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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

12 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे

12 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
( २ ) दाशमिक पाय्यमान (Measures of length)
1 मीटर = 39.37 इंच
1 डेसीमीटर = 1/10 मीटर
1 सेंटीमीटर = 1/100 मीटर
1 मिलीमीटर = 1/1000 मीटर
1 डेकामीटर = 10 मीटर
1 हेक्टोमीटर = 100 मीटर
1 किलोमीटर = 1000 मीटर
नवीन तथा प्राचीन द्रव्य
नवान्येव हि योज्यानि द्रव्याण्यखिलकर्मसु।
विना विडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षिकैः ॥ ४४ ॥
सभी प्रकार के व्यवहारों में नवीन (ताजे) द्रव्यों का ही उपयोग करना चाहिये, किन्तु निम्नलिखित द्रव्यों को ताजा न लें-वायविडंग, पीपल, गुड, धनियाँ, आज्य (घी) और माक्षिक (मधु या शहद)।
वक्तव्य-यह सूत्र रूप में दिया गया निर्देश विचारणीय है-यहाँ उपर्युक्त पुराने द्रव्यों का प्रयोग औषधयोगों के लिए ही निर्दिष्ट है, शेष कार्यों में इनको नया लिया ही जाता है। नया गुड़, घी, मधु, तथा धनियाँ ये प्रतिदिन बड़े आदर के साथ प्रयुक्त होते हैं। शास्त्र का भी निर्देश है कि भोजन तथा बृंहण कार्यों के लिए इन्हें नया ही लें। भावमिश्र ने 'धान्य' का अर्थ 'धनियाँ' न करके अन्न किया है। नया मधु पुष्टिकारक तथा सर होता है और वही पुराना हो जाने पर मल-संग्राहक, रूक्ष, मेदनाशक तथा दस्तावर हो जाता है। घी एक वर्ष पुराना, गुड़ तीन साल पुराना लेने की परम्परा है। चिकित्सा की दृष्टि से पुराने से पुराना घी अच्छा माना गया है, परन्तु औषधसिद्ध घी साल भर के बाद प्रभावहीन हो जाता है और औषधसिद्ध तैल पुराने उत्तम होते हैं। विशेष-देखें-सुश्रुत सू० अ० 36.7-9।
गीले द्रव्यों का प्रयोग
गुडूची कुटजो वासा कूष्माण्डश्च शतावरी।
अश्वगन्धा सहचरी शतपुष्पा प्रसारिणी ॥ ४५ ॥
पटोलं च तथा निम्बो बला नागबला तथा।
पथ्या पुनर्नवा चैव विदारी चेन्द्रवारुणी ॥ ४६ ॥
पलङ्कषा तथा छत्रा केतकी चेति विंशतिः।
प्रयोक्तव्याः सदैवार्द्रा द्विगुणा नैव कारयेत् ॥ ४७ ॥
(शुष्का यदि च गृह्यन्ते क्रियन्ते द्विगुणा न च।)
गिलोय (गुरूच), कुटज (कुरैया की छाल), अडूसा की पत्तियाँ, कूष्माण्ड (पेठा), शतावरी (शतावर की जड़ें), असगन्ध, सहचरी (कटसरैया), शतपुष्पा (पूर्ववर्ती सभी टीकाकारों ने इसका पर्याय 'सौंफ' लिखा है, वास्तव में यह 'सोया' है। इसके गुण-धर्मों पर ध्यान दें), गन्धप्रसारिणी, परबल की पत्ती, नीम की छाल, बला (बरियारा), नागबला (कंघी), पथ्या (हरड़), पुनर्नवा, विदारीकन्द, इन्द्रायण (इनारू का फल), पलंकषा (गुग्गुलु), छत्रा (छत्ता), केवड़ा का फूल-इन बीस द्रव्यों को सदैव गीले (सरस) या हरे लेकर प्रयोग में लाना चाहिये, किन्तु इनकी मात्रा को दूना नहीं किया जाता। कभी-कभी व्यवहार में ऐसा भी देखा जाता है कि ये द्रव्य सूखे तो ले लिये जाते हैं, किन्तु मात्रा में दूने नहीं लिये जाते।
वक्तव्य-यहाँ 'विंशतिः' शब्द प्रायिक वचन है। इस प्रकार के द्रव्यों की संख्या बीस से भी अधिक देखी जा सकती है, आप संहिता ग्रन्थों का परिशीलन करें। वहाँ यद्यपि इस प्रकार का स्वतन्त्र विचार नहीं किया गया है, तथापि प्रसंगानुसार यह निर्देश तो किया ही गया है, इस योग में किस द्रव्य को किस प्रमाण में कैसा (हरा, गीला या सूखा) लेना चाहिये।
सूखे तथा गीले द्रव्यों का विचार
शुष्कं नवीनं यद् द्रव्यं योज्यं सकलकर्मसु ॥ ४८ ॥
आर्द्रं च द्विगुणं युञ्ज्यादेष सर्वत्र निश्चयः।
चूर्ण, क्वाथ आदि सभी कार्यों में सूखे, किन्तु नवीन (ताजे-गुणवान्) द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये। उनके न मिलने पर ताजे (हरे-गीले) द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु वे आर्द्र (गीले) द्रव्य परिमाण में दूने लेने होंगे। यह सिद्धान्त सर्वत्र मान्य होता है।
वक्तव्य-यहाँ 'नवीन' शब्द 'प्रत्यग्रोऽभिनवो नव्यः' का पर्याय मात्र नहीं है, अपितु भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में इसकी क्या कालावधि है, इसके लिए देखें-इसी अध्याय के 54वें श्लोक के उत्तरार्ध से 57वें श्लोक के पूर्वार्ध तक के श्लोकों के आशय को। नवीन शब्द का एक आशय यह भी है कि वे द्रव्य सड़े, गले, घुने तथा किसी प्रकार से विकार युक्त न हो गये हों।
अनुक्त परिभाषा
कालेऽनुक्ते प्रभातं स्यादङ्गेऽनुक्ते जटा भवेत् ॥ ४९ ॥

