शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३७
अन्तर मुख के पञ्चमांशतुल्य होना चाहिये । दोनों कर्णों का अन्तर भी सदृश तथा कर्ण और नेत्र का अन्तर भी उसी प्रकार से होता है ।
भूस्थयोः शफयोः प्रोक्तं तदेतत् कर्णसंमितम् ।
मणिनेत्रप्रान्तरं च भ्रुवोरन्तरमेव हि ॥ ६८ ॥
सक्थ्यङ्गुलं तृतीयांशं नासानेत्रान्तरं तथा ।
त्रिभागपूरणं प्रोथः सोष्ठश्च परिकीर्तितः ॥ ६९ ॥
नासारन्ध्रान्तरं चैव तद्-दैर्घ्येनवमांशकम् ।
कायो नरार्धविस्तारस्त्रिके हृदयसंमितः ॥ ७० ॥
चतुर्थांशं तु हृदयं बाहुमूलादधः स्मृतम् ।
षष्ठांशमन्तरं बाह्वोर्हृत्समीपे प्रकीत्तितम् ॥ ७१ ॥
और भूमिस्थित दोनों खुरों का जो यह अन्तर है वह कर्ण के मान के तुल्य कहा हुआ है । मणि और नेत्र का अन्तर, दोनों भौंहों का अन्तर तथा नासिका और नेत्र का अन्तर सक्थि (ऊरु) के अंगुलों का तृतीयांश तुल्य मान समझना चाहिये । और ओष्ठ के सहित मुख का अग्रभाग मुख के मान के तृतीयांशतुल्य कहा हुआ है । तथा दोनों नासिकाओं के छिद्रों का अन्तर उन दोनों की लम्बाई के मान के तृतीयांश तुल्य मानवाला होता है । शरीर मनुष्य के विस्तार से आधा विस्तारवाला, पृष्ठवंश (रीढ़) के नीचे भाग में हृदय (वक्षस्थल) के समान विस्तार होता है तथा हृदय बाहुमूल के नीचे चतुर्थांश तुल्य कहा हुआ है । हृदय के समीप में दोनों बाहुओं का अन्तर षष्ठांश तुल्य होता है ।
अधरोष्ठोऽनुचिबुकं सार्धाङ्गुलमथोन्नतम् ।
शोभते चोन्नतग्रीवो नतपृष्ठः सदा हयः ॥ ७२ ॥
यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तस्तद्विम्बं वीक्ष्य सर्वतः ।
अदृष्ट्वा कस्य यद्रूपं न कर्तुं क्षमते हि तत् ॥ ७३ ॥
शिल्प्यग्रे वाजिनं ध्यात्वा कुर्यादवयवानतः ।
दिशाऽनया च विभूतेः सर्वमानानि वाजिनाम् ॥ ७४ ॥
अधरोष्ठ चिबुक तक डेढ़ अंगुल उन्नत होता है । और घोड़ा सदा उन्नत ग्रीवा तथा नत पृष्ठवाला शोभायमान होता है । जिसकी आकृति बनाने के लिये जो उद्यत हो वह सब तरफ से देखकर उसके बिम्ब (प्रतिकृति) को करे । किसी का जो रूप हो उसको बिना देखकर उसकी प्रतिकृति बनाने के लिये कोई समर्थ नहीं हो सकता है । अतः शिल्पी (मूर्तिकार) प्रथम घोड़े का ध्यान कर पश्चात् उसके अङ्गों को बनावे । इसी रीति से घोड़ों के अवयवों के सभी मानों की कल्पना करे ।
२२ शु०
| ३३८ | शुक्रनीतिः |
|---|
श्मश्रुहीनमुखः कान्तः प्रगल्भोत्तुङ्गनासिकः ।
दीर्घोद्धतग्रीवमुखो ह्रस्वकुक्षिखुरश्रुतिः ॥ ७५ ॥
तुरप्रचण्डवेगश्च हंसमेघसमस्वनः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुर्देवसत्त्वो मनोरमः ॥ ७६ ॥
उत्तम अश्व के अन्य लक्षण— जिस घोड़े के मुख पर बाल न हों एवं सुन्दर मुख तथा शब्द हो और नासिका ऊंची हो, तथा गर्दन और मुख लम्बे एवं कुछ उठे हुये हों, पेट, खुर एवं कान छोटे हों, अत्यन्त शीघ्र और प्रचण्ड वेग हो, हंस तथा मेघ के समान शब्द हो और स्वभाव न अत्यन्त क्रूर तथा न अत्यन्त मृदु ही हो, देवताओं के घोड़ों के समान उत्तम पराक्रम हो—ऐसा घोड़ा मन को मोहित करनेवाला अतएव उत्तम होता है ।
सुकान्तिगन्धवर्णश्च सद्गुणभ्रमरान्वितः ।
घोड़ों की कान्ति, गन्ध और वर्ण सुन्दर एवं अच्छे गुणवाले भौंरी ( भ्रमर ) होनी चाहिये ।
भ्रमरस्तु द्विधावर्त्तो वाम-दक्षिणभेदतः ॥ ७७ ॥
पूर्णोऽपूर्णः पुनर्द्वेधा दीर्घो ह्रस्वस्तथैव च ।
अश्व के भौंरी के दो भेद— और भौंरी का घुमाव वाम तथा दक्षिण भेद से दो प्रकार का होता है पुनः प्रत्येक के पूर्ण तथा अपूर्ण एवं दीर्घ और ह्रस्व भेद से दो २ प्रकार होते हैं ।
स्त्रीपुंदेहे वामदक्षौ यथोक्तफलदौ क्रमात् ॥ ७८ ॥
घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल— उक्त भौंरियां तभी यथोक्त उत्तम फल देनेवाली होती हैं जब कि वे क्रम से घोड़ी के बाएँ तथा घोड़े के दाहिनी ओर हों ।
न तथा विपरीतो तु शुभाशुभफलप्रदौ ।
अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश— यदि उक्त प्रकार से विपरीत हों अर्थात् उक्त स्थान ( दायें-बायें ) से अन्यत्र कहीं पर हों तो शुभ या अशुभ कोई फल नहीं देनेवाली होती है ।
नीचोर्ध्वतिर्यङ्मुखतः फलभेदो भवेत्तयोः ॥ ७९ ॥
भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद— यदि भौंरियों का मुख नीचा, ऊंचा या तिरछा हो तो तदनुसार फल में भी भेद हो जाता है ।
शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-वेदि-स्वस्तिकसन्निभः ।
प्रासादतोरणधनुःसुपूर्णकलशाकृतिः ॥ ८० ॥
स्वस्तिकस्रङ्मीनखड्गश्रीवत्साभः शुभ्रो भ्रमः ।
शुभ भौंरी के लक्षण— भौंरी शंख, चक्र, गदा, पद्म, वेदी या स्वस्तिक
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३९
(卐), के चिह्न की किंवा प्रासाद, तोरण, धनुष या पूर्ण कलश के आकार की होती है और स्वस्तिक, माला, मत्स्य, खङ्ग तथा श्रीवत्स के समान आकारवाली भौंरी शुभ मानी जाती है।
नासिकाग्रे ललाटे च शङ्खे कण्ठे च मस्तके ॥ ८१ ॥
आवर्त्तॊ जायते येषां ते धन्यास्तुरगोत्तमाः ।
**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता—**जिन घोड़ों की नासिका के अग्रभाग, ललाट, शङ्ख (कनपटी), कण्ठ या मस्तक में भौंरो हो वे धन्य तथा घोड़ों में 'उत्तम' माने जाते हैं।
हृदि स्कन्धे गले चैव कटिदेशे तथैव च ॥ ८२ ॥
नाभौ कुक्षौ च पार्श्वाग्रे मध्यमाः संप्रकीर्तिताः ।
**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमत्ता—**जिनके हृदय, स्कन्ध (कन्धा), गळा, कमर, नाभि, कुक्षि (उदर) तथा पार्श्व के अग्रभाग में भौंरी होती है वे घोड़े 'मध्यम' माने जाते हैं।
ललाटे यस्य चावर्त्तद्वितयस्य समुद्भवः ॥ ८३ ॥
मस्तके च तृतीयस्य पूर्णहर्षोऽश्व उत्तमः ।
