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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 359

सौंदर्य लहरी ३०२.
लिया है। और भगवती का प्रफुल्लित मुख कमल उसमें दिखने
लगा है।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
(गीता १५, १२)
भगवती का मुख कमल के सदृश है, इसलिये उसका प्रतिबिंव
सूर्य के हृदय कमलवत् जान पडता है। कमल रात्रि में संकुचित हो
जाता है और दिन में ही खिलता है। इसलिये ऊपर आज्ञाचक्र में
चन्द्र मंडल दिखने से उसके बंद हो जाने की यदि आशंका की
जाय तो वह उचित नहीं है, क्योंकि भगवती के तेज से ही चन्द्र-
मण्डल चमकता है और उसके प्रतिबिंब को चन्द्रमा से कोई भय
नहीं हो सकता।
कठवल्ली (६,५) की 'यथादर्शे तथात्मनि' इत्यादि श्रुति पर
भाष्यकार भगवत्पाद लिखते हैं कि जैसे मल रहित दर्पण में मनुष्य
को अपना प्रतिबिंब स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है वैसे ही तमोगुण और
रजोगुण से शुद्ध होने पर बुद्धि रूपी निर्मल आदर्श पर आत्मतत्त्व
का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखा करता है। अर्थात् योगियों को प्रत्यक्ष
होने वाला हृदय पुरुष परमतत्त्व का प्रतिबिंब है, जो उर्ध्वोन्मीलित
सूर्य और अधोन्मीलित चन्द्र के योग से योगियों के हृदय में सदा
क्रीडा किया करता है। अथवा वह शक्ति का ही रूप है जो योगियों
के हृदयस्थ सूर्यमण्डल रूपी मुकुर में परमतत्त्व का प्रतिबिंब मात्र है।