प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 13
भागोऽनुक्ते तु साम्यं स्यात् पात्रेऽनुक्ते च मृन्मयम्।
द्रवेऽनुक्ते जलं ग्राह्यं तैलेऽनुक्ते तिलोद्भवम् ।। ५० ।।
(दुग्धे सर्पिषि मूत्रे च ग्राह्यं गोसम्भवं बुधैः।)
यदि ग्रन्थकार द्वारा औषध सेवन करने का समय-निर्देश
न किया गया हो, तो प्रातःकाल समझ लेना चाहिये। यदि
औषधद्रव्य के पत्र, पुष्प, मूल, त्वचा, निर्यास (गोंद) आदि
का संकेत न किया गया हो, तो उसकी जड़ का ग्रहण करना
चाहिये। यदि किसी औषधयोग के द्रव्यों का अलग-अलग
मान=परिमाण न कहा गया हो, तो सभी द्रव्यों को समभाग में
लेना चाहिये। यदि क्वाथ, अवलेह आदि का निर्माण करने
के लिए किसी पात्र-विशेष का उल्लेख न किया गया हो, तो
मिट्टी के पात्र का ग्रहण करना चाहिये। औषध-निर्माण के
लिए अथवा औषध सेवन करने के लिए जहाँ किसी द्रव
(तरल पदार्थ) का उल्लेख न किया गया हो, वहाँ जल का
ग्रहण करना चाहिये। यदि तिल, सरसों, तीसी (अलसी),
बादाम आदि का नाम-निर्देश न किया गया हो तो वहाँ तिलों
के तेल का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ किसी विशेष प्राणी के
दूध, घी, मल, मूत्र का निर्देश न किया गया हो, वहाँ ये सभी
द्रव्य गाय से ही लेने चाहिये।
वक्तव्य-प्रायः ग्रन्थकार इस प्रकार की सामान्य बातों
को चर्चा नहीं किया करते, ऐसी परिस्थिति में ऐसे वचनों का
बड़ा महत्त्व होता है। निघण्टु-ग्रन्थों में प्रायः यह देखा जाता
है कि किसी औषधद्रव्य के कौन-से अंग (अवयव) के क्या
गुण हैं, लिखा रहता है, कहीं नहीं भी मिलता। ऐसे अवसरों
पर इस परिभाषा का प्रयोग होता है। मृन्मय-इसे अनेक
सम्पादकों टीकाकारों ने 'मृण्मय' लिखा है जो व्याकरण की
दृष्टि से अशुद्ध है। द्रवेऽनुक्ते-द्रव पदार्थों का प्रयोग किसी न
किसी प्रकार से चिकित्सा-क्षेत्र में होता ही है। अनुपान,
सहपान आदि में तो विशेष रूप से देखा ही जाता है। ऐसे
संदिग्ध अवसरों पर जल का प्रयोग शास्त्र द्वारा अनुमोदित है।
तिलोद्भवम्-तिलों से उत्पन्न तेल वास्तविक तेल है, शेष
तो आकार की साम्यता होने के कारण तेल कहे जाते हैं।
जितने 'तिलहन' द्रव्य हैं, उन सबसे तेल निकाला जाता है।
ध्यान दें-'तिलहन' नाम में भी तिल शब्द की ही प्रधानता है।
प्राणिज द्रव्यग्रहण-विधि
(जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमनखादिकम्।। ५१।।
क्षीरमूत्रपुरीषाणि जीर्णाहारे च संहरेत्।)
रक्त (खून), रोम (लोम तथा केश), नख (नाखून) आदि
(अस्थि, माँस, वसा तथा शुक्र) द्रव्य युवा पशुओं के शरीर
से ही ग्रहण करने चाहिये। यदि दूध, मूत्र, मल इनका ग्रहण
करना हो तो उन पशुओं का जब आहार पच जाये तभी ग्रहण
करना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त पद्य सु० सू० अ० 36.16 से लेकर यहाँ
ग्रन्थ की क्षति-पूर्ति की गयी है। आज भी वैज्ञानिक पद्धति
वाले रक्त का ग्रहण 18 वर्ष से 40 वर्ष तक की अवस्था वाले
स्त्री-पुरुषों से ही करते हैं। दूध आदि का ग्रहण आहार के पच
जाने पर करना चाहिये, किन्तु देखा जाता है कि गो-पालनकर्ता
चारा सामने रखकर गाय को दुहते हैं, ऐसा दूध उक्त सिद्धान्त
के विरुद्ध है। संहरण (संग्रह) भी दो प्रकार का होता है-एक
तो द्रव्य को लेकर तत्काल प्रयोग कर लेना और दूसरा लेकर
रख देना।
पुनरुक्त द्रव्य का मान
एकम्प्यौषधं योगे यस्मिन् यत् पुनरुच्यते ।। ५२ ।।
मानतो द्विगुणं प्रोक्तं तद् द्रव्यं तत्त्वदर्शिभिः ।
यदि एक द्रव्य किसी योग में दो बार कहा गया हो, तो
औषध-निर्माण में कुशल विद्वान् उस द्रव्य को दुगुना कर
लेते हैं।
वक्तव्य-यहाँ किसी योग के द्रव्यों को समभाग में लेने
की आज्ञा ग्रन्थकार ने दी हो, वहाँ तो आप उस पुनरुक्त द्रव्यों
को दूना ले लेंगे और जहाँ पहली बार वह द्रव्य दूसरे द्रव्यों के
साथ दूसरे परिमाण में परिगणित हो और दूसरी बार दूसरे
परिमाण वाले द्रव्यों के बीच में परिगणित हो तो वहाँ उसका
वही-वही परिमाण होगा। इसका सावधानीपूर्वक विचार
कर लें।
लाल एवं सफेद चन्दन का विचार
चूर्णस्नेहासवा लेहाः प्रायशश्चन्दनान्विताः ।। ५३ ।।
कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम्।
चूर्ण, स्नेह (घी, तेल, वसा तथा मज्जा), आसव तथा
अवलेह इनके निर्माण में प्रायः सफेद चन्दन का और कषाय
(क्वाथ) एवं लेप आदि में लाल चन्दन का प्रयोग करना
चाहिये।
वक्तव्य-लाल तथा सफेद चन्दन के गुण-धर्मों का
विचार कर युक्ति-विशेषज्ञ चिकित्सक इन उपर्युक्त नियमों में
परिवर्तन भी कर सकता है। यह अनुमति 'प्रायः' शब्द का
प्रयोग करके ग्रन्थकार ने दी है।
पाठ भेद—यद्यपि शार्ङ्गधरसंहिता अधिकांश संस्करणों