**'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिसके ललाट में दो भौरियां हों और तीसरी मस्तक में हों वह 'पूर्णहर्ष' (पूर्ण हर्ष देनेवाला) उत्तम अश्व माना जाता है।
पृष्ठवंशे यदावर्त्तो यस्यैकः संप्रजायते ॥ ८४ ॥
स करोत्यश्वसंघातान् स्वामिनः सूर्यसंज्ञकः ।
**'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिस अश्व के पृष्ठवंश (रीढ़) के ऊपर एक भौंरी हो वह 'सूर्यसंज्ञक' कहा जाता है एवं वह अपने स्वामी के यहां आने पर बहुत से घोड़ों को एकत्र कर देता है।
त्रयो यस्य ललाटस्था आवर्त्तास्तिर्यगुत्तराः ॥ ८५ ॥
त्रिकूटः स परिज्ञेयो वाजिवृद्धिकरः सदा ।
**अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के ललाट में तीन भौरियां हों और तिरछे मुखवाली हों तो उसे 'त्रिकूट' संज्ञक कहते हैं, जो सदा स्वामी के यहां घोड़ों की वृद्धि करनेवाला होता है।
एवमेव प्रकारेण त्रयो ग्रीवां समाश्रिताः ॥ ८६ ॥
समावर्त्ताः स बाजीशो जायते नृपमन्दिरे ।
**अन्य भौरियों से युक्त अश्वों के लक्षण—**इसी तरह से यदि अश्व की ग्रीवा में ३ भौरियां हों तो वह अश्व श्रेष्ठ राजमन्दिर में ही रहता है अर्थात् ऐसा यदि किसी के पास रह जाय तो स्वामी को राजा बना दे।
३४० शुक्रनीतिः
कपोलस्थौ यदावर्त्तौ दृश्येते यस्य वाजिनः ॥ ८७ ॥
यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ राज्यवृद्धिकरौ मतौ ।
एको वाऽथ कपोलस्थो यस्यावर्त्तः प्रदृश्यते ॥ ८८ ॥
सर्वनामा स विख्यातः स इच्छेत् स्वामिनाशनम् ।
यशोवर्द्धक तथा 'सर्व' संज्ञक अश्व के लक्षण— यदि किसी अश्व के दोनों कपोलों पर दो भौरियां हों तो स्वामी के लिये वे दोनों यश तथा राज्य की वृद्धि करनेवाली मानी गई हैं । जिस अश्व के एक ही कपोल पर एक ही भौरी हो वह 'सर्व' संज्ञक होता है तथा स्वामी का नाश चाहता है ।
गण्डसंस्थो यद्यावर्त्तो वाजिनो दक्षिणाश्रितः ॥ ८९ ॥
स करोति महासौख्यं स्वामिनः शिवसंज्ञकः ।
तद्वामाश्रितः क्रूरः प्रकरोति धनक्षयम् ॥ ९० ॥
शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण— जिसके दक्षिण गण्डस्थल पर एक भौंरी हो वह 'शिव' संज्ञक अश्व स्वामी के लिये महा सुखकारी होता है । इसी प्रकार से बायें गण्डस्थल पर यदि भौंरी हो तो वह अश्व 'क्रूर' संज्ञक होता है तथा धनक्षयकारक होता है ।
इन्द्राख्यौ तावुभौ शस्तौ नृपराज्यविवृद्धिदौ ।
इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— यदि गण्डस्थल के दोनों ओर भौरियां पड़ी हों तो वे 'इन्द्र' संज्ञक होती हैं और उत्तम एवं राजा के राज्य की वृद्धि करनेवाली होती हैं ।
कर्णमूले यदावर्त्तौ स्तनमध्ये तथाऽपरौ ॥ ९१ ॥
विजयाख्यावुभौ तौ तु युद्धकाले यशःप्रदौ ।
विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— अश्व के कर्ण के मूल भाग में दो तथा स्तन के मध्य में दो भौरियां हों तो ये दोनों 'विजय' संज्ञक होती हैं और युद्ध काल में विजय दिलाने से यशप्रद होती हैं ।
स्कन्धपार्श्वे यदावर्त्तौ स भवेत् पद्मैलक्षणः ॥ ९२ ॥
करोति विविधान् पद्मान् स्वामिनः सततं सुखम् ।
पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— दोनों स्कन्ध के पार्श्व भाग में यदि भौंरी हों तो उसे 'पद्म' संज्ञक कहते हैं । ऐसा अश्व स्वामी के सुख की सदा वृद्धि करता है एवं विविध प्रकार से पद्मसंख्यक धन का आगमन कराता है ।
नासामध्ये यदावर्त्त एको वा यदि वा त्रयम् ॥ ९३ ॥
चक्रवर्ती स विज्ञेयो वाजी भूपालसंज्ञकः ।
भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसकी नासिका के मध्य में
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४१
यदि १ या ३ भौरियां हों तो वह 'भूपाल' संज्ञक अश्व होता है जो स्वामी को चक्रवर्ती राजा बना देता है ।
कण्ठे यस्य महावर्त्त एकः श्रेष्ठः प्रजायते ॥ ६४ ॥
चिन्तामणिः स विज्ञेयश्चिन्तितार्थसुखप्रदः ।
चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसके कण्ठ में श्रेष्ठ एक बड़ी-सी भौंरी हो वह अश्व 'चिन्तामणि' संज्ञक होता है जो अभिलषित अर्थ तथा सुख को देनेवाला होता है ।
शुक्लाख्यौ भालकण्ठस्थौ आवर्तौ वृद्धिकीर्तिदौ ॥ ६५ ॥
शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिस अश्व के ललाट तथा शंख देश में जो भौरियां होती हैं वे दोनों 'शुक्ल' संज्ञक होती हैं और राज्य-धनादि की वृद्धि तथा कीर्ति को देनेवाली होती हैं ।
यस्यावर्त्तौ वक्त्रगतौ कुद्यन्ते वाजिनो यदि ।
स नूनं मृत्युमाप्नोति कुर्याद् वा स्वामिनाशनम् ॥ ६६ ॥
अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण— जिस अश्व के कुक्षि के अन्त भाग में यदि टेढ़ी दो भौरियां हों तो वह निश्चय स्वयं मर जाय या अपने स्वामी का नाश करे ।
जानुसंस्था यदावर्त्तः प्रवासक्लेशकारकाः ।
वाजिमेढ़े यदावर्त्तो विजयश्रोविनाशनः ॥ ६७ ॥
जिस अश्व के जानुओं ( घुट्टों ) पर ३ भौरियां हों, उनसे स्वामी को परदेश में विशेष क्लेश होता है । घोड़े के यदि लिङ्ग में भौंरी हो तो वह विजय और श्री ( लक्ष्मी ) का नाशक होता है ।
त्रिकसंस्थो यदावर्त्तस्त्रिवर्गस्य प्रणाशनः ।
पुच्छमूले यदावर्त्तो धूमकेतुरनर्थकृत् ॥ ६८ ॥
धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण फल— जिसकी पीठ के त्रिकस्थान में भौंरी हो तो वह त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम ) का नाशक होता है । घोड़े के पूंछ के मूल में जो भौंरी हो, वह 'धूमकेतु' संज्ञक है तथा अनर्थकारक होता है ।
गुह्यपुच्छत्रिकावर्ती स कृतान्तो भयप्रदः ।
कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल— जिस घोड़े की गुदा, पूंछ तथा त्रिकस्थान में भौंरी हो वह 'कृतान्त' संज्ञक होता है जो कि भयदायक होता है ।
मध्यदण्डा पार्श्वगमा सैव शतपदी कचे ॥ ६९ ॥
अतिदुष्टाङ्गुष्ठमिता दीर्घा दुष्टा यथा यथा ।
घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल— जिसकी पूंछ दोनों पाश्र्वों की ओर जावे और मध्य में दण्ड के आकार का चिह्न हो एवं यह एक अंगुष्ठ बराबर लम्बा
| ३४२ | शुक्रनीतिः |
|---|
हो तो उसे 'मध्यदण्डा' या 'शतपदी' कहते हैं यह अत्यन्त दुष्ट मानी जाती है। उसके बाद जैसे २ वह लम्बी होती जाती है वैसे २ उसकी दुष्टता नष्ट होकर शुभ फल देनेवाली होती जाती है ।
अश्रुपातो हनुगण्डहृद्गलप्रोथवस्तिषु ॥ १०० ॥
कटिशङ्खजानुमुष्क-ककुन्नाभिगुदेषु च ।
दक्षकुकौ दक्षपादे त्वशुभो भ्रमरः सदा ॥ १०१ ॥
**भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के हनु ( ठोढ़ी ), गण्डस्थल, हृदय, गला, प्रोथ ( मुखाग्रभाग ), बस्तिस्थान, कमर, शंख ( कनपटी ), जानु ( घोटू ), मुष्क ( अण्डकोश ), ककुद् ( पीठ पर उभरा हुआ स्थान ), नाभि, गुदा, में भौंरी हो तो अश्रुपातकारक होती है और दक्षिण कुक्षि या दक्षिण पेट में हो तो वह सदा अशुभ फल देनेवाली मानी जाती है।
गलमध्ये पृष्ठमध्ये उत्तरोष्ठेऽधरे तथा ।
कर्णनेत्रान्तरे वामकुक्षौ चैव तु पार्श्वयोः ॥ १०२ ॥
ऊरुषु च शुभावतौ वाजिनामग्रपादयोः ।
**आवत्तं भौरियों के शुभप्रद स्थानों का निर्देश—**अश्व के गले या पीठ के मध्य में, ऊपर या नीचे के ओष्ठ, कर्ण और नेत्र के मध्य में, बाईं कुक्षि, दोनों पार्श्व, दोनों ऊरु, या दोनों अगले पांवों में, भौरियाँ हों तो बड़ी शुभ देने वाली होती हैं।
आवर्तौ सान्तरौ भाले सूर्य्यचन्द्रौ शुभप्रदौ ॥ १०३ ॥
मिलितौ तौ मध्यफलौ ह्यतिलग्नौ तु दुष्फलौ ।
**सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश—**और भाल में यदि कुछ अन्तर पर दो भौरियाँ हो तो वे सूर्य-चन्द्र संज्ञक होती हैं तथा 'उत्तम' शुभ फल देने वाली होती हैं यदि कुछ सटी हुई हों तो 'मध्यम' शुभ फल देनेवाली एवं अत्यधिक सटी हुई हों तो 'दुष्ट' फल देनेवाली होती हैं।
आवर्तत्रितयं भाले शुभं चोर्ध्वं तु सान्तरम् ॥ १०४ ॥
अशुभं चातिसंलग्नमावर्त्तद्वितयं तथा ।
त्रिकोणत्रितयं भाले आवर्तानां तु दुःखदम् ॥ १०५ ॥
गलमध्ये शुभस्त्वेकः सर्वाशुभनिवारणः ।
**शुभाशुभ फलप्रद भौंरी के स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के भाल में ऊपर की ओर ३ भौरियां अलग २ हों तो शुभ फलप्रद होती हैं। यदि भाल में दो भौरियां अत्यन्त सटी हुई हों तो अशुभ फलप्रद होती हैं। और भाल में
चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४३
यदि त्रिकोणाकार ३ भौरियां हों तो दुःखप्रद होती हैं। गले के मध्य में यदि एक भौंरी हो तो वह शुभ फलप्रद और समस्त अशुभ फलों को दूर करने वाली होती है।
अधोमुखः शुभः पादे भाले चोर्ध्वमुखो भ्रमः ॥ १०६ ॥
न चैवात्यशुभा पृष्ठमुखी शतपदी मता।
पैर में अधोमुख एवं भाल में ऊर्ध्वमुख भौंरी शुभ होती है पीठ की ओर मुखवाली जो 'शतपदी' होती है वह अत्यन्त अशुभ फल देनेवाली नहीं होती है।
मेढ्रस्य पश्चाद् भ्रमरी स्तनी बाजी स चाशुभः ॥ १०७ ॥
और जिस अश्व के लिङ्ग के पीछे भौंरी या स्तन हो, वह अशुभ फलप्रद होता है।
भ्रमः कर्णसमीपे तु शृङ्गी चैकः स निन्दितः ।
ग्रीवोर्ध्वेपाश्र्वे भ्रमरी ह्येकरश्मिः स चैकतः ॥ १०८ ॥
**एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल—**जिस के कान के समीप में भौंरी होती है वह अश्व 'एकशृङ्गी' कहलाता है और निन्दित होता है। ग्रीवा के ऊपर पार्श्व में एक तरफ जो भौंरी होती है वह 'एकरश्मि' कहलाती है वह भी निन्दित होती है।
पादोर्ध्वमुखभ्रमरी कीलोत्पाटी स निन्दितः ।
शुभाशुभौ भ्रमौ यस्मिन्स वाजी मध्यमः स्मृतः ५ १०६ ॥
**कीलोत्पाटी व मध्यम आवत्तों के लक्षण व फल—**पैरों में यदि ऊर्ध्व मुख वाली भौंरी हो तो उसे 'कीलोत्पाटी' कहते हैं। वह निन्दित होता है। जिस अश्व में शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की भौरियां होती हैं, वह 'मध्यम' कहलाता है।
मुखे पत्सु सितः पञ्चकल्याणोऽश्वः सदा मतः ।
स एव हृदये स्कन्धे पुच्छे श्वेतोऽष्टमङ्गलः ॥ ११० ॥
**पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल—**जिसके मुख और चारों पैर सफेद हों, वह अश्व 'पञ्चकल्याण' संज्ञक सदा कहलाता है। यही सफेदी हृदय, स्कन्ध तथा पुच्छ में घोड़े को हो तो वह 'अष्टमङ्गल' संज्ञक होता है।
कर्णे श्यामः श्यामकर्णः सर्वतस्त्वेकवर्णभाक् ।
तत्रापि सर्वतः श्वेतो मेध्यः पूज्यः सदैव हि ॥ १११ ॥
**श्यामकर्ण अश्व के लक्षण—**यदि केवल कान ही मात्र कृष्ण वर्ण के हों और सर्वत्र कोई एक वर्ण हो तो वह अश्व 'श्यामकर्ण' संज्ञक होता है। और
३४४ | शुक्रनीतिः
जिस श्यामकर्ण घोड़े का सारा शरीर एक वर्ण का हो किन्तु वह श्वेत वर्ण हो तो वह अश्वमेध के योग्य होने से सदैव पूज्य होता है।
वैदूर्यसन्निभे नेत्रे यस्य स्तो जयमङ्गलः।
मिश्रवर्णस्त्वेकवर्णः पूज्यः स्यात् सुन्दरो यदि ॥ ११२॥
**जयमङ्गल अश्व के लक्षण—**जिस घोड़े की आंखें वैदूर्य मणि के समान कालापन युक्त सफेद हों वह 'जयमङ्गल' संज्ञक होता है। कोई भी घोड़ा चाहे अनेक वर्ण का या एक वर्ण का हो किन्तु देखने में सुन्दर हो तो वह पूज्य होता है।
कृष्णपादो हरिर्निन्यस्तथा श्वेतैकपादपि ।
रूक्षो धूसरवर्णश्च गर्दभामोऽपि निन्दितः ॥ ११३॥
जिस अश्व के पैर काले हों अथवा एक ही पैर सफेद हो किंवा जो रूप धूसर वर्ण का गदहे के समान हो वह निन्दित होता है।
कृष्णतालुः कृष्णजिह्वः कृष्णोष्ठश्च विनिन्दितः।
सर्वतः कृष्णवर्णो यः पुच्छे श्वेतः स निन्दितः ॥ ११४॥
जिसका तालु, जिह्वा और ओष्ठ कृष्ण वर्ण का हो अथवा सर्वत्र कृष्ण वर्ण का हो किन्तु पूंछ श्वेत वर्ण की हो तो वह निन्दित होता है।
उच्चैः पदन्यासगतिर्द्विपव्याघ्रगतिश्च यः।
मयूरहंसतित्तिरपारावतगतिश्च यः ॥ ११५॥
