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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 356 of 415

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Page 356

३०६ सौंदर्य लहरी

शोभा बढा रही है। शंभु की करुणा कभी मन्द नहीं पडती, परन्तु
मन्दपना हंसी में रहकर करुणा की वृद्धि करता है। शिरीष की
व्युत्पत्ति 'शृ' धातु से है (शृ हिंसायां शृणाति शीर्यते वा
इति शिरीषः) अर्थात् जो काटा जाता है, अथवा जो फैलता
है वह शिरीष कहलाता है। शिरीष अथवा सिरस एक वृक्ष का नाम
है जो कल्याण का सूचक है। अर्थात् भगवती में हिंसा का भाव
ऐसा है जैसा कि सिरस में, क्योंकि भगवती का शरीर सिरस की
आभायुक्त है जो सारे जगत का कल्याण करने को सदा तत्पर रहता
है। जैसे कुटिलता को भगवती ने केशों में धारण कर के उनकी
शोभा को बढाया है, और फिर भी पीठ पर पीछे की ओर फेंक
दिया है, इसी प्रकार कठोरता भी दया का विरोधी भाव है, उसे
भगवती ने अपने पयोधरों में धारण कर लिया है। दूध पिलाकर
पोषण करने वाले स्तनों में कठोरता रहने पर भी वे दयार्द्रता से
टपकते रहते हैं, क्योंकि भगवती का सारा शरीर शिरीष वृक्षवत्
कल्याणवपुः है। शंभु की करुणा में कुटिलता, हिंसा और कठोरता
के विरोधी भावों को स्थान कहां, वे इतने दयालु हैं कि उनकी
करुणा में कभी कमी नहीं आती, वह सदा सर्वदा पूर्ण है, फिर तनु
अथवा क्षीण होने की तो संभावना ही कैसे हो सकती है। इसलिये
वह पृथु अर्थात् महती करुणा है। पृथु भाव भगवती ने नितंबों
में धारण किया हुआ है। नीचे नितंब भाग का भारीपन
स्थिरता का द्योतक है, अर्थात् शंभु की करुणा नित्य है। परन्तु
भगवती का कटि प्रदेश अति तनु भी है, यद्यपि यह स्त्रियों की
शोभा का एक लक्षण है, तो भी करुणा का मध्य भाग तनु होने
से उसके क्षीण होने की संभावना की भ्रांति हो सकती है,