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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 365 of 415

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Page 365

सौंदर्य लहरी ३१५
ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति, ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म स्वरूप
हो जाता है, भगवती के निरन्तर चिन्तन करने से भगवती के भक्त
भी भगवती के रूप वाले हो जाते हैं। शक्ति जागृत होने पर
साधक का शरीर आनखशिख शक्ति के आबेश से पूर्ण आविष्ट हो
जाता है। इस अवस्था को घटा अवस्था कहते हैं।
यह श्लोक क्षेपक माना जाता है। यह क्षेपक हो सकता है
क्योंकि इसकी संगति पूर्वापर से नहीं मिलती। और भगवती के
शरीर का इस प्रकार का वर्णन पहिले भी आ चुका है।
प्रार्थना
( १०० )
कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविता कारणतया
यदाधत्ते वाणी मुखकमल ताम्बूलरसताम् ॥
अर्थ—हे मां ! बताओ, वह समय कब आयेगा, जब मैं
एक विद्यार्थी, तेरे चरणों का धुला हुआ जल ( चरणोदक ),
जो लाक्षारस ( महावर ) के रंग से लाल हो रहा है, पान
करूंगा, जिसमें सरस्वती के मुखकमल से निकले हुए पान की
पीक के सदृश, जन्म के गूंगे को भी कविता शक्ति प्रदान
करने की क्षमता है।