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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१

शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१
में तथा महः स्वरूप ब्रह्म में अधिष्ठित होता है। (ब्रह्मवेत्ता साधक) अपने राज्य में अधिष्ठित होता है, वह सम्पूर्ण मन
का स्वामी, वाणी, नेत्रों, कर्णों और विज्ञान का स्वामी हो जाता है। पूर्वोक्त साधन का यह फल मिलता है। वह ब्रह्म
आकाश के सदृश विशाल है। वह सत्यरूप आत्म तत्त्व है, वह प्राणों को विश्राम देने वाला, मन को आनन्द देने वाला,
शान्त और अमृत स्वरूप है। वही सर्वथा पुरातन पुरुष उपासना के योग्य है॥ १-२॥
[ इन्द्र शासक-संगठक के प्रतीक हैं। मनुष्य शरीर में स्थित देवता स्वरूप प्राण धाराओं को नियमित करने
की सामर्थ्य सहस्रार एवं ब्रह्मरन्ध्र में सन्निहित होने से उसे इन्द्र योनि कहा गया है।]
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
इस अनुवाक में ऋषि ने पाँच-पाँच तत्त्वों की विभिन्न पंक्तियों-शृंखलाओं का उल्लेख किया है और उन्हें एक
दूसरे का पूरक कहा है-
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप
ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान
उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसः स्नावास्थिमज्जा। एतदधि-
विधाय ऋषिरवोचत्। पाङ्क्तं वा इदं सर्वम्। पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तः स्पृणोतीति॥ १॥
पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ तथा अवान्तर दिशाएँ (दिशाओं के बीच के कोण) यह लोकों की
पंक्ति है। अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा तथा समस्त नक्षत्र (यह ज्योति श्रृंखला में है)। जल, ओषधियाँ,
वनस्पतियाँ, आकाश तथा आत्मा (यह काया से सम्बद्ध है), यह आधिभौतिक वर्णन हुआ। अब आध्यात्मिक
वर्णन करते हैं- प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान (यह प्राण समूह है)। चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी तथा
त्वचा (यह करणों-इन्द्रियों की पंक्ति है)। चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा (यह शरीर के धातु समूह में
है)। यह परिपूर्ण कल्पना करते हुए ऋषि ने कहा है- यह सब पंक्तियों का समूह है। पंक्तियों से ही
पंक्तियों की पूर्ति होती है॥ १॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्या-
श्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओऽशोमिति शस्त्राणि शःसन्ति। ओमित्यध्वर्युः
प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति
ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति। ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥
ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत् की) अनुकृति है। हे आचार्य!
ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके सामगायक सामगान करते हैं।
ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता
है। ॐ कहकर अग्निहोत्र आरम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ब्रह्म को प्राप्त
करने की बात कहता है। ॐ के द्वारा वह ब्रह्म को प्राप्त करता है॥ १॥
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने
च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने

२०२ तैत्तिरीयोपनिषद्
च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च
स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च
स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥ ९ ॥
सत्य आचरण, सत्यवाणी के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। तपश्चर्या,
इन्द्रियों के दमन, मन के निग्रह के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। प्रजा उत्पत्ति,
प्रजनन, प्रजा-वृद्धि के कर्म के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। रथीतर के पुत्र
सत्यवचा ऋषि कहते हैं- सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है। पुरुशिष्ट के पुत्र तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं-तप
ही सर्वोत्तम है। मुद्गल के पुत्र नाक मुनि कहते हैं- शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन ही सर्वश्रेष्ठ
है, क्योंकि वही तप है, वही तप है ॥ ९॥
[ यहाँ ऋषि ने मनुष्य के लिए स्वाध्याय की अनिवार्यता प्रकट की है।]
॥ दशमोऽनुवाकः ॥
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि।
द्रविणः सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्॥ १॥
मैं विश्व वृक्ष का उच्छेदक हूँ। मेरा यश गिरि शिखर के सदृश ऊँचा है। अन्नोत्पादक सूर्य में व्याप्त
अमृत के सदृश मैं भी अतिपवित्र अमृत स्वरूप हूँ। मैं तेजोयुक्त सम्पदावान्, उत्तम मेधावान् और अमृत
से अभिषिक्त हूँ - यह त्रिशङ्कु ऋषि की ज्ञान-अनुभव से युक्त वाणी है॥ १ ॥
॥ एकादशोऽनुवाकः ॥
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न
प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न
प्रमदितव्यम्। देव पितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्॥ १॥ मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो
इतराणि। यान्यस्माकंः सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ॥ २ ॥ नो इतराणि। ये के
चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयाऽऽसने न प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽ
देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते
कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता
आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः।
अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः
स्युः। यथा ते तेषु वर्तेरन्। तथा तेषु वर्तेथाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्।
एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