पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
विषय-सूची
पूरा सतगुरु मिलै जो १ काल महासिल २१ लागी गांसी ४२
सतगुरु सिकलीगर मिलै १ ज्यों ज्यों सूखै २१ जियतै मरना ४२
सरबंगी कोउ एक है २ बूड़ी जात जहाज २२ परिवरता को ४२
परस्वारथ के कारने २ एक भक्ति मैं २२ सोई सती सराहिये ४३
धुन आनै जो २ संत न चाहै २३ हरि को दास ४३
नाव मिली केवट ३ ऐसी भक्ति २३ अपनी ओर ४४
धुबिया फिर मर ३ मेरे तन तन लग २४ काजर दिहे से ४४
साहिब वहीं फकीर ३ पिय को खोजन २४ जाकी जैसी ४४
रैयत कौन कहावै ४ मगन भई मेरी २४ टेढ़ सोझ ४५
जग खीजै तो ४ आठ पहर निरखत २५ फूली है यह ४५
नाम नाम सब ५ अम्मा मेरा दिल २५ गुरु की भक्ति ४६
लहना है सतनाम ५ सीस उतारै हाथ २५ पलटू जो सिर ४६
मीठ बहुत सतनाम ५ भूली जग को २६ राम कृस्न ४६
संत सनेही नाम ६ फनि से मनि २६ समुझावै सो ४७
दीपक बारा ६ प्रेम बान जा २७ तुझे पराई ४७
नाम के रे परताप ७ अपने पिय की २७ बहता पानी ४८
देखो नाम ताप ७ सतगुरु सब्द के २७ जिन जिन पाया ४८
हाथी घोड़ा खाक ७ की तौ इक २८ बीज बासना ४८
हाथ जोरि ८ यह तो घर है २८ तो कहँ कोऊ कछु ४९
अदल होइ ८ आसिक का घर २८ इहाँ उहाँ कुछ है ४९
देत लेत हैं ८ जहां तनिक जल २८ मन को मौज ५०
बड़ा होय तेहि ९ जो मैं हारौं २९ जो साहिब का ५०
सीतल चन्दन ९ लगन महूरत ३० जीव जाय तो ५१
संत बराबर १० मोर राम मैं ३० खोजत हीरा को ५१
राम समीपी १० मगन आपने ३० मूरख को ५१
संत सासना १० जो कोउ चाहै ३१ तीन लोक पेरागया ५२
संतन के सिर ११ बैरागिनी भूली ३१ लोक लाज कुल ५२
तीन लोक से ११ मलया के ३२ तन मन लज्जा ५२
फाका जिकर १२ पारस के परसंग ३२ लोक लाज नहिं ५३
कबही फाका १२ फिर फिर नहीं ३२ जेहि सुमिरे गनिका ५३
साध महातम १२ जंगल जंगल मैं ३३ ज्यों ज्यों भीजैं ५४
हरि हरिजन १३ बिन खाये चित ३३ वे बोलैं में ५४
हरि अपनो १३ जो जो गा ३३ जौ लगि लागै ५४
काम क्रोध जिन १४ पलटू मेरी बानि ३४ दुइ पासाही ५५
ना काहू से १४ सतगुरु सब को ३४ चोर मूँसि ५५
पिसना पीसै राँड़ १४ सबद छुड़ावै ३५ पलटू ऐसे दास को ५६
पार दुख कारन १५ सुरत सब्द ३५ बूझि समुझि ले ५६
बिस्वा किये १५ जोग जुगत आसन ३५ पलटू नीच से ऊंच ५६
हवा हिरिस १६ कमठ दृष्टि ३६ हस्ती बिनु मारे मरै ५७
जौ लगि फाटै १६ जैसे कामिनी ३६ स्वांती कौ जल ५७
क्या सोवै तू १६ साहिब साहिब क्या ३७ भक्ति बीज ५८
खेलु सिताबी १७ दिल में आवै ३७ पलटू सरबसदीजिए ५८
ते क्यों गफलत १७ खोजत खोजत ३७ खवा टूटै खवा फाटै ४८
गरमै गरमै १८ नजर मँहै ३८ परदा अंदर का टरै ५९
सुर नर मुनि १८ पहिले दासातन ३८ समुझाये से क्या ५९
चोला भया १८ तुरत पदम-पद ३९ ज्ञान समाधि जा ६०
धुआं का धौरेहरा १९ खाविंद कब ३९ समुझे को ६०
यही दिदारी दार १९ संत चढ़े मैदान ४० अपनी अपनी करनी ६०
आग लगी लंका १९ बाना बांधे लड़ि ४० सरबंगी जो ६१
( २ )
भजन आतुरी २० काया कोट छुड़ावै ४० करम धरम ६१
यही समय २० संत चढ़े जो ४१ पलटू सोवै ६२
भया तगादा २१ लागी गोली ४१
कोउ कितनौ ६२ अँधरन केरि ७७ जा को निरगुन ६३
जौन काछ की ६२ सब अंधरन ७८ अमृत को ६३
साधु को ऐसा ६३ अपकारी जिव ७८ जैसे नदी ६३
