सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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हैं; वह दिन में लक्ष्मी का पात्र रहता है और तेरे चरण समयाचार
के उपासकों को खूब लक्ष्मी देते हैं ।
अर्थात् तेरे चरणों को कमल की उपमा कैसे दी जा सकती है ?
कदापि नहीं दी जा सकती ।
( ८८ )
पदं ते कीर्त्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीखर्परतुलाम् ।
कथंचिद्द्बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥
अर्थ—हे देवि ! तेरा पद कीर्तियों का प्रपद (स्थान)
है और विपदाओं का अपद है। न जाने सत्पुरुषों ने उसकी
तुलना कछुवे की कठिन खोपरी से कैसे की है, वह इतना कोमल
है कि विवाह के समय पुरारि ने दयार्द्र मन से किसी प्रकार
(अर्थात् बडी हिचकिचाहट और बडे संकोच के साथ)
दोनों हाथों से उठाकर उसे पत्थर पर रखा था।
विवाह में फेरों या भांवरों के समय वर वधू के एक चरण को
अपने हाथों से उठाकर पत्थर पर रखकर कहता है, कि हे देवि !
तू धर्मे पालनार्थे अपना चित्त इतना दृढ रखना जैसा यह पत्थर है।