14 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे


में 'प्रायशश्चन्दनान्विताः' पाठ प्राप्त होता है, परन्तु इसका
एक पाठभेद है-'साध्या धवलचन्दनैः'। इस पाठ से
'सफेदचन्दन' की कामना तो पूर्ण हो जाती है, किन्तु 'प्रायः'
शब्द का गौरवपूर्ण भाव समाप्त हो जाता है ऐसा कुछ टीकाकारों
का मत है। इसके लिए उन्हें श्लोक के उत्तरार्ध में पठित प्रायः
शब्द का प्रयोग कर ही लेना चाहिये।

चूर्णादि में गुणहीनता का विचार
गुणहीनं भवेद् वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम् ।। ५४ ।।
मासद्वयात् तथा चूर्णं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्।
हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरात् परम् ।। ५५ ।।
हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकात् तथा।
ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निर्वीर्या वत्सरात् परम् ।। ५६ ।।
पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः।

एक वर्ष के बाद प्रत्येक वानस्पतिक औषधद्रव्य जैसे
लाये थे, वैसे ही यदि पड़ा हो, तो वह गुणहीन हो जाता है,
अर्थात् वह अपने रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव से
रहित हो जाता है। तद्रूप का एक अर्थ यह भी है यदि उन काष्ठ
औषध द्रव्यों का वास्तविक रूप बदलकर किसी रासायनिक
योग के साथ प्रयोग कर लिया जाता है, तो उनके गुणों में
चिरस्थायिता आ जाती है। दो मास के बाद चूर्ण (पीसे हुये
काष्ठ द्रव्य) शक्तिहीन हो जाते हैं। एक वर्ष के पश्चात् गोली
तथा अवलेह के रूप में बनाकर रखे गये काष्ठ औषधद्रव्य
तथा एक वर्ष चार मास (अर्थात् 16 मास) के बाद काष्ठ
औषधों के योग से तैयार किये गये घी, तेल, तथा वसा आदि
हीनवीर्य हो जाते हैं। लघुपाकी (शीघ्र पक जाने वाले
औषधद्रव्य जैसे-बरसाती घास, आदि) औषधियाँ भी एक
वर्ष के बाद शक्ति रहित हो जाती हैं, किन्तु आसव, अरिष्ट,
तथा लोह आदि धातुओं की भस्में तथा रस (पारद-गन्धक
के योग से निर्मित) औषधयोग जितने अधिक पुराने होते हैं,
उतने अधिक गुणवान् होते जाते हैं।

वक्तव्य-जहाँ जिन द्रव्यों की गुणहीनता की जो अवधि
कहीं गयी है, वह प्रयोगात्मक दृष्टि से क्रमशः अपने गुण,
वीर्य आदि से हीन होती देखी जाती है। 'चतुर्मासाधिकात्
तथा'
-यद्यपि प्रसंगानुसार इसका अर्थ सोलह मास से अधिक
होता है, किन्तु कुछ विद्वान् इसका अर्थ 'वर्षाऋतु के चार
मास बीतने पर' ऐसा अर्थ करते हैं। व्याकरण की दृष्टि से यह
अर्थ प्राप्त नहीं होता है, परन्तु चूर्ण आदि बनाने के बाद बीच
में जब भी वर्षा ऋतु आ जाती है, उसका दुष्प्रभाव तो पड़ता
ही है। घी, तेल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत प्राप्त होते हैं।
तो भी ताजा घी का प्रयोग करने का जहाँ निर्देश है, वहाँ
सालभर के भीतर का ही लेना चाहिये। पुराने घी की जहाँ
प्रशंसा है, उसका वर्णन हम यथास्थान करेंगे। तेल पुराने
अच्छे माने जाते हैं। जौ, गेहूँ, तिल, तथा माष आदि अन्न नये
ही लिये जाते हैं। कहीं-कहीं इनको पुराना ग्रहण करने की भी
चर्चा है। आसव-अरिष्ट पुराने होने पर उनकी मादकता क्रमशः
कम हो जाती है और लाभ की दृष्टि से उनमें कमी नहीं आती
है। अतएव उन्हें अच्छा कहा गया है। विशेष-देखें-सु० सू०
अ० ३६ सम्पूर्ण।

गुणहीनता का निर्णय
(विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः ।। ५७ ।।
नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेव विनिर्दिशेत्।)

जिस औषधद्रव्य में दुर्गन्ध (द्रव्य की स्वाभाविक गन्ध
से विपरीत गन्ध) उत्पन्न न हुई हो, जिसके अपने स्वाभाविक
रस, गुण आदि नष्ट न हो गये हों, वह द्रव्य यदि नया हो
अथवा पुराना ही हो, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये।

