शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४६
**घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश—**घोड़ों को भोजन के लिये जौ तथा चना देना उत्तम, उर्द तथा मोठ मध्यम और मसूर तथा मूंग का देना नीच माना जाता है।
गतयः षड्विधा धाराऽऽस्कन्दितं रेचितं प्लुतम् ।
धौरीतकं वल्गितं च तासां लक्ष्म पृथक् पृथक् ॥ १४४ ॥
**घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश—**१. धारा, २. आस्कन्दित, ३. रेचित, ४. प्लुत, ५. धौरीतक, ६. वल्गित इन भेदों से गति ६ प्रकार की होती है। अब उनके लक्षण पृथक् २ कहते हैं।
धारागतिः सा विज्ञेया यातिवेगतरा मता ।
पार्ष्णिस्तोदाविनुदितो यस्यां भ्रान्तो भवेद्धयः ॥ १४५ ॥
**धारा गति के लक्षण—**जो अत्यन्त वेग से युक्त गति हो उसे 'धारा' गति समझनी चाहिये। इसमें सवार की एड़ी या चाबुक की मार से अत्यन्त प्रेरित होकर घोड़ा वेग से चक्कर या दौड़ लगाने लगता है।
आकुञ्चिताग्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्य या गतिः ।
आस्कन्दिता च सा ज्ञेया गतिविद्भिस्तु वाजिनाम् ॥ १४६ ॥
**आस्कन्दित गति के लक्षण—**जिसमें अगले पैरों को सिकोड़े हुये उछल २ कर घोड़े की गति होती है उसे 'आस्कन्दित' गति घोड़ों की गति जाननेवाले विद्वान् मानते हैं ।
ईषदूत्प्लुत्य गमनमखण्डं रेचितं हि तत् ।
**रेचित गति के लक्षण—**और घोड़ा जिसमें थोड़ा उछल २ कर अखण्ड गमन करता है उसे 'रेचित' कहते हैं ।
पादैश्चतुर्भिरुत्प्लुत्य मृगवत् सा प्लुता गतिः ॥ १४७ ॥
असंवलितपद्भ्यां तु सुव्यक्तं गमनं तुरम् ।
धौरीतकं च तज्ज्ञेयं रथसंवाहने वरम् ॥ १४८ ॥
**प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण—**घोड़ा चारो पैरों से मृग के समान चौकड़ी भरकर जिसमें दौड़ता है उसको 'प्लुत' गति कहते हैं। जिसमें दोनों पैर बिना सिकोड़े हुये उठाकर चलाये जांय, और शीघ्र सुन्दर गति हो, जिससे रथ ( गाड़ी ) खींचने में अच्छाई हो, उसे 'धौरीतक' गति कहते हैं।
प्रसंवलितपद्भ्यां यो मयूरोद्धृतकन्धरः ।
दोलायितशरीरार्धकायो गच्छति वल्गितम् ॥ १४९ ॥
**वल्गित गति के लक्षण—**जिसमें घोड़ा सिकोड़े हुये दोनों पैरों से मयूर के समान गर्दन उठाये हुये और आधे शरीर को हिंडोले के समान हिलाता हुआ दौड़ता है उसको 'वल्गित' गति कहते हैं