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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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सौंदर्य लहरी २९७
बजना, जो ध्यान समाधि के प्रतिपक्षी हैं, कामदेव की प्रसन्नता
को व्यक्त करने वाले हास्य की किलकिलाहट सदृश्य हैं।
मन के लय और व्युत्थान का स्थान आज्ञा चक्र के ऊपर है।
अनाहत् में ईश्वर, विशुद्ध में सदाशिव और आज्ञा में शिव का स्थान
है। शांभवी मुद्रा को समाधि का द्वारोद्घाटन कहना चाहिये।
व्युत्थान के समय जब शक्ति नीचे उतरती है, तब मानो शिव के
ललाट पर पद प्रहार करती हुई नीचे उतरती है, और उसके नूपुरों
के शब्द में कामदेव के हास्य की प्रति ध्वनि बताई गई है। शांभवी
मुद्रा के अभ्यासी को काम वासना रूपी अन्तर्दाह का उन्मूलन हो
जाता है।
(८७)
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि च पर भागे च विशदौ।
परं लक्ष्मी पात्रं श्रियमनिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥
अर्थ—हे जननि ! तेरे दोनों चरण कमल पर जय प्राप्त
कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य क्या है ? क्योंकि कमल बरफ़ से मर
जाता, तेरे चरण हिमगिरि पर निवास करने में कुशल हैं।
कमल रात को सो जाता है, तेरे चरण दिन रात विशद् रहते

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२६८ सौंदर्य लहरी
हैं; वह दिन में लक्ष्मी का पात्र रहता है और तेरे चरण समयाचार
के उपासकों को खूब लक्ष्मी देते हैं ।
अर्थात् तेरे चरणों को कमल की उपमा कैसे दी जा सकती है ?
कदापि नहीं दी जा सकती ।
( ८८ )
पदं ते कीर्त्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीखर्परतुलाम् ।
कथंचिद्द्बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥
अर्थ—हे देवि ! तेरा पद कीर्तियों का प्रपद (स्थान)
है और विपदाओं का अपद है। न जाने सत्पुरुषों ने उसकी
तुलना कछुवे की कठिन खोपरी से कैसे की है, वह इतना कोमल
है कि विवाह के समय पुरारि ने दयार्द्र मन से किसी प्रकार
(अर्थात् बडी हिचकिचाहट और बडे संकोच के साथ)
दोनों हाथों से उठाकर उसे पत्थर पर रखा था।
विवाह में फेरों या भांवरों के समय वर वधू के एक चरण को
अपने हाथों से उठाकर पत्थर पर रखकर कहता है, कि हे देवि !
तू धर्मे पालनार्थे अपना चित्त इतना दृढ रखना जैसा यह पत्थर है।

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सौंदर्य लहरी २९९
केवल्यशर्मा का मत है कि यह श्लोक मद्रास की भाषाओं की
प्रतियों में नहीं मिलता, इसलिये क्षेपक है।
(८९)
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नायददतौ ॥
कठिन शब्द— नाक=स्वर्ग, किसलय=पत्र, पल्लव, अह्नाय=
तुरन्त, स्वःस्थ=स्वावलंबी, स्वर्ग निवासी, अनिशं=निरन्तर ।
अर्थ—हे चण्डि ! तेरे दोनों चरण अपने नखों ने
कल्पवृक्षों का परिहास सा कर रहे हैं, जो नख देवांगनाओं के
कर रूपी कमलों को ( हाथ जोडने समय ) बंद करने के लिये
संख्या में १० चन्द्रमा सदृश हैं । कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में
रहने वाले स्वावलंबी देवताओं को अपने पल्लव रूपी कराग्रों से
फल देते हैं, परन्तु तेरे चरण दरिद्रियों को निरन्तर, तुरन्त और
बहुत धन देते रहते हैं ।
कल्पवृक्ष से स्वर्ग निवासियों को ही लाभ है, यहां के दरिद्रियों
को कुछ नहीं ।