वक्तव्य-उक्त पद्य (सु० सू० अ० 36.15) में नये तथा
पुराने द्रव्यों के ग्रहण के सम्बन्ध में यह तो बतलाया गया है
कि वे द्रव्य कैसे होने चाहिये, किन्तु यह नहीं कहा गया है,
कि किन द्रव्यों को नया लें और किन द्रव्यों को पुराना।
इसका विचार महर्षि सुश्रुत ने इस प्रकार किया है-'चिकित्सा
के लिए सभी नये द्रव्यों का ही प्रयोग करना चाहिये। केवल
मधु, घी, गुड़, पिप्पली और वायविडंग को एक वर्ष पुराना
लेना चाहिये।' इस प्रसंग में कुछ टीकाकारों का मत है, कि
'धनियाँ' भी पुराना ही लेना चाहिये, किन्तु लोकव्यवहार में
ये सभी द्रव्य नये ही लिये जाते हैं। देखें-सु० सू० अ०
36.8-9।

भेषज-भण्डार
(प्लोतमृद्भाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम् ।। ५८ ।।
प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते।)

प्लोत (साफ-सुथरे वस्त्रों के टुकड़े), मिट्टी के पात्र,
फलक (लकड़ी की पट्टियाँ), तथा शंकु (नुकीली कील)
आदि में औषध द्रव्यों को जहाँ सुरक्षित रखते हैं, उसे
औषध-भंडारगृह कहते हैं। इस भंडारगृह को पूर्व दिशा की
ओर पवित्र स्थान पर बनवाना चाहिये।

प्रथमोऽध्यायः ] परिभा॒षा 15
वक्तव्य-प्लोत शब्द से थैला, बोरा या कपड़े की गठरी
का, मृद्भाण्ड शब्द से चीनी मिट्टी के मर्तबान, बोयाम,
काँच या शीशा के जार, बरनी, शीशी, बोतल आदि का,
फलक शब्द से लकड़ी की टाँड, आलमारी, बक्सा आदि का
तथा न्यङ्कु शब्द से खूँटी, छत पर लटका हुआ कुंडा आदि का
ग्रहण करना चाहिये। इन्हीं में औषधद्रव्यों को भरकर,
सँभालकर लटकाकर यथायोग्य रखें, क्योंकि यह भेषजागार
है। इसमें सभी आवश्यक औषधद्रव्यों आदि का संग्रह करके
रखा जाता है। देखें-सु० सू० अ० 38.81।
भेषज-भण्डार-स्वरूप
(धूमवर्षानिलक्लेदैः सर्वर्तुष्वनभिद्रुते ।। 59 ।।
ग्राहयित्वा गृहे न्यस्येद् विधिनौषधसङ्ग्रहम्।)
जिस घर में धुआँ, वर्षा, अनिल (दूषित वायु) तथा
क्लेद (गीलापन) का अहितकर प्रभाव औषधद्रव्यों पर न
पड़ सके, उस घर में विधिपूर्वक संग्रह किये गये उन औषधद्रव्यों
को रखना चाहिये।
वक्तव्य-संग्रह करके रखी हुई प्रत्येक वस्तु की
समय-समय पर देख-रेख भी करते रहना चाहिये, नहीं तो वे
काम में लाने योग्य नहीं रह जातीं। इनमें उपयुक्त धुआँ आदि
को प्रधान कारण माना गया है। वर्षानिल-इस पद का
टीकाकारों ने भिन्न-भिन्न अर्थ किया है-वर्षा के कारण
औषधद्रव्य सड़ जाते हैं, वर्षानिल = बरसाती हवा के कारण
उनमें बुकनी या फफूंदी लग जाती है, अथवा अनिल = दूषित
वायु के कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है। इस प्रकार ये
सभी अर्थ प्रकरणोचित हैं।
विशेष-यह पाठ सुश्रुतसंहिता से लिया गया है। देखें-सु०
सू० अ० 38.81।
उचित-अनुचित द्रव्य
व्याधेरयुक्तं यद् द्रव्यं गणोक्तमपि तत् त्यजेत् ।। 60 ।।
अनुक्तमपि यद् युक्तं योजयेत् तत्र तद् बुधः।
बुद्धिमान् चिकित्सक का प्रमुख कर्तव्य है कि वह गण
में कहे गये भी उस द्रव्य का ग्रहण न करे, जो द्रव्य रोगी के
रोग का शमन करने में उपयुक्त न हो और जो द्रव्य उस गण
में नहीं कहा गया हो, किन्तु रोग-शमन में उपयोगी हो तो भी
उस द्रव्य का ग्रहण कर लेना चाहिये।
वक्तव्य-आयुर्वेदीय संहिताओं में अनेक प्रकार के
औषधद्रव्यों के गणों का उल्लेख मिलता है, जिनका संग्रह
सामान्य दृष्टि से किया गया था, किन्तु यहाँ उक्त निर्देश विशेष
परिस्थिति के लिए किया गया है। अतः शास्त्रोक्त क्वाथ,
चूर्ण, आसव, अरिष्ट, तथा अवलेह आदि के योगों में कहे गये
उस-उस अनुपयोगी द्रव्य या द्रव्यों को निकालकर उपयोगी
द्रव्यों को मिला लेने की अनुमति ग्रन्थकार चिकित्सक को दे
रहा है।
स्थानभेद से औषधद्रव्यों का विचार
आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिर्मतः ।। 61 ।।
अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः ।
अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च ।। 62 ।।
गृह्णीयात् तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे।
आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि ।। 63 ।।
विन्ध्याचल, सह्याद्रि आदि पर्वत श्रेणियाँ आग्नेय
(अग्निगुण-प्रधान) अर्थात् उष्ण प्रभाव वाली होती हैं और
हिमगिरि (हिमालय) सौम्य (सोमगुण युक्त) होता है, अर्थात्
शीत प्रभाव वाला होता है। इसलिये उक्त प्रकार की पर्वत
श्रेणियों में पैदा होने वाली औषधियाँ अपने-अपने स्थान में
उत्पन्न होने के कारण से तदनुरूप गुणों वाली होती हैं। अर्थात्
विन्ध्य आदि पर्वत श्रेणियों में पैदा होने वाली उष्णगुण-प्रधान
तथा हिमालय परिसर में पैदा होने वाली शीतगुण-प्रधान
औषधियाँ होती हैं। इसके अतिरिक्त स्थानों (समतल प्रदेशों)
में, वनों तथा उपवनों (बगीचों) में भी औषधियाँ उगती या
उगायी जाती हैं। उक्त सभी प्रकार की औषधियों को चिकित्सक
प्रसन्नचित्त होकर, मनसा, वाचा पवित्र होकर, प्रातःकाल,
शुभवार (दिन) में, सूर्य की ओर मुख करके मौन धारण कर
तथा हृदय में शिव जी को प्रणाम कर ग्रहण करे।
वक्तव्य-विन्ध्याचल आदि पर्वत आग्नेय और हिमालय
सौम्यगुण-प्रधान है। उक्त स्थानों पर होने वाली औषधियाँ
तदनुरूप होती हैं, ऐसा जो कहा गया है, वह सामान्य वचन
है। उदाहरणस्वरूप आप 'वत्सनाभ' विष का परिचय देखें।
यह हिमालयप्रदेश में 10 से 14 हजार फुट की ऊँचाई पर पैदा
होता है। यह हिमालय के अनुरूप न होकर उष्णवीर्य होता है।
ऐसी विशेषताएँ सामान्य वचनों के बीच में सर्वत्र मिलती
ही हैं।
वनेषूपवनेषु च-'वनेषु' प्राकृतिक वनों में, जहाँ वृक्ष,
लता, गुल्म आदि स्वयं पैदा हो जाते हैं। उपवनेषु-ये वे
बगीचे हैं जिन्हें 'भैषज्योद्यान' कहा जाता है। इस प्रकार के

