Skip to content
SarvaKosh
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 360 of 415

Read in context
Page 360

३१० सौंदर्य लहरी
लक्ष्मीधर के मतानुसार श्लोक ९४, ९९ और १०२ तीनों
क्षेपक हैं। ऊपर कहा जा चुका है कि कैवल्य शर्मा के मत से
श्लोक ८८ क्षेपक है। शंकर भगवत्पाद ने पूरी शतश्लोकी
लिखी थी इसलिये ३ श्लोक क्षेपक होने चाहिये अर्थात् उक्त चारों
में एक श्लोक क्षेपक नहीं है। हमारी समझ में यह ९४ वां
श्लोक क्षेपक नहीं माना जाना चाहिये, क्योंकि इसकी पूर्व संगति
९२ श्लोक से और उत्तर संगति ९५ श्लोक से स्पष्ट है। शृङ्गार
के लिये यदि ९५ श्लोकोक्त शृङ्गार का डिब्बा पास में दिखाया
जाता है तो शृङ्गार के आवश्यक साधन मुकुर को क्यों नहीं स्थान
दिया जाना चाहिये। शृङ्गार के लिये शृङ्गार का डिब्बा जितना
अनिवार्य है उतना आवश्यक मुकुर भी है।
श्रृङ्गार के डिब्बे का ध्यान:—
( ९५ )
कलङ्कः कस्तूरी रजनिकर बिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबडयति नूनं तव कृते ॥
कठिन शब्दः—मरकतं=एक हरे रंग की मणि; करण्ड=डिब्बा,
पिटारी; निबिडितं=भरा हुआ; कुहरं=डिब्बे के भीतर का पोलापन ।
अर्थः—चन्द्र बिंब एक मरकत मणि के बने हुए डिब्बे
के सदृश है, उसका कलङ्क ( काला धब्बा ) किस्तूरी का काला