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३०० सौन्दर्य लहरी
( ९० )
ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशाऽनुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दं विकिरति ।
तवास्मिन्मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥
कठिन शब्द— करण चरणः = इन्द्रियों रूपी चरण वाला,
षट्चरण = भौंरा, मधुकर ।
अर्थ:—इस तेरे चरण में जो मंदार वृक्ष के पुष्पों के
स्तबक जैसा सुन्दर है, मेरा ५ ज्ञानेन्द्रिय और १ अन्तःकरण
रूपी ६ चरण वाला यह जीव छः चरणों वाला मधुकर बनकर
डूबा रहे। तेरा चरण जो दीनों को उनकी आशा के अनुसार
निरन्तर लक्ष्मी देता रहता है, और सौन्दर्य राशि के मकरन्द
को खूब फैलाता रहता है और मन्दार के पुष्पों के स्तबक
सदृश सुभग है ।
अर्थात् मैं भौर की तरह तेरे चरण कमल पर अपना सर्वस्व
मनसा, वाचा कर्मणा सब इन्द्रियों और मनके व्यापारों
को समर्पण करदूं ।

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सौन्दर्य लहरी ३७१
चरणों की गति का ध्यानः—
( ९१ )
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवाब्धुमनम-
श्रन्तस्ते ( स्खलन्तस्ते ) खेलं भवनकलहंसा न जहति ।
अतस्तेषां (स्वविक्षेपे) शिक्षां सुभगमणिमञ्जीरगणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥
कठिन शब्दः—आचक्षाणः=बातें करता हुआ
अर्थः—हे चारु चरिते ! ऐसा प्रतीत होता है कि तेरे
भवन के राजहंस चलते समय तेरे पदन्यास क्रीडा ( चाल ) का
परिचय प्राप्त करने को तेरे खेल का त्याग नहीं करते । ( अर्थात्
तेरे पीछे २ तेरी तरह कदम उठाकर चलते हैं, और वे इस
खेल का त्याग नहीं करते , और तेरे चलते समय चरण कमलों
में लगी मणियों युक्त नूपुरों की झङ्कार का शब्द मानो उनको
चलने की शिक्षा का उपदेश कर रहा है ।
स्त्रियों की चाल की हंसगति से उपमा दी जाया करती है,
परन्तु भगवती की चाल से हंस स्वयं चलने की शिक्षा ग्रहण कर
रहे हैं । दूसरा भाव यह भी है कि परमहंस महापुरुषों की उन्मत्त
गतिविधि में शक्ति की क्रीडा युक्त मस्तीभरी चाल का आभास
रहता है । जीवन्मुक्त परम हंस ही भगवती के भवन के राजहंस हैं ।

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३०२ सौन्दर्य लहरी
पलंग का ध्यानः—
( ९२ )
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रसइव दृशांदोग्धि कुतुकम् ॥
कठिन शब्दः—प्रच्छदपट=चादर, दृशां=दृष्टि को, दोग्धि=दुहता
है, कुतुकं=कौतुहल
अर्थः—ब्रह्मा हरि रुद्र और ईश्वर द्वारा रक्षा किये जाने
वाले (क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर और अनाहत् चक्र )
तेरे मंच के चार पाये हैं, अर्थात् चारों तेरा मंच बनाते हैं
उसपर बिछी हुई स्वच्छ छाया की बनी हुई कपट रुपी माया की
चादर शिव है, जो तेरी प्रभा के झलकने के कारण अरुण
दिख पडने से एसी प्रतीत होती हैं कि मानो शृङ्गार रस शरीरी
बनकर दृष्टि में कुतूहल उत्पन्न कर रहा है ।
शिव शक्त्यात्मक प्रथम स्पन्द आज्ञा चक्र में, सदाख्य अर्थात्
अर्धनारीश्वर शिव विशुद्ध में, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा क्रमशः
नीचे के चारों चक्रों के आधिदेव हैं। रुद्र विष्णु और ब्रह्मा
शुद्ध विद्या के अन्तर्गत है और जीव (पुरुष) माया के अन्तर्गत है
और अन्य २४ तत्त्वों का संघात् रूपी देह अशुद्धविद्या के अन्तर्गत है।