मृगोष्ट्रश्वानरगतिः पूज्यो वृषगतिर्हयः ।
**अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण—**जो अश्व ऊंचा पैर उठाकर चलता हो किंवा जिसकी चाल हाथी अथवा सिंह की सी हो और जिसकी मोर, हंस, तीतर, कबूतर, मृग, ऊँट या बैल की सी चाल हो तो वह पूज्य (श्रेष्ठ चालवाला) होता है।
अतिमुक्तोऽतिपीतोऽपि यथा सादी न पीड्यते ॥ ११६॥
श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया स श्रेष्ठस्तुरगो मतः।
घोड़े की वही चाल श्रेष्ठ कहलाती है कि जिससे अत्यन्त भोजन करके या अत्यन्त जल पीकर के भी सवारी करने पर सवार को कष्ट न मालूम पड़े। और वही घोड़ा श्रेष्ठ भी माना जाता है।
सुश्वेतभालतिलको विद्धो वर्णान्तरेण च ॥ ११७॥
स वाजी दलभञ्जी तु यस्य सैवातिनिन्दितः।
**निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के मस्तक का श्वेत तिलक अन्य वर्ण से मिश्रित भी हो तो वह 'दलभंजी' नामक कहा जाता है और वह तथा उसका स्वामी दोनों निन्दित माने जाते हैं।
चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४५
संहन्याद्वर्णजान् दोषान् स्निग्धवर्णो भवेद् यदि ॥ ११८ ॥
**स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश—**घोड़ा यदि स्निग्ध (चिकनाई लिये हुये) वर्ण का हो तो वर्ण से होनेवाले सारे दोषों को नष्ट कर डालता है ।
बलाधिकश्च सुगतिर्महान् सर्वाङ्गसुन्दरः ।
नातिक्रूरः सदा पूज्यो भ्रमाद्यैरपि दूषितः ॥ ११९ ॥
**आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण—**जो अधिक बलशाली, अच्छी चालवाला, ऊंचा, सर्वाङ्ग-सुन्दर, अत्यन्त बदमाश नहीं होने पर यदि भौंरी आदि दोषों से युक्त हो तो भी वह सदा पूजनीय होता है ।
वाजिनामत्यवहनात् सुदोषाः संभवन्ति हि ।
कृशो व्याधिपरीताङ्गो जायतेऽत्यन्तवाहनात् ॥ १२० ॥
अवाहितो भवेन्मन्दः सर्वकर्मसु निन्दितः ।
अपोषितो भवेत् क्षीणो रोगी चात्यन्तपोषणात् ॥ १२१ ॥
**अश्वों के कृशत्वादि दोष उत्पन्न होने के कारण—**यदि घोड़े अच्छे भी हों किन्तु अधिकतर सवारी न की जाय तो उसमें दोष उत्पन्न हो जाते हैं और अत्यन्त अधिक सवारी करने से भी घोड़े दुर्बल तथा रोगी हो जाते हैं अतः योग्यतानुसार उन्हें सवारी में लेना चाहिये । और बिना सवारी के भी घोड़े मन्द गतिवाले एवं किसी काम के नहीं रह जाते हैं । और बिना पौष्टिक खुराक के क्षीण तथा अधिक पौष्टिक भोजन कराने तथा तदनुरूप सवारी न करने से रोगी हो जाते हैं, अतः मात्रानुरूप खिलाना चाहिये ।
सुगतिर्दुर्गतिर्नित्यं शिक्षकस्य गुणागुणैः ।
**घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश—**घोड़े में शिक्षक के गुण तथा दोष के द्वारा ही नित्य अच्छी या बुरी चाल हो जाती है अर्थात् जैसा सिखानेवाला होता है वैसा घोड़ा बन जाता है ।
जान्वधश्चलपादः स्यादृजुकायः स्थिरासनः ॥ १२२ ॥
तुलाधृतखलीनः स्यात् काले देशे सुशिक्षकः ।
मृदुना नातितीक्ष्णेन कशाघातेन ताडयेत् ॥ १२३ ॥
**घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण—**घोड़े को सुन्दर रीति से सिखानेवाला सवार जानु (घुठनों) ओंसे नीचे पैर को हिलाता हुआ, शरीर को सीधा रक्खे हुये, स्थिर आसन से बैठकर तुला की भांति लगाम को पकड़े हुए, काल तथा देश के अनुसार न अत्यन्त कठिन और न अत्यन्त कोमल चाबुक की मार से घोड़े को मार कर सिखावे ।
ताडयेन्मध्यघातेन स्थाने स्वश्वं सुशिक्षकः ।
३४६
शुक्रनीतिः
हेषिते कक्षयोर्हन्यात् स्खलिते पक्षयोस्तथा ॥ १२४ ॥
भीते कर्णान्तरे चैव ग्रीवासून्मार्गगामिनि ।
कुपिते बाहुमध्ये च भ्रान्तचित्ते तथोदरे ॥ १२५ ॥
अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैर्नान्यस्थानेषु च कर्हिचित् ।
**अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश—**सुन्दर सिखानेवाला सवार अपने अच्छे घोड़ों को उचित स्थान पर चाबुक की मध्यम मार से मारे। जैसे यदि ज्यादा हिनहिनाता हो तो दोनों आँखों में, फिसलने पर दोनों बगलों में, डरने (भड़कने) पर दोनों कानों के बीच में, विपरीत मार्ग से चलने पर ग्रीवा में, दोनों अगले पैरों को उठाकर खड़ा होने पर आगे के पैरों के मध्य में, और भ्रान्त चित्त होने पर उदर में बुद्धिमान सवार घोड़े के मारे किन्तु अन्य स्थानों में कभी भी न मारे ।
अथवा हेषिते स्कन्धे स्खलिते जघनान्तरे ॥ १२६ ॥
भीते वक्षःस्थलं हन्याद् वक्त्रमुन्मार्गगामिनि ।
कुपिते पुच्छसंघाते भ्रान्ते जानुद्वयं तथा ॥ १२७ ॥
अथवा अधिक हिनहिनाने पर कन्धे में, फिसलने पर जांघों के बीच में, डरने पर वक्षःस्थल में, कुमार्ग पर चलने पर मुख में, कुपित होने पर पूंछ की सन्धि के अन्त में, चित्त की भ्रान्ति होने पर दोनों जानुओं में मारे।
नासकृत्ताडयेदश्वमकाले च विदेशके ।
अकालस्थानघातेन वाजिदोषान् वितन्वते ॥ १२८ ॥
**अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट—**घोड़े को बार बार या असमय तथा कुठॉव में (जहां नहीं मारना चाहिये, वहां पर) नहीं मारना चाहिये क्योंकि असमय तथा कुठांव में मारने से घोड़े में दोषों की वृद्धि हो जाती है।
तावद् भवन्ति ते दोषा यावज्जीवत्यसौ हयः ।
दुष्टं दण्डेनाभिभवेन्नारोहेद्दण्डवर्जितः ॥ १२९ ॥
और वे दोष घोड़े में तब तक बने रहते हैं, जब तक घोड़ा जीवित रहता है। दुष्ट घोड़े को दण्ड देकर परास्त कर देवे, विना दण्ड दिये उस पर सवारी न करे।
गच्छेत् षोडशमात्राभिरुत्तमोऽश्वो धनुःशतम् ।
यथा यथा न्यूनगतिरश्वो हीनस्तथा तथा ॥ १३० ॥
**उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण—**उत्तम घोड़ा १६ मात्रा का उच्चारण करते-करते १०० धनुष की दूरी तक पहुँच जाता है। जैसे २ जिसकी न्यून गति होती है वैसे २ वह हीन माना जाता है।
सहस्रचापप्रमितं मण्डलं गतिशिक्षणे ।'
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७