पतित पावन बाना ६३ बनियां बानि ७८ साध बचन ६४
दीनन पर दया ६४ संत रतन ७६ महीं भुलाना ६४
पलटू पूछै ६४ अंजन देय ७६ जगत भगत ६५
मन मिहीन ६४ जौं लगि ८० लेहु परोसिनि ६५
जोग जुगत ना ६५ वस्तु घरी दै ८० सिध चौरासी ६५
दूसरा पलटू इक ६५ झूठे में सब ८१ हंस चुगै ६६
मान बड़ाई ६६ लड़का चूल्हे ८१ कृस्न कन्हैया ६
पलटू साहिब की बानी भाग १
( कुंडलिया )
॥ गुरुदेव ॥
( १ )
पूरा सतगुरु मिलै जो पूजै मन की आस ॥
पूजै मन की आस पिया को देय मिलाई।
छूटा सब जंजाल बहुत सुख हम ने पाई॥
देखा पिय का रूप फिरा अहिबात¹ हमारा।
बहुत दिनन की राँड़ माँग भर सेंदुर धारा॥
सासु ननद² को मारि अदल में दिहा चलाई।
उन कै चलै न जोर पिया को मैंहि सुहाई॥
पिय जो बस में भये पिया को जादू कीन्हा।
ऐसी लागी नेह पिया तब मोको चीन्हा॥
प्रसाद पिया को पाय के मिले गुरु पलटूदास।
पूरा सतगुरु मिलै जो पूजै मन की आस ॥
( २ )
सतगुरु सिकलीगर मिलैं तब छुटै पुराना दाग ॥
छुटै पुराना दाग गड़ा मन मुरचा माहीं।
सतगुरु पूरे बिना दाग यह छूटै नाहीं॥
झाँवाँ लेवै जोग तेग को मलै बनाई।
जौहर देय निकार सुरत को रंद चलाई॥
सब्द मस्कला करै ज्ञान का कुरँड³ लगावै।
जोग जुगत से मलै दाग तब मन का जावै॥
पलटू सैफ⁴ को साफ करि बाढ़ धरै बैराग।
सतगुरु सिकलीगर मिलैं तब छुटै पुराना दाग ॥
(१) सुहाग। (२) माया और बासना। (३) एक तरह का पत्थर जो सिकल
करने के काम में आता है। (४) तलवार।
२ कुंडलिया
( ३ )
सरबंगी कोउ एक है राखै सब की लाज ॥
राखैं सब की लाज काज वो सब के आवैं ।
अंधा पंगुल लूल सबन को डगर बतावैं ॥
मारि पीटि संसार सभन को राह चलावैं ।
उनकी मागि खाइ भेष सब रोटी पावैं ॥
बड़े बहादुर मर्द भेष का परदा राखैं ।
सुनि कै बचन कठोर संत जन जनि कोऊ भाखैं ॥
पलटू जो कोउ संत है सब हमरे सिरताज ।
सरबंगी कोउ एक है राखै सब की लाज ॥
( ४ )
पर स्वारथ के कारने संत लिया औतार ॥
संत लिया औतार जगत को राह चलावैं ।
भक्ति करें उपदेस ज्ञान दे नाम सुनावैं ॥
प्रीत बढ़ावैं भक्त में धरनी पर डोलैं ।
कितनौ कहै कठोर बचन बे अमृत बोलैं ॥
उनको क्या है चाह सहत हैं दुःख घनेरा ।
जिव तारन के हेतु मुलुक फिरते बहुतेरा ॥
पलटू सतगुरु पाय के दास भया निरवार ।
पर स्वारथ के कारने संत लिया औतार ॥
( ५ )
धुन आनै जो गगन की सो मेरा गुरुदेव ॥
सो मेरा गुरुदेव सेवा मैं करिहौं वा की ।
सब्द में है गलतान१ अवस्था ऐसी जा की ॥
निस दिन दसा अरूढ़ लगै ना भूख पियासा ।
ज्ञान भूमि के बीच चलत है उलटी स्वासा ॥
(१) लोटपोट, मस्त ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३
तुरिया सेती अतीत सोधि फिर सहज समाधी ।
भजन तेल की धार साधना निर्मल साधी ॥
पलटू तन मन वारिये मिलै जो ऐसा कोउ ।
धुन आनै जो गगन की सो मेरा गुरुदेव ॥
( ६ )
नाव मिली केवट नहीं कैसे उतरै पार ॥
कैसे उतरै पार पथिक बिस्वास न आवै ।
लगै नहीं बैराग यार कैसे कै पावै ॥
मन में धरै न ज्ञान नहीं सतसंगति रहनी ।
बात करै नहिं कान प्रीति बिन जैसे कहनी ॥
बूटी डगमगी नाहिं संत को बचन न मानै ।
मूरख तजै बिबेक चतुराई अपनी आनै ॥