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सौंदर्य लहरी ३०३
अशुद्धविद्या के रूप को सुप्त कुण्डलिनी कहा जा सकता है। जागकर
वह सब तत्त्वों की शुद्धि करती हुई विशुद्ध चक्र में अपने विशुद्ध
रूप में विराजने लगती है। यह हम ऊपर भी एक स्थान पर कह
आये हैं कि प्रसुप्त अवस्था में शक्ति का स्थान मूलाधार के पास
सुषुम्ना से बाहर है और जागकर सुषुम्ना के भीतर स्वाधिष्ठान चक्र
में, परन्तु विशुद्ध स्वरूप में वह विशुद्धिचक्र में रहती है। इस
श्लोक में भगवती के इस रूप का ही वर्णन है।
इस श्लोक के साथ ३७ वें श्लोक को एक बार फिर पढ़
लेना चाहिये। व्योमेश्वर और व्योमेश्वरी का यहां चित्र खेंचा गया
है। शिव को यदि स्वच्छ छाया घटित आकाशमयी मायावी चादर
सदृश समझा जाय तो शक्ति को उसमें स्फटिकवत् झलकने वाली
अरुणिमा समझना चाहिये ।
श्री चक्र को भी भगवती का मंच कहा जा सकता है। ईशान्
कोण में ईश्वर, अग्निकोण में रुद्र, नैऋत्य कोण में विष्णु और
वायव्य कोण में ब्रह्मा समझना चाहिये। अथवा पूर्व में ब्राह्मी
(ईश्वरी) मातृ देवता, दक्षिण में रौद्री मातृ देवता पश्चिम में
कौमारी मातृ देवता और उत्तर में वैष्णवी अर्थात् प्रत्येक की शक्ति
को देव के वाम ओर में देखना चाहिये, जो चारों द्वारों पर स्थित
हैं। श्री चक्र को आकाश रूपी स्फटिक का बना हुआ समझना
चाहिये। उस पर शिव रूपी चादर है और अरुणिमा रूपी शक्ति
है। वैन्दव स्थान पर शक्ति का आसन है। श्री चक्र की रश्मियां
दसों दिशाओं में भुक्ति मुक्ति सहित अणिमादि सिद्धियों के रूपों में
फैल रही हैं।

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३०४ सौंदर्य लहरी
यहां तक भगवती के अंगों का पृथक २ ध्यान बताया जाकर
इस श्लोक में पूरे शरीर का ध्यान कहा गया है ।
( ९३ )
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा ¹गात्रे दृषदिव कठोरा कुचतटे ।
भृशंतन्वी मध्ये ²पृथुरपिवरारोह विषये
जगत् त्रातुं शंभोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥
पाठान्तरः— १ चित्तेदृषदुपलशोभा, २ पृथुरुरसिजारोह
कठिन शब्द—अराला=कुटिल, पृथु=भारी, बडा, वरारोह=
सुन्दर नितंब, उपल=रत्न, उरसिज=कुच, काचित्=कचते (प्रकाशित
इति) काचित, चमकती हुई अथवा काच के सदृश, अथवा कोई भी
जिसको हम नहीं जान सकते । करुणा काचिदरुणा=करुणा का अर्थ
काचित् अरुणा किया जाना चाहिये ।
अर्थः—शंभु की करुणा (अर्थात दया) की, जगत की
रक्षा करने के लिये मानों जो काचित अरुणा है सर्वत्र जय हो
रही है । जिसके अर्थात् अरुणा भगवती के केश स्वाभाविक
सरलता लिये हुए घूंघराले अर्थात् कुटिल हैं, मन्द २ हंसी मुख
पर है, गात्र अथवा चित्त सिरस की आभा लिये हुए है, कुच
पत्थर सदृश कठोर है (अथवा स्फटिक की शोभा युक्त हैं)
मध्य में कटिभाग अति पतला है और नितंब भारी हैं (अथवा