16 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
उपवन आयुर्वेदीय शिक्षा देने की दृष्टि से महाविद्यालयों,
विश्वविद्यालयों की भूमि पर लगाये जाते हैं। औषध-ग्रहण या
संग्रहण की विधि तन्त्रशास्त्र में भी देखी जाती है। यहाँ 'प्रातः'
शब्द का अर्थ सूर्योदय के पूर्व भी लिया जा सकता है और
'आदित्यसम्मुखः' का अर्थ पूर्वाभिमुख भी देखा जाता है।
सुवासरे का अर्थ है-शुभ दिन में। ज्योतिःशास्त्र के अनुसार
तिथि, वार, चन्द्र तथा नक्षत्र जिस दिन अनुकूल हों, उसे
'सुवासर' कहा जाता है। इसके लिए मुहूर्तचिन्तामणि का
नक्षत्र-प्रकरण देखें। मौनी शब्द से औषधिग्रहण के मन्त्र का
मन ही मन जप करने का यह संकेत मिलता है। नमस्कृत्य
शिवं हृदि-शिव संसार का कल्याण करने वाले देव हैं और
इन्हीं का एक नाम 'मृत्युञ्जय' है। चिकित्सा का मूल लक्ष्य
मृत्यु को जीतना ही है। अतएव औषधिग्रहण काल में इन्हें
प्रणाम करने का निर्देश किया है।
त्रिविध देश-लक्षण
(बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान्।
जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ।। 64 ।।
संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः ।)
जिस देश में जल अधिक बरसता हो; झील, नदी, नाले,
तथा कुएँ, आदि अधिक हों तथा नग अर्थात् पेड़, पहाड़
अधिक हों और कफ एवं वात दोष के कारण होने वाले रोग
जहाँ अधिक होते हों, वह 'आनूप देश' है। जिस देश में जल
तथा वृक्ष (अनूप देश की अपेक्षा) कम हों और पित्त, रक्त
तथा वात दोष सम्बन्धी रोग अधिक मात्रा में होते हों, वह
'जांगल देश' है। उक्त दोनों (आनूप तथा जांगल) देशों के
लक्षणों से युक्त लक्षण जिसमें दिखलायी दें, वह 'साधारण
देश' माना जाता है।
वक्तव्य-औषध-संग्रह, रोग-निर्णय, तथा साध्यासाध्य-
विचार आदि के अवसर पर इन देशों का भी सहारा लिया
जाता है। इस दृष्टि से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा
सकता है। इनका विशेष विवरण देखें-च० वि० अ० 3..
47-48। च० क० अ० 1.8। अत्रिसंहिता। सु० सू० अ० 36
तथा राजनिघण्टु में।
द्रव्यग्रहण-निर्देश
साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।। 65 ।।
(द्रव्याणि तत्र जायन्ते तद्गुणानि विशेषतः ।)
साधारण भूमि (देश) में उत्पन्न उस औषधद्रव्य को
ग्रहण करना चाहिये, जो उत्तर दिशां की ओर उत्पन्न हुआ हो,
क्योंकि वहाँ (उस ओर) जो द्रव्य उत्पन्न होते हैं, वे विशेष
रूप से अपने-अपने गुणों से युक्त होते हैं।
वक्तव्य-'उत्तराश्रितम्' इसका महत्त्व ऊपर 61वें पद्य
में इस प्रकार वर्णित है-'सौम्यो हिमगिरिर्मतः' अर्थात् उत्तर
दिशा सौम्यगुण से समृद्ध होती है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी
संहिता में इस पद्य को दिया है, जिसका पूर्वार्ध भिन्न है।
देखें-सु० सू० अ० 36.14।
निन्दित भेषज द्रव्य
वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः ।। 66 ।।
जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसिद्धदाः ।
वल्मीक (वामी या दीमकों से बनाया गया मिट्टी का
टीला) पर उत्पन्न या उससे घिरी हुई, कुत्सित (निन्दित,
गन्दे) स्थान में पैदा हुई, अनूपदेशज, श्मशान भूमि (जहाँ
मरे हुये पुरुषों को जलाया अथवा गाड़ दिया जाता है, उस
स्थान) पर, ऊषर (बंजर भूमि अथवा नमक या रेह के कणों
से व्याप्त) भूमि पर तथा मार्ग के बीच में या उसके
अगल-बगल में उत्पन्न हुई अर्थात् जो पथिकों के पैरों से
कुचल दी गयी हो और जो कीड़ों से खायी गयी हो, जो आग
से जल गयी हो एवं हिम (बर्फ या पाला या ओला) से
व्याप्त हो, ऐसी ओषधियाँ कार्य में सिद्धि नहीं देती हैं। अतः
ऐसी औषधियों का संग्रह नहीं करना चाहिये।
वक्तव्य-आप ध्यान दें कि ग्रन्थकार ने इस प्रकार की
औषधियों के संग्रह का निषेध क्यों किया है? वल्मीक के
भीतर जहरीले सर्प रहते हैं। उनके स्पर्श या दंश से वे दूषित
हो सकती हैं। कुत्सित शब्द स्वयं ही औषधि की अयोग्यता
का संकेत कर रहा है। अनूपदेशज औषधियाँ कफवर्धक तथा
वातकारक होती हैं। श्मशान-प्रदेश में उत्पन्न औषधियाँ भूत-प्रेत
तथा चिता-धूम से दूषित होती हैं। मार्गज औषधियाँ अपने
स्वरूप में प्राप्त नहीं हो पाती हैं। शेष स्पष्ट है। तात्पर्य यह है
कि सम्पूर्ण गुणसम्पन्न औषधद्रव ही कार्य (चिकित्सा) में
सिद्धि प्रदान कर सकते हैं।
ऋतुभेद से औषधद्रव्य-संग्रह
शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् ।। 67 ।।
विरेक-वमनार्थं च वसन्तान्ते समाहरेत् ।
सभी कार्यों (चूर्ण, गुटिका, लेप, अवलेह, आसव, तथा
अरिष्ट आदि) के लिए शरद् ऋतु (आश्विन-कार्तिक मासों) में

प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 17
सरस (जो सूखी न हो अर्थात् ताजी, हरी, तथा गीली)
औषधियों का ग्रहण (संग्रह) करना चाहिये और विरेचन
तथा वमन कराने के लिए जिनका उपयोग करना हो, उन्हें
वसन्त ऋतु (फाल्गुन-चैत्र) के अन्त में ग्रहण करना चाहिये।

वक्तव्य-वसन्त तथा शरद् ऋतुओं में औषधद्रव्य अपने
रस, वीर्य, विपाक आदि से परिपूर्ण पाये जाते हैं, क्योंकि इन
दोनों ही ऋतुओं का काल समशीतोष्ण होता है। अतएव इन
अवसरों पर औषध-ग्रहण का शास्त्रकार ने निर्देश किया है।
तन्त्रान्तर में ऋतु के अनुसार औषधियों में रसस्थिति का
वर्णन इस प्रकार मिलता है-ग्रीष्म ऋतु में मञ्जरियों के अग्रभाग
में, वर्षा ऋतु में पत्तों तथा त्वचा (छाल) में, वसन्त ऋतु में
वृक्षों को जड़ों में रस की स्थिति होती है। इस प्रसंग में शेष
ऋतुओं का उल्लेख नहीं किया गया है।

द्रव्यों के अवयवों का ग्रहण
अतिस्थूलजटा याः स्युस्तासां ग्राह्यास्त्वचो बुधैः ।। 68 ।।
गृह्णीयात् सूक्ष्ममूलानि सकलान्यपि बुद्धिमान्।
न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्याः सारः स्याद् बीजकादितः ।। 69 ।।
तालीसादेश्च पत्राणि फलं स्यात् त्रिफलादितः ।
धातक्यादेश्च पुष्पाणि स्नुह्यादेः क्षीरमाहरेत् ।। 70 ।।
(विदार्यादेश्च कन्द्वानि गुन्दं सर्जरसादितः ।
मज्जा अक्षोटकादेश्च शेषं वृद्धोपदेशतः ।। 71 ।।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे परिभाषा नाम
प्रथमोऽध्यायः ।। 1 ।।

जो औषधियाँ अधिक मोटी जड़ों वाली होती हैं, विद्वान्
वैद्यों को उनकी जड़ों की छालें ग्रहण करनी चाहिये और
जिनकी जड़ें छोटी हैं, उन्हें सम्पूर्ण लेना चाहिये। अर्थात्
उनके पंचांग (जड़, शाखा, पत्र, पुष्प तथा फल) का ग्रहण
करना चाहिये। बरगद आदि बड़े वृक्षों की भीतरी त्वचा
(छाल) लेनी चाहिये (क्योंकि बाहरी छाल. निःसार होती
है)। बीजक (विजयसार) आदि वृक्षों का सार (बीच की
लकड़ी) लेना चाहिये (यहाँ आदि शब्द से खैर, चीड़, देवदारु,
तथा चन्दन जैसे वृक्षों का ग्रहण करना चाहिये)। तालीस
आदि (तुलसी, पान, तेजपत्ता, तथा सनाय जैसे द्रव्यों) के
पत्र; त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, तथा आँवला) आदि
(कालीमिर्च, पीपल, वायविडंग, सौंफ, सोया, मैनफल,
प्रियंगु तथा जैसे द्रव्यों) के फल तथा धातकी (धाय) आदि
वृक्षों के फूल तथा स्नुही (थूहर) आदि क्षीरी वृक्षों का दूध
ग्रहण करना चाहिये। विदारीकन्द आदि (कन्दवर्ग में कहे
गये द्रव्यों) के कन्दों का, सर्जरस (राल) आदि के गोंद का
तथा अखरोट आदि (काजू, बादाम, तथा पिस्ता जैसे द्रव्यों)
की मज्जा का ग्रहण करें। जिन द्रव्यों के ग्राह्य अवयवों का
उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है, उनका आयुर्वेदवेत्ता वृद्धों के
कथनानुसार ग्रहण करें।