पलटू सतगुरु सब्द का तनिक न करै बिचार ।
नाव मिली केवट नहीं कैसे उतरै पार ॥
( ७ )
धुबिया फिर मर जायगा चादर लीजै धोय ॥
चादर लीजै धोय मैल है बहुत समानी ।
चल सतगुरु के घाट भरा जहँ निर्मल पानी ॥
चादर भई पुरानि दिनों दिन बार न कीजै ।
सतसंगत में सौंद ज्ञान का साबुन दीजै ॥
छूटै कलमल दाग नाम का कलप लगावै ।
चलिये चादर ओढ़ि बहुर नहिं भवजल आवै ॥
पलटू ऐसा कीजिये मन नहिं मैला होय ।
धुबिया फिर मर जायगा चादर लीजै धोय ॥
( ८ )
साहिब वही फकीर है जो कोई पहुँचा होय ॥
जो कोई पहुँचा होय नूर का छत्र बिराजै ।
४ कुंडलिया
सबर तखत पर बैठि तूर अठपहरा बाजै ॥
तम्बू है असमान जमीं का फरस बिछाया ।
छिमा किया छिड़काव खुसी का मुस्क लगाया ॥
नाम खजाना भरा जिकिर का नेजा चलता ।
साहिब चौकीदार देखि इबलीसहुँ १ डरता ॥
पलटू दुनिया दीन में उनसे बड़ा न कोय ।
साहिब वही फकीर है जो कोई पहुँचा होय ॥
( ९ )
रैयत कौन कहावै घर घर हाकिम होय ॥
घर घर हाकिम होय अदल फिर कौन चलावै ।
सब नायक होइ जाय बैल फिर कौन लदावै ॥
गदहा चलै हर बैल कौन फिर बेसहै तुरकी २ ।
मिलै कूप में मुक्ति गंग को देवै बुड़की ॥
काँच छुए होइ कनक पारस की रहै न इच्छा ।
घर घर सम्पति होइ कौन फिरि माँगै भिच्छा ॥
पलटू तैसे संत हैं भेष बनावै कोय ।
रैयत कौन कहावै घर घर हाकिम होय ॥
( १० )
जग खीझै तो का भया रीझै सतगुरु संत ॥
रीझै सतगुरु संत आस कुछ जग की नाहीं ।
एक द्वार को छोड़ और ना माँगन जाही ॥
जिउ मेरो बरु जाय जन्म बरु जाय नसाई ।
करौं न दूसर आस संत की करौं दुहाई ॥
तीन लोक रिसियाय ३ सकल सुर नर और नारी ।
मोर न बाँकै बार पठंगा पाया भारी ॥
पलटू सब रोवै पड़ा मोर भया सलतंत ।
(१) शैतान भी । (२) घोड़ा मोल ले । (३) रुष्ट हो ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ५
जग खीझै तो का भया रीझै सतगुरु संत ।
॥ नाम ॥
( ११ )
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ॥
नाम न पाया कोय नाम की गति है न्यारी ।
वही सकस¹ को मिलै जिन्होंने आसा मारी ॥
हौं को करै खमोस होस ना तन को राखै ।
गगन गुफा के बीच पियाला प्रेम का चाखै ॥
बिसरै भूख पियास जाय मन रंग में लागै ।
पाँच पचीस रहै वार संग में सोऊ भागै ॥
आपुइ रहै अकेल बोलै बहु मीठी बानी ।
सुनतै अब वह बनै कहा मैं कहौं बखानी ॥
पलटू गुरु परताप तें रहै जगत में सोय ।
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ॥
( १२ )
लहना है सतनाम का जो चाहै सो लेय ॥
जो चाहै सो लेय जायगी लूट ओराई² ।
तुम का लुटिहौ यार गाँव जब दहिहै³ लाई ॥
ताकै कहा गँवार मोट भर बाँध सिताबी ।
लूट में देरी करै ताहि की होय खराबी ॥
बहुरि न ऐसा दाँव नहीं फिर मानुष होना ।
क्या ताकै तू ठाढ़ हाथ से जाता सोना ॥
पलटू मैं उतृन भया मोर दोस जिन देय ।
लहना है सतनाम का जो चाहै सो लेय ॥
( १३ )
मीठ बहुत सतनाम है पियत निकारै जान ॥
पियत निकारै जान मरै की करै तयारी ।
(१) आदमी । (२) खतम । (३) जलावैगा ।
कुंडलिया
सो वह प्याला पियै सीस को धरै उतारी ॥
आँख मूँदि कै पियै जियन की आसा त्यागै ।
फिरि वह होवै अमर मुए पर उठि कै जागै ॥
