Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 431 of 526

Read in context
Page 431

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४५

संहन्याद्वर्णजान् दोषान् स्निग्धवर्णो भवेद् यदि ॥ ११८ ॥

**स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश—**घोड़ा यदि स्निग्ध (चिकनाई लिये हुये) वर्ण का हो तो वर्ण से होनेवाले सारे दोषों को नष्ट कर डालता है ।

बलाधिकश्च सुगतिर्महान् सर्वाङ्गसुन्दरः ।
नातिक्रूरः सदा पूज्यो भ्रमाद्यैरपि दूषितः ॥ ११९ ॥

**आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण—**जो अधिक बलशाली, अच्छी चालवाला, ऊंचा, सर्वाङ्ग-सुन्दर, अत्यन्त बदमाश नहीं होने पर यदि भौंरी आदि दोषों से युक्त हो तो भी वह सदा पूजनीय होता है ।

वाजिनामत्यवहनात् सुदोषाः संभवन्ति हि ।
कृशो व्याधिपरीताङ्गो जायतेऽत्यन्तवाहनात् ॥ १२० ॥
अवाहितो भवेन्मन्दः सर्वकर्मसु निन्दितः ।
अपोषितो भवेत् क्षीणो रोगी चात्यन्तपोषणात् ॥ १२१ ॥

**अश्वों के कृशत्वादि दोष उत्पन्न होने के कारण—**यदि घोड़े अच्छे भी हों किन्तु अधिकतर सवारी न की जाय तो उसमें दोष उत्पन्न हो जाते हैं और अत्यन्त अधिक सवारी करने से भी घोड़े दुर्बल तथा रोगी हो जाते हैं अतः योग्यतानुसार उन्हें सवारी में लेना चाहिये । और बिना सवारी के भी घोड़े मन्द गतिवाले एवं किसी काम के नहीं रह जाते हैं । और बिना पौष्टिक खुराक के क्षीण तथा अधिक पौष्टिक भोजन कराने तथा तदनुरूप सवारी न करने से रोगी हो जाते हैं, अतः मात्रानुरूप खिलाना चाहिये ।

सुगतिर्दुर्गतिर्नित्यं शिक्षकस्य गुणागुणैः ।

**घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश—**घोड़े में शिक्षक के गुण तथा दोष के द्वारा ही नित्य अच्छी या बुरी चाल हो जाती है अर्थात् जैसा सिखानेवाला होता है वैसा घोड़ा बन जाता है ।

जान्वधश्चलपादः स्यादृजुकायः स्थिरासनः ॥ १२२ ॥
तुलाधृतखलीनः स्यात् काले देशे सुशिक्षकः ।
मृदुना नातितीक्ष्णेन कशाघातेन ताडयेत् ॥ १२३ ॥

**घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण—**घोड़े को सुन्दर रीति से सिखानेवाला सवार जानु (घुठनों) ओंसे नीचे पैर को हिलाता हुआ, शरीर को सीधा रक्खे हुये, स्थिर आसन से बैठकर तुला की भांति लगाम को पकड़े हुए, काल तथा देश के अनुसार न अत्यन्त कठिन और न अत्यन्त कोमल चाबुक की मार से घोड़े को मार कर सिखावे ।

ताडयेन्मध्यघातेन स्थाने स्वश्वं सुशिक्षकः ।