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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 354 of 415

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Page 354

३०४ सौंदर्य लहरी
यहां तक भगवती के अंगों का पृथक २ ध्यान बताया जाकर
इस श्लोक में पूरे शरीर का ध्यान कहा गया है ।
( ९३ )
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा ¹गात्रे दृषदिव कठोरा कुचतटे ।
भृशंतन्वी मध्ये ²पृथुरपिवरारोह विषये
जगत् त्रातुं शंभोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥
पाठान्तरः— १ चित्तेदृषदुपलशोभा, २ पृथुरुरसिजारोह
कठिन शब्द—अराला=कुटिल, पृथु=भारी, बडा, वरारोह=
सुन्दर नितंब, उपल=रत्न, उरसिज=कुच, काचित्=कचते (प्रकाशित
इति) काचित, चमकती हुई अथवा काच के सदृश, अथवा कोई भी
जिसको हम नहीं जान सकते । करुणा काचिदरुणा=करुणा का अर्थ
काचित् अरुणा किया जाना चाहिये ।
अर्थः—शंभु की करुणा (अर्थात दया) की, जगत की
रक्षा करने के लिये मानों जो काचित अरुणा है सर्वत्र जय हो
रही है । जिसके अर्थात् अरुणा भगवती के केश स्वाभाविक
सरलता लिये हुए घूंघराले अर्थात् कुटिल हैं, मन्द २ हंसी मुख
पर है, गात्र अथवा चित्त सिरस की आभा लिये हुए है, कुच
पत्थर सदृश कठोर है (अथवा स्फटिक की शोभा युक्त हैं)
मध्य में कटिभाग अति पतला है और नितंब भारी हैं (अथवा