१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ३ खण्ड ६ मन्त्र ४ १९५
अध्याय ३ खण्ड ६ मन्त्र ४ १९५
तद्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥
वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ और वह आदित्य के ऊर्ध्व भाग में आश्रित हुआ। आदित्य
के मध्य भाग में जो उद्वेलित होता हुआ संचरित हो रहा है, यह वही है ॥ ३ ॥
ते वा एते रसानाँ रसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि
वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥
वे श्वेत, कृष्ण, रोहित आदि रूप ही रसों के रस हैं, वेद ही रस हैं और वे उनके भी रस हैं। वे ही
अमृतों के अमृत हैं- वेद ही अमृत हैं और वे उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥
[ प्रथम से पाँचवें खण्ड तक आदित्य के पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर भागों तथा ऊर्ध्व भाग में स्थित रसों
का वर्णन किया गया है। सूर्य के दृश्य स्थूल रंगों के साथ कुछ सूक्ष्म चेतन प्रवाह भी जुड़े हुए हैं, ऐसा ऋषि ने कहा
है। सूर्य के रोहित, श्वेत रंग विभाग तो सहज ही समझ में आ जाते हैं। कृष्ण और अतिकृष्ण क्या है ? यह सूर्य के
वे विभाग ही सकते हैं, जिन्हें पदार्थ विज्ञानी सौर कलंक कहते हैं। इन पाँच खण्डों में सूर्य के पूर्वादि विभागों में
विशेष प्रवाहों की स्थापना का वर्णन किया गया है। आगे के ५ खण्डों में ( ६ से १० तक) सूर्य के उन्हीं भागों
से उसी प्रकार अमृत प्रवाहों के प्रकट होने तथा उसके प्रभाव आदि का वर्णन किया गया है। ]
॥ षष्ठः खण्डः ॥
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
इनमें जो (रोहित वर्ण का) प्रथम अमृत है, वसुगण अग्नि देव के मुख से संयुक्त होकर उसमें
जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे केवल इस अमृत को देखकर ही तृप्ति
को प्राप्त कर लेते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे वसुगण इस रूप से ही विश्रान्ति पाते हैं और उसी से उत्साहित भी होते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य
एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो इस प्रकार इस अमृत रूप को जानता है, वह वसुगणों में ही कोई एक होता है। वह अग्नि (यज्ञ)
के साथ संयुक्त होकर इस अमृत रूप को देखकर ही तृप्त हो जाता है। इसी रूप से वह ध्यानस्थ (अक्रिय)
होता है और इसी से उत्साहित भी होता है ॥ ३ ॥
[ ऋषि कहते हैं कि वसुओं द्वारा प्रवाहित अमृत तत्त्व को साधकों में स्थित वसु ही जान पाते हैं। आगे के
खण्डों में इसी प्रकार रुद्र आदि के बारे में कहा गया है। उपनिषदों का यह मत है ही कि विराट् में स्थित देवों के
अंश मनुष्य के अन्दर में स्थित हैं। अस्तु, वे अपने समानधर्मी प्रवाहों से सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। सुदूर अन्तरिक्ष
यानों में स्थित विभिन्न उपकरणों को उनके अनुरूप विशेष फ्रीकैन्सी सिगनल भेजकर सक्रिय या निष्क्रिय कर
दिया जाता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्दर स्थापित विशिष्ट सर्किट (चक्र) देव प्रवाह अन्तरिक्षीय तत्सम प्रवाहों
से जागृत् या सुप्त अवस्था को प्राप्त होते हैं।]
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥
जब तक सूर्य अपने पूर्व पक्ष से उदित होता है और उसका पश्चिम भाग अस्त होता है, तब तक
वसुगणों के अधिकार और स्वाराज्य के भागों का उपभोग करता है ॥ ४ ॥
११६ छान्दोग्योपनिषद्
[ छठवें से दसवें खण्ड तक सूर्य के उदय एवं अस्त की प्रक्रिया में विभिन्न दिशाओं का उल्लेख किया गया
है। अधिकांश आचार्यों ने उन दिशाओं को पृथ्वी की दिशाएँ मानकर अर्थ करने के प्रयास किए हैं, जो विवेक को
संतुष्ट नहीं कर पाते। ये दिशाएँ पृथ्वी की दिशाएँ नहीं हैं। जैसा कि पूर्व खण्डों में स्पष्ट लिखा है कि विशिष्ट दिव्य
प्रवाहों की स्थापना सूर्य के विशिष्ट ( पूर्वादि नामक ) भागों में हुई है। यहाँ सूर्य के उन्हीं भागों से विशिष्ट अमृत
प्रवाहों के प्रकट होने की बात कही गयी है। आदित्य के पूर्व से उदय का भाव यह लिया जाना चाहिए कि जब
आदित्य का पूर्व वाला भाग दृश्य होता है और पश्चिम वाला अदृश्य ( अस्त ) होता है, उस समय तक वसुगणों का
तथा उनसे सम्बद्ध अमृत प्रवाह का प्रभाव वातावरण एवं साधक पर रहता है। आगे के खण्डों में भी इसी प्रकार
सूर्य के अन्य दक्षिण, पश्चिम आदि भागों के उदय-अस्त का भाव लिया जाना उचित है।]
।। सप्तमः खण्डः ।।
अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न
पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
यह जो शुक्लरूप द्वितीय अमृत है, रुद्रगण इन्द्रदेव के नेतृत्व में संयुक्त होकर उसमें जीवन धारण
करते हैं। वे देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतरूप को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इस रूप को देखकर ही अक्रिय ( ध्यानस्थ ) हो जाते हैं और इसी को देखकर उत्साहित भी होते हैं॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स
एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो साधक इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह रुद्रगणों में से कोई एक होकर इन्द्रदेव के नेतृत्व
में इस अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप को देखकर ही अक्रिय हो जाता है और इसी को
देखकर उत्साहित होता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता
रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
जब तक आदित्य अपने पूर्व भाग से उदित होता और पश्चिम से अस्त होता है, उससे दुगुने समय तक
उसका दक्षिण भाग उदित होता है और उत्तर भाग अस्त होता है। उतने समय तक वह ( साधक) रुद्रगणों
के ही अधिकार एवं स्वाराज्य को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
।। अष्टमः खण्डः ।।
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न
पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
अब यह जो कृष्ण रूप तृतीय अमृत है, आदित्यगण वरुणदेव के नेतृत्व में उसमें जीवन धारण करते
हैं। वे देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे इस अमृत को देखकर ही तृप्ति का अनुभव करते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इसी रूप से विश्रान्ति पाते हैं और इसी से उत्साहित हो जाते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति
स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