शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५५
वह शत्रु के साथ युद्ध में ठहरने के लिये क्या समर्थ हो सकता है अर्थात् कदापि नहीं ।
सुसिद्धाल्पबलः शूरो विजेतुं क्षमते रिपुम् ॥ १८१ ॥
महान् सुसिद्धबलयुक् शूरः किन्न विजेष्यति ।
सन्नद्ध सेना का माहात्म्य — जब सुन्दर शिक्षित थोड़ी भी सेना से युक्त पराक्रमी राजा शत्रु को जीतने में समर्थ होता है, तब सुन्दर शिक्षित बड़ी सेना से युक्त होकर वह क्या नहीं जीत सकेगा अर्थात् अवश्य जीतेगा ।
मौलाशिक्षितसारेण गच्छेद्राजा रणे रिपुम् ॥ १८२ ॥
प्राणात्ययेऽपि मौलं न स्वामिनं त्यक्तुमिच्छति ।
मौल सेना की प्रशंसा — राजा पुरानी शिक्षितों में श्रेष्ठ सेना के साथ युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़ने के लिये जाये, क्योंकि प्राण-संकट उपस्थित होने पर भी पुरानी खास सेना कभी स्वामी का साथ नहीं छोड़ना चाहती है ।
वाग्दण्डपरुषेणैव भृतिह्रासेन भीतितः ॥ १८३ ॥
नित्यं प्रवासायासाभ्यां भेदोऽवश्यं प्रजायते ।
सेना में अवश्य भेद होने के कारण — सदा वाणी या दण्ड की कठोरता करने से, किंवा तनख्वाह कम कर देने से, वा अधिक भय दिखाने से, एवं निरन्तर प्रवास (परदेश) में भेजते रहने से, तथा अधिक परिश्रम का कार्य कराते रहने से शत्रुओं द्वारा सेना में भेद अवश्य डाला जा सकता है अर्थात् फोड़ ली जा सकती है अतः उक्त व्यवहार से बचना चाहिये ।
बलं यस्य तु सम्भिन्नं मनागपि जयः कुतः ॥ १८४ ॥
शत्रोः स्वस्यापि सेनाया अतो भेदं विचिन्तयेत् ।
सेना का भेद होने से अनिष्ट फल — जिसकी सेना में यदि थोड़ा भी भेद हो जाय तो उसे कहां से जय मिल सकता है । इससे अपनी तथा शत्रु की सेना के सम्बन्ध में भेद का विशेष ख्याल रक्खें, अर्थात् जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद हो सके किन्तु अपनी सेना में न हो वैसा व्यवहार खूब विचार कर करना चाहिये ।
यथा हि शत्रुसेनायाः भेदोऽवश्यं भवेत्तथा ॥ १८५ ॥
कौटिल्येन प्रदानेन द्राक् कुर्यान्नृपतिः सदा ।
राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश — जिस प्रकार से शत्रु-सेना में भेद अवश्य पड़ जाय, वैसा कूटनीति से तथा धनादि देकर राजा को शीघ्र भेद का प्रबन्ध सदा करते रहना चाहिये ।
सेवयाऽत्यन्तप्रबलं नत्या ऽचारिं प्रसाधयेत् ॥ १८६ ॥