Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 425 of 526

Read in context
Page 425

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३९

(卐), के चिह्न की किंवा प्रासाद, तोरण, धनुष या पूर्ण कलश के आकार की होती है और स्वस्तिक, माला, मत्स्य, खङ्ग तथा श्रीवत्स के समान आकारवाली भौंरी शुभ मानी जाती है।

नासिकाग्रे ललाटे च शङ्खे कण्ठे च मस्तके ॥ ८१ ॥
आवर्त्तॊ जायते येषां ते धन्यास्तुरगोत्तमाः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता—**जिन घोड़ों की नासिका के अग्रभाग, ललाट, शङ्ख (कनपटी), कण्ठ या मस्तक में भौंरो हो वे धन्य तथा घोड़ों में 'उत्तम' माने जाते हैं।

हृदि स्कन्धे गले चैव कटिदेशे तथैव च ॥ ८२ ॥
नाभौ कुक्षौ च पार्श्वाग्रे मध्यमाः संप्रकीर्तिताः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमत्ता—**जिनके हृदय, स्कन्ध (कन्धा), गळा, कमर, नाभि, कुक्षि (उदर) तथा पार्श्व के अग्रभाग में भौंरी होती है वे घोड़े 'मध्यम' माने जाते हैं।

ललाटे यस्य चावर्त्तद्वितयस्य समुद्भवः ॥ ८३ ॥
मस्तके च तृतीयस्य पूर्णहर्षोऽश्व उत्तमः ।

**'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिसके ललाट में दो भौरियां हों और तीसरी मस्तक में हों वह 'पूर्णहर्ष' (पूर्ण हर्ष देनेवाला) उत्तम अश्व माना जाता है।

पृष्ठवंशे यदावर्त्तो यस्यैकः संप्रजायते ॥ ८४ ॥
स करोत्यश्वसंघातान् स्वामिनः सूर्यसंज्ञकः ।

**'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिस अश्व के पृष्ठवंश (रीढ़) के ऊपर एक भौंरी हो वह 'सूर्यसंज्ञक' कहा जाता है एवं वह अपने स्वामी के यहां आने पर बहुत से घोड़ों को एकत्र कर देता है।

त्रयो यस्य ललाटस्था आवर्त्तास्तिर्यगुत्तराः ॥ ८५ ॥
त्रिकूटः स परिज्ञेयो वाजिवृद्धिकरः सदा ।

**अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के ललाट में तीन भौरियां हों और तिरछे मुखवाली हों तो उसे 'त्रिकूट' संज्ञक कहते हैं, जो सदा स्वामी के यहां घोड़ों की वृद्धि करनेवाला होता है।

एवमेव प्रकारेण त्रयो ग्रीवां समाश्रिताः ॥ ८६ ॥
समावर्त्ताः स बाजीशो जायते नृपमन्दिरे ।

**अन्य भौरियों से युक्त अश्वों के लक्षण—**इसी तरह से यदि अश्व की ग्रीवा में ३ भौरियां हों तो वह अश्व श्रेष्ठ राजमन्दिर में ही रहता है अर्थात् ऐसा यदि किसी के पास रह जाय तो स्वामी को राजा बना दे।