वक्तव्य-ऊपर ग्रन्थकार न औषधद्रव्यों के किन-किन
अवयवों का ग्रहण करना चाहिये, इस प्रकार का जो निर्देश
किया है, वह सामान्य स्वरूप है। ज्ञातव्य है कि प्रायः
सभी औषधद्रव्यों के एकाधिक अवयवों का ग्रहण शास्त्र-निर्देश
द्वारा अथवा लोकव्यवहार द्वारा देखा जाता है। जैसे न्यग्रोध
(बरगद) की त्वचा भी ली जाती है और क्षीरीवृक्ष होने के
कारण उसके दूध का भी ग्रहण किया जाता है, इसी तरह
परबल की पत्ती तथा उसके फल दोनों का ग्रहण होता है। इस
प्रकार की विसंगतियों अथवा विशेषताओं के सम्यक् ज्ञान के
लिए औषध-निर्माण कुशल गुरुजनों की चिरकाल तक
उपासना तथा उनका सहवास करना चाहिये। औषध-विक्रेता
भी इन विषयों के ज्ञाता होते हैं। उनसे हरड़ माँगेंगे तो वे
उसका फल ही देंगे, न कि जड़ या उसकी छाल। इसके
विशद विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 39 गद्य 3-6 ।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित
दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता
पूर्वखण्ड का पहला अध्याय समाप्त ।। 1 ।।

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द्वितीयोऽध्यायः
भैषज्याख्यान

औषध-सेवन-काल
भैषज्यमभ्यवहरेत् प्रभाते प्रायशो बुधः।
कषायांश्च विशेषेण तत्र भेदस्तु दर्शितः॥१॥
बुद्धिमान् रोगी का कर्तव्य है कि वह प्रायः (अधिकांश,
विशेष निर्देश के अभाव में) औषध का सेवन प्रातःकाल ही
करे। विशेष करके कषायों (स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम,
तथा फाण्ट) का सेवन तो अवश्य ही प्रातःकाल करे। औषध-
सेवन के सम्बन्ध में जो भेद (मतभेद) है, वह आगे दिखलाया
गया है।
वक्तव्य-इस पद्य में कषाय शब्द को बहुवचनान्त प्रयुक्त
किया गया है। इसका तात्पर्य है कि कषाय शब्द से पंचकषायों
का ग्रहण किया जाता है। देखें-शा० सं० म० खं० अ० 1.1।
औषध-सेवन के पाँच काल
ज्ञेयः पञ्चविधः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम्।
किञ्चित् सूर्योदये जाते तथा दिवसभोजने॥२॥
सायन्तने भोजने च मुहुश्चापि तथा निशि।
मनुष्यों के लिए औषध-सेवन के पाँच कालों का निर्देश
किया गया है-1. कुछ सूर्य के उदय होने पर (यह अरुणोदय
से सूर्योदय होने तक की मध्य अवधि है), 2. दिन के भोजन
के समय में, 3. सायंकाल के भोजन के समय में, 4. बार-बार
और 5. रात्रि में (सोने के समय)।
वक्तव्य-उक्त औषध-सेवन के पाँचों कालों का विशद
विवेचन आगे किया जा रहा है।
औषध-सेवन का प्रथम काल
प्रायः पित्तकफोद्रेके विरेकवमनार्थयोः॥३॥
लेखनार्थं च भैषज्यं प्रभाते तत् समाहरेत्।
एवं स्यात् प्रथमः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम्॥४॥

पित्त अथवा कफ दोष की वृद्धि होने पर विरेचन या
वमन कराने के लिए और दोषों को विशेष करके कफदोष
को अपने स्थान से खुरच कर बाहर निकालने के लिए प्रायः
(अधिकांश) प्रातःकाल औषधयोग का प्रयोग करना चाहिये।
इस प्रकार यह मनुष्यों के लिए औषध-सेवन का प्रथम काल
कहा गया है।
वक्तव्य-साहित्यिक लेखन-कार्य से आयुर्वेदिक लेखन-
कार्य सर्वथा भिन्न है। यद्यपि दोनों स्थानों के लेखन शब्द की
मूल प्रवृत्ति समान है। आज जिसे साहित्यिक भाषा में लेखन
कहा जाता है, वह वास्तव में लेपन (लीपना) है। लेखन
शब्द का सही प्रयोग शिलालेख के रूप में होता है। आप देखें
कि जिस प्रकार शिला पर लिखने के लिए उसे खुरचना
पड़ता है, ठीक उसी प्रकार कफ अपने आशय के उन-उन
अवयवों में सटा रहता है, अतः उसका लेखन किया जाता है।
उद्रेक-वमन तथा विरेचन कराने के पूर्व कफ तथा पित्त को
अपने स्थान से विचलित करा दिया जाता है, जिससे उसका
उचित प्रकार से निर्हरण किया जा सके।
औषध-सेवन का द्वितीय काल
भैषज्यं विगुणेऽपाने भोजनाग्रे प्रशस्यते।
अरुचौ चित्रभोज्यैश्च मिश्रं रुचिरमाहरेत्॥५॥
समानवाते विगुणे मन्देऽग्नावग्निदीपनम्।
दद्याद् भोजनमध्ये च भैषज्यं कुशलो भिषक्॥६॥
व्यानकोपे च भैषज्यं भोजनान्ते समाहरेत्।
हिक्काऽऽक्षेपककम्पेषु पूर्वमन्ते च भोजनात्॥७॥
एवं द्वितीयकालश्च प्रोक्तो भैषज्यकर्मणि।
अपानवायु की विकृति से होने वाले (मलाशय, वस्ति
तथा गर्भाशय सम्बन्धी) रोगों में भोजन करने के पहले औषध-
सेवन करना उत्तम होता है। भोजन के प्रति अरुचि हो जाने

