केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
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पद-भाष्य
भिभवितुम् । यत एवमात्म- | मृत्युका पराभव कर सकता है ।
विद्याकृतं वीर्यमात्मनैव विन्दते, | क्योंकि [ मुमुक्षु पुरुष ] इस प्रकार
अतः विद्यया आत्मविषयया | आत्मविद्याजनित वीर्यको आत्माद्वारा
विन्दतेऽमृतम् अमृतत्वम् । | ही प्राप्त करता है, इसलिये आत्म-
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” | सम्बन्धिनी विद्यासे ही अमरत्व प्राप्त
( मु० उ० ३ । २ । ४ ) इत्या- | करता है । अथर्ववेदीय ( मुण्डक )
थर्वणे । अतः समर्थो हेतुः अमृ- | उपनिषदमें कहा है—“यह आत्मा
तत्वं हि विन्दत इति ॥४॥ | बलहीन पुरुषको प्राप्त होने योग्य
| नहीं है” । अतः यह आत्मविद्यारूप
| हेतु [ मृत्युका निवारण करनेमें ]
| समर्थ है क्योंकि इससे अमरत्व
| प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
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कष्टा खलु सुरनरतिर्यक्प्रेता- | जिनमें सांसारिक दुःखोंकी बहुलता
दिषु संसारदुःखबहुलेषु प्राणि- | है उन देवता, मनुष्य, तिर्यक् और
निकायेषु जन्मजरामरणरोगादि | प्रेतादि प्राणियोंमें अज्ञानवश
संप्राप्तिरज्ञानात् । अतः— | जन्म, जरा, मरण और रोगादिकी
| प्राप्ति होना निश्चय ही बड़े दुःखकी
| बात है । अतः—
वाक्य-भाष्य
वा विदितं मतमिति । उभयत्र | हुआ ही मत (जाना हुआ) है।
प्रतिबोधशब्दप्रयोगोऽस्ति सुप्त- | सोनेसे जागा हुआ तथा गुरुद्वारा
प्रतिबुद्धो गुरुणा प्रतिबोधित | प्रतिबोधित—दोनों ही जगह
इति । पूर्वं तु यथार्थम् ॥ ४ ॥ | ‘प्रतिबोध’ शब्दका प्रयोग होता है ।
| परन्तु इन तीनोंमें सबसे पहला अर्थ
| ही ठीक है ॥ ४ ॥
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८४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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आत्मज्ञान ही सार है
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती
विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद-
मृता भवन्ति ॥ ५ ॥
यदि इस जन्ममें ब्रह्मको जान लिया तब तो ठीक है और यदि
उसे इस जन्ममें न जाना तब तो बड़ी भारी हानि है। बुद्धिमान् लोग
उसे समस्त प्राणियोंमें उपलब्ध करके इस लोकसे जाकर (मरकर)
अमर हो जाते हैं॥ ५ ॥
पद-भाष्य
इह एव चेत् मनुष्योऽधिकृतः | यदि किसी अधिकारी पुरुषने
समर्थः सन् यदि अवेदीद् | सामर्थ्य लाभ कर इस लोकमें ही
आत्मानं यथोक्तलक्षणं विदित- | उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त आत्माको
वान् यथोक्तेन प्रकारेण, अथ | पूर्वोक्त प्रकारसे जान लिया, तब
तदा अस्ति सत्यं मनुष्यजन्म- | तो उसके इस मनुष्यजन्ममें सत्य—
न्यास्मिन्नविनाशोऽर्थवत्ता वा | अविनाशिता—सार्थकता—सद्भाव
वाक्य-भाष्य
इह चेदवेदीत् इत्यवश्यकर्त- | 'इहचेदवेदीदथ सत्यमस्ति' यह
व्यतोक्तिर्विपर्यये विनाशश्रुतेः। | श्रुति आत्मसाक्षात्कारकी अवश्य-
कर्तव्यता बतलानेवाली है, क्योंकि
इसकी विपरीत अवस्थामें श्रुतिने
इह मनुष्यजन्मनि सत्यवश्य- | विनाश बतलाया है। इह अर्थात् इस
मनुष्य-जन्मके रहते हुए आत्माको
मात्मा वेदितव्य इत्येतद्विधीयते। | अवश्य जान लेना चाहिये—ऐसा
कथमह चेदवेदीद्विदितवान्, अथ | विधान किया जाता है। किस प्रकार
कि यदि इस जन्ममें आत्माको जान
सत्यं परमार्थतत्त्वमस्त्यवाप्तं | लिया तो ठीक है, उसे परमार्थतत्त्व
प्राप्त हो गया; अभिप्राय यह कि
तस्य जन्म सफलमित्यभिप्रायः। | उसका जन्म सफल हो गया। और
न चेदिहावेदीन्न विदितवान् | यदि उसे इस जन्ममें न जाना-न
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
पद-भाष्य
सद्भावो वा परमार्थता वा सत्यं | अथवा परमार्थता विद्यमान है ।
विद्यते । न चेदिहावेदीदिति, न | और यदि न जाना अर्थात् इस लोकमें जीवित रहते हुए ही उस
चेद् इह जीवंश्चेद् अधिकृतः | अधिकारीने आत्मज्ञान प्राप्त न
अवेदीत् न विदितवान्, तदा | किया तो उसे महान्—दीर्घ यानी
महती दीर्घा अनन्ता विनष्टिः | अनन्त विनाश अर्थात् जन्म, जरा
विनाशनं जन्मजरामरणादि- | और मरण आदिकी परम्पराका
प्रबन्धाविच्छेदलक्षणा संसार- | विच्छेद न होनारूप संसारगतिकी
गतिः । | ही प्राप्ति होती है ।
तस्मादेवं गुणदोषौ विजा- | अतः इस प्रकार गुण और दोषको
नन्तो ब्राह्मणाः भूतेषु भूतेषु | जाननेवाले धीर—बुद्धिमान् ब्राह्मण-
सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च एक- | लोग प्राणी-प्राणीमें अर्थात् सम्पूर्ण
मात्मतत्त्वं ब्रह्म विचित्य विज्ञाय | चराचर जीवोंमें एक ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्वको 'विचित्य'—जानकर
वाक्य-भाष्य
वृथैव जन्म । अपि च महती | समझा तो उसका जन्म वृथा ही गया ।
विनष्टिर्महान्विनाशो जन्म- | यही नहीं, जन्म-मरणपरंपराकी
मरणप्रबन्धाविच्छेदप्राप्तिलक्षणः | अविच्छिन्नतारूप बड़ी भारी हानि भी
स्यात्ततस्तस्मादवश्यं तद्विच्छेदाय | है । अतः उस परम्पराके विच्छेदके लिये आत्माको अवश्य जान लेना