हरि से वे हैं बड़े पियो जिन हरि रस जाई ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस पियत कै रहे डेराई ॥
पलटू मेरे बचन को ले जिज्ञासू मान ।
मीठ बहुत सतनाम है पियत निकारै जान ॥
( १४ )
संत सनेही नाम है नाम सनेही संत ।
नाम सनेही संत नाम को वही मिलावैं ॥
वे हैं वाकिफकार मिलन की राह बतावैं ।
जप तप तीरथ बरत करै बहुतेरा कोई ॥
बिना वसीला संत नाम से भेंट न होई ।
कोटिन करै उपाय भटक सगरौ१ से आवै ॥
संत दुवारे जाय नाम को घर तब पावै ।
पलटू यह है प्रान पर२ आदि सेती औ अंत ॥
संत सनेही नाम है नाम सनेही संत ।
( १५ )
दीपक बारा नाम का महल भया उजियार ॥
महल भया उजियार नाम का तेज बिराजा ।
सब्द किया परकास मानसर३ ऊपर छाजा ॥
दसो दिसा भई सुद्ध बुद्ध भई निर्मल साची ।
छुटी कुमति की गाँठि सुमति परगट होय नाची ॥
होत छतीसो राग दाग तिर्गुन का छूटा ।
पूरन प्रगटे भाग करम का कलसा फूटा ॥
पलटू अँधियारी मिटी बाती दीन्ही टार ॥
(१) सब । (२) परे । (३) नाम पारब्रह्मांड के तालाब का ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७
दीपक बारा नाम का महल भया उजियार ॥
( १६ )
नाम के रे परताप से भये आन कै आन ॥
भये आन कै आन बड़े के पाँव पड़ूँगा ।
का बपुरा तिल तेल फूल संग बिकता महँगा ॥
संत हैं बड़े दयाल आप सम मो को कीन्हा ।
जैसे भृङ्गी कीट सिच्छा कुछ ऐसी दीन्हा ॥
राई किहा सुमेर अजया गजराज चढ़ाई ।
तुलसी होइगा रेंड सरन की पैज बड़ाई ॥
पलटू जातिन नीच मैं सब औगुन की खान ।
नाम के रे परताप से भये आन कै आन ॥
( १७ )
देखौ नाम प्रताप से सिला तिरै¹ जल बीच ॥
सिला तिरै जल बीच सेत² में कटक³ उतारी ।
नामहिं के परताप बानरन⁴ लंका जारी ॥
नामहिं के परताप जहर मीरा ने खाई ।
नामहिं के परताप बालक पहलाद बचाई ॥
पलट हरि जस ना सुनै ता को कहिये नीच ।
देखौ नाम प्रताप से सिला तिरै जल बीच ॥
( १८ )
हाथी घोड़ा खाक है कहै सुनै सो खाक ॥
कहै सुनै सो खाक खाक है मुलुक खजाना ।
जोरू बेटा खाक खाक जो साचै माना ॥
महल अटारी खाक खाक है बाग बगैचा ।
सेत सपेदी खाक खाक है हुक्का नैचा ॥
साल दुसाला खाक खाक मोतिन कै माला ।
नौबतखाना खाक खाक है ससुरा साला ॥
(१) तैरती है। (२) पुल । (३) फौज, सेना । (४) बन्दरों ने ।
८ कुंडलीया
पलटू नाम खुदाय का यही सदा है पाक ।
हाथी घोड़ा खाक है कहै सुनै सो खाक ॥
( १६ )
हाथ जोरि आगे मिलै लै लै भेट अमीर ॥
लै लै भेट अमीर नाम का तेज बिराजा ।
सब कोउ रगरै नाक आइ कै परजा राजा ॥
सकलदार¹ मैं नहीं नीच फिर जाति हमारी ।
गोड़ धोय षट करम बरन पीवै लै चारी ॥²
बिन लसकर बिन फौज मुलुक में फिरी दुहाई ।
जन महिमा सतनाम आपु में सरस बढ़ाई ॥
सत्तनाम के लिहे से पलटू भया गँभीर ।
हाथ जोरि आगे मिलै लै लै 'भेट अमीर ॥
॥ सामर्थ ॥
( २० )
अदल होइ बैकुण्ठ में सब कोइ पावै सुक्ख ॥
सब कोइ पावै सुक्ख अमल है तेज³ तुम्हारा ।
भौसागर के बीच लगै ना उतरत बारा ॥
लेइ तुम्हारो नाम ताहि को बार न बाँकै ।
खुले-बंद⁴
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६
कौड़ी घर में नाहिं आपु मैं माँगौं भिच्छा ॥
