शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३४८ | शुक्रनीतिः
लिये चने, उड़द तथा मोठ को दे चाहे वे सूखे हों या हरे (भिगोये हुये) एवं अच्छी तरह पकाये हुये मांस भी दे।
यद्यत्र स्खलितं गात्रं तत्र दण्डं न पातयेत् ॥ १३७ ॥
मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश— यदि कभी घोड़े के किसी अंग में मोच हो जाय तो वहां पर चाबुक नहीं मारना चाहिये।
नावतारितपल्याणं हयं मार्गसमागतम्।
दत्त्वा गुडं सलवणं बलसंरक्षणाय च ॥ १३८ ॥
मार्ग से चलकर आये हुये घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश— मार्ग चलकर आये हुये घोड़ों को बिना जीन उतारे हुये ही बल का संरक्षण करने के लिये लवण (निमक) के साथ गुड़ देना चाहिये।
गतस्वेदस्य शान्तस्य सुरूपमुपतिष्ठतः।
मुक्तपृष्ठादिबन्धस्य खलीनमवतारयेत् ॥ १३९ ॥
पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश— पसीना सूख जाय एवं घोड़ा शान्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो जाय तब उसके पीठ के बन्धन (कसे हुये चारजामे) को खोल कर लगाम निकाल लेवे।
मर्दयित्वा तु गात्राणि पांसुमध्ये विवर्त्तयेत्।
स्नानपानावगाहैश्च ततः सम्यक् प्रपोषयेत् ॥ १४० ॥
घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश— और घोड़े के सारे शरीर का मर्दन (खरहरा) करके धूलि में लोटने की व्यवस्था कर दे। इसके बाद स्नान कराना, पानी पिलाना, नदी आदि में अवगाहन (स्नान) कराना आदि से उसे भलीभांति पुनः परिपुष्ट (ताजा) कर लेवे।
सर्वदोषहरोऽश्वानां मद्यजाङ्गल्यो रसः।
शक्त्या सम्पापयेत् क्षीरं घृतं वा वारिसक्तुकम् ॥ १४१ ॥
घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल— घोड़ों के लिये मद्य तथा जंगली जीवों का मांसरस सर्वदोषनाशक (लाभप्रद) होता है। शक्ति के अनुसार दूध, घी या जल में घुला हुआ सत्तू पिलावे।
अन्नं भुक्त्वा जलं पीत्वा तत्क्षणाद्वाहितो हयः।
उत्पद्यन्ते तदाश्वानां कासश्वासादिका गदाः ॥ १४२ ॥
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष— यदि चारा खिलाने के बाद पानी पिलाकर फौरन घोड़े पर सवारी की जाय तो उससे घोड़े को खांसी तथा दमे की बीमारी हो जाती है।
यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा मध्या माषा मकुष्ठकाः।
नीचा मसूरा मुद्गाश्च भोजनार्थं तु वाजिनः ॥ १४३ ॥