ज्ञेय आत्मा । | चाहिये ।
ज्ञानेन तु किं स्यादित्युच्यते । | आत्मज्ञानसे होगा क्या सो [भूतेषु
भूतेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेषु | भूतेषु आदि वाक्यसे] बतलाते हैं ।
इत्यर्थः । विचित्य पृथङ्निष्कृष्य | भूत-भूतमें अर्थात् सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंमें आत्माका शोधनकर—उसे
एकमात्रमतत्त्वं संसारधर्मैरस्पृष्ट- | उससे अलग निकालकर यानी संसारधर्मोंसे अस्पृष्ट एकमात्र आत्मतत्त्वको
८६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
८६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
साक्षात्कृत्य धीराः धीमन्तः प्रेत्य | अर्थात् साक्षात् कर यहाँसे लौटने-
व्यावृत्य ममाहंभावलक्षणाद- | पर अर्थात् ममता-अहंतारूप इस
विद्यारूपादस्माल्लोकाद् उपरम्य | अविद्यात्मक लोकसे उपरत होकर
सर्वात्मैकभावमद्वैतमापन्नाः सन्तः | सत्रमें आत्मैकत्वरूप अद्वैतभावको
अमृता भवन्ति ब्रह्मैव भवन्ती- | प्राप्त होकर अमर अर्थात् ब्रह्म ही
त्यर्थः । “स यो ह वै तत्परं ब्रह्म | हो जाते हैं, जैसा कि “जो पुरुष
वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० | निश्चयपूर्वक उस परब्रह्मको जानता
३।२।९) इति श्रुतेः ॥५॥ | है वह ब्रह्म ही हो जाता है” इस
श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ५ ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
मात्मभावेनोपलभ्येत्यर्थः अनेका- | आत्मभावसे उपलब्ध कर धीर—
र्थत्वाद्धांतूनां न पुनश्चित्वेति | बुद्धिमान् अर्थात् विवेकी पुरुष—
सम्भवति विरोधात् ; धीराः | जिनकी बाह्य विषयोंकी अभिलाषा
धीमन्तो विवेकिनो विनिवृत्त- | निवृत्त हो गयी है—मरकर अर्थात्
बाह्यविषयाभिलाषाः प्रेत्य मृत्वा- | इस शरीरादि अनात्मस्वरूप लोकसे
स्माल्लोकाच्छरीराद्यनात्मलक्षणात् | जिनका ममत्व और अहंकार निवृत्त
व्यावृत्तममत्वाहंकाराः सन्तः | हो गया है ऐसे होकर अमृत—अमरण-
इत्यर्थः । अमृता अमरणधर्माणो | धर्मी यानी नित्यविज्ञानामृतस्वभाववाले
नित्यविज्ञानामृतत्वस्वभावा एव | ही हो जाते हैं । धातुओंके अनेक अर्थ
भवन्ति ॥ ५ ॥ | होते हैं [ इसीलिये यहाँ ‘विचित्य’
क्रियाका उपर्युक्त अर्थ ठीक है ] यहाँ
इसका ‘चयन करके’ ऐसा अर्थ नहीं हो
सकता, क्योंकि आत्माके सम्बन्धमें ऐसा
अर्थ करनेसे विरोध आता है ॥ ५ ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
तृतीय खण्ड
यक्षोपाख्यान
वाक्य-भाष्य
ब्रह्म ह देवेभ्य इति ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोत्कीर्त्यता- 'ब्रह्म ह देवेभ्यो' इत्यादि वाक्यसे [ आरम्भ होनेवाली आख्यायिकाके
यक्षोपाख्यानस्य- दुर्विज्ञेयतोत्कीर्त्यता- द्वारा ] जो ब्रह्मकी दुर्विज्ञेयता बतलायी
प्रयोजने विवक्ष्यार्था। समाप्ता गयी है वह, ब्रह्मप्राप्तिके लिये अधिक
विकल्पाः ब्रह्मविद्या यदधीनः यत्न करना चाहिये—इस प्रयोजनके
पुरुषार्थः । अत लिये है। जिसके अधीन पुरुषार्थ है
ऊर्ध्वमर्थवादेन ब्रह्मणो दुर्विज्ञेय- वह ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। अब आगे अर्थवादद्वारा ब्रह्मकी
तोच्यते । तद्विज्ञाने कथं नु नाम दुर्विज्ञेयता बतलायी जाती है, जिससे
यत्नमधिकं कुर्यादिति । कि उसे प्राप्त करनेके लिये मनुष्य किसी-न-किसी तरह अधिक यत्न करे।
शमाद्यर्थो वाम्नायोऽभिमान- अथवा यह श्रुतिभाग अभिमानका
शातनात् । शमादि वा ब्रह्म- नाश करनेवाला होनेसे शमादिकी प्राप्ति-
विद्यासाधनं विधित्सितं तदर्थोऽय- के लिये हो सकता है। या शमादिको ब्रह्मविद्याका साधन बतलाना इष्ट है,
मर्थवादाम्नायः । न हि शमादि- अतः उसीके लिये यह अर्थवाद-श्रुति
साधनरहितस्याभिमानरागद्वेषा- है। जो पुरुष शमादि साधनसे रहित तथा अभिमान और राग-द्वेषादिसे
युक्तस्य ब्रह्मविज्ञाने सामर्थ्य- युक्त है उसका ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें
मस्ति। व्यावृत्तबाह्यमिथ्याप्रत्यय- सामर्थ्य नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म बाह्य मिथ्या प्रतीतियोंके निरसनद्वारा
ग्राह्यत्वाद्वह्मणः । यस्माच्चा- ही ग्रहण किया जाने योग्य है। यह
ग्न्यादीनां जयाभिमानं शातयति। आख्यायिका अग्नि आदिके विजय- सम्बन्धी अभिमानको नष्ट करती है,
ततश्च ब्रह्मविज्ञानं दर्शयत्यभि- इसलिये अभिमानके शान्त होनेपर ही
मानोवशमे । तस्माच्छमादि- ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति दिखलाती है। अतः इसका सारांश यह हुआ कि यह
साधनविधानार्थोऽयमर्थवाद इत्य- अर्थवाद शमादि साधनोंका विधान
वसीयते । करनेके लिये ही है।
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)]
सगुणोपासनार्थो वापोदित-
त्वात। नेदं यदिदमुपासत इत्यु-
पास्यत्वं ब्रह्मणोऽपोदितमपोदित-
त्वादतुपास्यत्वे प्राप्ते तस्यैव
ब्रह्मणः सगुणत्वेनाधिदैवमध्यात्मं
चोपासनं विधातव्यमित्येवमर्थो
वा। इत्यधिदैवतं तद्वनमित्युपा-
सितव्यमिति हि वक्ष्यति।
ब्रह्मेति परो लिङ्गात् । न
(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मपदामिप्रायः) ह्यन्यत्र परादीश्वरात्
