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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ६ खण्ड १५ मन्त्र १ १६७

अध्याय ६ खण्ड १५ मन्त्र १ १६७
'नमकीन है।' तत्पश्चात् पिता के कहने पर जल पात्र के नीचे से जल लेकर पान किया। पिता के द्वारा 'कैसा है?' पूछने पर
उसने बताया कि 'नमकीन है।' उद्दालक ने कहा- 'अच्छा तुम इस जल को बाहर फेंक कर हमारे पास आ जाओ।' उसने
पिता के कहने पर वैसा ही किया और कहा उस सम्पूर्ण जल में नमक पूर्ण रूप से मिला हुआ था। तत्पश्चात् आरुणि ने कहा-
हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तुम सत् तत्त्व को देखने में असमर्थ हो, फिर भी वह यहाँ पर पूर्ण रूप से विद्यमान है ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
आरुणि ने कहा- हे सोम्य ! इसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अति सूक्ष्म रूप से सत् तत्त्व आत्मा में
विद्यमान है, यही सत्य है। हे श्वेतकेतो ! ठीक वैसे ही तुम स्वयं भी सत्य स्वरूप हो। तब उसने फिर कहा
भगवन् ! आप पुनः समझाएँ। पिता ने अच्छा कहकर पुनः उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र
प्राङ्वोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥
उद्दालक ने पुनः एक पुरुष के दृष्टान्त द्वारा श्वेतकेतु को समझाते हुए कहा- हे सोम्य ! जिस प्रकार
किसी पुरुष की आँखें बाँधकर गान्धार देश से अन्यत्र किसी निर्जन क्षेत्र में लाकर छोड़ दें, तो वह वहाँ
चतुर्दिक् पूर्व, उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम दिशा की ओर मुँह करके करुण क्रन्दन करता है। वह चिल्लाते हुए
कहता है कि मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाकर छोड़ दिया गया है ॥ १ ॥
तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं
पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव
चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति ॥ २ ॥
यदि कोई दूसरा पुरुष वहाँ आकर उसकी आँखों के बन्धन खोलकर उसे यह बतलाये कि 'गान्धार'
अमुक दिशा में है। अमुक की ओर प्रस्थान कर जाओ। तब वह बुद्धिमान् एवं उपदिष्ट हुआ व्यक्ति एक
गाँव से दूसरे गाँव को पूछते हुए क्रमशः अपने मूल स्थान यानी गान्धार देश को प्राप्त कर लेता है। ठीक
वैसे ही इस लोक में सदाचारवान् व्यक्ति ही सत् को समझ पाता है। उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्ति में उतनी ही
देर लगती है, जितने तक शरीर के बन्धन से मुक्ति नहीं मिल जाती। इसके अनन्तर तो वह पुरुष सत् युक्त
ब्रह्म के अनुरूप हो जाता है अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! यह समस्त जगत् अणु रूप सूक्ष्म सत् तत्त्व से युक्त है। वह ही सत् स्वरूप है। वह ही
आत्म स्वरूप है। हे श्वेतकेतो ! तुम भी उसी सत् तत्त्व से युक्त हो। इस प्रकार सुनते ही उस (श्वेतकेतु) ने
कहा- भगवन् ! पुनः बताने की कृपा करें। तब उद्दालक ने अच्छा कहते हुए उसे पुनः आश्वस्त किया ॥३ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
पुरुषं सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न
वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥

१६८ छान्दोग्योपनिषद्
हे सौम्य ! ज्वरादि से अत्यधिक संतप्त एवं मरणासन्न स्थिति में पहुँचते हुए पुरुष के चारों ओर उसके
बन्धु-बान्धव एवं निकट परिवारीजन बैठकर पूछते हैं- क्या तुम मुझे पहचानते हो ? क्या तुम मुझे जानते
हो ? तो उस व्यक्ति की वाणी जब तक मन में लीन नहीं होती, मन प्राण में, प्राण तेज में तथा तेज परमदेव
तत्त्व में विलीन नहीं हो जाता, तब तक वह सबको जानता रहता है ॥ १ ॥
अथ यदास्य वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ।
तदनन्तर जब उस व्यक्ति की वाणी मन में विलीन हो जाती है, मन प्राण में, प्राण तेज में एवं तेज
उस परमदेव तत्त्व में मिल जाता है, तब वह व्यक्ति किसी को भी पहचान पाने में असमर्थ रहता है ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सौम्य ! वह (अणुरूप) जो अणिमा आदि तत्त्व है, तदनुरूप ही यह सब कुछ है। वही सत्य है और वही
आत्मतत्त्व है। हे सौम्य ! उसी सत् तत्त्व से युक्त स्वयं तुम भी हो। उद्दालक के इस तरह कहने पर श्वेतकेतु ने कहा-
हे भगवन् ! पुनः बताने की कृपा करें। तब उसके पिता ने 'अच्छा' कहते हुए उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि
तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं
तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥
(आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को अपराधी व्यक्ति द्वारा तप्त कुल्हाड़े को ग्रहण करने के उदाहरण द्वारा
समझाते हुए कहते हैं)- हे सौम्य ! जब किसी दोषी व्यक्ति को हाथ बाँधकर (राज्य कर्मचारी) लाते हुए
कहते हैं कि 'इसने चोरी की है', इसके लिए परशु तप्त करो। वह यदि सचमुच उसका (चोरी का) करने
वाला होता है तथा असत्य भाषण कर, अपने किये हुए कृत्य को आवरण में रखता है, तो उस तप्त परशु
को ग्रहण करते ही, वह जलते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येना-
त्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥
यदि वह व्यक्ति चोरी करने वाला नहीं होता, तो उसी परशु से स्वयं को सत्य प्रमाणित करता है। वह अपने
आप को सत्य से ढककर उस परशु को पकड़ लेता है और जब उस परशु से नहीं जलता, तो छोड़ दिया जाता है ॥
[ इस समय अपने भाव से स्वयं को आवृत कर लेने की क्षमता लुप्तप्राय हो गयी है, फिर भी उसके प्रमाण
मिलते हैं। किसी पीड़ित व्यक्ति को सहायता करते समय वास्तविक प्रेम सम्पन्न व्यक्ति को कष्ट नहीं होता; किन्तु
प्रेम का ढोंग करने वाले को कष्ट अनुभव होता है।]
स यथा तत्र नादाह्यैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति
तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ३ ॥
हे सौम्य ! जैसे वह व्यक्ति उस परीक्षा के समय तप्त परशु से नहीं जलता है, वैसे ही सत् तत्त्व को प्राप्त करने
वाले विद्वान् पुनर्जन्म से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यह समस्त विश्व सत् स्वरूप है। वह ही आत्मा है। हे श्वेतकेतो ! उसी
सत् तत्त्व से सम्पन्न तुम स्वयं हो। तब श्वेतकेतु ने कहा भगवन् ! मैं उस सत् तत्त्व को जान गया हूँ-जान गया हूँ ॥