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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ३ ८७

अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ३ ८७
तेन तꣳहायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ॥ १२ ॥
आयास्य ऋषि ने भी प्राण के रूप में ही उद्गीथ की उपासना की थी, अतः मनुष्य इस प्राण को ही
आयास्य मानते हैं, क्योंकि यह प्राण आस्य अर्थात् मुख से निष्क्रमण करता है ॥ १२ ॥
तेन तꣳह बको दाल्भ्यो विदांचकार। स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः
कामानागायति ॥ १३॥
दल्भ ऋषि के पुत्र बक नामक ऋषि ने प्राण के रूप में उद्गीथ अर्थात् ॐकार की उपासना की ।
वे ऋषि नैमिषारण्य में यज्ञ करने वाले ऋषियों के उद्गाता हुए। उन्होंने ऋषियों की कामनाओं की पूर्ति के
लिए उद्गान किया ॥ १३ ॥
[ जिसने उद्गीथ साधना की है, ऐसे साधक यज्ञादि कार्यों के समक्ष उनके संकल्प के अनुरूप अपने प्राणों
को तरंगित करके उसी भाव से पूरे वातावरण को भर देने में समर्थ होते थे।]
आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४॥
इस प्रकार इस तथ्य को जानने वाला जो विद्वान् इस अक्षर ब्रह्म ॐकार की उपासना करता है, वह
कामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है। यह (शरीर की) आध्यात्मिक उपासना का वर्णन है॥ १४॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति
उद्यꣳस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
अब आधिदैविक उपासना का वर्णन करते हैं- तपःशील आदित्य के रूप में उद्गीथ की उपासना
करनी चाहिए। यह उदित होकर मनुष्यों के लिए उद्गान अर्थात् प्राणों का संचार करता है। उदित होकर
यह अज्ञानरूपी अन्धकार और उससे उत्पन्न होने वाले भय का नाश करता है। जो इस प्रकार जानता है, वह
तमस् और सर्वविध भय का नाश करने वाला होता है ॥ १ ॥
[ ईश्वर ने आदित्य को जो प्राण सम्पदा दी है, उसे वह उत्कृष्ट प्रयोजनों के लिए ही प्रकट करता है। उसे
आदर्श मानकर अपने प्राणों को गति देने वाला साधक उक्त सिद्धि प्राप्त करता है। ]
समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयममुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर
इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥
यह प्राण और वह सूर्य दोनों ही समान हैं। यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है। इस प्राण को
स्वर कहते हैं और उस सूर्य को भी स्वर एवं (अस्तकाल में) प्रत्यास्वर कहते हैं। अतः इस प्राण और उस
सूर्य रूप में उद्गीथ (ओंकार) की उपासना करनी चाहिए ॥ २ ॥
अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ
यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन्वाच-
मभिव्याहरति ॥ ३ ॥
व्यान नामक शरीरस्थ प्राण के रूप में उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। मनुष्य श्वास के द्वारा जो
भीतर की वायु बाहर निकालता है, वह प्राण है; और बाहर की वायु जो अन्दर खींचता है, वह अपान है।
जो प्राण और अपान की सन्धि है, वह व्यान है। व्यान ही वाणी है। इसीलिए जब मनुष्य बोलता है, तब
वह प्राण तथा अपान की क्रिया नहीं करता है ॥ ३ ॥

८८ छान्दोग्योपनिषद्

[ प्राण तत्त्व की प्राण-अपान क्रियाएँ स्वचालित ( आटोमैटिक ) हैं। व्यान में संकल्प पूर्वक प्राण नियोजन
दिशा विशेष में होता है। साधना क्रम में प्राण को संकल्प पूर्वक उत् -उच्च आदर्शों की दिशा में तरंगित करना
उद्गीथ है। यह क्रिया प्राण एवं अपान क्रियाओं का रोध करके की जाती है। अगले मंत्रों में इस विषय को और
भी स्पष्ट किया गया है।]

या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्नपानन्साम
गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्नपानन्नुद्गायति ॥ ४॥

जो वाणी है, वही ऋक् है। इसलिए मनुष्य श्वास-प्रश्वास की क्रिया न करते हुए भी ऋक् का उच्चारण
करता है। जो ऋक् है, वही साम है। इसी से मनुष्य श्वास-प्रश्वास की क्रिया न करते हुए भी सामगान करता
है। जो साम है, वही उद्गीथ है। इसीलिए मनुष्य श्वास-प्रश्वास न करते हुए भी उद्गीथ का गान करता है॥

अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष
आयमनमप्राणन्नपानन्स्तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ ५॥

इसके अतिरिक्त जो अन्यान्य पराक्रमयुक्त कर्म हैं, जैसे-अग्नि मन्थन, किसी विशिष्ट लक्ष्य तक
दौड़ना, दृढ़ धनुष को खींचना इन सब कर्मों को भी मनुष्य श्वास-प्रश्वास को रोककर ही करता है। अतः
व्यान के रूप में ही उद्गीथ की उपासना करना चाहिए ॥ ५॥

अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो ह
गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितम् ॥ ६ ॥

'उद्गीथ' शब्द के अक्षरों से भी उद्गीथ की उपासना की जाती है। उद्गीथ शब्द में 'उत्' प्राण का
पर्याय है, क्योंकि प्राण की शक्ति से प्राणी उठते हैं। वाणी ही 'गी' अक्षर है, क्योंकि वाणी को 'गिरा'
कहते हैं। 'थ' अक्षर अन्न है, क्योंकि अन्न के आश्रय से सम्पूर्ण प्राणी स्थित-जीवित हैं ॥ ६ ॥

[ उद्गीथ साधना से शरीर में इन्द्रियों में स्थित अन्न रूप प्राण, कर्म में व्यक्त प्राण ( व्यान ) तथा ऊर्ध्व गति
देने वाले मुख्य प्राण तीनों को साधना अनिवार्य है। प्रकृति में भी विभिन्न रूपों में धारक, व्यक्त और उन्नायक प्राण
प्रवाहों के संयोग से उद्गीथ साधना का मर्म आगे कहा गया है।]

द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्यः सामवेद एवोद्यजुर्वेदो
गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवान्नादो भवति य एतान्येवं
विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७॥

ऊँचा होने से द्यौ ही 'उत्' है, अन्तरिक्ष 'गी' है और पृथिवी 'थ' है। आदित्य ही 'उत्' है, वायु ही
'गी' है और अग्नि ही 'थ' है। सामवेद ही 'उत्' है, यजुर्वेद 'गी' है और सामवेद 'थ' है। जो विद्वान्
उद्गीथ के इन अक्षरों के तत्त्व को इस प्रकार जानता है, उसके लिए वाणी वेदों आदि का रहस्य प्रकट कर
देती है और वह भोगों को प्राप्त करने वाला तथा भोगने की शक्ति वाला होता है ॥ ७ ॥

आगे यह स्पष्ट किया गया है कि उद्गीथ का साधक सफलता के लिए अपने भावों को एकनिष्ठ रखे।
सामगान- स्तुतिगान करने वाले की भाव-साधना, आत्म साधना का स्पष्ट उल्लेख है-

अथ खल्वाशीः समृद्धिरुपसरणीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ।

अपने अभीष्ट ध्येय की उपासना करनी चाहिए। इससे निश्चयपूर्वक अभीष्ट कामनाओं की समृद्धि प्राप्त
होती है। उद्गाता जिस साम के द्वारा उपासना करना चाहता है, वह उसी साम का चिन्तन सर्वदा करे ॥ ८ ॥