श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गृहीतो दम्यमानस्तु यथास्वस्थस्तु जायते।<br>तथा समीरणोऽस्वस्थो दुराधर्षश्च योगिनाम् ॥ ५२ | दुराधर्ष होते हैं। जैसे उन्हें पकड़कर उनका दमन किये जानेपर वे अस्वस्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार यह दुराधर्ष प्राणवायु भी योगियोंके द्वारा वशमें किये जानेपर अस्वस्थ हो उठता है अर्थात् अव्यवस्थित हो जाता है॥ ५१-५२॥ |
| न्यायतः सेव्यमानस्तु स एवं स्वस्थतां व्रजेत् ।<br>यथैव मृगराड् नागः शरभो वापि दुर्मदः ॥ ५३ | नियमपूर्वक अभ्यास किये जानेपर वह वायु उसी प्रकार स्वस्थताको प्राप्त हो जाता है, जैसे मतवाले सिंह, हाथी तथा शरभ अभ्यासपूर्वक युक्तिसे दमित किये जानेपर अपने अधीन हो जाते हैं॥ ५३॥ |
| कालान्तरवशाद्योगाद्गम्यते परमादरात् ।<br>तथा परिचयात्स्वास्थ्यं समत्वं चाधिगच्छति ॥ ५४ | जैसे नियमतः नियन्त्रण करनेपर शनैः-शनैः अपनी उग्रताको त्यागकर ये सिंहादि आदरपूर्वक वशमें हो जाते हैं, वैसे ही यह प्राणवायु भी शनैः-शनैः अभ्याससे अपनी अस्वस्थताको छोड़कर समत्वभावको प्राप्त हो जाता है॥ ५४॥ |
| योगादभ्यस्यते यस्तु व्यसनं नैव जायते ।<br>एवमभ्यस्यमानस्तु मुनेः प्राणो विनिर्दहेत् ॥ ५५<br><br>(चित्र)<br><br>मनोवाक्कायजान् दोषान् कर्तुर्देहं च रक्षति।<br>संयुक्तस्य तथा सम्यक्प्राणायामेन धीमतः ॥ ५६ | जो पुरुष योगपूर्वक अभ्यास करता है, उसके चित्तमें व्यसन उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार सततं अभ्यास करनेपर प्राणायामसे उस योगीके मन-वचन तथा कर्मसे जायमान सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और इस प्राणायामसे इसे करनेवाले उस बुद्धिमान् योगीके देहकी भलीभाँति रक्षा भी होती है॥ ५५-५६॥ |
| दोषात्तस्माच्च नश्यन्ति निःश्वासस्तेन जीर्यते।<br>प्राणायामेन सिध्यन्ति दिव्याः शान्त्यादयः क्रमात् ॥ ५७ | उस प्राणायामके सतत अभ्याससे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। साथ ही श्वास (प्रश्वास)-की गति भी न्यून होती जाती है। इस प्रकार प्राणोंके [श्वासोंके] नियन्त्रणसे क्रमशः दिव्य शान्ति आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं॥ ५७॥ |
| शान्तिः प्रशान्तिर्दीप्तिश्च प्रसादश्च तथा क्रमात् ।<br>आदौ चतुष्टयस्येह प्रोक्ता शान्तिरिह द्विजाः ॥ ५८<br>सहजागन्तुकानां च पापानां शान्तिरुच्यते ।<br>प्रशान्तिः संयमः सम्यग्वचसामिति संस्मृता ॥ ५९ | हे द्विजो! अब मैं क्रमसे शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसादका वर्णन करूँगा। आरम्भमें इन चारोंमेंसे यहाँ पहले शान्तिके विषयमें कहता हूँ। सहज तथा आगन्तुक पापोंका नाश शान्ति कहा जाता है तथा वाणीपर भली-भाँति संयम प्रशान्ति कहा गया है॥ ५८-५९॥ |
| प्रकाशो दीप्तिरित्युक्तः सर्वतः सर्वदा द्विजाः ।<br>सर्वेन्द्रियप्रसादस्तु बुद्धेर्वै मरुतामपि ॥ ६०<br>प्रसाद इति सम्प्रोक्तः स्वान्ते त्विह चतुष्टये ।<br>प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ ६१ | हे द्विजो! सभी तरहसे सर्वदा प्रकाशकी स्थितिको दीप्ति कहा गया है। सभी इन्द्रियों, बुद्धि तथा प्राणवायु आदिकी प्रसन्नताको इस चतुष्टयमें 'प्रसाद' कहा गया है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, |