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सौंदर्य लहरी ३०५
कुचों का उठाव भारी है ) पाठान्तर को ग्रहण करने मे शरीर
के स्थान पर चित्त और नितंब के स्थान पर कुचों का दोबारा
वर्णन हो जाता है । चित्त को स्फटिक मे उपमित तो किया जा
सकता, परन्तु देह की शोभा का वर्णन किया जाना अधिक
उपयुक्त दिखता है, और कुचों को दोबारा न बताकर नितंबों
का भी वर्णन आना अत्यावश्यक है, इसलिये हमने पाठान्तरों
को पृथक दिखा दिया है ।
शंभु की करुणा और अरुणा दोनों एक ही हैं। अरुणा
भगवती का एक नाम है और उसके अरुण वर्ण के कारण प्रसिद्ध
है। करुणा भी ककार पूर्वक अरुणा ही है, इसलिये ककार से
काचित् का भाव व्यक्त होता है। काचित् का अर्थ 'कोई' होने
से करुणा को अरुणा का एक अंश समझना चाहिये। अर्थात्
पराशक्ति अरुणा जिसको कोई नहीं जान सकता वह शंभु की
करुणा के रूप में ही जानी जा सकती है। दूसरा भाव यह भी है
कि शंभु के स्फटिक अथवा कांच सदृश स्वच्छ शरीर में प्रतिफलित
होने वाली अरुणिमा ही भगवती अरुणा की छत्री करुणा के स्वरूप में
दिख रही है। कुटिलता, हिंसा, और कठोरता करुणा के विरोधी भाव
होते हैं। दया का मन्द पड़ना भी एक कमी का लक्षण है, और किसी
भाव का तनु होना उसके क्षीण होने का पूर्व रूप है। इसलिये
शंभु की करुणा में कुटिलता हिंसा, कठोरता, मन्दपना और तनु का
भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि शंभु की करुणा के रूप में जगत
की रक्षा के लिये ही अरुणा ने यह रूप धारण किया है। अराल
का अर्थ कुटिल होता है परन्तु कुटिलता भगवती के केशों की

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३०६ सौंदर्य लहरी

शोभा बढा रही है। शंभु की करुणा कभी मन्द नहीं पडती, परन्तु
मन्दपना हंसी में रहकर करुणा की वृद्धि करता है। शिरीष की
व्युत्पत्ति 'शृ' धातु से है (शृ हिंसायां शृणाति शीर्यते वा
इति शिरीषः) अर्थात् जो काटा जाता है, अथवा जो फैलता
है वह शिरीष कहलाता है। शिरीष अथवा सिरस एक वृक्ष का नाम
है जो कल्याण का सूचक है। अर्थात् भगवती में हिंसा का भाव
ऐसा है जैसा कि सिरस में, क्योंकि भगवती का शरीर सिरस की
आभायुक्त है जो सारे जगत का कल्याण करने को सदा तत्पर रहता
है। जैसे कुटिलता को भगवती ने केशों में धारण कर के उनकी
शोभा को बढाया है, और फिर भी पीठ पर पीछे की ओर फेंक
दिया है, इसी प्रकार कठोरता भी दया का विरोधी भाव है, उसे
भगवती ने अपने पयोधरों में धारण कर लिया है। दूध पिलाकर
पोषण करने वाले स्तनों में कठोरता रहने पर भी वे दयार्द्रता से
टपकते रहते हैं, क्योंकि भगवती का सारा शरीर शिरीष वृक्षवत्
कल्याणवपुः है। शंभु की करुणा में कुटिलता, हिंसा और कठोरता
के विरोधी भावों को स्थान कहां, वे इतने दयालु हैं कि उनकी
करुणा में कभी कमी नहीं आती, वह सदा सर्वदा पूर्ण है, फिर तनु
अथवा क्षीण होने की तो संभावना ही कैसे हो सकती है। इसलिये
वह पृथु अर्थात् महती करुणा है। पृथु भाव भगवती ने नितंबों
में धारण किया हुआ है। नीचे नितंब भाग का भारीपन
स्थिरता का द्योतक है, अर्थात् शंभु की करुणा नित्य है। परन्तु
भगवती का कटि प्रदेश अति तनु भी है, यद्यपि यह स्त्रियों की
शोभा का एक लक्षण है, तो भी करुणा का मध्य भाग तनु होने
से उसके क्षीण होने की संभावना की भ्रांति हो सकती है,

