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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 350

३०० सौन्दर्य लहरी
( ९० )
ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशाऽनुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दं विकिरति ।
तवास्मिन्मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥
कठिन शब्द— करण चरणः = इन्द्रियों रूपी चरण वाला,
षट्चरण = भौंरा, मधुकर ।
अर्थ:—इस तेरे चरण में जो मंदार वृक्ष के पुष्पों के
स्तबक जैसा सुन्दर है, मेरा ५ ज्ञानेन्द्रिय और १ अन्तःकरण
रूपी ६ चरण वाला यह जीव छः चरणों वाला मधुकर बनकर
डूबा रहे। तेरा चरण जो दीनों को उनकी आशा के अनुसार
निरन्तर लक्ष्मी देता रहता है, और सौन्दर्य राशि के मकरन्द
को खूब फैलाता रहता है और मन्दार के पुष्पों के स्तबक
सदृश सुभग है ।
अर्थात् मैं भौर की तरह तेरे चरण कमल पर अपना सर्वस्व
मनसा, वाचा कर्मणा सब इन्द्रियों और मनके व्यापारों
को समर्पण करदूं ।