उत्तमं वाजिनो मध्यं नीचमर्धं तदर्धकम् ॥ १३१ ॥
**उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश—**गतिकी शिक्षा देने में घोड़े के लिये १ मण्डल का प्रमाण १००० धनुषों का होता है जो उत्तम होता है उसका आधा (५०० धनुषों का) मण्डल मध्यम और उसका भी आधा (२५० धनुषों का) मण्डल नीच होता है।
अल्पं शतधनुः प्रोक्तमत्यल्पं च तदर्धकम् ।
और १०० धनुषों का मण्डल अल्प और उसका आधा (५० धनुषों का) मण्डल अत्यल्प होता है।
शतयोजनगन्ता स्याद्दिनेकेन यथा हयः ॥ १३२ ॥
गतिं संवर्धयेन्नित्यं तथा मण्डलविक्रमैः ।
मण्डल के द्वारा गति बढ़ाने की शिक्षा से तब तक घोड़े की गति नित्य बढ़ाता रहे कि जब तक वह एक दिन में १०० योजन (४००) तक न दौड़ लगाने लगे।
सायं प्रातश्च हेमन्ते शिशिरे कुसुमागमे ॥ १३३ ॥
सायं ग्रीष्मे तु शरदि प्रातरश्वं वहेत् सदा ।
**ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश—**हेमन्त, शिशिर तथा वसन्तऋतु में सायंकाल तथा प्रातःकाल एवं ग्रीष्म में सायंकाल और शरदऋतु में प्रातःकाल घोड़े को शिक्षा देवे।
वर्षासु न वहेद्दीषत्तथा विषमभूमिषु ॥ १३४ ॥
**वर्षाऋतु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध—**और वर्षा ऋतु तथा विषम भूमि में घोड़े को थोड़ी भी दौड़ाने की शिक्षा न देवे।
सुगत्याऽग्निर्बलं दार्ढ्यमारोग्यं वर्धते हरेः ।
**उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश—**उत्तम चाल से घोड़ों की जठराग्नि, बल, शरीर की दृढ़ता तथा आरोग्य की वृद्धि होती है। अतः चाल की शिक्षा देना आवश्यक है।
भारमार्गपरिश्रान्तं शनैश्चङ्क्रमयेद्धयम् ॥ १३५ ॥
स्नेहं सम्पाथयेत् पश्चाच्छर्करासक्तुमिश्रितम् ।
हरिमन्थांश्च माषांश्च भक्षणार्थे मकुष्ठकान् ॥ १३६ ॥
शुष्कानाद्रांश्च मांसानि सुस्विन्नानि प्रदापयेत् ।
**थके हुये अश्व को धीरे २ चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश—**भारवहन तथा मार्ग चलने से थके हुये घोड़े को धीरे २ टहलावे उसके बाद शक्कर तथा सत्तू मिले हुये स्नेह (घृत) को पिलावे। और खाने के
३४८ | शुक्रनीतिः
लिये चने, उड़द तथा मोठ को दे चाहे वे सूखे हों या हरे (भिगोये हुये) एवं अच्छी तरह पकाये हुये मांस भी दे।
यद्यत्र स्खलितं गात्रं तत्र दण्डं न पातयेत् ॥ १३७ ॥
मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश— यदि कभी घोड़े के किसी अंग में मोच हो जाय तो वहां पर चाबुक नहीं मारना चाहिये।
नावतारितपल्याणं हयं मार्गसमागतम्।
दत्त्वा गुडं सलवणं बलसंरक्षणाय च ॥ १३८ ॥
मार्ग से चलकर आये हुये घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश— मार्ग चलकर आये हुये घोड़ों को बिना जीन उतारे हुये ही बल का संरक्षण करने के लिये लवण (निमक) के साथ गुड़ देना चाहिये।
गतस्वेदस्य शान्तस्य सुरूपमुपतिष्ठतः।
मुक्तपृष्ठादिबन्धस्य खलीनमवतारयेत् ॥ १३९ ॥
पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश— पसीना सूख जाय एवं घोड़ा शान्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो जाय तब उसके पीठ के बन्धन (कसे हुये चारजामे) को खोल कर लगाम निकाल लेवे।
मर्दयित्वा तु गात्राणि पांसुमध्ये विवर्त्तयेत्।
स्नानपानावगाहैश्च ततः सम्यक् प्रपोषयेत् ॥ १४० ॥
घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश— और घोड़े के सारे शरीर का मर्दन (खरहरा) करके धूलि में लोटने की व्यवस्था कर दे। इसके बाद स्नान कराना, पानी पिलाना, नदी आदि में अवगाहन (स्नान) कराना आदि से उसे भलीभांति पुनः परिपुष्ट (ताजा) कर लेवे।
सर्वदोषहरोऽश्वानां मद्यजाङ्गल्यो रसः।
शक्त्या सम्पापयेत् क्षीरं घृतं वा वारिसक्तुकम् ॥ १४१ ॥
घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल— घोड़ों के लिये मद्य तथा जंगली जीवों का मांसरस सर्वदोषनाशक (लाभप्रद) होता है। शक्ति के अनुसार दूध, घी या जल में घुला हुआ सत्तू पिलावे।
अन्नं भुक्त्वा जलं पीत्वा तत्क्षणाद्वाहितो हयः।
उत्पद्यन्ते तदाश्वानां कासश्वासादिका गदाः ॥ १४२ ॥
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष— यदि चारा खिलाने के बाद पानी पिलाकर फौरन घोड़े पर सवारी की जाय तो उससे घोड़े को खांसी तथा दमे की बीमारी हो जाती है।
यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा मध्या माषा मकुष्ठकाः।
नीचा मसूरा मुद्गाश्च भोजनार्थं तु वाजिनः ॥ १४३ ॥
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४६
**घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश—**घोड़ों को भोजन के लिये जौ तथा चना देना उत्तम, उर्द तथा मोठ मध्यम और मसूर तथा मूंग का देना नीच माना जाता है।
गतयः षड्विधा धाराऽऽस्कन्दितं रेचितं प्लुतम् ।
धौरीतकं वल्गितं च तासां लक्ष्म पृथक् पृथक् ॥ १४४ ॥
**घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश—**१. धारा, २. आस्कन्दित, ३. रेचित, ४. प्लुत, ५. धौरीतक, ६. वल्गित इन भेदों से गति ६ प्रकार की होती है। अब उनके लक्षण पृथक् २ कहते हैं।
धारागतिः सा विज्ञेया यातिवेगतरा मता ।
पार्ष्णिस्तोदाविनुदितो यस्यां भ्रान्तो भवेद्धयः ॥ १४५ ॥
**धारा गति के लक्षण—**जो अत्यन्त वेग से युक्त गति हो उसे 'धारा' गति समझनी चाहिये। इसमें सवार की एड़ी या चाबुक की मार से अत्यन्त प्रेरित होकर घोड़ा वेग से चक्कर या दौड़ लगाने लगता है।
आकुञ्चिताग्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्य या गतिः ।
आस्कन्दिता च सा ज्ञेया गतिविद्भिस्तु वाजिनाम् ॥ १४६ ॥
**आस्कन्दित गति के लक्षण—**जिसमें अगले पैरों को सिकोड़े हुये उछल २ कर घोड़े की गति होती है उसे 'आस्कन्दित' गति घोड़ों की गति जाननेवाले विद्वान् मानते हैं ।
ईषदूत्प्लुत्य गमनमखण्डं रेचितं हि तत् ।
