सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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परन्तु यह बात नहीं है । कटि प्रदेश में मणिपूर चक्र रुद्र का स्थान
होने से, भगवती में रुद्र का रौद्र भाव अर्थात् क्रोध अति *तनु हो
गया है, अर्थात् क्षीणवत् तनु है । मानो भगवती ने रुद्र के रौद्र
भाव को मेखला सदृश कस रखा है ।
अभिप्राय यह है कि भगवती का शरीर मानो शंभु की दया
का अवतार है, जो जगत की रक्षा करने के लिये अवतीर्ण हुआ है ।
इस श्लोक में यह भाव भी प्रतीत होता है कि सद्गुरू स्वरूप
शिव के अनुग्रह से जो शक्ति की जागृति होती है, और उपरोक्त
करुणा के स्वरूप में साधक गण उसे अपने अन्तर में अनुभव करते हैं,
वह शंभु की करूणा है । अर्थात शिव स्वरूप गुरु का अनुग्रह
शंभु का ही अनुग्रह है, जिससे शिष्य में शक्ति का उत्थान होता
है । इसलिये गुरु कृपा, शक्ति की अभिव्यक्ति और शंभु की
करुणा तीनों पर्यायवाची हैं ।
भगवती के श्रृङ्गारार्थ दर्पण का ध्यान
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समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधाति त्वद्वक्त्रप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातंकं चन्द्रादपि निजहृदम्भोरुहमिव ॥
कठिन शब्दः—मसृणः=चिकना, स्वच्छः विकचं=प्रफुल्लित.
विकसित, खिला हुआः निरातंक=आतंकरहित, निडर, बिना भय के ।
- नोट:—देखें योग दर्शन सूत्र (२, ४) में ५ क्लेशों की प्रसुप्त,
तनु, विच्छिन्न और उदार चार अवस्थायें ।