राई परबत करैं करैं परबत को राई ।
अदना के सिर छत्र पैज की करैं बड़ाई ॥
लीला अगम अपार सकल घट अंतरजामी ।
खाँहिं खिलावहिं राम देहिं हम को बदनामी ॥
हम सों भया न होयगा साहिब करता मोर ।
देत लेत हैं आपुहीं पलट पलट सोर ॥
॥ संत और साध ॥
( २२ )
बड़ा होय तेहि पूजिये संतन किया बिचार ॥
संतन किया बिचार ज्ञान का दीपक लीन्हा ।
देवता तैंतिस कोट नजर में सब को चीन्हा ॥
सब का खंडन किया खोजि के तीनि निकारा ।
तीनों में दुइ सही मुक्ति का एकै द्वारा ॥
हरि को लिया निकारि बहुर तिन मंत्र बिचारा ।
हरि हैं गुन के बीच संत हैं गुन से न्यारा ॥
पलटू प्रथमै संत जन दूजे हैं करतार ।
बड़ा होय तेहि पूजिये संतन किया बिचार ॥
( २३ )
सीतल चन्दन चन्द्रमा, तैसे सीतल संत ॥
तैसे सीतल संत जगत की ताप बुझावैं ।
जो कोइ आवै जरत मधुर मुख बचन सुनावैं ॥
धीरज सील सुभाव छिमा ना जात बखानी ।
कोमल अति मृदु बैन बज्र को करते पानी ॥
रहन चलन मुसकान ज्ञान को सुगंध लगावैं ।
तीन ताप मिट जाय संत के दर्सन पावैं ॥
पलटू ज्वाला उदर की रहै न मिटै तुरंत ।
२
प्रथम भाग: प्रसिद्ध कुण्डलियाँ (सतगुरु, नाम व माया खण्डन)
१० कुंडलिया
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल संत ॥
( २४ )
संत बराबर कोमल दूसर को चित नाहिं ॥
दूसर को चित नाहिं करैं सब ही पर दाया ।
हित अनहित सब एक असुभ सुभ हाथ बनाया ॥
कोमल कुसुमी चाह¹ नहीं सपने में दूषन ।
देखें परहित लागि प्रेम रस चूंखैं ऊखन² ॥
मिलनसार मुसकान बचन मृदु बोली मीठी ।
पुलकित सीतल गात सुभग रतनारी दीठी³ ॥
पलटू कौनो कछु कहै तनिको ना अकुताहिं ।
संत बराबर कोमल दूसर को चित नाहिं ॥
( २५ )
राम समीपी संत हैं वे जो करैं सो होय ॥
वे जो करैं सो होय हुकुम में उन के साहिब ।
संत कहैं सोइ करैं राम ना करते बायब⁴ ॥
राम के घर के बीच काम सब संतै करते ।
देवता तेंतिसकोट संत से सबही डरते ॥
राई पर्बत करैं करैं परबत को राई ।
राम के घर के बीच फिरत है संत दुहाई ॥
पलटू घर में राम के और न करता कोय ।
राम समीपी संत हैं वे जो करैं सो होय ॥
( २६ )
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
जैसे सहत कपास नाय चरखा में ओटै ।
रूई धर जब तुमै हाथ से दोऊ निभोटै ॥
(१) कुसुम फूल के समान वृत्ति जो बड़ा नाजुक होता है । (२) गन्ने चूसैं ।
(३) दृष्टि । (४) खिलाफ ।
पलटू साहब की बानी भाग-१ ११
रोम रोम अलगाय पकरि कै धुनिया धूनी ।
पिउनी¹ नँह² दै कात सूत ले जुलहा बूनी ॥
धोबी भट्ठी पर धरी कुन्दीगर मूँगरी मारी ।
दरजी टुक टुक फारि जोरि कै किया तयारी ॥
पर-स्वारथ के कारने दुख सहै पलटूदास ।
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
(२७)
संतन के सिर ताज है सोई संत होइ जाय ॥
सोई संत होइ जाय रहै जो ऐसी रहनी ।
मुख से बोलै साच करै कछु उज्ज्वल करनी ॥
एक भरोसा करै नहीं काहू से माँगै ।
मन में करै संतोष तनिक ना कबहुँ लागै ॥
भली बुरी कोउ कहै ताहि सुन नहिं मन माखै³ ।
आठ पहर दिन रात नाम की चरचा राखै ॥
पलट रहै गरीब होय भूखे को दे खाय ।
संतन के सिर ताज है सोई संत होइ जाय ॥
(२८)
