागृत) होती है, तभी वह उसके प्रति श्रद्धावनत होता है, निष्ठा के अभाव में कोई भी
(व्यक्ति) श्रद्धायुक्त नहीं होता; बल्कि निष्ठावान् (व्यक्ति) ही श्रद्धा करने वाला होता है, (इसलिए हे
नारद !) निष्ठा को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं
निष्ठा को विशेष रूप से जानने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥

॥ एकविंशः खण्डः ॥

१८० छान्दोग्योपनिषद्
॥ एकविंशः खण्डः ॥
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव
विजिज्ञासितव्येति। कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥
(सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद!) जब मनुष्य कोई कार्य विशेष करता है, तब वह (उसके प्रति)
निष्ठावान् हो जाता है। बिना कार्य किये (व्यक्ति) की निष्ठा (उत्पन्न) नहीं होती। मनुष्य कर्म करने पर ही
निष्ठावान् होता है। इसलिए (हे नारद!) कृति (अर्थात् इन्द्रियों का संयम और चित्त की एकाग्रता) को
विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं कृति को ही विशेष
रूप से जानने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥
॥ द्वाविंशः खण्डः ॥
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति
सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति। सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद!) जिस समय व्यक्ति को सुख की प्राप्ति होती है, उस समय वह
कर्म करता है, सुख के अभाव में कोई भी व्यक्ति कार्य नहीं करता, वरन् सुख प्राप्त करके ही (कुछ विशेष
पाने की आशा) करता है। (इसलिए हे नारद!) सुख को ही प्राप्त करने की तथा उसे विशेष रूप से जानने
की इच्छा करनी चाहिए। (नारद बोले-) हे भगवन्! मैं सुख प्राप्ति की ही विशेष रूप से जिज्ञासा करता हूँ॥
॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति
भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥
(सनत्कुमार जी ने कहा-) हे नारद! निश्चय ही जो भूमा (महान्, निरतिशय) है, वही सुख
है। अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही सुख स्वरूप है। (अतः हे नारद!) भूमा की ही विशेष रूप से
जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं भूमा (निरतिशय) को ही
विशेष रूप से जानने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥
॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्य-
त्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यँ स भगवः
कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्रीति ॥ १ ॥
(सनत्कुमार जी नारद जी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- हे नारद!) जहाँ अन्य कुछ न देखता
है, न अन्य कुछ सुनता है और न ही अन्य कुछ जानता है, वही भूमा है; परन्तु इसके विपरीत जहाँ अन्य
कुछ देखता है, अन्य कुछ सुनता है तथा कुछ अन्य जानकारी रखता है, वह अल्प है। इस प्रकार से जो
भूमा है, वही अमृत है तथा जो अल्प है, वह ही मर्त्य है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन्! भूमा किसमें
स्थित है ? (सनत्कुमार जी ने कहा-) भूमा अपनी महिमा में स्थित है और वास्तव में तो वह उसमें भी
स्थित नहीं है अर्थात् वह अवलम्बन रहित है ॥ १ ॥

अध्याय ७ खण्ड २६ मन्त्र १ १८१

अध्याय ७ खण्ड २६ मन्त्र १ १८१
गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं
ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
(हे नारद!) इस संसार में तो गौ, अश्व आदि को ही महिमा कहा जाता है। साथ ही हाथी, सुवर्ण,
दास, भार्या (पत्नी), भूमि (क्षेत्र) और घर आदि को भी महिमा के नाम से जाना जाता है; किन्तु यह मेरा
कथन नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्य में स्थित होता है- मैं तो यही कहता हूँ। इस प्रकार से सनत्कुमार
जी ने नारद जी से कहा॥ २॥
[ सनत्कुमार जी लौकिक महिमा और भूमा की महिमा में अन्तर भर स्पष्ट करना चाहते हैं, वैसे आगे भूमा
के बारे में पुनः बतला रहे हैं।]
॥ पञ्चविंशः खण्डः ॥
स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेद१सर्व-
मित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतो-
ऽहमुत्तरतोऽहमेवेद१ सर्वमिति ॥ १ ॥
(हे नारद!) वही (भूमा) नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे एवं आगे भी है, वही दायीं ओर और
वही बायीं ओर भी है। वह (भूमा) ही यह सब कुछ है। उसी (भूमा) में अहंकारवश (व्यक्तिभाव से)
इस तरह से कहते हैं- मैं ही ऊपर, मैं ही नीचे एवं मैं ही दायीं और मैं ही बायीं ओर हूँ। मैं ही दक्षिण की
ओर तथा ऊपर की ओर हूँ। मैं ही सभी ओर से विद्यमान हूँ॥ १ ॥
अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत
आत्मोत्तरत आत्मैवेद१ सर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्म-
रतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो
भवति। अथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषा१ सर्वेषु
लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥
(हे नारद!) इस तरह से सत्य स्वरूप आत्मा के रूप में ही भूमा का आदेश किया जाता है। आत्मा
ही आगे-पीछे, दायीं-बायीं ओर व्याप्त है। यह आत्मा ही सब कुछ है। वह (ज्ञानी पुरुष) इस आत्मा को
इस प्रकार से देखने वाला, मनन करने वाला और विशेष रूप से इस भाँति से जिज्ञासा वाला आत्मरति
(आत्मा में ही क्रीड़ा करने वाला) और आत्मा में ही मिथुन एवं आत्मा में ही आनन्दानुभूति करने वाला
होता है। वह ही स्वराट् (स्वप्रकाशित) है, समस्त भुवनों (लोकों) में उसकी इच्छानुसार गति होती है;
किन्तु जो इससे विपरीत देखते हैं, वे ही अन्यराट् और क्षय्यलोक को प्राप्त होते हैं। उन (व्यक्तियों) की
स्वेच्छानुसार गति नहीं होती ॥ २ ॥
॥ षड्विंशः खण्डः ॥
तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत
आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत
आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतोबलमात्मतोविज्ञानमात्मतो ध्यानमा-