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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 347 of 415

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Page 347

सौंदर्य लहरी २९७
बजना, जो ध्यान समाधि के प्रतिपक्षी हैं, कामदेव की प्रसन्नता
को व्यक्त करने वाले हास्य की किलकिलाहट सदृश्य हैं।
मन के लय और व्युत्थान का स्थान आज्ञा चक्र के ऊपर है।
अनाहत् में ईश्वर, विशुद्ध में सदाशिव और आज्ञा में शिव का स्थान
है। शांभवी मुद्रा को समाधि का द्वारोद्घाटन कहना चाहिये।
व्युत्थान के समय जब शक्ति नीचे उतरती है, तब मानो शिव के
ललाट पर पद प्रहार करती हुई नीचे उतरती है, और उसके नूपुरों
के शब्द में कामदेव के हास्य की प्रति ध्वनि बताई गई है। शांभवी
मुद्रा के अभ्यासी को काम वासना रूपी अन्तर्दाह का उन्मूलन हो
जाता है।
(८७)
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि च पर भागे च विशदौ।
परं लक्ष्मी पात्रं श्रियमनिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥
अर्थ—हे जननि ! तेरे दोनों चरण कमल पर जय प्राप्त
कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य क्या है ? क्योंकि कमल बरफ़ से मर
जाता, तेरे चरण हिमगिरि पर निवास करने में कुशल हैं।
कमल रात को सो जाता है, तेरे चरण दिन रात विशद् रहते