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सौंदर्य लहरी ३०७
परन्तु यह बात नहीं है । कटि प्रदेश में मणिपूर चक्र रुद्र का स्थान
होने से, भगवती में रुद्र का रौद्र भाव अर्थात् क्रोध अति *तनु हो
गया है, अर्थात् क्षीणवत् तनु है । मानो भगवती ने रुद्र के रौद्र
भाव को मेखला सदृश कस रखा है ।
अभिप्राय यह है कि भगवती का शरीर मानो शंभु की दया
का अवतार है, जो जगत की रक्षा करने के लिये अवतीर्ण हुआ है ।
इस श्लोक में यह भाव भी प्रतीत होता है कि सद्गुरू स्वरूप
शिव के अनुग्रह से जो शक्ति की जागृति होती है, और उपरोक्त
करुणा के स्वरूप में साधक गण उसे अपने अन्तर में अनुभव करते हैं,
वह शंभु की करूणा है । अर्थात शिव स्वरूप गुरु का अनुग्रह
शंभु का ही अनुग्रह है, जिससे शिष्य में शक्ति का उत्थान होता
है । इसलिये गुरु कृपा, शक्ति की अभिव्यक्ति और शंभु की
करुणा तीनों पर्यायवाची हैं ।
भगवती के श्रृङ्गारार्थ दर्पण का ध्यान
[ ९४ ]
समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधाति त्वद्वक्त्रप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातंकं चन्द्रादपि निजहृदम्भोरुहमिव ॥
कठिन शब्दः—मसृणः=चिकना, स्वच्छः विकचं=प्रफुल्लित.
विकसित, खिला हुआः निरातंक=आतंकरहित, निडर, बिना भय के ।

  • नोट:—देखें योग दर्शन सूत्र (२, ४) में ५ क्लेशों की प्रसुप्त,
    तनु, विच्छिन्न और उदार चार अवस्थायें ।
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३०८ सौन्दर्य लहरी
अर्थः—अंबर मणि अर्थात् सूर्य तेरे चरणों के समीप
होने पर मुकुर (दर्पण) का काम दे रहा है। तेरे मुख के भय
से उसने अपनी किरणों के समूह को अन्दर छुपा लिया है,
इसलिये वह स्वच्छ है और तेरे मुख का प्रतिबिम्ब उसके हृदय
कमल के सदृश सदा विकसित है (क्योंकि तेरा मुख कमल
सदा विकसित रहता है और वह उसका प्रतिबिंब है), और
उसको चन्द्रमा का भय नहीं है। (कमल सूर्य को देख कर
खिलता है और रात्रि में मुरझा जाता है मानों उसे चन्द्रमा से
भय लगता है)।
यहां पर सूर्य को दर्पण से उपमा देकर, उसमें प्रतिबिंबित
भगवती के मुख कमल को उसके विकसित हृदय कमल से उपमित
किया गया है। अनाहत् चक्र का स्थान हृदय है, और वह सूर्य-
मंडल का स्थान है। अनाहत् चक्र की १२ पंखडियां १२ आदित्य
मानी जाती हैं। इसलिये हृदयस्थ सूर्य मंडल भगवती के चरणों
के समीप मुकुरवत् रखा हुआ है। ९२ श्लोक में भगवती को जिस
मंच पर बिठाया गया है, वह विशुद्ध चक्र है और हृदय चक्र उसके
नीचे है और आज्ञा चक्रस्थ चंद्रमंडल ऊपर है। दर्पण स्वच्छ होना
चाहिये, यदि सूर्य की किरणें उसको ढकलेती हैं तो वे मुकुर को
मलीनवत् करके मुख के प्रतिबिंबित् होने में बाधक होती हैं। परन्तु
भगवती के मुख का तेज सूर्य के तेज से भी अधिक है अथवा
उसका तेज भगवती के तेज से ही प्रकाश पातां है, इसलिये सूर्य ने
भगवती के मुख के भय से अपनी किरणों को अन्तःस्तिमित् कर