तीन लोक से जुदा है उन संतन की चाल ॥
उन संतन की चाल करम से रहते न्यारे ।
लोभ मोह हंकार ताहि की गरदन मारे ॥
काम क्रोध कछु नाहिं लगै ना भूख पियासा ।
जियतै मिरतक रहें करैं ना जग की आसा ॥
ऋद्धि सिद्धि को देख देत हैं खाक चलाई ।
माया से निर्वर्त भजन की करैं बड़ाई ॥
सबै चबैना काल का पलटू उन्हें न काल ।
तीन लोक से जुदा है उन संतन की चाल ॥
(१) रुई की मोटी बत्ती जिस से सूत निकालते हैं। (२) नाखून। (३) रोस करै।
१२ कुंडलिया
( २६ )
फाका जिकर किनात१ ये तीनों बात जगोर ॥
तीनों बात जगोर खुसी की कफनी डारै ।
दिल को करै कुसाद२ आई भी रोजी टारै ॥
इबादत३ दिन रात याद में अपनी रहना ।
खुदी खूब को खोइ जनाजा४ जियतै करना ॥
सीकन्दर और गदा५ दोऊ कों एकै जानै ।
तब पावै टुक नसा फना६ का प्याला छानै ॥
पलटू मस्त जो हाल में तिसका नाम फकीर ।
फाका जिकर किनात ये तीनों बात जगोर ॥
( ३० )
कबही फाका फकर है कबही लाख करोर ॥
कबही लाख करोर गमी सादी कछु नाहीं ।
ज्यों खाली त्यों भरा सबुर है मन के माहीं ॥
कबही फूलन सेज हाथी की है असवारी ।
कबही सोवै भुईं पियादे मँजिल गुजारी ॥
कबही मलमल जरी ओढ़ते साल दुसाला ।
कबही तांपै आग ओढ़ि रहते मृगछाला ॥
पलटू वह यह एक है परालब्ध नहिं जोर ।
कबही फाका फकर है कबही लाख करोर ॥
( ३१ )
साध महातम बड़ा है जैसो हरि यस होय ॥
जैसो हरि यस होय ताहि को गरहन कीजै ।
तन मन धन सब वारि चरन पर तेकरे दीजै ॥
नाम से उत्पति राम संत अनामी७ समाने ।
( १ ) उपास, सुमिरन और संतोष । ( २ ) उदार । ( ३ ) आराधना । ( ४ )
रथी या टिकठी मुरदे के ले जाने की । ( ५ ) सिकन्दर बादशाह और भिखारी । ( ६ )
मौत । ( ७) अनामी पद में ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १३
सब से बड़ा अनाम नाम की महिमा जाने ॥
संत बोलते ब्रह्म चरन के पियै पखारन ।
बड़ा महापरसाद सीत संतन कर छाड़न ॥
पलटू संत न होवते नाम न जानत कोय ।
साध महातम बड़ा है जैसो हरि यस होय ॥
( ३२ )
॥ भक्त जन ॥
हरि हरिजन को दुइ कहै सो नर नरकै जाय ॥
सो नर करकै जाय हरिजन हरि अंतर नाहीं ।
फूलन में ज्यों बास रहैं हरि हरिजन माहीं ॥
संत रूप अवतार आप हरि धरि कै आये ।
भक्ति करे उपदेस जगत को राह चलाये ॥
और धरै अवतार रहै निर्गुन संजुक्ता ।
संत रूप जब धरै रहै निर्गुन से मुक्ता ॥
पलटू हरि नारद सेती बहुत कहा समुझाय ।
हरि हरिजन को दुइ कहै सो नर नरकै जाय ॥
( ३३ )
हरि अपनो अपमान सह जन की सही न जाय ॥
जन की सही न जाय दुर्बासा की क्या गत कीन्हा¹ ।
भुवन चतुर्दस फिरे सबै दुरियाय जो दीन्हा ॥
पाहि पाहि करि परै जबै हरि चरनन जाई ।
तब हरि दीन्ह जवाब मोर बस नाहि गुसाँई ॥
मोर द्रोह करि बचै करौं जन द्रोहक नासा ।
(१) दुर्बासा ऋषि ने भक्त शिरोमणि राजा अंबरीक का प्रण तोड़ने को एकादशी
व्रत के पारन के लिए द्वादशी का न्योता राजा का माना । जब द्वादशी बीतने लगी और
ऋषि जी न आये तो राजा ने व्रत का धर्म्म निबाहने को शालिग्राम का चरणामृत
लिया कि तुर्त ऋषि जी पहुँचे और सराप देना चाहा । यह अनर्थ देख कर विष्णु ने
सुदर्शन चक्र को उन पर छोड़ा जिस से बचने को वह आप विष्णु तक की शरण में गये
