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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २० २९९

अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २० २९९
आप एव यस्यायतनꣲ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणꣲ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣲ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ
य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥
शाकल्य बोले- जल ही उसका आयतन (देह), हृदय ही लोक और मन ही ज्योति है। उस
सर्वभूतान्तरात्मा को जो जानता है, वह ब्रह्मज्ञानी होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा- मैं निश्चित ही उसका ज्ञान
रखता हूँ, जिसे तुम सर्वभूतान्तरात्मा कहते हो, वह जल स्थित पुरुष ही है। हे शाकल्य! और पूछो,
शाकल्य ने कहा- उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- उसके देवता वरुण हैं ॥ १६ ॥
रेत एव यस्यायतनꣲ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणꣲ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣲ सर्वस्यात्मनः परायणं
यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति
होवाच ॥ १७ ॥
शाकल्य ने कहा- वीर्य ही जिसका शरीर (आयतन) है, हृदय ही जिसका लोक है, मन ही जिसकी
ज्योति है, उस सर्वभूताश्रय पुरुष को जो जानता है, वह सर्वज्ञाता होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा- उस पुरुष
को मैं भली-भाँति जानता हूँ, जिसे आप सर्वभूतों का आश्रय कहते हो, वह पुत्ररूप पुरुष है। हे शाकल्य !
और प्रश्न करो- शाकल्य के पूछने पर कि उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- प्रजापति ॥
शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यस्त्वाꣲ स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमक्रता ३ इति ॥ १८ ॥
याज्ञवल्क्य ने शाकल्य से कहा- हे शाकल्य ! इन ब्राह्मणों ने तुम्हें ही निश्चित रूप से अङ्गारे हटाने
का चिमटा बनाया है ॥ १८ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म
विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यदिशो वेत्थ सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥
शाकल्य ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! जो आप कुरु और पांचाल देश के ब्राह्मणों पर आरोप लगाकर उन्हें तिरस्कृत
करते हैं, क्या स्वयं को ब्रह्मवेत्ता मानकर ऐसा करते हैं ? याज्ञवल्क्य जी बोले-मुझे देवताओं और प्रतिष्ठा के सहित
दिशाओं का ज्ञान है। शाकल्य बोले-यदि आपको देवता और प्रतिष्ठा सहित दिशाओं का ज्ञान है ॥ १९ ॥
किंदेवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति
चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु
रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि
प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥
तो यह बताएँ कि पूर्व दिशा में आप किस देवता से युक्त हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- वहाँ मैं आदित्य
देवता से युक्त हूँ। शाकल्य ने पुनः पूछा- वह आदित्य किसमें स्थित है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- चक्षु में।
शाकल्य ने पूछा- चक्षु किसमें प्रतिष्ठित हैं ? ऋषि ने कहा- रूप में, क्योंकि चक्षुओं के द्वारा ही पुरुष रूपों
को देखता है। शाकल्य ने पूछा- रूप किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- हृदय में, क्योंकि हृदय के
द्वारा ही पुरुष को रूपों का ज्ञान होता है। शाकल्य ने कहा यह सत्य है ॥ २० ॥

३०० बृहदारण्यकोपनिषद्
किं देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति
यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति
श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायाः ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति
कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा
प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥
शाकल्य ने पूछा- दक्षिण दिशा में आप किस देवता से युक्त हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- यम देवता से। शाकल्य
ने पूछा-वह यम देवता किसमें स्थित है? उत्तर मिला श्रद्धा में। श्रद्धा किसमें स्थित है? ऋषि ने कहा-हृदय में,
क्योंकि हृदय के द्वारा ही पुरुष श्रद्धा को जानता है। शाकल्य ने कहा-हे याज्ञवल्क्य ! यह सत्य है ॥ २१ ॥
किंदेवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन्प्रतिष्ठित
इत्यप्स्विति कस्मिन्नापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति
तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं
भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥
शाकल्य ने आगे कहा-पश्चिम दिशा में आप किस देवता वाले हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा-पश्चिम दिशा
में मैं वरुण देवता से युक्त हूँ। शाकल्य ने पूछा- वरुण किसमें प्रतिष्ठित है ? ऋषि ने उत्तर दिया-जल में।
जल किसमें स्थित है ? उत्तर मिला-वीर्य में। तब शाकल्य ने पूछा- वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य
ने कहा-हृदय में। इसलिए तो पिता के अनुरूप उत्पन्न पुत्र के लिए लोग कहते हैं कि ये मानो पिता के हृदय
से निकला है, पिता के हृदय से ही निर्मित हुआ है। शाकल्य ने कहा-यह भी यथार्थ ही है ॥ २२ ॥
किंदेवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति
दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति
सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि
सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥
शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से पूछा-आप उत्तर दिशा में किस देवता से सम्पन्न हैं। याज्ञवल्क्य ने कहा- सोम देवता
से। शाकल्य ने पूछा- सोम किसमें स्थित है ? ऋषि ने कहा-दीक्षा में। दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य ने
कहा- सत्य में। सत्य किसमें विद्यमान है ? ऋषि ने कहा-हृदय में। क्योंकि व्यक्ति हृदय से ही सत्य को जान पाता
है, अतः सत्य हृदय में ही प्रतिष्ठित है। तब शाकल्य ने कहा-हे याज्ञवल्क्य ! यह भी ठीक है ॥ २३ ॥
किंदेवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति वाचीति
कस्मिन्नु वाक् प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥
शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से पूछा- आप ध्रुव दिशा में किस देवता से युक्त हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा-
अग्निदेव से युक्त हूँ। प्रश्न किया गया- अग्निदेव किसमें प्रतिष्ठित है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- वाक्
शक्ति में। पुनः प्रश्न हुआ कि वाक् किसमें स्थित है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- वाक् हृदय में प्रतिष्ठित
है। इस पर शाकल्य ने पूछा- फिर हृदय किसमें स्थित है ? ॥ २४ ॥