नित्यसर्वज्ञात् परि-
भूयाग्न्यादींस्तृणं वज्रीकर्तुं
सामर्थ्यमस्ति तन्न शशाक
दग्धुमित्यादिलिङ्गाद्ब्रह्मशब्दवाच्य
ईश्वर इत्यवसीयते । न ह्यन्यथा-
ग्निस्तृणं दग्धुं नोत्सहेते वायुर्वा-
दातुम् । ईश्वरेच्छया तृणमपि
वज्रीभवतीत्युपपद्यते। तत्सिद्धि-
र्जगतो नियतप्रवृत्तेः ।
[हिन्दी-अनुवाद (दक्षिण स्तम्भ)]
अथवा यह सगुणोपासनाका विधान
करनेके लिये भी हो सकता है, क्योंकि
पहले ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध कर
चुके हैं। पहले 'नेदं यदिदमुपासते'
इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध
हो चुका है; इस प्रकार निषिद्ध हो
जानेसे ब्रह्मकी अनुपास्यता प्राप्त
होनेपर उसी ब्रह्मकी सगुणभावसे
अधिदैव या अध्यात्म उपासना करनी
चाहिये इसीको बतलानेके लिये यह
अर्थवाद हो सकता है, जैसा कि आगे
चलकर 'तद्वनमित्युपासितव्यम्' इस
[४।६ मन्त्र] से उसके अधिदैवरूप-
के उपास्यत्वका वर्णन करेंगे।
'ब्रह्म' इस शब्दसे यहाँ परमात्मा
(ईश्वर) समझना चाहिये, क्योंकि
यहाँ उसीकी सूचना देनेवाले लिंग
(चिह्न) देखे जाते हैं । नित्यसर्वज्ञ
परमेश्वरको छोड़कर और किसीमें
अग्नि आदि देवताओंका पराभव करके
तृणको वज्र बना देनेकी शक्ति नहीं हो
सकती। अतः 'तन्न शशाक दग्धुम्'
(उसे अग्नि नहीं जला सका) इत्यादि
लिंगसे ब्रह्मशब्दका वाच्य ईश्वर ही
है—ऐसा निश्चित होता है। इसके
सिवा और किसी कारणसे अग्नि तृणको
जलानेमें और वायु उसे उड़ानेमें
असमर्थ नहीं हो सकते थे। हाँ, यह
ठीक है कि ईश्वरकी इच्छासे तो तृण
भी वज्र हो जाता है। उस ईश्वरकी
सिद्धि संसारकी नियमित प्रवृत्तिसे
होती है।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
वाक्य-भाष्य
[संस्कृत-मूल]
श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिभिर्नित्य-
सर्वविज्ञान ईश्वरे सर्वात्मनि सर्व-
शक्तौ सिद्धेऽपि शास्त्रार्थनिश्च-
यार्थमुच्यते । तस्येश्वरस्य सद्भाव-
सिद्धिः कुतो भवतीत्युच्यते ।
यदिदं जगद्देवगन्धर्वयक्षरक्षः-
(ईश्वरस्य जगन्नियन्तृत्व-निरूपणम्) पितृपिशाचादि-
लक्षणं द्युवियत्पृथिव्यादित्यचन्द्रग्रह-
नक्षत्रविचित्रं विविध-
प्राण्युपभोगयोग्यस्थानसाधन-
सम्बन्धि तदत्यन्तकुशलशिल्पि-
भिरपि दुर्निर्माणं देशकाल-
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति-
क्रममेतद्भोक्तृकर्मविभागज्ञप्रयत्न-
पूर्वकं भवितुमर्हति; कार्यत्वे
सति यथोक्तलक्षणत्वात् । गृह-
प्रासादरथशयनासनादिवत् ।
विपक्ष आत्मादिवत् ।
[हिन्दी-अनुवाद]
यद्यपि नित्यसर्वविज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् ईश्वर श्रुति, स्मृति और प्रसिद्धिसे सिद्ध भी है तो भी शास्त्रके अर्थको निश्चय करनेके लिये यहाँ यह [अनुमान] कहा जाता है । उस ईश्वरके सद्भावकी सिद्धि किस प्रकार होती है ? इसपर कहते हैं—
स्वर्ग, आकाश, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके कारण विचित्र दीखनेवाला तथा नाना प्रकारके प्राणियोंके उपभोगयोग्य स्थान और साधनोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह जितना देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और पिशाचादिरूप जगत् है वह अत्यन्त कुशल शिल्पियोंद्वारा भी बनाया जाना कठिन है । अतः यह देश, काल और निमित्तके अनुरूप नियमित प्रवृत्ति-निवृत्तिके क्रमवाला जगत् भोक्ता और कर्मके विभागको जाननेवाले किसी चेतनके प्रयत्नपूर्वक ही हो सकता है, क्योंकि कार्यरूप होनेके कारण यह उपर्युक्त लक्षणोंवाला है । जैसे कि गृह, प्रासाद, रथ, शय्या और आसन आदि [सभी कार्यरूप अनित्य पदार्थ देखे जाते हैं]; तथा इसके विपरीत [व्यतिरेकी दृष्टान्तरूप] आत्मा आकाश आदि [नित्य पदार्थ हैं] ।
९० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
कर्मण एवेति चेत् ? न । पर- | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति
[कर्मणाम्-] तन्त्रस्य निमित्तमात्र- | कर्मसे ही है तो ऐसा कहना ठीक
[स्वातन्त्र्यम्] त्वात् । यदिदमुपभोग- | नहीं, क्योंकि कर्म परतन्त्र होनेके
वैचित्र्यं प्राणिनां | कारण केवल उसका निमित्त हो सकता
तत्साधनवैचित्र्यं च देशकाल- | है । [ मीमांसककी युक्तिको स्पष्ट करके
| दिखलाते हैं ] यह जो प्राणियोंके
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- | उपभोगकी विचित्रता है तथा उनके
| साधनोंकी विभिन्नता और देश, काल
क्रमं च तन्न नित्यसर्वज्ञकर्तृकम् । | तथा निमित्तके अनुरूप प्रवृत्ति-निवृत्ति-
| का नियमित क्रम है वह किसी नित्य
किं तर्हि ? कर्मण एव तस्या- | सर्वज्ञका रचा हुआ नहीं है । तो
| किसका रचा हुआ है ? [ इसपर कहते
चिन्त्यप्रभावत्वात् सर्वैश्च फल- | हैं—] यह केवल कर्मका ही फल है
हेतुत्वाभ्युपगमात् । सति कर्मणः | क्योंकि वह अचिन्त्य प्रभाववाला है
| तथा सभीने उसे फलके हेतुरूपसे
फलहेतुत्वे किमीश्वराधिक- | स्वीकार किया है । इस प्रकार फलके
कल्पनयेति न नित्यस्येश्वरस्य | हेतुरूपसे कर्मके रहते हुए ईश्वरकी
| अधिक कल्पना करनेसे क्या लाभ है ?