लेकिन कोई उन्हें न बचा सका जब तक कि वह राजा अंबरीक की शरण में न आये ।
१४ कुंडलिया
माफ करै अंबरीक बचौगे तब दुर्बासा ॥
पलटू द्रोही संत कर तिन्हें सुदर्सन खाय ।
हरि अपनो अपमान सह जन की सही न जाय ॥
( ३४ )
काम क्रोध जिन के नहीं लगै न भूख पियास ॥
लगै न भूख पियास रहै तिरगुन से न्यारा ।
लोभ मोह हंकार नींद की गर्दन मारा ॥
सत्रु मित्र सब एक एक है राजा रंका ।
दुख सुख जीवन मरन तनिक ना ब्यापै संका ॥
कंचन लोहा एक एक है गरमी पाला ।
अस्तुति निन्दा एक एक है नगन दुसाला ॥
पलटू उन के दरस से होत पाप को नास ।
काम क्रोध जिन के नहीं लगै न भूख पियास ॥
( ३५ )
ना काहू से दुष्टता ना काहू से रोच१ ॥
ना काहू से रोच दोऊ को इक-रस जाना ।
बैर भाव सब तजा रूप अपना पहिचाना ॥
जो कंचन सो काँच दोऊ की आसा त्यागी ।
हारि जोत कछु नाहिं प्रीति इक हरि से लागी ॥
दुख सुख संपति बिपति भाव ना यहु से दूजा ॥
जो बाम्हन सो सुपच२ दृष्टि सम३ की पूजा ॥
ना जियने की खुसी है पलटू मुए न सोच ।
ना काहू से दुष्टता ना काहू से रोच ॥
॥ पाखंडी ॥
( ३६ )
पिसना पीसै राँड़ री पिउ पिउ करै पुकार ॥
(१) रुचि, प्यार । (२) डोम । (३) बराबर ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १५
पिउ पिउ करै पुकार जगत को प्रेम दिखावै ।
कहवै कथा पुरान पिया को तनिक न भावै ॥
खिन रोवै खिन हँसै ज्ञान की बात बतावै ।
आप न रीझै भाँड़ और को बैठि रिझावै ॥
सुनै न वा की बात तनिक जो अंतर जानी ।
चाहै भेटा पीव चलै ना सुपथ रहानी ॥
पलटू ऊपर से कहै भीतर भरा बिकार ।
पिसनो पीसै राँड़ री पिव पिव करै पुकार ॥
( ३७ )
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
सन असंत है एक काट के जल में सारै ।
कूँचै खैंचै खाल उपर से मुँगरा मारै ॥
तेकर बटि के भाँजि भाँजि के बरतै रसरा ।
नर की बाँधै मुसुक बाँधते गउ और बछरा ॥
अमरजाल फिर होय बझावै जलचर १ जाई ।
खग मृग जीवा जंतु तेही में बहुत बझाई ॥
जिव दे जिव संतावते २ पलटू उन की टेक ।
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
( ३८ )
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
बैठी बीच बजार नजारा सब से मारै ।
बातैं मीठी करै सभन की गाँठि निहारै ॥
चोवा चंदन लाइ पहिरि के मलमल खासा ।
पंचभतारी भई करै औरन की आसा ॥
लेइ खसम को नाँव खसम से परिचै नाहीं ।
(१) जल में रहने वाले जीव जन्तु । (२) दूसरे जीव को सताने के निमित्त
अपने जीव पर कष्ट सहते हैं ।
बेचि बड़न को नाँव सभन को ठगि ठगि खाही ॥
पलटू तेकर बात है जेकरे एक भतार ।
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
( ३६ )
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
नाहक भये फकीर पीर की सेवा नाहीं ।
अपने मुँह से बड़े कहावैं सब से जाहीं ॥
धमधूसर होइ रहे बात में सब से लड़ते ।
लाम काफ१ वो कहैं इमान को नाहीं डरते ॥
हमहीं हैं दुरवेस२ और ना दूसर कोई ।
सब को देहिं मुराद यकीन से ओकरे होई ॥
मन मुरीद होवै नहीं आप कहावैं पीर ।
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
( ४० )
