शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 432 of 526
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शुक्रनीतिः
हेषिते कक्षयोर्हन्यात् स्खलिते पक्षयोस्तथा ॥ १२४ ॥
भीते कर्णान्तरे चैव ग्रीवासून्मार्गगामिनि ।
कुपिते बाहुमध्ये च भ्रान्तचित्ते तथोदरे ॥ १२५ ॥
अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैर्नान्यस्थानेषु च कर्हिचित् ।
**अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश—**सुन्दर सिखानेवाला सवार अपने अच्छे घोड़ों को उचित स्थान पर चाबुक की मध्यम मार से मारे। जैसे यदि ज्यादा हिनहिनाता हो तो दोनों आँखों में, फिसलने पर दोनों बगलों में, डरने (भड़कने) पर दोनों कानों के बीच में, विपरीत मार्ग से चलने पर ग्रीवा में, दोनों अगले पैरों को उठाकर खड़ा होने पर आगे के पैरों के मध्य में, और भ्रान्त चित्त होने पर उदर में बुद्धिमान सवार घोड़े के मारे किन्तु अन्य स्थानों में कभी भी न मारे ।
अथवा हेषिते स्कन्धे स्खलिते जघनान्तरे ॥ १२६ ॥
भीते वक्षःस्थलं हन्याद् वक्त्रमुन्मार्गगामिनि ।
कुपिते पुच्छसंघाते भ्रान्ते जानुद्वयं तथा ॥ १२७ ॥
अथवा अधिक हिनहिनाने पर कन्धे में, फिसलने पर जांघों के बीच में, डरने पर वक्षःस्थल में, कुमार्ग पर चलने पर मुख में, कुपित होने पर पूंछ की सन्धि के अन्त में, चित्त की भ्रान्ति होने पर दोनों जानुओं में मारे।
नासकृत्ताडयेदश्वमकाले च विदेशके ।
अकालस्थानघातेन वाजिदोषान् वितन्वते ॥ १२८ ॥
**अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट—**घोड़े को बार बार या असमय तथा कुठॉव में (जहां नहीं मारना चाहिये, वहां पर) नहीं मारना चाहिये क्योंकि असमय तथा कुठांव में मारने से घोड़े में दोषों की वृद्धि हो जाती है।
तावद् भवन्ति ते दोषा यावज्जीवत्यसौ हयः ।
दुष्टं दण्डेनाभिभवेन्नारोहेद्दण्डवर्जितः ॥ १२९ ॥
और वे दोष घोड़े में तब तक बने रहते हैं, जब तक घोड़ा जीवित रहता है। दुष्ट घोड़े को दण्ड देकर परास्त कर देवे, विना दण्ड दिये उस पर सवारी न करे।
गच्छेत् षोडशमात्राभिरुत्तमोऽश्वो धनुःशतम् ।
यथा यथा न्यूनगतिरश्वो हीनस्तथा तथा ॥ १३० ॥
**उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण—**उत्तम घोड़ा १६ मात्रा का उच्चारण करते-करते १०० धनुष की दूरी तक पहुँच जाता है। जैसे २ जिसकी न्यून गति होती है वैसे २ वह हीन माना जाता है।
सहस्रचापप्रमितं मण्डलं गतिशिक्षणे ।'