नित्यसर्वज्ञशक्तेः फलहेतुत्वं | अतः नित्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान्
| ईश्वरमें फलका हेतुत्व नहीं है ।
चेति चेत् । | सिद्धान्ती—केवल कर्मसे ही उपभोग
न कर्मण एवोपभोगवैचित्र्या- | आदिकी विचित्रता सम्भव नहीं है ।
| किस कारणसे ? क्योंकि कर्म कर्ताके
द्युपपद्यते । कस्मात् ? कर्तृतन्त्र- | अधीन हैं । चेतन पुरुषके यत्नसे
त्वात्कर्मणः । चितिमत्प्रयत्न- | निष्पन्न होनेवाला कर्म उसके प्रयत्नके
निर्वृत्तं हि कर्म तत्प्रयत्नोपरमात्- | निवृत्त होनेसे निवृत्त होकर देशान्तर
| या कालान्तरमें किसी नियत निमित्त-
उपरतं सद्देशान्तरे कालान्तरे | विशेषकी अपेक्षासे ही कर्ताको फलकी
वा नियतनिमित्तविशेषापेक्षं | प्राप्ति करावेगा—ऐसी व्यवस्था होनेके
| कारण यह कहना उचित नहीं कि वह
कर्तुः फलं जनयिष्यतीति न युक्त- | अपने किसी दूसरे प्रवर्त्तककी अपेक्षा
मनपेक्ष्यान्यदात्मनः प्रयोक्तृ । | न करके ही फल दे देता है । यदि
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
९२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
९२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
परित्यक्तानि न फलं कालान्तरे | कर्ताद्वारा त्याग दिये जाते हैं, कालान्तर-
कर्तुमुत्सहन्ते न हि हलं क्षेत्राद् | में उसका फल देनेमें समर्थ नहीं हो
व्रीहीन्गृहं प्रवेशयति । भूतकर्म- | सकते । हल धान्योंको खेतसे ले जाकर
णोश्चाचेतनत्वात्स्वतः प्रवृत्त्यनुप- | घरमें नहीं पहुँचा सकता । अतः
| अचेतन होनेके कारण भूत और
पत्तिः । वायुवदिति चेन्नासिद्ध- | कर्मोंकी स्वतः प्रवृत्ति असम्भव है ।
| यदि कहो कि [ अचेतन होनेपर भी ]
त्वात् । न हि वायोरचितिमत्- | वायुके समान इनकी स्वतः प्रवृत्ति हो
| सकती है तो ऐसा कहना ठीक नहीं,
स्वतःप्रवृत्तिः सिद्धा रथादिष्व- | क्योंकि वह असिद्ध है । अचेतन
| वायुकी स्वतः प्रवृत्ति सिद्ध नहीं हो
दर्शनात् । | सकती, क्योंकि रथादि अन्य अचेतन
| पदार्थोंमें वह देखी नहीं जाती ।
शास्त्रात्कर्मण एवेति चेच्छास्त्रं | मीमांसक-शास्त्रानुसार तो कर्मसे
हि क्रियातः फलसिद्धिमाह | ही फल मिलता है, क्योंकि 'स्वर्गकामो
नेश्वरादेः स्वर्गकामो यजेतेत्यादि। | यजेत' इत्यादि शास्त्र कर्मसे ही फलकी
न च प्रमाणाधिगतत्वादानर्थक्यं | सिद्धि बतलाता है, ईश्वरादिसे नहीं ।
| इस प्रकार जो बात प्रमाणसिद्ध है
युक्तम् । न चेश्वरस्तित्वे प्रमा- | उसको व्यर्थ बतलाना भी ठीक नहीं है,
णान्तरमस्तीति चेत् । | और ईश्वरकी सत्तामें भी [अर्थापत्तिका
| छोड़कर] और कोई प्रमाण नहीं है ।
न । दृष्टन्यायहानानुपपत्तेः । | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं,
| क्योंकि दृष्ट न्यायको त्यागना उचित
[क्रियाभेद-] क्रिया हि द्विविधा दृष्ट- | नहीं है । क्रिया दो प्रकारकी है—
[निरूपणम्] फलादृष्टफला च, दृष्ट- | दृष्टफला और अदृष्टफला । दृष्ट-
फलापि द्विविधानन्तर- | फलाके भी दो भेद हैं—अनन्तरफला¹
फलागामिफला च, अनन्तरफला | और आगामिफला² । गमन और
गतिभुजिलक्षणा । कालान्तरफला | भोजन इत्यादि क्रियाएँ अनन्तरफला
| हैं तथा कृषि और सेवा आदि
१. तत्काल फल देनेवाली । २. भविष्यमें फल देनेवाली ।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
वाक्य-भाष्य
च कृषिसेवादि लक्षणा तत्रानन्तर- | कालान्तरफला हैं । उनमें जो जो
फला फलापवर्गिण्येव कालान्तर- | अनन्तरफला हैं वे फलोदयके समय
फला तूत्पन्नप्रध्वंसिनी । | ही नष्ट हो जाती हैं तथा कालान्तर-
| फला उत्पन्न होकर [फल देनेसे पूर्व
आत्मसेव्याद्यधीनं हि कृषि- | ही] नष्ट हो जानेवाली हैं ।
सेवादेः फलम् यतः । न चोभय- | क्योंकि कृषिका फल अपने अधीन
न्यायव्यतिरेकेण स्वतन्त्रं कर्म | है और सेवा आदिका फल अपने
ततो वा फलं दृष्टम् । तथा च | सेव्यके अधीन है । इस दो प्रकारके
कर्मफलप्राप्तौ न दृष्टन्यायहान- | न्यायको छोड़कर कर्म या उससे प्राप्त
मुपपद्यते । तस्माच्छान्ते यागादि- | होनेवाला फल स्वतन्त्र देखा भी नहीं
