सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ३०३
अशुद्धविद्या के रूप को सुप्त कुण्डलिनी कहा जा सकता है। जागकर
वह सब तत्त्वों की शुद्धि करती हुई विशुद्ध चक्र में अपने विशुद्ध
रूप में विराजने लगती है। यह हम ऊपर भी एक स्थान पर कह
आये हैं कि प्रसुप्त अवस्था में शक्ति का स्थान मूलाधार के पास
सुषुम्ना से बाहर है और जागकर सुषुम्ना के भीतर स्वाधिष्ठान चक्र
में, परन्तु विशुद्ध स्वरूप में वह विशुद्धिचक्र में रहती है। इस
श्लोक में भगवती के इस रूप का ही वर्णन है।
इस श्लोक के साथ ३७ वें श्लोक को एक बार फिर पढ़
लेना चाहिये। व्योमेश्वर और व्योमेश्वरी का यहां चित्र खेंचा गया
है। शिव को यदि स्वच्छ छाया घटित आकाशमयी मायावी चादर
सदृश समझा जाय तो शक्ति को उसमें स्फटिकवत् झलकने वाली
अरुणिमा समझना चाहिये ।
श्री चक्र को भी भगवती का मंच कहा जा सकता है। ईशान्
कोण में ईश्वर, अग्निकोण में रुद्र, नैऋत्य कोण में विष्णु और
वायव्य कोण में ब्रह्मा समझना चाहिये। अथवा पूर्व में ब्राह्मी
(ईश्वरी) मातृ देवता, दक्षिण में रौद्री मातृ देवता पश्चिम में
कौमारी मातृ देवता और उत्तर में वैष्णवी अर्थात् प्रत्येक की शक्ति
को देव के वाम ओर में देखना चाहिये, जो चारों द्वारों पर स्थित
हैं। श्री चक्र को आकाश रूपी स्फटिक का बना हुआ समझना
चाहिये। उस पर शिव रूपी चादर है और अरुणिमा रूपी शक्ति
है। वैन्दव स्थान पर शक्ति का आसन है। श्री चक्र की रश्मियां
दसों दिशाओं में भुक्ति मुक्ति सहित अणिमादि सिद्धियों के रूपों में
फैल रही हैं।