**रेचित गति के लक्षण—**और घोड़ा जिसमें थोड़ा उछल २ कर अखण्ड गमन करता है उसे 'रेचित' कहते हैं ।
पादैश्चतुर्भिरुत्प्लुत्य मृगवत् सा प्लुता गतिः ॥ १४७ ॥
असंवलितपद्भ्यां तु सुव्यक्तं गमनं तुरम् ।
धौरीतकं च तज्ज्ञेयं रथसंवाहने वरम् ॥ १४८ ॥
**प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण—**घोड़ा चारो पैरों से मृग के समान चौकड़ी भरकर जिसमें दौड़ता है उसको 'प्लुत' गति कहते हैं। जिसमें दोनों पैर बिना सिकोड़े हुये उठाकर चलाये जांय, और शीघ्र सुन्दर गति हो, जिससे रथ ( गाड़ी ) खींचने में अच्छाई हो, उसे 'धौरीतक' गति कहते हैं।
प्रसंवलितपद्भ्यां यो मयूरोद्धृतकन्धरः ।
दोलायितशरीरार्धकायो गच्छति वल्गितम् ॥ १४९ ॥
**वल्गित गति के लक्षण—**जिसमें घोड़ा सिकोड़े हुये दोनों पैरों से मयूर के समान गर्दन उठाये हुये और आधे शरीर को हिंडोले के समान हिलाता हुआ दौड़ता है उसको 'वल्गित' गति कहते हैं
३५० | शुक्रनीतिः
परिणाहो वृषमुखादुदरे तु चतुर्गुणः।
सककुत् त्रिगुणोच्छ्रन्तु सार्धत्रिगुणदीर्घता ॥ १५० ॥
**बैल के मुखादि का प्रमाण—**वृष के मुख के प्रमाण से चौगुना उदर का विस्तार और ककुद् (बैल के पीठ पर का टिल्ला)-के सहित उदर मुख से तिगुना ऊंचा एवं मुख से उदर की लम्बान साढ़े तीन गुना होना चाहिये।
सप्ततालो वृषः पूज्यो गुणैरेभियुतो यदि।
**पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण—**जो सात ताल प्रमाण ऊंचा होते हुये यदि इन निम्न लिखित गुणों से युक्त हो तो वह बैल पूजनीय (श्रेष्ठ) माना जाता है।
न स्थायी न च वै मन्दः सुवोढा स्वङ्गसुन्दरः ॥ १५१ ॥
नातिक्रूरः सुपृष्ठश्च वृषभः श्रेष्ठ उच्यते।
**श्रेष्ठ बैल के लक्षण—**जो चलते १ रुकनेवाला (अड़ियल) न हो और धीरे २ चलनेवाला भी न हो एवं सुन्दर वहन करनेवाला, सभी अङ्गों से सुन्दर, अत्यन्त क्रूर (बदमाश) न हो और जिसकी पीठ सुन्दर हो, ऐसा बैल श्रेष्ठ कहा जाता है।
त्रिंशद्योजनगन्ता वा प्रत्यहं भारवाहकः ॥ १५२ ॥
नवतालश्च सुदृढः सुमुखोष्ट्रः प्रशस्यते।
**श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण—**जो प्रतिदिन ३० योजन (१२० कोश) तक चल सकनेवाला या भारवहन करनेवाला, नवताल-प्रमाण ऊंचा हो, एवं अत्यन्त मजबूत शरीरवाला तथा सुन्दर मुखवाला हो, ऐसा ऊंट प्रशस्त माना जाता है।
शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परमं स्मृतम् ॥ १५३ ॥
मनुष्यगजयोर्बाल्यं यावद्विंशतिवत्सरम् ।
नृणां हि मध्यमं यावत् षष्टिवर्षे वयः स्मृतम् ॥ १५४ ॥
अशीतिवत्सरं यावद् गजस्य मध्यमं वयः।
**मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण—**मनुष्यों और हाथियों की परम आयु १०० वर्ष तक की और बाल्यावस्था २० वर्ष तक की मानी गई है। और मनुष्यों की मध्यम (जवानी से प्रौढ़ावस्था तक) अवस्था ६० वर्ष तक की मानी जाती है किन्तु हाथियों की मध्यम अवस्था ८० वर्ष तक की मानी गई है।
चतुस्त्रिंशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ १५५ ॥
पञ्चविंशतिवर्षं हि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः ।
बाल्यमश्ववृषोष्ट्राणां पञ्चमं वत्सरं मतम् ॥ १५६ ॥
मध्यं यावत् षोडशाब्दं वार्धक्यं तु ततः परम्।
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५१
**घोड़ा, बैल तथा ऊँट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण—**घोड़े की परमायु ३४ वर्ष तक की मानी गई है। और बैल तथा ऊंटों की परमायु २५ वर्ष तक की ही मानी जाती है। घोड़ा, बैल तथा ऊंट की बाल्यावस्था ५ वर्ष तक की और मध्यावस्था १६ वर्ष तक की होती है उसके बाद वृद्धावस्था मानी गई है।
दन्तानामुद्गमैर्वर्णैरायुर्ज्ञेयं वृषाश्वयोः ॥ १५७ ॥
**दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश—**बैल तथा घोड़े की अवस्था का ज्ञान उनके दांत निकलने तथा दांतों के वर्ण के द्वारा किया जाता है।
अश्वस्य षट् सिता दन्ताः प्रथमाब्दे भवन्ति हि ।
कृष्णलोहितवर्णास्तु द्वितीयेऽब्दे ह्यधोगताः ॥ १५८ ॥
**दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथम वर्ष का ज्ञान—**घोड़ों के प्रथम वर्ष में उपरी भाग में सफेद ६ दांत होते हैं। और दूसरे वर्ष में काले तथा लाल मिश्रित वर्ण के ६ दांत नीचे भाग में निकलते हैं।
तृतीयेऽब्दे तु सन्दंशौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ।
तत्पार्श्ववर्त्तिनौ तौ तु चतुर्थे पुनरुद्गतौ ॥ १५९ ॥
तीसरे वर्ष में दो २ दांत ६ वर्ष तक क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं और चौथे वर्ष में पुनः उक्त दाँतों के पार्श्व में दो दांत निकल आते हैं।
अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु संदंशौ पुनरुद्गतौ ।
मध्यपार्श्वान्तगौ द्वौ द्वौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ॥ १६० ॥
पांचवें वर्ष में अन्त में दो दांत फिर निकल आते हैं। मध्य तथा पार्श्व के अन्त भाग में दो २ दांत ६ वर्ष में क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं।
नवमाब्दात् क्रमात् पीतौ तौ सितौ द्वादशाब्दतः ।
दशपञ्चाब्दतस्तौ तु काचाभौ क्रमशः स्मृतौ ॥ १६१ ॥
नवें वर्ष से वे दोनों दांत क्रम से पीत वर्ण के तदनन्तर फिर १२ वें वर्ष तक में सफेद हो जाते हैं। फिर १५ वें वर्ष तक वे दोनों कांच की भांति क्रमशः उज्ज्वल हो जाते हैं।
अष्टादशाब्दतस्तौ हि मध्वाभौ भवतः क्रमात् ।
शङ्खाभौ चैकविंशाब्दाच्चतुर्विंशाब्दतः सदा ॥ १६२ ॥
छिद्रं सञ्चलनं पातो दन्तानां च त्रिके त्रिके ।
फिर १८ वें वर्ष तक वे दोनों मधु के समान वर्ण के क्रम से हो जाते हैं। फिर २१ वें वर्ष तक शङ्ख के समान वर्ण के हो जाते हैं पुनः २४ वें वर्ष तक तीन ३ दांतों में छिद्र, संचलन (हिलना) तथा गिरना जारी हो जाता है।