कर्मणि नित्यः कर्तृकर्मफल- | जाता; तथा कर्मफलकी प्राप्तिमें इस
विभागज्ञ ईश्वरः सेव्यादिवद्या- | स्पष्ट दीखनेवाले न्यायको छोड़ना
गाद्यनुरूपफलदातोपपद्यते । स | उचित भी नहीं है, इसलिये यागादि
चात्मभूतः सर्वस्य सर्वक्रिया- | कर्मोंके समाप्त हो जानेपर उन यागादि-
फलप्रत्ययसाक्षी नित्यविज्ञान- | के अनुरूप फल देनेवाला तथा कर्त्ता,
स्वभावः संसारधर्मैरसंस्पृष्टः । | कर्म और फलके विभागको जाननेवाला
श्रुतेश्च । “न लिप्यते लोक- | ईश्वर सेव्य आदिके समान होना ही
दुःखेन बाह्यः” | चाहिये, और वह सबका अन्तरात्मा,
(ईश्वरास्तित्व-साधनम्) (क० उ० २।२।११) | सम्पूर्ण कर्मफल और प्रतीतियोंका
“जरां मृत्युमत्येति” | साक्षी, नित्यविज्ञानस्वरूप तथा
(बृ० उ० ३।५।१) “विजरो | सांसारिक धर्मोंसे अछूता होना चाहिये ।
विमृत्युः” । (छा० उ० | यही बात श्रुतिसे भी सिद्ध होती
८।७।१) “सत्यकामः सत्य- | है। “सम्पूर्ण लोकोंसे विलक्षण परमात्मा
सङ्कल्पः (छा० उ० ८।७।१) | लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता”
“एष सर्वेश्वरः” (मा० उ० ६) | “वह जरा और मृत्युको पार किये हुए
“साधु कर्म कारयति” (कौषी० | है” “जरा और मृत्युसे रहित है” “वह
उ० ३।९) “अनश्नन्नन्यो अभि- | सत्यकाम सत्यसङ्कल्प है” “यह सर्वेश्वर
| है” “वह शुभ कर्म कराता है” “दूसरा
| [पक्षी] कर्मफलको न भोगता हुआ
९४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
९४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
चाकशीति" (श्वे० उ० ४।६) | केवल उसे देखता है" "इस अक्षर-
"एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" | ब्रह्मको आज्ञामें [ सूर्य और चन्द्रमा
(बृ० उ० ३।८।९) इत्याद्या | स्थित हैं ]" इत्यादि श्रुतियाँ संसार-
असंसारिण एकस्यात्मनो नित्य- | धर्मोंसे रहित एक नित्यमुक्त आत्माकी
मुक्तस्य सिद्धौ श्रुतयः। स्मृतयश्च | सिद्धिमें ही प्रमाणभूत हैं। इसी प्रकार-
सहस्रशो विद्यन्ते। न चार्थवादाः | सहस्रों स्मृतियाँ भी मौजूद हैं। ये सब
शक्यन्ते कल्पयितुम्। अनन्य- | अर्थवाद हैं—ऐसी कल्पना भी नहीं
योगित्वे सति विज्ञानोत्पादक- | की जा सकती, क्योंकि वे किसी अन्य
त्वात्। न चोत्पन्नं विज्ञानं | विधिके शेषभूत न होनेके कारण
बाध्यते। | स्वतन्त्र ज्ञान उत्पन्न करनेवाले हैं और
| उनसे उत्पन्न हुआ ज्ञान [किसी
| प्रमाणान्तरसे] बाधित भी नहीं होता।
अप्रतिषेधाच्च। न चेश्वरो | [ईश्वरका] निषेध न होनेके कारण
| भी [पूर्वोक्त श्रुतियाँ अर्थवाद नहीं हैं]।
नास्तीति निषेधोऽस्ति। प्राप्त्य- | ईश्वर नहीं है—ऐसा निषेध कहीं
| भी नहीं मिलता। यदि कहो कि
भावादिति चेन्नोक्तत्वात्। न | ईश्वरकी प्राप्ति (सिद्धि) न होनेके
| कारण निषेध नहीं है, तो ऐसा कहना
हिंस्यादितिवत्प्राप्त्यभावात्प्रति- | उचित नहीं; क्योंकि उसके विषयमें कहा
| जा चुका है। अर्थात् यदि ऐसा कहो
| कि [शास्त्रमें] ईश्वरका कोई प्रसङ्ग
षेधो नारभ्यत इति चेन्न। | ही नहीं आता, इसीलिये 'न हिंस्यात्सर्वा
| भूतानि' इस वाक्यके समान ईश्वरके
ईश्वरसद्भावे न्यायस्योक्तत्वात्। | निषेधका भी आरम्भ नहीं किया गया,
| तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि
अथवाप्रतिषेधादिति कर्मणः फल- | ईश्वरकी सत्तामें उपर्युक्त न्याय कहा
| गया है। अथवा 'अप्रतिषेधात्' इस हेतु
दान ईश्वरकालादीनां न प्रति- | का यह तात्पर्य समझना चाहिये कि कर्म
| का फल देनेमें ईश्वर और काल आदिका
षेधोऽस्ति। न च निमित्तान्तर- | प्रतिषेध नहीं किया गया है। कर्मको,
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
वाक्य-भाष्य
निरपेक्षं केवलेन कर्त्रैव प्रयुक्तं | किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करके केवल कर्तासे ही प्रेरित होकर फल
फलदं दृष्टम् । न विनष्टोऽपि | देते देखा भी नहीं है । सर्वथा नष्ट हुआ याग कालान्तरमें फल देनेवाला
यागः कालान्तरे फलदो भवति । | कभी नहीं होता ।
सेव्यबुद्धिवत्सेवकेन सर्वज्ञे- | जिस प्रकार सेवककी सेवासे सेव्य (स्वामी) की बुद्धिपर संस्कार पड़ .
