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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 364 of 415

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Page 364

३१४ सौंदर्य लहरी
की पत्नि को पद्मा ( कमला ) कहते हैं और हर की सहचरी
को पार्वती कहते हैं । परन्तु तू महामाया कोई चौथी ही है,
तेरी महिमा असीम है तूने सारे विश्व को भ्रम में डाल रखा है,
तुझको जानना कठिन है ।
सरस्वती का बीज मंत्र ऐं है, लक्ष्मी का श्रीं, पार्वती का क्लीं
और महामाया का ह्रीं । वाग्भव कूट का तीसरा अक्षर शक्ति का
वाचक है और वर्णमाला का चौथा अक्षर होने से तुरीय पद समाधि
का द्योतक है और वह सब बीजाक्षरों के अन्त में रहता है ।
अनुस्वार भी शक्ति के साथ सदा रहता है, वह शिवात्मक है। इसे
काम कला कहते हैं ।
घटा अवस्था
( ९९ )
समुद्भूतस्थलस्तनभरमुरश्चारुहसितं
कटाक्षे कंदर्पो कतिचन कदम्बद्युतिवपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्ति मनसि जनयन्तिस्म विमला
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥
अर्थ – हे उमे ! ऊपर उभरे हुए स्थूल स्तनों के भार से
युक्त उरःस्थल, सुन्दर हंसी और कटाक्ष में कंदर्प और कदंब
वृक्ष की कुछ शोभा वाला शरीरं, सब हर के मन में तेरी याद
दिलाकर भ्रम उत्पन्न करते हैं, क्योंकि तेरे विमल भक्तों में तेरी
तद्रूपता की परिणति के कारण वे तेरे जैसे दिखने लगते हैं ।