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सौंदर्य लहरी ३०२.
लिया है। और भगवती का प्रफुल्लित मुख कमल उसमें दिखने
लगा है।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
(गीता १५, १२)
भगवती का मुख कमल के सदृश है, इसलिये उसका प्रतिबिंव
सूर्य के हृदय कमलवत् जान पडता है। कमल रात्रि में संकुचित हो
जाता है और दिन में ही खिलता है। इसलिये ऊपर आज्ञाचक्र में
चन्द्र मंडल दिखने से उसके बंद हो जाने की यदि आशंका की
जाय तो वह उचित नहीं है, क्योंकि भगवती के तेज से ही चन्द्र-
मण्डल चमकता है और उसके प्रतिबिंब को चन्द्रमा से कोई भय
नहीं हो सकता।
कठवल्ली (६,५) की 'यथादर्शे तथात्मनि' इत्यादि श्रुति पर
भाष्यकार भगवत्पाद लिखते हैं कि जैसे मल रहित दर्पण में मनुष्य
को अपना प्रतिबिंब स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है वैसे ही तमोगुण और
रजोगुण से शुद्ध होने पर बुद्धि रूपी निर्मल आदर्श पर आत्मतत्त्व
का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखा करता है। अर्थात् योगियों को प्रत्यक्ष
होने वाला हृदय पुरुष परमतत्त्व का प्रतिबिंब है, जो उर्ध्वोन्मीलित
सूर्य और अधोन्मीलित चन्द्र के योग से योगियों के हृदय में सदा
क्रीडा किया करता है। अथवा वह शक्ति का ही रूप है जो योगियों
के हृदयस्थ सूर्यमण्डल रूपी मुकुर में परमतत्त्व का प्रतिबिंब मात्र है।

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३१० सौंदर्य लहरी
लक्ष्मीधर के मतानुसार श्लोक ९४, ९९ और १०२ तीनों
क्षेपक हैं। ऊपर कहा जा चुका है कि कैवल्य शर्मा के मत से
श्लोक ८८ क्षेपक है। शंकर भगवत्पाद ने पूरी शतश्लोकी
लिखी थी इसलिये ३ श्लोक क्षेपक होने चाहिये अर्थात् उक्त चारों
में एक श्लोक क्षेपक नहीं है। हमारी समझ में यह ९४ वां
श्लोक क्षेपक नहीं माना जाना चाहिये, क्योंकि इसकी पूर्व संगति
९२ श्लोक से और उत्तर संगति ९५ श्लोक से स्पष्ट है। शृङ्गार
के लिये यदि ९५ श्लोकोक्त शृङ्गार का डिब्बा पास में दिखाया
जाता है तो शृङ्गार के आवश्यक साधन मुकुर को क्यों नहीं स्थान
दिया जाना चाहिये। शृङ्गार के लिये शृङ्गार का डिब्बा जितना
अनिवार्य है उतना आवश्यक मुकुर भी है।
श्रृङ्गार के डिब्बे का ध्यान:—
( ९५ )
कलङ्कः कस्तूरी रजनिकर बिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबडयति नूनं तव कृते ॥
कठिन शब्दः—मरकतं=एक हरे रंग की मणि; करण्ड=डिब्बा,
पिटारी; निबिडितं=भरा हुआ; कुहरं=डिब्बे के भीतर का पोलापन ।
अर्थः—चन्द्र बिंब एक मरकत मणि के बने हुए डिब्बे
के सदृश है, उसका कलङ्क ( काला धब्बा ) किस्तूरी का काला

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सौंदर्य लहरी ३११
रंग है और चमकती हुई कलायें कपूर सदृश हैं। दोनों को जल
में पीसकर तेरे आभोग के लिये डिब्बे में भरकर रखा हुआ है,
जो प्रतिरात्रि खर्च होता रहता है और ब्रह्मा उसे फिर दिन में
बार २ भरता रहता है।
नीचे चरणों के पास सूर्यमण्डल, और ऊपर विशुद्ध चक्र में
१६ कलायुक्त चन्द्रमण्डल दोनों भगवती के शृङ्गार के साधन हैं।
सूर्यमण्डल यदि मुकुर है तो चन्द्रमण्डल शृङ्गार का डिब्बा है। कृष्णपक्ष
भगवती की रात्रि है और शुक्लपक्ष दिवस। शुक्ल और कृष्ण पक्षों
को देवताओं का दिनरात कहते हैं।
भगवती की सपर्या की असुलभता
(९६)
पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथाप्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाऽद्याभिरमराः ॥
कठिन शब्दः- शतमख=इन्द्र
अर्थः- तू त्रिपुरारि के अन्तःपुर की रानी है इसलिये
तेरे चरणों की सपर्या पूजा की मर्यादा चंचल इंद्रियों वाले
मनुष्यों को सुलभ नहीं, और इन्द्र की प्रमुखता में रहने