[कर्मफलप्रदाने] श्वरबुद्धौ तु संस्कृ- | जाता है उसी प्रकार यागादि कर्मसे सर्वज्ञ ईश्वरकी बुद्धिके संस्कारयुक्त
[ईश्वरस्य] तायां यागादि- | हो जानेसे, फिर उस कर्मके नष्ट हो जानेपर भी, जैसे सेवकको स्वामीसे
[प्राधान्यम्] कर्मणा विनष्टेऽपि | वैसे ही कर्ताको ईश्वरसे फल मिल जाता है—ऐसा विचार ही ठीक है ।
कर्मणि सेव्यादिव | पदार्थ तो, सैकड़ों प्रमाणभूत वाक्य होनेपर भी, देशान्तर या कालान्तरमें
ईश्वरात्फलं कर्तुर्भवतीति युक्तम् । | अपने स्वभावको नहीं छोड़ते । अग्नि किसी भी देश या कालान्तरमें शीतल
न तु पुनः पदार्था वाक्यशतेनापि | नहीं हो सकता । इस प्रकार कर्मोंका भी कालान्तरमें दो ही प्रकार फल
देशान्तरे कालान्तरे वा स्वं स्वं | मिलता देखा जाता है ।
स्वभावं जहति । न हि देश- | कृषि आदि कर्म ऐसे कर्ताकी अपेक्षासे फल देनेवाले हैं जिसे बीज,
कालान्तरेषु चाग्निरनुष्णो भवति। | क्षेत्रसंस्कार तथा खेतीकी रक्षा आदिका ज्ञान हो, और सेवा आदि कर्म
एवं कर्मणोऽपि कालान्तरे फलं | विज्ञानवान् सेव्यकी बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे फलदायक हैं । यागादि
द्विप्रकारमेवोपलभ्यते । | कर्म कालान्तरमें फल देनेवाले हैं इसलिये उनकी फलप्राप्तिको अज्ञानी
बीजक्षेत्रसंस्कारपरिरक्षावि- | कर्ताकी अपेक्षासे मानना तो ठीक नहीं है; अतः उनका फल कर्म, देश,
ज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलं कृष्यादि वि- | काल, निमित्त और कर्मविपाकके विभागको जाननेवाले किसी चेतनकी
ज्ञानवत्सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलं | बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे ही हो
च सेवादि । यागादेः कर्मणस्त- |
थाविज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलत्वानुप- |
पत्तौ कालान्तरफलत्वात्कर्मदेश- |
कालनिमित्तविपाकविभागज्ञबुद्धि- |
संस्कारापेक्षं फलं भवितु- |
९६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
९६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
मर्हति; सेवादिकर्मानुरूपफलज्ञ- | सकता है, जैसे कि सेवा आदि कर्मोंका
सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलस्येव । | फल उसके अनुरूप फलको जाननेवाले
तस्मात्सिद्धः सर्वज्ञ ईश्वरः सर्व- | सेव्यकी बुद्धिपर हुए संस्कारकी
जन्तुबुद्धिकर्मफलविभागसाक्षी | अपेक्षासे मिलता है। इससे सम्पूर्ण
सर्वभूतान्तरात्मा । "यत्साक्षा- | जीवोंकी बुद्धि कर्म और फलके
दपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वा- | विभागका साक्षी, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ
न्तरः" (बृ० उ० ३ । ४ । १) | ईश्वर सिद्ध हुआ। "जो साक्षात्
इति श्रुतेः । | अपरोक्ष ब्रह्म है जो सर्वान्तर आत्मा
| है" इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित
| होता है।
स एव चात्रात्मा जन्तूनां | और वही इस सृष्टिमें जीवोंका
[ईश्वरस्य सर्वात्म्य-स्थापनम्] नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता “नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ” (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्याद्यात्मान्तरप्रतिषेधश्रुतेः । "तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८+१६) इति चात्मत्वोपदेशात् । न हि मृत्पिण्डः काञ्चनात्मत्वेनोपदिश्यते । | आत्मा है। उससे भिन्न और कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता अथवा विज्ञाता नहीं है, जैसा कि "इससे भिन्न और कोई विज्ञाता नहीं है" इत्यादि भिन्न आत्माका प्रतिषेध करनेवाली श्रुतिसे, तथा "तत्त्वमसि” इस महावाक्यद्वारा ब्रह्मका आत्मत्व उपदेश करनेसे सिद्ध होता है। मिट्टीके ढेलेका सुवर्णरूपसे कभी उपदेश नहीं किया जाता।
ज्ञानशक्तिकर्मोपास्योपासक- | यदि कहो कि ज्ञान, शक्ति, कर्म,
शुद्धाशुद्धमुक्तामुक्तभेदादात्मभेद | उपास्य-उपासक, शुद्ध-अशुद्ध तथा मुक्त-
एवेति चेन्न। भेददृष्ट्यपवादात् । | अमुक्त इत्यादि भेदोंके कारण आत्माका
| भेद ही है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं,
| क्योंकि भेददृष्टिकी निन्दा की गयी है।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
पद-भाष्य
| [वक्ष्यमाणा-ख्यायिकायाः प्रयोजनम्] | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्' इत्यादि-श्रवणाद् यदस्ति तद्विज्ञातं प्रमाणैः यन्नास्ति तदविज्ञातं शशविषाणकल्पमत्यन्तमेवासद्दृष्टम् ; तथेढं ब्रह्माविज्ञातत्वादसदेवेति मन्दबुद्धीनां व्यामोहो मा भूदिति तदर्थेयमाख्यायिका आरभ्यते । | 'ब्रह्म जाननेवालोंके लिये अविज्ञात है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात है' इस श्रुतिसे मन्दबुद्धि पुरुषोंको ऐसा भ्रम न हो जाय कि 'जो वस्तु है वह तो प्रमाणोंसे जान ही ली जाती है और जो नहीं है वह अविज्ञात वस्तु तो खरगोशके सींगके समान अत्यन्त अभावरूप ही देखी गयी है, अतः यह ब्रह्म भी अविज्ञात होनेके कारण असत् ही है' इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है । |
|---|
वाक्य-भाष्य
यदुक्तं संसारिण ईश्वरादनन्या इति; तन्न ।
पूर्व०—तुमने जो कहा कि संसारी जीवोंका ईश्वरसे अभेद है सो ठीक नहीं।
किं तर्हि ?
सिद्धान्ती—तो फिर क्या बात है ?
भेद एव संसार्यात्मनाम् ।
पूर्व०—संसारी जीव और परमात्माका तो परस्पर भेद ही है।
कस्मात् ?
सिद्धान्ती—क्यों ?