द्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्याख्यान 19
--- [बायाँ स्तम्भ] ---
पर विविध प्रकार के रुचिकर, किन्तु पथ्य भोजनों में मिलाकर
औषध-सेवन करना चाहिये। समान वायु की विकृति से होने
वाले (पक्वाशय सम्बन्धी) रोगों में, मन्दाग्नि (जठराग्नि के
मन्द पड़ जाने) में, अग्नि की शक्ति को बढ़ाने वाले औषधयोग
को भोजन के बीच में कुशल चिकित्सक दे। व्यानवायु के
प्रकोप से होने वाले (अर्दित = मुखप्रदेश का लकवा तथा
पक्षाघात आदि) रोगों में भोजन के अन्त में औषध-सेवन
करना चाहिये। हिचकी, आक्षेपक (वातव्याधि-विशेष देखें-
मा० नि०) तथा कम्पवात आदि रोगों में भोजन के तथा
भोजन करने के बाद औषध-सेवन करना चाहिये। इस प्रकार
यह औषध-सेवन करने के दूसरे काल का वर्णन कर दिया
गया है।
औषध-सेवन का तृतीय काल
उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि।।8।।
ग्रासे ग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने।
प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते च दीयते।।9।।
औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात् तृतीयकः।
स्वरभंग (स्वरभेद) आदि (कास, श्वास, तथा हिक्का
जैसे) रोगों को उत्पन्न करने वाले उदान नामक वायु (जो
कंठ, श्वासमार्ग में निवास करता है, उस) के प्रकुपित हो जाने
पर सायंकालीन भोजन के समय प्रत्येक ग्रास के साथ औषध
देना चाहिये और हृदयगति का संचालन करने वाली प्राणवायु
के कुपित होने पर सायंकालीन भोजन के अन्त में विद्वान्
चिकित्सक को औषध प्रयोग कराना चाहिये। इस प्रकार यह
औषध-सेवन करने का तीसरा काल है।
औषध-सेवन का चतुर्थ काल
मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च।।10।।
सान्नं च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः।
तृट् (प्यास), छर्दि (वमन, उल्टी या कै), हिचकी,
श्वास (दमा) तथा विविध गरों (दूषीविषों के प्रयोग के कारण
उत्पन्न रोगों) में बार-बार (अनेक बार) भोजन में मिलाकर
औषध का सेवन कराना चाहिये। यह औषध-सेवन का चौथा
काल कहा गया है।
औषध-सेवन का पञ्चम काल
ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा।।11।।
पाचनं शमनं देयमनन्नं भेषजं निशि।
इति पञ्चमकालश्च प्रोक्तो भेषज्यकर्मणि।।12।।
--- [दायाँ स्तम्भ] ---
जत्रु (Collar bone = ग्रीवा के सामने उभरी हुई
अस्थि) के ऊपरी भाग में होने वाले अवयवों (गला, मुख,
नाक, कान, आँख तथा सिर) के रोगों में लेखन (कर्षण =
खुरचकर निकालने या कृश करने) में, बृंहण (स्थूल करने)
में पाचन तथा शमन औषधयोगों का प्रयोग रात में भोजन के
पहले ही कराना चाहिये। यह औषध सेवन का पाँचवाँ काल
कह दिया गया है।
वक्तव्य-प्रायः देखा जाता है कि रोगी चिकित्सक से
पूछा करते हैं-यह औषध कब-कब खानी है, इसके उत्तर के
लिए इन श्लोकों में कहे गये विषयों का अभ्यास करें। विशेष
जानकारी प्राप्त करने के लिए चरक चि० अ० 30, श्लोक
296 से 312 का भी अवलोकन कर लेना चाहिये। उपर्युक्त
श्लोक में प्रयुक्त 'निशि' शब्द का अर्थ सामान्य स्थिति में
'रात्रि का प्रथम प्रहर' है।
द्रव्य की पाँच अवस्थाएँ
द्रव्ये रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च।
संवेदनक्रमादेताः पञ्चावस्थाः प्रकीर्तिताः।।13।।
द्रव्य का सेवन करने पर उसमें अनुभवी-क्रम से रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) ये पाँच अवस्थाएँ
कही गयी हैं।
वक्तव्य-रस आदि का परिचय-जीभ द्वारा जिसका
परिचय प्राप्त होता है उसे 'रस' कहते हैं। इसकी उत्पत्ति मूल
रूप से जल द्वारा मानी गयी है। रसों की संख्या छः है। यथा-
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, तथा कषाय। गुण-इनकी
संख्या बीस है-गुरु, मन्द, हिम, स्निग्ध, श्लक्ष्ण, सान्द्र, मृदु,
स्थिर, सूक्ष्म, विशद (इन गुणों के विपरीत क्रमशः ये दस
गुण हैं) लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, खर, द्रव, कठिन, सर,
स्थूल, तथा पिच्छिल। वीर्य-यह दो प्रकार का होता है-उष्ण
और शीतल। विपाक-इसकी परिभाषा इसी अध्याय के
33वें श्लोक में देखें। यह रसभेद से तीन प्रकार का होता
है-मधुर, अम्ल, तथा कटु। शक्ति-द्रव्यों की शक्ति अचिन्त्य
होती है। द्रव्य-यह स्थावर, जंगम तथा पार्थिव भेद से तीन
प्रकार का होता है। स्थावर द्रव्य-जड़, छाल, सार, गोंद,
नाल, स्वरस, पत्र, पुष्प, फल, दूध, क्षार, भस्म, तथा तेल
आदि। जङ्गम द्रव्य-दूध, मधु, पित्त, स्नेह (वसा), मज्जा,
रक्त, मांस, हड्डी, चर्म, मल, मूत्र, स्नायु, नख, लोम, खुर,
तथा सींग आदि। पार्थिव द्रव्य-सोना, चाँदी, ताँबा, सीसा,