शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३४० शुक्रनीतिः
कपोलस्थौ यदावर्त्तौ दृश्येते यस्य वाजिनः ॥ ८७ ॥
यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ राज्यवृद्धिकरौ मतौ ।
एको वाऽथ कपोलस्थो यस्यावर्त्तः प्रदृश्यते ॥ ८८ ॥
सर्वनामा स विख्यातः स इच्छेत् स्वामिनाशनम् ।
यशोवर्द्धक तथा 'सर्व' संज्ञक अश्व के लक्षण— यदि किसी अश्व के दोनों कपोलों पर दो भौरियां हों तो स्वामी के लिये वे दोनों यश तथा राज्य की वृद्धि करनेवाली मानी गई हैं । जिस अश्व के एक ही कपोल पर एक ही भौरी हो वह 'सर्व' संज्ञक होता है तथा स्वामी का नाश चाहता है ।
गण्डसंस्थो यद्यावर्त्तो वाजिनो दक्षिणाश्रितः ॥ ८९ ॥
स करोति महासौख्यं स्वामिनः शिवसंज्ञकः ।
तद्वामाश्रितः क्रूरः प्रकरोति धनक्षयम् ॥ ९० ॥
शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण— जिसके दक्षिण गण्डस्थल पर एक भौंरी हो वह 'शिव' संज्ञक अश्व स्वामी के लिये महा सुखकारी होता है । इसी प्रकार से बायें गण्डस्थल पर यदि भौंरी हो तो वह अश्व 'क्रूर' संज्ञक होता है तथा धनक्षयकारक होता है ।
इन्द्राख्यौ तावुभौ शस्तौ नृपराज्यविवृद्धिदौ ।
इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— यदि गण्डस्थल के दोनों ओर भौरियां पड़ी हों तो वे 'इन्द्र' संज्ञक होती हैं और उत्तम एवं राजा के राज्य की वृद्धि करनेवाली होती हैं ।
कर्णमूले यदावर्त्तौ स्तनमध्ये तथाऽपरौ ॥ ९१ ॥
विजयाख्यावुभौ तौ तु युद्धकाले यशःप्रदौ ।
विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— अश्व के कर्ण के मूल भाग में दो तथा स्तन के मध्य में दो भौरियां हों तो ये दोनों 'विजय' संज्ञक होती हैं और युद्ध काल में विजय दिलाने से यशप्रद होती हैं ।
स्कन्धपार्श्वे यदावर्त्तौ स भवेत् पद्मैलक्षणः ॥ ९२ ॥
करोति विविधान् पद्मान् स्वामिनः सततं सुखम् ।
पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— दोनों स्कन्ध के पार्श्व भाग में यदि भौंरी हों तो उसे 'पद्म' संज्ञक कहते हैं । ऐसा अश्व स्वामी के सुख की सदा वृद्धि करता है एवं विविध प्रकार से पद्मसंख्यक धन का आगमन कराता है ।
नासामध्ये यदावर्त्त एको वा यदि वा त्रयम् ॥ ९३ ॥
चक्रवर्ती स विज्ञेयो वाजी भूपालसंज्ञकः ।
भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसकी नासिका के मध्य में