लक्षणभेदादश्वमहिषवत् । कथं लक्षणभेद इत्युच्यते—ईश्वरस्य तावन्नित्यं सर्वविषयं ज्ञानं सवितृप्रकाशवत् । तद्विपरीतं संसारिणां खद्योतस्येव । तथैव शक्तिभेदोऽपि । नित्या
पूर्व०—घोड़े और भैंसके समान उनके लक्षणोंमें भेद होनेके कारण; और यदि कहो कि उनके लक्षणोंमें किस प्रकार भेद है तो बतलाते हैं [सुनो, ] सूर्यके प्रकाशके समान ईश्वरको सब विषयोंका सर्वदा ज्ञान रहता है, उसके विपरीत संसारी जीवोंको खद्योत (जुगनू) के समान अल्पज्ञान है। इसी प्रकार दोनोंकी शक्तियोंमें भी भेद है । ईश्वरकी शक्ति नित्य
९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
तदेव हि ब्रह्म सर्वप्रकारेण | वह ब्रह्म ही सब प्रकारसे शासन
प्रशास्तृ देवानामति परोदेवः, | करनेवाला, देवताओंका भी परम देव,
ईश्वराणामपि परमेश्वरः, दुर्विज्ञेयः, | ईश्वरोंका भी परम ईश्वर, दुर्विज्ञेय
देवानां जयहेतुः, असुराणां | तथा देवताओंकी जयका कारण और असुरोंकी पराजयका हेतु है।
वाक्य-भाष्य
सर्वविषया चेश्वरशक्तिर्विपरीते- | और सर्वतोमुखी है तथा जीवकी
तरस्य। कर्म च चित्स्वरूपात्म- | इसके विपरीत है। ईश्वरका कर्म भी
सत्तामात्रनिमित्तमीश्वरस्य। औ- | उसके चित्स्वरूपकी सत्तामात्रसे ही होनेवाला है जैसे कि उष्णतारूप
ष्ण्यस्वरूपद्रव्यसत्तामात्रनिमित्त- | [सूर्यकान्तमणि आदि] द्रव्योंकी सत्तामात्रसे दहनकार्य निष्पन्न हो जाता
दहनकर्मवत् । राजाद्यस्कान्त- | है, अथवा जैसे राजा, चुम्बक और प्रकाशसे होनेवाले कार्य [उनकी
प्रकाशकर्मवच्च स्वात्माविक्रिया- | सन्निधिमात्रसे] होते हैं उसी प्रकार ईश्वरके कर्म उसके स्वरूपमें विकार
रूपम्। विपरीतमितरस्य। उपासी- | उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, किन्तु जीवके कर्म इससे विपरीत हैं।
तेतिवचनादुपास्य ईश्वरो गुरु- | "उपासीत" इस श्रुतिके अनुसार
राजवत् । उपासकश्चेतरः | ईश्वर गुरु एवं राजाके समान उपासनीय
शिष्यभृत्यवत्। अपहतपाप्मादि- | है तथा जीव शिष्य और सेवकके समान उपासक है। "अपहतपाप्मा" आदि
श्रवणान्नित्यशुद्ध ईश्वरः। | श्रुतियोंके अनुसार ईश्वर नित्यशुद्ध है
पुण्यो वै पुण्येनेतिवचनाद्विपरीत | तथा "पुण्यो वै पुण्येन" आदि
इतरः। | श्रुतिवाक्योंसे जीव इसके विपरीत-स्वभाववाला है।
अत एव नित्यमुक्त एवेश्वरो | अतः ईश्वर तो नित्यमुक्त ही है
नित्याशुद्धियोगात्संसारीतरः । | किन्तु जीव नित्य अशुद्धिके योगके कारण संसारी है। तथा जहाँ ज्ञानादि
अपि च यत्र ज्ञानादिलक्षणभेदः | लक्षणोंमें भेद रहता है वहाँ सर्वदा भेद
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
पद-भाष्य
पराजयहेतुः; तत्कथं नास्तीत्येत- | तब वह है किस प्रकार नहीं ?
स्वार्थस्यानुकूलानि ह्युत्तराणि | [ अर्थात् अवश्य ही है ] । इस अर्थके अनुकूल ही इस खण्डके आगेके
वचांसि दृश्यन्ते । | वाक्य देखे जाते हैं ।
वाक्य-भाष्य
अस्ति तत्र भेदो दृष्टः; यथाश्व- | ही देखा गया है; जैसे घोड़े और
महिषयोः । तथा ज्ञानादिलक्षण- | भैंसमें । अतः इसी प्रकार ज्ञानादि
भेदादीश्वरादात्मनां भेदोऽस्तीति | लक्षणोंमें भेद रहनेके कारण ईश्वर और
चेत् । | जीवोंमें भेद ही है ।
न । | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है ।
कस्मात् ? | पूर्व०—कैसे ?
"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति | सिद्धान्ती—क्योंकि "यह (ब्रह्म)
न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) | अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो
"ते क्षय्यलोका भवन्ति" (छा० | जानता है वह [ब्रह्मके यथार्थ स्वरूप-
उ० ७।२५।२) "मृत्योः स | को] नहीं जानता" "वे नाशवान्
मृत्युमाप्नोति" (क० उ० २।१।१०) | लोकोंको प्राप्त होते हैं" "वह मृत्युसे
इति भेददृष्टिर्ह्यपोद्यते । एकत्व- | मृत्युको प्राप्त होता है" इत्यादि
प्रतिपादिन्यश्च श्रुतयः सहस्रशा | वाक्योंसे भेददृष्टिका निषेध किया जाता
विद्यन्ते । | है और एकत्वका प्रतिपादन करने-
| वाली तो सहस्रों श्रुतियाँ विद्यमान हैं।
यदुक्तं ज्ञानादिलक्षणभेदादि- | तथा तुमने जो कहा कि ज्ञानादि
त्यत्रोच्यते—न | लक्षणोंमें भेद होनेके कारण जीव और
ज्ञानादिभेदस्य औपाधिकत्वम् | ईश्वरका भेद ही है, सो इस विषयमें
अनभ्युपगमात् । | मेरा यह कथन है कि उनमें कुछ भी
बुद्ध्यादिभ्यो व्यति- | भेद नहीं है, क्योंकि हमें उनके ज्ञानादि-
रिक्ता विलक्षणाश्चेश्वराद्भिन्न- | का भेद मान्य नहीं है। बुद्धि आदि
लक्षणा आत्मानो न सन्ति। एक | उपाधियोंसे व्यतिरिक्त और विलक्षण
एवेश्वरश्चात्मा सर्वभूतानां | ऐसे कोई जीव नहीं हैं जो ईश्वरसे
| भिन्न लक्षणवाले हों। एक ही नित्यमुक्त
| ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा माना
१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
अथवा ब्रह्मविद्यायाः स्तुतये । | अथवा इस ( आख्यायिका )
कथम् ? ब्रह्मविज्ञानाद्धि अग्न्या- | का आरम्भ ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके
दयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः । | लिये है । किस प्रकार ? क्योंकि
ततोऽप्यतितरामिन्द्र इति । | ब्रह्मज्ञानसे ही अग्नि आदि देवगण
| देवताओंमें श्रेष्ठत्वको प्राप्त हुए थे और
| उनमें भी इन्द्र सबसे बढ़कर हुआ ।
वाक्य-भाष्य
नित्यमुक्तोऽभ्युपगम्यते । बाह्य- | जाता है; क्योंकि चक्षु और बुद्धि
श्चक्षुर्बुद्ध्यादिसमाहारसन्तानाहं- | आदि संघातकी परम्परासे प्राप्त हुए
कारममत्वादि विपरीतप्रत्ययप्र- | अहंकार और ममतारूप विपरीत
बन्धाविच्छेदलक्षणो नित्यशुद्ध- | ज्ञानका विच्छेद न होना ही जिसका
बुद्धमुक्तविज्ञानात्मेश्वरगर्भो नित्य- | लक्षण है, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त
विज्ञानाभासश्चित्तचैत्यबीजबीजि- | विज्ञानस्वरूप ईश्वर ही जिसका
स्वभावः कल्पितोऽनित्यविज्ञान | अन्तर्यामी है, जो स्वयं नित्यविज्ञानका
ईश्वरलक्षणविपरीतोऽभ्युपगम्यते; | अवभास ( प्रतिबिम्ब ) चित्त, चैत्य
यस्याविच्छेदे संसारव्यवहारः | ( सुखादि विषय ), बीज (अविद्यादि)