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
गई फकीरी खोय लगी है मान बड़ाई ।
मोर तोर में परा नाहिं छूटी दुचिताई ॥
दुख सुख संपति बिपति सोच दोऊ की लागी ।
जीवन की है चाह मरन की डेर नहिं त्यागी ॥
कौड़ी जिव के संग रैन दिन करै कलपना ।
दुष्ट३ कहै दुख देइ मित्र को जानै अपना ॥
पलटू चिन्ता लगी है जनम गँवाये रोय ।
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
॥ चितावनी ॥
( ४१ )
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥
चाला जात बसंत कंत ना घर में आये ।
(१) गाली देना । (२) सच्चे फकीर । (३) शत्रु ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १७
धृग जीवन है तोर कंत बिन दिवस गँवाये ॥
गर्ब गुमानी नारि फिरै जोवन की माती ।
खसम रहा है रूठि नहीं तू पठवै पाती ॥
लगै न तेरो चित्त कंत को नाहिं मनावै ।
का पर करै सिंगार फूल की सेज बिछावै ॥
पलटू ऋतु भरि खेलि ले फिर पछितैहै अंत ।
क्या सोतूवै बावरी चाला जात बसंत ॥
( ४२ )
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
बीती जात बहार सम्बत लगने पर आया ।
लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तन पाया ॥
खेलो घूँघट खोलि लाज फागुन में नाहीं ।
जे कोउ करिहै लाज काज ना सपनेहुँ नाहीं ॥
प्रेम की माट भराय सुरति की करु पिचकारी ।
ज्ञान अबीर बनाय नाम की दीजै गारी ॥
पलटू रहना है नहीं सपना यह संसार ।
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
( ४३ )
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
सिर पर बैठा काल दिनो दिन वादा पूजै ।
आज काल में कूच मूरख नहिं तोकँह सूझै ॥
कौड़ी कौड़ी जोरि ब्याज दे करते बट्टा ।
सुखी रहै परिवार मुक्ति में होवत ठट्ठा ॥
तू जानै मैं ठग्यो आप को तुही ठगावै ।
नाम संजीवन मूर छोरि के माहुर खावै ॥
पलटू सेखी ना रही चेत करो अब लाल ।
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
३
१८ कुंडलिया
( ४४ )
गरमै गरमै हेलुवा गंफा लीजै मारि ॥
गंफा लीजै मारि मनुष तन जात सिराना ।
भजि लीजै भगवान काल सिर पर नियरना ॥
मीठा है हरि नाम जियन का नाहिं भरोसा ।
खाय लेहु भरि पेट आगे से जात परोसा ॥
लीजै लाहा लूटि दिना दुइ संतन पासा ।
अज हूँ चेत गँवार जात है खाली स्वासा ॥
पलटू अटक न कीजिये कूच है साँझ सकारि ।
गरमै गरमै हेलुवा गंफा लीजै मारि ॥
( ४५ )
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बसि होय ॥
सबै काल बसि होय मौत कालौ की होती ।
पारब्रह्म भगवान मरै ना अबिगत जोती ॥
जा को काल डेराय ओट ताही की लीजै ॥
काल की कहा बसाय भक्ति जो गुरु की कीजै ॥
जरामरन मिटि जाय सहज में औना जाना ।
जपि कै नाम अनाम संत जन तत्व समाना ॥
बेद धनंतर मरि गया पलटू अमर न कोय ।
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बसि होय ॥
( ४६ )
चोला भया पुराना आज फटै की काल ॥
आज फटै की काल तेहू पै है ललचाना ।
तीनों पन गे बीत भजन का मरम ना जाना ॥
नख सिख भये सफेद तेहू पै नाहीं चेतै ।
जोरि जोरि धन धरै गला औरन का रेतै ॥
अब का करिहौ यार काल ने किहा तगादा ।