३५२ | शुक्रनीतिः
प्रोथे सुवलयस्तिस्रः पूर्णायुर्यस्य वाजिनः ॥ १६३ ॥
यथा यथा तु हीनास्ता हीनमायुस्तथा तथा ।
निन्दित घोड़ों के लक्षण—जिस घोड़े के प्रोथ (मुखाग्र) में स्पष्ट ३ बली पड़ी हुई हों उसकी आयु पूर्ण (वृद्धि पूर्ण) हुई समझनी चाहिये। और जैसे २ उक्त बलियों में कमी होती जाती है वैसे २ उसकी आयु क्षीण हुई समझनी चाहिये।
जानूत्पाता त्वोष्ठवायो धूतपृष्ठो जलासनः ॥ १६४ ॥
गतिमध्यासनः पृष्ठपाती पश्चाद्गमोर्ध्वपात् ।
सर्पजिह्वश्शङ्खकान्ति-भीरुरश्वोऽतिनिन्दितः ॥ १६५ ॥
सच्छिद्रभालतिलकी निन्य आश्रयकृत्तथा ।
जो घोड़ा जानुओं को उछालता हो, ओठों को बजाता हो, पीठ हिलाता हो, जल में या चलते २ बैठ जाता हो, पीठ पर से सवार को गिरा देता हो, पीछे की ओर घसकता हो, पैर ऊपर उठाता हो, सांप की तरह जीभ लपलपानेवाला, शंख की भांति कान्तिवाला, और भड़कनेवाला हो वह अत्यन्त निन्द्य होता है। और जिस घोड़े के भाल में छिद्रयुक्त तिलक हो वह निन्दनीय तथा आश्रयदाता स्वामी को नष्ट करनेवाला होता है।
वृषस्याष्टौ सिता दन्ताश्चतुर्थेऽब्देऽखिलाः स्मृताः ॥ १६६ ॥
द्वावन्त्यौ पतितोत्पन्नौ पञ्चमेऽब्दे हि तस्य व ।
दाँतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा—बैल के चौथे वर्ष तक में सम्पूर्ण सफेद ८ दांत निकल आते हैं, और ५ वें वर्ष में अन्त के दो दांत गिर कर पुनः उत्पन्न जाते हैं।
षष्ठे तूपान्त्यौ भवतः सप्तमे तत्समीपगौ ॥ १६७ ॥
अष्टमे पतितोत्पन्नौ मध्यमौ दशनौ खलु ।
६ ठें वर्ष में अन्त के समीप में स्थित दो दांत, ७ वें वर्ष में उसके समीप के दो दांत, और ८ वें वर्ष में मध्य के दो दांत क्रमसे गिरकर पुनः उत्पन्न हो जाते हैं।
कृष्णपीतसितारक्तशङ्खच्छायौ द्विके द्विके ॥ १६८ ॥
क्रमादब्दे च भवतश्चलनं पतनं ततः ।
उष्ट्रस्योक्तप्रकारेण वयोग्ज्ञानं तु वा भवेत् ॥ १६९ ॥
उसके बाद ८ वें वर्ष से दो-दो वर्ष के पश्चात् क्रम से दो-दो दांत काले पीले, श्वेत, रक्त तथा शंख वर्ण के हो जाते हैं। उसके बाद वे हिलने लगते हैं और अन्त में गिर जाते हैं। और इसी प्रकार से ऊंटकी अवस्था का भी ज्ञान किया जाता है।
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् | ३५५
| चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् | ३५५ |
|---|
प्रेरकाऽऽकर्षकमुखोऽङ्कुशो गजविनिग्रहे ।
हस्तिपकैर्गजस्तेन विनेयः सुगमाय हि ॥ १७० ॥
**अंकुश के लक्षण—**गज को दमन करने के लिये अंकुश (गजबाग) का स्वरूप प्रेरणा करने के लिये नुकीला तथा उसी के साथ लगा हुआ खींचने के लिये झुका हुआ बनाना चाहिये । और इसी के द्वारा मार कर फीलवान अच्छी तरह से चलने की शिक्षा हाथी को दे ।
खलीनस्योर्ध्वखण्डौ द्वौ पार्श्वगौ द्वादशाङ्गुलौ ।
तत्पार्श्वान्तर्गताभ्यां तु सुदृढाभ्यां तथैव च ॥ १७१ ॥
वारकाकर्षखण्डाभ्यां रज्ज्वर्थवलयैर्युतौ ।
एवंविधखलीनेन वशीकुर्यात्तु वाजिनम् ॥ १७२ ॥
**घोड़ों की लगाम का वर्णन—**लगाम के ऊपर दो खण्ड होते हैं जो लोहे के बने होते हैं और मुख के दोनों पार्श्व तक होते हैं एवं १२ अंगुल के होते हैं। उन्हीं पार्श्वों के अन्तर्गत अत्यन्त दृढ़ निवारण एवं आकर्षण (खींचने) के लिये दो खण्ड होते हैं एवं उनमें रज्जु (डोरी) बांधने के लिये कड़े बने रहते हैं जिन्हें आवश्यकतानुसार सवार हाथ में लिये हुये खींचता रहता है । इस प्रकार के लगाम से घोड़े को अपने वश में करना चाहिये ।
नासिकाकर्षरज्ज्वा तु वृषोष्ट्रं विनयेद् भृशम् ।
तीक्ष्णाग्रियः सप्तफालः स्यादेषां मलशोधने ॥ १७३ ॥
**बैल व ऊँट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-शोधनार्थ दंताली का वर्णन—**और नासिका में खींचने के लिये लगी हुई रस्सी से बैल तथा ऊँट को अपने वश में करना चाहिये । और इन सबों के मल (लीद-गोबर आदि) हटाने के लिये जो कुदारी होती है उसका अग्रभाग तीक्ष्ण होता है तथा सात फाल का होता है ।
सुताडनैर्विनेया हि मनुष्याः पशवः सदा ।
सैनिकास्तु विशेषेण न ते वै धनदण्डतः ॥ १७४ ॥
**मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश—**मनुष्य और पशु इनको सदा भलीभांति ताड़ना देकर ठीक रास्ते पर लाना चाहिये । और सैनिकों को तो विशेष रूप से ताडन का दण्ड देना चाहिये । उन्हें धन-दंड से दण्डित नहीं करना चाहिये ।
अनूपे तु वृषाश्वानां गजोष्ट्राणां तु जाङ्गले ।
साधारणे पदातीनां निवेशाद्रक्षणं भवेत् ॥ १७५ ॥
**बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल—**अनूप (जलप्राय) देश में
२३ शु०
३५४ | शुक्रनीतिः
बैलों तथा घोड़ों को, जाङ्गल देश में हाथियों तथा ऊँटों को एवं साधारण देश (स्थान) में पैदल सैनिकों को रखने से उन्हें विशेष आराम मिलता है।
शतं शतं योजनान्ते सैन्यं राष्ट्रे नियोजयेत् ।
राज्य में सौ-सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश— राष्ट्र के अन्दर एक २ सौ (१००-१००) योजन पर सैनिकों की एक टुकड़ी सेना रखनी चाहिये।
गजोष्ट्रवृषभाश्वाः प्राक् श्रेष्ठाः सम्भारवाहने ॥ १७६ ॥
सर्वेभ्यः शकटाः श्रेष्ठा वर्षाकालं बिना स्मृताः ।
बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य— प्रथम हाथी, बैल तथा घोड़े युद्ध-सामग्री ढोने के लिये श्रेष्ठ होते हैं। और वर्षा काल को छोड़कर शेष समयों में सामग्री ढोने के लिये सबों से श्रेष्ठ बैलगाड़ी ही मानी जाती है।
न चाल्पसाधनो गच्छेदपि जेतुमरिं लघुम् ॥ १७७ ॥
महताऽत्यन्तसाद्यस्कबलेनैव सुबुद्धियुक् ।
राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध— छोटे से शत्रु को भी जीतने के लिये थोड़ी सेना के साथ राजा कभी न जावे। सुन्दर बुद्धि रखनेवाला राजा तो अत्यन्त नवीन भर्ती किये हुये सैनिकों की बड़ी सेना के द्वारा ही उन्हें जीतने के लिये चढ़ाई करता है।
अशिक्षितमसारं च साद्यस्कं तूलवच्च तत् ॥ १७८ ॥
युद्धं विनाऽन्यकार्येषु योजयेन्मतिमान् सदा ।
युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश— बुद्धिमान् राजा अशिक्षित, असार (विशेष श्रेष्ठ नहीं), नवीन भर्ती की हुई सेना रूई की भांति अत्यन्त लघु (तुच्छ) मानी जाती है, अतः उसे युद्ध के अतिरिक्त अन्य कार्यों में आवश्यकता पड़ने पर नियुक्त करना चाहिये।
विकर्तुं यततेऽल्पोऽपि प्राप्ते प्राणात्ययेऽनिशम् ॥ १७९ ॥
न पुनः किन्तु बलवान् विकारकरणक्षमः ।
संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश— प्राण-संकट उपस्थित होने पर क्षुद्र बल-सम्पन्न सेना विपरीत आचरण करने के लिये सदा उद्यत हो जाती है किन्तु बलवानों की सेना विपरीत आचरण करने के लिये नहीं समर्थ होती है।
अपि बहुबलोऽशूरो न स्थातुं क्षमते रणे ॥ १८० ॥
किमल्पसाधनोऽशूरः स्थातुं शक्तोऽरिणा समम् ।
जब कि बहुत बल से सम्पन्न होता हुआ भी पराक्रमहीन राजा या सैन्य लड़ाई के मैदान में नहीं ठहर सकता है तब अल्प बल-सम्पन्न पराक्रमहीन
चतुर्थाऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५५
वह शत्रु के साथ युद्ध में ठहरने के लिये क्या समर्थ हो सकता है अर्थात् कदापि नहीं ।
सुसिद्धाल्पबलः शूरो विजेतुं क्षमते रिपुम् ॥ १८१ ॥
महान् सुसिद्धबलयुक् शूरः किन्न विजेष्यति ।
सन्नद्ध सेना का माहात्म्य — जब सुन्दर शिक्षित थोड़ी भी सेना से युक्त पराक्रमी राजा शत्रु को जीतने में समर्थ होता है, तब सुन्दर शिक्षित बड़ी सेना से युक्त होकर वह क्या नहीं जीत सकेगा अर्थात् अवश्य जीतेगा ।
मौलाशिक्षितसारेण गच्छेद्राजा रणे रिपुम् ॥ १८२ ॥
प्राणात्ययेऽपि मौलं न स्वामिनं त्यक्तुमिच्छति ।
मौल सेना की प्रशंसा — राजा पुरानी शिक्षितों में श्रेष्ठ सेना के साथ युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़ने के लिये जाये, क्योंकि प्राण-संकट उपस्थित होने पर भी पुरानी खास सेना कभी स्वामी का साथ नहीं छोड़ना चाहती है ।
वाग्दण्डपरुषेणैव भृतिह्रासेन भीतितः ॥ १८३ ॥
नित्यं प्रवासायासाभ्यां भेदोऽवश्यं प्रजायते ।
सेना में अवश्य भेद होने के कारण — सदा वाणी या दण्ड की कठोरता करने से, किंवा तनख्वाह कम कर देने से, वा अधिक भय दिखाने से, एवं निरन्तर प्रवास (परदेश) में भेजते रहने से, तथा अधिक परिश्रम का कार्य कराते रहने से शत्रुओं द्वारा सेना में भेद अवश्य डाला जा सकता है अर्थात् फोड़ ली जा सकती है अतः उक्त व्यवहार से बचना चाहिये ।
बलं यस्य तु सम्भिन्नं मनागपि जयः कुतः ॥ १८४ ॥
शत्रोः स्वस्यापि सेनाया अतो भेदं विचिन्तयेत् ।
सेना का भेद होने से अनिष्ट फल — जिसकी सेना में यदि थोड़ा भी भेद हो जाय तो उसे कहां से जय मिल सकता है । इससे अपनी तथा शत्रु की सेना के सम्बन्ध में भेद का विशेष ख्याल रक्खें, अर्थात् जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद हो सके किन्तु अपनी सेना में न हो वैसा व्यवहार खूब विचार कर करना चाहिये ।
यथा हि शत्रुसेनायाः भेदोऽवश्यं भवेत्तथा ॥ १८५ ॥
कौटिल्येन प्रदानेन द्राक् कुर्यान्नृपतिः सदा ।
राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश — जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद अवश्य पड़ जाय, वैसा कूटनीति से तथा धनादि देकर राजा को शीघ्र भेद का प्रबन्ध सदा करते रहना चाहिये ।
सेवयाऽत्यन्तप्रबलं नत्या ऽचारिं प्रसाधयेत् ॥ १८६ ॥
३५६ | शुक्रनीतिः
प्रबलं मानदानाभ्यां युद्धैर्हीनबलं तथा।
मैत्र्या जयेत् समबलं भेदैः सर्वान् वशे नयेत् ॥ १८७ ॥
शत्रुओं को साधने का प्रकार — अत्यन्त प्रबल शत्रु को सेवा तथा नम्रता-प्रदर्शन के द्वारा, साधारण प्रबल को दान (द्रव्य देकर) तथा सम्मान-प्रदर्शन द्वारा और हीन बलवाले शत्रु को युद्ध के द्वारा, समान बलवाले को मित्रता के द्वारा एवं भेद के द्वारा सभी प्रकार के शत्रुओं को अपने अनुकूल बनाना चाहिये।
शत्रुसंसाधनोपायो नान्यः सुबलभेदतः।
तावत् परो नीतिमान् स्याद्यावत् सुबलवान् स्वयम् ॥ १८८ ॥
मित्रं तावच्च भवति पुष्टाग्नेः पवनो यथा।
शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश — सुशिक्षित सेना में भेद डालने से बढ़ कर कोई दूसरा साधन शत्रु को अनुकूल बनाने (जीतने) का नहीं है। जब तक स्वयं राजा शिक्षित सेना से बलवान बना रहता है तब तक वह श्रेष्ठ नीतिमान माना जाता है। और तभी तक उसके सभी मित्र बने रहते हैं। जैसे लोक में जब तक अग्नि ईंधन से परिपुष्ट रहती है तभी तक वायु उसका मित्र बनकर बढ़ानेवाला बना रहता है। ईंधन से हीन होने पर बुझानेवाला हो जाता है।
त्यक्तं रिपुबलं धार्यं न समूहसमीपतः ॥ १८९ ॥
पृथङ्नियोजयेत् प्राग्वा युद्धार्थं कल्पयेच्च तत्।
शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश — शत्रु के द्वारा निकाली हुई या फोड़ ली गई शत्रु-सेना को अपनी सामूहिक सेना के समीप न रखकर पृथक् रखनी चाहिये। और युद्ध के समय अपनी सेना के अग्रभाग पर लड़ने के लिये नियुक्त करना चाहिये।
मैक्यमारात् पृष्ठभागे पार्श्वयोर्वा बलं न्यसेत् ॥ १९० ॥
मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश — और मित्रता रखनेवाली सेना को अपने समीप, पृष्ठ या पार्श्व भाग में युद्धार्थ रखनी चाहिये।
अस्यते क्षिप्यते यत्तु मन्त्रयन्त्राग्निभिश्च तत्।
अस्त्रं तदन्यतः शस्त्रमसिकुन्तादिकं च यत् ॥ १९१ ॥
अस्त्रं तु द्विविधं ज्ञेयं नालिकं मान्त्रिकं तथा।
अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद — मन्त्र एवं यन्त्र तथा अग्नि के द्वारा जो फेंका जाता है। उसे 'अस्त्र' कहते हैं। और इनसे अन्य तलवार और