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३१२ सौंदर्य लहरी
वाले ये देवगण तेरे द्वार के निकट खडी रहने वाली अणिमादि की
अतुल सिद्धियों तक ही पहुंच पाते हैं ।
देवताओं के पास जो अणिमादि सिद्धियां होती हैं, उनका
स्थान भगवती के अन्तःपुर के द्वारों के बाहर ही है, जैसाकि श्रीचक्र
के भूगृह के बहिर्द्वारों पर उनका स्थान बताया जाता है, और
असंयतेन्द्रिय चंचल चित्त वाले मनुष्यों की तो वहां तक गति ही
दुर्लभ है । उनको तो भगवती की पूजा करने का भी सौभाग्य प्राप्त
नहीं होता, कहा है देवो भूत्वा देवं यजेत् । और सिद्धियां भी अन्तःपुर
में प्रवेश नहीं कर पातीं ।
इस श्लोक में असंयमी और सिद्धियों की कामना रखने वाले
मनुष्यों की निन्दा की गई है और अगले श्लोक में कुरवक तरु
(काँटेदार वृक्षों) के सदृश कषायों से युक्त कुत्सित् मनुष्यों में
शक्ति के जागरण होने की असंभावना दिखाई गई है ।
(९७)
कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपिधनैः ।
महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे
कुचाभ्यामासंगः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥
कुरवक=एक प्रकार का वृक्ष, जिसमें पीत, रक्त और नीले रंग
के पुष्प होते हैं । लाल फूलों वाला कुवरक कहलाता है, पीले फूलों

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सौंदर्य लहरी ३१३
वाला कुरुण्टक, और नीले रंग वाले को झिंटी कहते हैं । कुत्सित् है
'रव' अर्थात् शब्द जिसका वह कुरवक ।
अर्थः— विधाता की स्त्री सरस्वती को क्या कितने ही
कविजन नहीं भजते ? और कौन थोड़ा सा भी धनवान होकर
लक्ष्मी का पति नहीं होता ? (धनाढ्य को धनपति या
लक्ष्मि पति कहने लगते हैं) । परन्तु हे सति सतियों में श्रेष्ठ !
महादेव को छोडकर तेरे कुचों का संग तो कुरवक तरु को
भी दुर्लभ है ।
यहां भगवती का आसंग आलिंगन करने से शक्ति के जागृत
होने पर उसकी क्रिया अथवा उसके आवेश का अपने शरीर में
अनुभव करने का अभिप्राय है, परन्तु वह कुरवक जैसे कषाय युक्त
कुतर्की कुवादियों को सुलभ नहीं होता, शक्ति जागृत होने पर तो
मनुष्य शिवतुल्य हो जाता है । कवि होना और धनवान होना
सुलभ है परन्तु भगवती का कृपा पात्र बनना कठिन है ।
(९८)
गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेःपत्निं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया काऽपित्वं दुरधिगम निःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥
अर्थः— हे पर ब्रह्म की महाराज्ञि ! शास्त्रों के जानने
वाले ब्रह्मा की पत्नि को सरस्वती वाक देवी कहते हैं, विष्णु

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३१४ सौंदर्य लहरी
की पत्नि को पद्मा ( कमला ) कहते हैं और हर की सहचरी
को पार्वती कहते हैं । परन्तु तू महामाया कोई चौथी ही है,
तेरी महिमा असीम है तूने सारे विश्व को भ्रम में डाल रखा है,
तुझको जानना कठिन है ।
सरस्वती का बीज मंत्र ऐं है, लक्ष्मी का श्रीं, पार्वती का क्लीं
और महामाया का ह्रीं । वाग्भव कूट का तीसरा अक्षर शक्ति का
वाचक है और वर्णमाला का चौथा अक्षर होने से तुरीय पद समाधि
का द्योतक है और वह सब बीजाक्षरों के अन्त में रहता है ।
अनुस्वार भी शक्ति के साथ सदा रहता है, वह शिवात्मक है। इसे
काम कला कहते हैं ।
घटा अवस्था
( ९९ )
समुद्भूतस्थलस्तनभरमुरश्चारुहसितं
कटाक्षे कंदर्पो कतिचन कदम्बद्युतिवपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्ति मनसि जनयन्तिस्म विमला
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥
अर्थ – हे उमे ! ऊपर उभरे हुए स्थूल स्तनों के भार से
युक्त उरःस्थल, सुन्दर हंसी और कटाक्ष में कंदर्प और कदंब
वृक्ष की कुछ शोभा वाला शरीरं, सब हर के मन में तेरी याद
दिलाकर भ्रम उत्पन्न करते हैं, क्योंकि तेरे विमल भक्तों में तेरी
तद्रूपता की परिणति के कारण वे तेरे जैसे दिखने लगते हैं ।

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सौंदर्य लहरी ३१५
ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति, ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म स्वरूप
हो जाता है, भगवती के निरन्तर चिन्तन करने से भगवती के भक्त
भी भगवती के रूप वाले हो जाते हैं। शक्ति जागृत होने पर
साधक का शरीर आनखशिख शक्ति के आबेश से पूर्ण आविष्ट हो
जाता है। इस अवस्था को घटा अवस्था कहते हैं।
यह श्लोक क्षेपक माना जाता है। यह क्षेपक हो सकता है
क्योंकि इसकी संगति पूर्वापर से नहीं मिलती। और भगवती के
शरीर का इस प्रकार का वर्णन पहिले भी आ चुका है।
प्रार्थना
( १०० )
कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविता कारणतया
यदाधत्ते वाणी मुखकमल ताम्बूलरसताम् ॥
अर्थ—हे मां ! बताओ, वह समय कब आयेगा, जब मैं
एक विद्यार्थी, तेरे चरणों का धुला हुआ जल ( चरणोदक ),
जो लाक्षारस ( महावर ) के रंग से लाल हो रहा है, पान
करूंगा, जिसमें सरस्वती के मुखकमल से निकले हुए पान की
पीक के सदृश, जन्म के गूंगे को भी कविता शक्ति प्रदान
करने की क्षमता है।

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३१६ सौंदर्य लहरी
यहां 'अयं विद्यार्थी' पद से अनुमान होता है, कि जिस समय
यह स्तोत्र लिखा गया था, उस समय शंकर भगवत्पाद् विद्यार्थी ही
थे। वैसे तो मनुष्य जीवन भर विद्या का प्रार्थी रहता है परन्तु
विद्यार्थी शब्द रूढी अर्थ में गुरु कुल में रहने वाले विद्यार्थी के लिये
ही प्रयुक्त होता है ।
( १०१ )
सरस्वत्या लक्ष्म्या विधि हरि सपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरञ्जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यं रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥
अर्थ—तेरा भजन करने वाला मनुष्य सरस्वती और लक्ष्मी
दोनों से युक्त होकर ब्रह्मा और हरि के सापत्नडाह का पात्र
बनकर विहार करता है। और सुन्दर रम्य शरीर से रति
( कामदेव की स्त्री ) के भी पातिव्रत धर्म को शिथिल करता है,
अर्थात् वह विद्वान्, धनाढ्य और सुन्दर रूपलावण्य युक्त शरीर
वाला हो जाता है। और पशु पाश के दुःखों को नष्ट करके
चिरकाल तक परमानन्द के रस का रसास्वाद लेता हुआ जीवित
रहता है ।
बंधन में पडा हुआ जीव पशु कहलाता है, और राग रूपी
पाश संसार रूपी खूंटे से बांधने की रस्सी है। कहीं २ आठ पाशों