सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी २९९
केवल्यशर्मा का मत है कि यह श्लोक मद्रास की भाषाओं की
प्रतियों में नहीं मिलता, इसलिये क्षेपक है।
(८९)
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नायददतौ ॥
कठिन शब्द— नाक=स्वर्ग, किसलय=पत्र, पल्लव, अह्नाय=
तुरन्त, स्वःस्थ=स्वावलंबी, स्वर्ग निवासी, अनिशं=निरन्तर ।
अर्थ—हे चण्डि ! तेरे दोनों चरण अपने नखों ने
कल्पवृक्षों का परिहास सा कर रहे हैं, जो नख देवांगनाओं के
कर रूपी कमलों को ( हाथ जोडने समय ) बंद करने के लिये
संख्या में १० चन्द्रमा सदृश हैं । कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में
रहने वाले स्वावलंबी देवताओं को अपने पल्लव रूपी कराग्रों से
फल देते हैं, परन्तु तेरे चरण दरिद्रियों को निरन्तर, तुरन्त और
बहुत धन देते रहते हैं ।
कल्पवृक्ष से स्वर्ग निवासियों को ही लाभ है, यहां के दरिद्रियों
को कुछ नहीं ।