१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ६ खण्ड ४ मन्त्र ६ १५९
अध्याय ६ खण्ड ४ मन्त्र ६ १५९
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रि-
वृत्तृिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥४॥
उस देवता ने उन सभी में से हर एक को अलग-अलग त्रिवृत् अर्थात् तीन भागों में किया। हे पुत्र! जिस
प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके (हर एक) त्रिवृत् (कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल रूप ) हैं, वह मैं जानता हूँ ॥४॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
यदग्ने रोहितꣳ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं
वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १॥
तीन प्रकार से अलग-अलग की हुई अग्नि का जो रोहित (लाल) वर्ण है, वह तेज प्रकाश का ही रूप
है। जो श्वेत वर्ण है, वह जल तत्त्व का रूप है और जो कृष्ण वर्ण है, वह अन्न तत्त्व का रूप है। इस भाँति
अग्नि से अग्नित्व पृथक् हो गया, क्योंकि 'अग्नि' शब्द तो मात्र विकार वाणी से कहने के लिए नाम मात्र
है। सत्य तो मात्र तीन रूप ही हैं॥ १॥
यदादित्यस्य रोहितꣳरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्या-
पागादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २॥
आदित्य का जो रोहित (लालिमा युक्त) वर्ण है, वह प्रकाश का ही रूप है, जो शुक्ल वर्ण है, वह जल
तत्त्व का रूप है और जो कृष्ण वर्ण है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है। अतः आदित्य से आदित्यत्व अलग हो
गया, क्योंकि आदित्य रूप विकार वाणी पर आश्रित नाम मात्र है, मात्र तीन रूप ही सत्य स्वरूप हैं॥ २॥
यच्चन्द्रमसो रोहितꣳ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापा-
गाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३ ॥
चन्द्रमा में जो रोहित वर्ण है, वह प्रकाश का रूप है, जो श्वेत वर्ण है, वह जल का है और जो कृष्ण
वर्ण है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है। इस तरह चन्द्रमा चन्द्रत्व से निवृत्त हो गया। अतः विकार वाणी पर
आश्रित नाम मात्र ही है, सत्य तो मात्र केवल तीन रूप ही हैं॥ ३॥
यद्विद्युतो रोहितꣳ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो
विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥
विद्युत् का जो लाल वर्ण है, वह एक मात्र तेज (प्रकाश) का ही रूप है। जो शुक्ल वर्ण है, वह जल
का स्वरूप है और जो काला वर्ण है वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है। इसलिए विद्युत् से विद्युत्त्व अलग हो
गया, क्योंकि विद्युत् रूप विकार वाणी पर आश्रित नाम मात्र ही है, तीन रूप ही केवल सत्य हैं॥ ४॥
एतद्ध स्म वै तद्विद्वाꣳस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुत-
ममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदांचक्रुः ॥ ५॥
इस प्रकार (त्रिवृत् के वर्गीकरण) का ज्ञान रखने वाले अतीतकालीन महागृहस्थ और महाश्रोत्रियों ने
कहा कि वर्तमान काल में हमारे वंश में कोई बात अश्रुत और अविज्ञात है- ऐसा कोई भी नहीं कहेगा।
अतः इन अग्नि आदि तत्त्वों के उदाहरण द्वारा वे लोग सभी कुछ जानते थे ॥ ५॥
यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां
रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदांचक्रुः ॥ ६॥
१६० छान्दोग्योपनिषद्
जो कुछ उन्हें रोहित सा (लाल रंग की भाँति) प्रतीत होता है, वह तेज का ही रूप है, जो कुछ शुक्ल
सा प्रतीत होता है, वह जल का रूप है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है, ऐसे सभी रूपों
की जानकारी उन्होंने प्राप्त की ॥ ६ ॥
यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाः समास इति तद्विदांचक्रुर्यथा नु खलु
सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥
इसके अतिरिक्त जो कुछ भी विशेष रूप से स्वीकार नहीं किया गया, वह भी इन तीनों देवों का ही
समूह है, ऐसी जानकारी उन्होंने प्राप्त की। उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! मेरे द्वारा यह जानो, कि किस प्रकार
ये तीनों देवता शरीर एवं इन्द्रियों के संघात रूप पुरुषत्व को प्राप्त करके तीन प्रकार से पृथक्-पृथक् हो जाते
हैं। (यह क्रम अगले खण्ड में स्पष्ट किया गया है।) ॥ ७ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं
योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥
जो अन्न भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है, वह तीन भागों में बँट जाता है। उस अन्न का जो
स्थूलतम पदार्थ है, वह मल रूप में परिवर्तित हो जाता है, जो मध्यम अंश है, वह रसादि से युक्त होकर
मांस के रूप में परिवर्तित हो जाता है और जो अति सूक्ष्म है, वह मन के रूप में परिणत हो जाता है ॥१॥
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं
योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥
जो जल ग्रहण किया जाता है, वह तीन प्रकार से विभक्त हो जाता है। उस (जल) का स्थूल भाग
मूत्र बनता है, मध्यम अंश रक्त के रूप में परिवर्तित हो जाता है और सूक्ष्म अंश प्राण बन जाता है ॥ २ ॥
तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स
मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥
जो तेज ग्रहण किया जाता है, वह भी तीन रूपों में विभाजित हो जाता है। उस (तेज) का स्थूल भाग
हड्डी के रूप में, मध्यम भाग मज्जा के रूप में और अत्यन्त सूक्ष्म अंश वाणी के रूप में परिणत हो जाता है ॥
अन्नमयः हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा
भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥
उद्दालक ने पुनः कहा- 'हे सोम्य ! अन्न का कार्य मन, जल का कार्य प्राण और तेज का कार्य वाणी
है।' श्वेतकेतु ने कहा- 'हे भगवन् ! आप कृपा करके यह बात पुनः स्पष्ट करने की कृपा करें।' तब उद्दालक
ने फिर से मार्गदर्शन देने हेतु उसे आश्वस्त किया ॥ ४ ॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥
श्वेतकेतु के पिता उद्दालक ने पुनः कहा- हे सोम्य ! दही को मथने के पश्चात् उसका जो सूक्ष्म भाग
एकत्रित होता है, वही ऊर्ध्व की ओर गमन करते हुए घृत के रूप में परिणत होता है ॥ १ ॥