विच्छेदे च मोक्षव्यवहारः । | और बीजी ( शरीरादि ) से तादात्म्यको
| प्राप्त होकर तद्रूप हो गया है तथा जो
| कल्पित, अनित्य विज्ञानवान् और
| ईश्वरके लक्षणसे विपरीत है वही बाह्य
| जीव माना गया है; जिसके इस
| औपाधिक स्वरूपका विच्छेद न होनेसे
| संसारका व्यवहार होता है तथा विच्छेद
| हो जानेपर मोक्षव्यवहार होता है ।
अन्यश्च मृत्प्रलेपवत्प्रत्यक्षप्र- | इसमें जो देव, पितृ और मनुष्यरूप
ध्वंसो देवपितृमनुष्यादिलक्षणो | भूतोंका संघातविशेष है वह मृत्तिकाके
भूतविशेषसमाहारो न पुनश्चतु- | लेपके समान प्रत्यक्ष नष्ट हो जानेवाला
र्थोऽन्यो भिन्नलक्षण ईश्वरादभ्यु- | और [ चेतन आत्मासे ] सर्वथा भिन्न
पगम्यते । | है; किन्तु जो [ स्थूल, सूक्ष्म और
| कारण तीनों प्रकारके शरीरोंसे ]
| विलक्षण चौथा आत्मा है वह ईश्वरसे
| भिन्न लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता ।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
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पद-भाष्य
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथवा दुर्विज्ञेयं ब्रह्मेत्येतत् | अथवा इससे यह दिखलाया |
| प्रदर्श्यते—येनाग्न्यादयोऽति- | गया है कि ब्रह्म दुर्विज्ञेय है, क्योंकि |
| तेजसोऽपि क्लेशेनैव ब्रह्म विदित- | अग्नि आदि परम तेजस्वी होनेपर |
| वन्तस्तथेन्द्रो देवानामीश्वरोऽपि | भी कठिनतासे ही ब्रह्मको जान |
| सके थे तथा देवताओंका स्वामी | |
| सन्निति । | होनेपर भी इन्द्रने उसे बड़ी |
| कठिनतासे पहचाना था । |
वाक्य-भाष्य
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बुद्ध्यादिकल्पितात्मव्यतिरे- | यदि कहो कि बुद्धि आदि कल्पित |
| आत्मासे [ निरुपाधिक चेतनस्वरूप ] | |
| काभिप्रायेण तु लक्षणभेदात् | आत्मा भिन्न है इस अभिप्रायसे हमने |
| 'लक्षणभेद होनेके कारण' ऐसा हेतु | |
| इत्याश्रयासिद्धो हेतुः ईश्वरात् | दिया है, तो तुम्हारा यह हेतु |
| आश्रयासिद्ध * है, क्योंकि ईश्वरसे भिन्न | |
| अन्यस्यात्मनोऽसत्त्वात् । | और किसी आत्माकी सत्ता नहीं है । |
| ईश्वरस्यैव विरुद्धलक्षणत्वम- | पूर्व०—[ यदि ईश्वरसे भिन्न और |
| कोई आत्मा नहीं है तो ] ईश्वरमें ही | |
| विरुद्धलक्षणत्व तथा सुख-दुःख | |
| युक्तमिति चेत्सुखदुःखादियोगश्च । | आदिका योग होना तो ठीक नहीं है । |
| न । निमित्तत्वे सति लोक- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है क्योंकि |
| आत्मा सूर्यके समान केवल निमित्तमात्र | |
| विपर्ययाध्यारोपणात्सविट्वत् । | है; लोगोंकी उसमें जो विपरीत बुद्धि है |
| वह केवल आरोपके कारण है । जिस | |
| यथा हि सविता नित्यप्रकाशरूप- | प्रकार सूर्य नित्यप्रकाशस्वरूप होनेके |
पादटिप्पणी:
* जहाँ पक्षमें पक्षतावच्छेदकका अभाव होता है वहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास
माना जाता है; जैसे—'आकाशकुसुम सुगन्धिमान् है, कुसुम होनेके कारण, अन्यकुसुमवत्,
इस अनुमानमें 'आकाशकुसुम' जो पक्ष है उसमें पक्षतावच्छेदकाल यानी कुसुमत्वका
अभाव है, क्योंकि आकाशकुसुम कभी किसीने नहीं देखा । इसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ।
१०२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ
पद-भाष्य
वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा | अथवा आगे कही जानेवाली
सर्वं ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां | समस्त उपनिषद् विधिपरक है।
कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या | और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियों-
| का जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका अभि-
वाक्य-भाष्य
त्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्ति- | कारण लौकिक पदार्थोंकी अभिव्यक्ति
निमित्तत्वे सति लोकदृष्टिविपर्य- | और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता
येणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृ- | है तथापि लोकोंकी दृष्टिमें विपरीत
त्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे | भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोप-
नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञाना- | का पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त
पोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे | और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी
सति लोकविपरीतबुद्ध्याध्यारो- | प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमें
पितं विपरीतलक्षणत्वं सुख- | भी लोकोंके ज्ञानका विनाश तथा सुख,
दुःखाश्रयश्च न स्वतः। | दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता
आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च। | उपस्थित होनेपर लोकोंकी विपरीत
यथा घनादिविप्रकीर्णेऽम्बरे येनैव | बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख-
सवितृप्रकाशो न दृश्यते स | दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया
आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति | जाता है, उसमें स्वतः ऐसा कोई भाव
सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति | नहीं है।
सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या। | इसके सिवा सभी जीव अपनी-
| अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमें
| आरोप करते हैं [ इसलिये भी वह उन
| सब आरोपोंसे अछूता है]। जिस प्रकार
| आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो
| जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश
| दिखलायी नहीं देता वही-वही अन्यत्र
| प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी
| दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है
| कि 'इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान
| नहीं है।' इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमें