सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौन्दर्य लहरी ३७१
चरणों की गति का ध्यानः—
( ९१ )
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवाब्धुमनम-
श्रन्तस्ते ( स्खलन्तस्ते ) खेलं भवनकलहंसा न जहति ।
अतस्तेषां (स्वविक्षेपे) शिक्षां सुभगमणिमञ्जीरगणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥
कठिन शब्दः—आचक्षाणः=बातें करता हुआ
अर्थः—हे चारु चरिते ! ऐसा प्रतीत होता है कि तेरे
भवन के राजहंस चलते समय तेरे पदन्यास क्रीडा ( चाल ) का
परिचय प्राप्त करने को तेरे खेल का त्याग नहीं करते । ( अर्थात्
तेरे पीछे २ तेरी तरह कदम उठाकर चलते हैं, और वे इस
खेल का त्याग नहीं करते , और तेरे चलते समय चरण कमलों
में लगी मणियों युक्त नूपुरों की झङ्कार का शब्द मानो उनको
चलने की शिक्षा का उपदेश कर रहा है ।
स्त्रियों की चाल की हंसगति से उपमा दी जाया करती है,
परन्तु भगवती की चाल से हंस स्वयं चलने की शिक्षा ग्रहण कर
रहे हैं । दूसरा भाव यह भी है कि परमहंस महापुरुषों की उन्मत्त
गतिविधि में शक्ति की क्रीडा युक्त मस्तीभरी चाल का आभास
रहता है । जीवन्मुक्त परम हंस ही भगवती के भवन के राजहंस हैं ।